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कविता में भाव-पक्ष मूल होता है - तेजपाल सिंह ‘तेज’ -

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कविता में भाव-पक्ष मूल होता है - तेजपाल सिंह ‘तेज’ - दुख-सुख, आचार-विचार, चेतना-अचेतना ही नहीं मुक्तावस्था भी कविता को जन्म देती है. अनुभूत...

कविता में भाव-पक्ष मूल होता है

- तेजपाल सिंह ‘तेज’ -

दुख-सुख, आचार-विचार, चेतना-अचेतना ही नहीं मुक्तावस्था भी कविता को जन्म देती है. अनुभूतियों का वह स्तर जहाँ पहुँचकर मानव स्वयं को भूल जाता है और अपनी निजता को लोक-सत्ता में लीन किए रहता है या फिर सत्ता और सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा हो जाता है, वहाँ विचारवान मानव जैसे कवि हो जाता है. संकुचन समाप्त प्राय: हो जाता है. फिर जैसा मन, वैसी कविता. व्यक्ति यदि मानसिक रूप से धार्मिक है तो धार्मिक कविता, राजनीतिक है तो राजनीतिक कविता, किसी का प्रेमी है तो प्रेमान्ध कविता, उत्पीड़ित है तो प्रताड़ना के खिलाफ चीखती-चिल्लाती अर्थात देश, काल और परिस्थिति कविता को सदैव प्रभावित करती है.

कविता अचानक किसी के दिमाग में घर नहीं करती. कविता यूँ जानिए कि प्रत्येक बच्चा जन्मजात एक कवि होता है, यदि उसे होने दिया जाए या फिर बच्चा अपनी पहली आवाज को याद रख पाए, किंतु सच यह है कि प्रत्येक बच्चा – जैसे बड़ा होता जाता है, वैसे- वैसे सांसारिक उलझनों से परिचित होता चला जाता है, उसका अपना मूल समाप्त होता चला जाता है. और बाहरी झंझटों में उलझकर रह जाता है, उसका अपना मूल यानी बचपन समाप्त हो जाता है. हाँ! कुछ बच्चे ऐसे अवश्य होते हैं जो तमाम उलझनों/पचड़ों में पड़कर भी अपने कविपन को वैचारिक खाद-पानी देकर कविता को जिन्दा रख पाते हैं.

कविता कवि की अपनी ही बात हो, यह आवश्यक नहीं. कविता अनुभूति अर्थात अहसास और संवेदना का भी परिणाम भी हो सकती है. कविता अपने दुख-दर्द से भी प्रेणित हो सकती है. इसे चेतावनी देना शायद ही तर्कसंगत हो. यह आवश्यक नहीं कि कवि की अपनी पीड़ा की अनुभूति किसी और को हो, किंतु औरों की पीड़ा कवि की पीड़ा हो सकती है. हाँ! यह अलग बात है कि कवि समस्या का समाधान करने में सक्षम न हो, किंतु समस्या के विरोध में न केवल आवाज़ तो बुलन्द तो कर सकता है, अपितु समस्या के समाधान का मार्ग तो प्रशस्त करता है, यह जानना अति आवश्यक है.

दर्शन की बात करें तो जगत एक है, किंतु इसके रूप अनेक. मुखौटे पहने हुए है आज का हर शख्स. एक उतारा, दूसरा पहना. जैसा मौका मिला, वैसा काम किया. अब कविता बेचारी क्या करे? जब संवेदना ही खारिज हो गई तो शेष क्या रह गया? केवल व्यभचार, भ्रष्टाचार, अनाचार और क्या? ठीक इसी प्रकार कवि एक है – हृदय एक है, किंतु भाव अनेक हैं. इस विभिन्न प्रकार की भावनात्मकता का निर्वाह, कार्य-व्यवहार तब ही समझा जा सकता है, जब यह भावनात्मकता जगत के भिन्न-भिन्न रूपों, व्यापारों या तथ्यों के साथ हो जाए; जगत की बात करे.

यहाँ यह जानना भी जरूरी है कि काव्य-दृष्टि में भाव-पक्ष मूल होता है. विषय अलग-अलग हो सकते हैं. भोगे हुए सच में भी भाव-पक्ष का निर्वहन आवश्यक है. भोगा हुआ सच नंगा और अशोभनीय हो सकता है, किंतु उसका प्रस्तुतिकरण नंगा-उघाड़ा न होकर अत्यंत मार्मिक और वीभत्स हो जाता है. दरअसल कविता भाव-पक्ष की चहेती है. स्मरणीय है कि जैसा पहले कहा जा चुका है कि विषय अलग-अलग हो सकते हैं. इसे ध्यान में रखने की आवश्यकता है. सामाजिक परिवर्तन के साथ कविता भी अपने वस्त्र बदलती है, क्योंकि विचार निरंतर बदलता है. ऐसे में कवियों का काम ही नहीं बढ़ जाता अपितु परम्परागत विषयों से नए विचारों तक लौटकर आना, उनके गले की हड्डी बन जाता है. असल में, कविता मूलत: सभ्यता और संस्कृति की विवेचना है. कविता समाज की पहचान है. समाज में व्याप्त अक्छाइयाँ और बुराइयाँ कविता का विषय रही हैं. इस सत्य को नकारना जैसे कविता को नकारना है.

कविता मूलत: सभ्यता और संस्कृति की विवेचना है. कविता की सार्थकता भी इसी में है कि उसमें रसात्मकता हो न हो, किंतु क्रांति-बोध जरूर सम्मलित हो. जिनके लिए कविता बन पड़ी है, उन्हें चलने को, उठने को, अन्याय से निपटने को खड़ा करने का मार्ग प्रशस्त करे. कविता में मीरा, सूरदास या फिर तुलसी के जैसा भक्ति-भाव ही पर्याप्त नहीं है. अम्बेडकरवादी साहित्य की मान्यताओं के अनुसार, यह कविता का एक भ्रामक रूप है. लुभावना और कर्णप्रिय अवश्य है किंतु समाज की प्रगति में साधक नहीं. यह एक लीक बनाता है और एक ही लीक पर चलना, क्रांति का मार्ग लील जाता है. कविता में भक्ति-भाव होना समाज में व्याप्त विभिन्न मान्यताओं की पहचान है. समर्थ और असमर्थ के बीच खड़ा होना और सामाजिक-सद्भाव की दीवार खड़ी करना भी कविता का काम है. महाराणा प्रताप को भूख-प्यास से उबरने के लिए संयम और विवेक उत्पन्न करना भी कविता की मूल आत्मा है. बात सीधी-सपाट हो या चक्रदार, लक्ष्य से विमुख न हो. यह कविता की मूल आवश्यकता है.

समाज में व्याप्त विकृतियों, भ्रांतियों, गैर-बराबरी और कट्टरता का काव्यात्मक रूप में बखान भर करते रहना कविता नहीं कही जा सकती – अपितु समाज में व्याप्त विकृतियों, भ्रांतियों, गैर-बराबरी और कट्टरता के बखान के साथ-साथ उनके निराकरण के लिए दिशा देने; उनसे निबटने के लिए भाव-भूमि प्रस्तुत करने से कविता समग्र होती है.

कवि मुक्त-भाव होता है. कोई रोता है तो कवि भी रोता है. कोई हँसता है तो कवि भी हँसता है. समय के साथ-साथ चलता है कवि. कवि खुद का कम, जगत का प्रतिनिधित्व ज्यादा करता है. कोई इस तथ्य को समझे अथवा न समझे किंतु अम्बेडकरवादी कवि का यही सत्य है. हाँ कुछ अपवाद अवश्य हो सकते हैं. उन अपवादों में भी कट्टरपंथियों, पोंगा पंडितों का ही प्रतिशत ज्यादा निकलेंगे किंतु उन्हें अम्बेडकरवादी कवि की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता. दरसल कवि एक प्रवाह है. नदी के साथ-साथ बहता है. कभी किनारों में फंसा होता है तो कभी नदी की भाँति किनारों को छोड़कर दूर तक बढ़ जाता है. इतना ही नहीं, समंदर का-सा ठहराव भी कवि में होता है. कभी सुनामी लहरों-सा भी उफनता है कवि. प्रेम-प्रीत और वियोग – दोनों को जीने का दम कवि में होता है. यदि ऐसा दम नहीं होता है किसी कवि में तो वो कवि कतई नहीं हो सकता, कुछ और ही होता है. वास्तव में कवि वह है जो तमाशबीन नहीं, भावुक और सहृदय होता है. भावुक और सहृदय कि कभी कभी वर्षा भी उसे नहीं भिगो पाती तो कभी वो सर्दी में भी ग्रीष्म के प्रचंड आतप में तपता है. कभी मधुमास में पतझर तो कभी पतझर में मधुमास का अनुभव करता है. दरअसल विभिन्न-विभिन्न/ विशेष-विशेष परिस्थितियाँ कवि की भावुकता को नाना-प्रकार से प्रभावित करती हैं. कवि की दृष्टि सृष्टि के क्षेत्र को घटा-बढ़ा देती हैं. कवि की दृष्टि यदि सजीव है तो उजड़ा जंगल भी हरा-भरा सा लगता है, यानी सौन्दर्य-बोध को प्रबलता प्रदान करता है. हाँ, यदि कहीं अनाचार ही अनाचार है तो कवि का धर्म अनाचार से लड़ना होता है. कवि की दृष्टि यदि निर्जीव है तो सब-कुछ गुड़-गोबर सा हो जाता है. हास-परिहास तो क्या क्रांति का भाव तक उत्पन्न नहीं होता. वस्तुत: कविता केसी की धरोहर अथवा सौतन नहीं है. सत्य और अनुभूति का योग है. अब चाहे इसे कवि की अनुभूति कहें अथवा तथ्य, सजीवता कहें अथवा निर्जीवता, इसी से कविता जन्म लेती है. किंतु वाह्य अनुभूति – चमक-धमक का ज्यूँ का त्यूँ बखान करती कविता का कोई अर्थ नहीं है. यह बात अलग है कि आजकल के कुछेक मंचीय कवि नाम कमाने के चक्र में फँसकर कविता के मूलाधार को ठिकाने लगाने से बाज नहीं आते. और कविता के बल पर साहित्यिक व्यवसायी हुए दिखते हैं.

यदि कविता व्यावसायिक है तो वह कविता के मर्म और धर्म दोनों को नहीं समझती. देश, काल और परिस्थिति का अर्थ व्यावसायिकता की चादर में ढक जाता है. ऐसे में कोई भी कवि व्यावसायिक होकर, कवि नहीं, शब्दों-अर्थों का व्यावसायी हो जाता है. या यूँ कहें कि सुख-समृद्धि और सम्पन्नता ही व्यावसायिक कविता का उद्देश्य हो जाता है. ऐसी स्थिति में कवि की भावुकता और संवेदनशीलता मृत प्राय: हो जाती है.

उपर्युक्त कथन के मद्देनज़र, सजीव और निर्जीव कविता में अंतर करना सहज और सरल हो जाता है. अत: सूक्ष्म और मार्मिक पाठक को अति सचेत रहना पड़ता है. अपना मार्ग स्वयं ही तलाशना होता है. सजीव कविता में ही जीवन-प्रवाह को गति मिलती है किंतु व्यावसायिक कविता से जीवन-प्रवाह क्षीण और अशक्त सा होने लगता है. व्यावसिकता ज्ञान और विचार – दोनों की विशालता और अस्मिता की रक्षा करने का सामर्थ्य नहीं पालती. अर्थात व्यावसिकता कविता को ही नहीं, समूचे काव्य-साहित्य को लील जाती है. अत: गद्य हो या पद्य, साहित्य को व्यावसिकता की बेड़ियों से मुक्त होना ही चाहिए.

शेष पाठक की दृष्टि पर निर्भर है. यदि दृष्टि संकीर्ण/सूक्ष्म है तो कविता भी संकीर्ण/सूक्ष्म; यदि दृष्टि मार्मिक तो कविता भी मार्मिक. इसका उलट भी हो सकता है. यदि कविता संकीर्ण/सूक्ष्म दृष्टि वाली है तो मार्मिक पाठक के लिए बेकार और कविता मार्मिक/ मानवीय दृष्टि वाली है तो संकीर्ण/सूक्ष्म दृष्टि वालों के लिए बेकार. इसलिए मार्मिक पाठक को सचेत रहने की अति आवश्यकता होती है...कवि को भी.

सफलता/प्रभुल्लता प्राप्त करने के लिए सबको अपना मार्ग स्वयं तय करना होता है. सच्ची कविता से जीवन प्रवाह को गति मिलती है. अम्बेडरवादी कविता में यह गुण विद्यमान है. किंतु व्यावसायिक कविता से जीवन-प्रवाह क्षीण और अशांत सा होने लगता है. व्यावसायिकता ज्ञान और विचार दोनों की विशालता और अस्मिता की रक्षा करने की क्षमता को खो देती है. या यूँ कहें कि व्यावसायिकता कविता को ही नहीं, समूचे साहित्य-धर्म को ही लील जाती है. अत: साहित्य को व्यावसायिकता से मुक्त होना ही चाहिए. कम से कम अब तक तो अम्बेडरवादी कविता व्यावसायिकता के कोढ़ से मुक्त है.

कविता समसामयिक हो, प्रासंगिक हो, वस्तु-निष्ठ हो तो बात ही कुछ और होती है. जहाँ हर ओर चीख-पुकार हो या यूँ कहें कि फुफकारते काल-चक्र में कविता (साहित्य) फुफकारेगी नहीं तो और क्या करेगी? कहा जाता है कि थके-हारे लोग ही सच्चा साहित्य रचते हैं. अम्बेडकरवादी कविता (साहित्य) इस तथ्य का प्रमाण है. इस दृष्टि से अम्बेडकरवादी कविता (साहित्य) को किसी के भी प्रमाण-पत्र की आवश्यकता नहीं है.

अम्बेडकरवादी कविता (साहित्य) की दशा और दिशा पर बहस छिड़ना कोई नई बात नहीं है. सामाजिक दृष्टि से उत्पीड़ित व्यक्ति की अभिव्यक्ति ही अम्बेडकरवादी कविता (साहित्य) का उद्देश्य है. सामाजिक असमानता और वर्तमान पीढ़ी में समानता के प्रति व्याप्त व्याकुलता ही अम्बेडकरवादी कविता (साहित्य) का मूल है. अब व्याकुल अभिव्यक्ति से परिपूर्ण साहित्य में परम्परागत साहित्यिक व्याकरण ढँढना एक कतिपय हास्यास्पद बात है. आज मुक्त-छन्द कविता पर ही नहीं, कथा-साहित्य पर भी नाना-प्रकार से उंगलियाँ उठाई जा रही हैं. जो तर्क-संगत इसलिए नहीं है कि अम्बेडकरवादी साहित्य परम्परावादी साहित्य कतई नहीं है. अपितु समाज के शोढित वर्ग की पीड़ा का साहित्य है.

अब बात चाहे उर्दू साहित्य की हो या हिन्दी साहित्य की, साहित्य पहले रचा गया है या साहित्यिक व्याकरण, यह प्रश्न आज भी अपने उत्तर की तलाश में है. हिन्दी साहित्य में कबीर, मीरा, सूरदास, रहीम, रैदास ऐसे नाम है, जिन्होंने अपने-अपने अन्दाज में साहित्य-रचना की है. कोई पूछे कि इन्होंने से मठ में शिक्षा-दीक्षा ली थी. उधर उर्दू साहित्य में अमीर खुसरो, मीर तकी मीर से लेकर गालिब तक के जमाने तक ग़ज़ल का कोई व्याकरण नहीं था. व्याकरण बनी तो बाद में बनी. शुरु-शुरु में सिर्फ और सिर्फ भाषाई पकड़ थी जिसमें हिन्दुस्तानी जबान का जोर रहा.

सच तो ये है कि वर्तमान दौर में दो तरह से कविता हो रही है. एक मन से, दूसरी मस्तिष्क से लिखी जा रही है. ऐसा होना स्वाभाविक ही लगता है. समग्र साहित्य ने समय के साथ-साथ खुद भी करवट बदली है. भक्ति-काल और छायावाद के बाद कविता मुक्त-छन्द में लिखी जाने लगी. शिक्षा का क्षेत्र जो बढ़ गया. शिक्षा के प्रचार और प्रसार के साथ-साथ मन के बजाय मस्तिष्क ने ज्यादा काम करना शुरू जो कर दिया जो व्यावहारिक/स्वाभाविक ही है. अक्सर कहा जाता है कि आज कविता भी गद्य में लिखी जा रही है. क्या कविता पर भी किसी का ‘पेटेंट’ है कि कविता ऐसे लिखो? समय परिवर्तन के चलते न जाने कितने आयाम बदलते चले जाते हैं, फिर कविता(साहित्य) पर ये सवाल क्यों? आज कविता में छ्न्द-विधान का सवाल उठाना प्रासंगिक नहीं है. छ्न्द-विधान की परिधि में रहकर कविता करना शायद आज के कवि के वश की बात नहीं है, क्योंकि आज की कविता नितांत मन की बात नहीं है, दिमाग की भी है. अत: अम्बेडकरवादी कविता ( साहित्य) में छ्न्द-विधान का सवाल उठाना कतिपय उचित नहीं है. कविता बस कविता है. मन की बात है. कविता ठीक पेड़ की डालियों पर सहज अवस्था में उगने वाली पत्तियों की तरह है. अम्बेडकरवादी कविता को छ्न्द-विधान में बंधने की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती. फिर भी यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि छ्न्द-विधान आदि शर्तों की तलाश साहित्य-शिक्षकों अथवा आलोचकों की आवश्यकता हो सकती है, रचनाकार की नहीं. वैसे भी किसी कविता की एक पंक्ति भी यदि हृदयग्राही हो जाती है तो इसे कविता की सम्पूर्णता ही कही जाएगा. अब जहाँ तक अम्बेडकरवादी कविता में छन्द-विधान की प्रश्न है, यह समय के साथ-साथ स्वत: ही हल हो जाएगा, किसी को इसकी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है. अम्बेडकरवादी कविता (साहित्य) का व्याकरण परम्परागत न होकर, एक नए छन्द-विधान का जनक सिद्ध होगा, इसमें कोई संदेह की गुंजाइश नहीं है.

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तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय. तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं. स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं. सामाजिक/ नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं. आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं.

सम्पर्क  : E-mail — tejpaltej@gmail.com

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तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,344,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,66,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,14,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान 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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,242,लघुकथा,1244,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2002,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,705,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,790,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,80,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,201,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: कविता में भाव-पक्ष मूल होता है - तेजपाल सिंह ‘तेज’ -
कविता में भाव-पक्ष मूल होता है - तेजपाल सिंह ‘तेज’ -
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रचनाकार
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