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लघुकथा - जहर की हार - ज्ञानदेव मुकेश


      सड़क के बीचोबीच एक जगह पर दो गाडियां आपस में सट गईं। दोनों गाडियों पर हल्के स्क्रैच आ गए। एक गाड़ी में कुछ दबंग टाईप लोग सवार थे। वहीं दूसरी गाड़ी में एक निहायत भला आदमी बैठा था। इसके पहले कि अनजाने में हुई इस घटना के कारण तनातनी का माहौल बने, वह निहायत शरीफ आदमी गाड़ी से बाहर निकला और क्षमा की मुद्रा में हाथ बांध कर खड़ा हो गया। उधर दबंगों का मुखिया आपे से बाहर होता हुआ गाड़ी से बाहर निकला और षरीफ आदमी की तरफ बढ़ा। इसके पहले कि वह दबंग आदमी अपनी गंदी जुबान से जहर उगलना शुरू करता, वह शरीफ आदमी माफी मांगने लगा और हर्जाने के तौर दो हजार का नोट भी बढ़ाने लगा। दबंग का गुस्सा उफनने के पहले ही शांत हो गया। उसने यह भी देखा कि गाड़ी पर बिल्कुल मामूली स्क्रैच है। उसने झटके से पैसे ले लिए और वापस गाड़ी में आ गया।
     दोनों गाड़ियां फिर चल पड़ीं। अपनी गाड़ी में बैठे दबंग लोग उस शरीफ आदमी की भलमनसाहत पर हंसने लगे। मगर दबंगों का मुखिया अभी भी गंभीर था। उसने कहा, ‘‘यारो, मजा नहीं आया। दो हजार रुपए मिले जरूर, मगर उसे लतियाने-जूतियाने में जो मजा आता, मैं उससे महरूम रह गया। आज के जमाने में ऐसे सीधे लोग कहां से आ जाते हैं ? उफ्फ ! पीटने का मौका हाथ से निकल गया।’’
   दूसरे दबंग भी उदास हो गए। उन्होंने कहा, ‘‘हां यार, हम भी एक फाईट सीन देखने से रह गए।’’
                                                           - ज्ञानदेव मुकेश
                                                                                  पता-
                                                फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                अल्पना मार्केट के पास,
                                                न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी
                                                पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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