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कहानी - "एक इंच मुस्कान" - तुलसी पिल्लई

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"एक इंच मुस्कान"

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छत पर खड़ी सलोनी नीचे जमीन की ओर देखती हुई यह विचार कर रही थी कि इस तीन मंजिला मकान की ऊंचाई कितनी होगी? पहले भी कई बार वह छत पर ऐसे ही खड़ी होती थी। लेकिन तब ऐसे विचार नहीं आते थे। तब तो मन छत पर ठंडी और गर्म हवाओं से  प्रफुल्लित  रहता था।

दूर-दूर तक रंगीन हरे-लाल-पीले -नीले-गुलाबी छोटे छोटे बल्ब से पूरा घर और गार्डन जगमग आ रहा था। उसके हाथों में मेहंदी और लाल चूड़ियां थी। हर एक लड़की का सपना होता है कि वह अपनी शादी में ऐसे ही मेहंदी और चूड़ियां पहने हुए बहुत सुन्दर लगे। हां,आज उसकी शादी ही थी। यह मेहंदी और चूड़ियां किसके नाम की है ?(उसने खुद से ही प्रश्न किया।)  रघु के नाम की तो नहीं ? अब संजय के नाम की है। इतना सोचते ही उसे लगा की वो यहीं से कूद जाए। ऐसी जिन्दगी को खत्म कर दे। लेकिन खुद को मारना असंभव है। इतनी जल्दी जीवन का अंत ?

दूर से कानों में आ रही बैंड बाजों की आवाज। लगता है बारात आ गई है। पहले वह ऐसे ही खड़ी छत पर रघु की घंटों प्रतीक्षा करती थी और रघु भी तो कई बार उसके घर के आगे, उसे देखने के लिए बाइक पर सवार होकर कई चक्कर लगाता था और वह उसे देख कर खुश होती रहती थी। इस खुशनुमा पल को याद करके उसकी आंखों से आंसू बहने लगे और चिल्ला-चिल्ला कर रोने का मन होने लगा। क्या मेरा रघु एक धोखे बाज प्रेमी था? क्या उसकी सारी बातें झूठी थी? क्या रघु का उसके साथ समय बिताना महज मन बहलाने का साधन थी या प्रेम ? क्या आज तक  मैं रघु की बातों से बेवकूफ हीं  बनती रही हूं ? नहीं, मैंने तो उससे प्रेम किया था और उसने यह सब क्यों किया?

रघु कॉलेज में सहपाठी था। उसके साथ पढ़ाई के दौरान सलोनी अपना समय बिताया करती थी और दोनों को एक दूसरे से लगाव हो गया। सलोनी को रघु की हर एक बात मोहित कर जाती थी। उसका चंचल होकर बोलना‌‌। एक बालक की तरह शरारत करना। रघु ने ही तो कॉलेज के गार्डन में उसके सामने प्रेम का प्रस्ताव रखा था और प्रेम की शुरुआत की थी ।उस दिन कितने की वादे किए और उसने कितनी कसमें खाई थी। सारी की सारी कसमें और वादे झूठी थी।

उसे सारी की सारी बातें याद है ।उसने कहा था मैं तुमको कभी धोखा नहीं दूंगा। मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं। मैं एक अच्छा इंसान हूं। मेरे मन में कोई चोर नहीं है। मैं तुम्हें बहुत पसंद करता हूं। तुम्हारे बिना मेरी जीवन की कोई कल्पना नहीं है। ईश्वर की कसम, मैं तुम्हें हद से ज्यादा चाहता हूं। सारी की सारी बातें आज दोहरा गई थी। बैंड बाजों का शोर तेजगति से उसके कानों के पास आया और वह रघु की बातों से बाहर निकल आई।

सामने गार्डन में देखा तो बारात गार्डन में प्रवेश कर चुकी थी और बराती के बीचों-बीच  घोड़ी पर उसका दुल्हा बैठा था। क्या यह रघु है? नहीं, यह तो संजय है। काश! यह रघु होता तो वह अपने दुल्हे को निहार भी लेती। लेकिन उसने अपनी आंखें फेर ली।

बार-बार उसे याद आते हैं वहीं पल। इसी छत पर खड़ी होकर रघु की कितनी प्रतीक्षा करती थी? क्या मेरे लिए रघु का प्रेम झूठा था? अगर झूठा नहीं था तो उसने  मुझसे शादी करने के लिए मना क्यों किया? क्या वह अपने माता-पिता को मेरे बारे में नहीं बता सकता था ? मुझमें क्या कमी है? जो मुझसे शादी करने से उसने मना कर दिया? क्या उसके माता-पिता मुझे नहीं अपनाते ? उसने अपने ही अंतर्मन से एक बार पूछा :- क्या सचमुच रघु धोखेबाज था? नहीं। उसका अंतर्मन तो प्रेम में अंधा था।

अभी भी वह रघु को कॉल करने को उद्यत हुई। बार-बार उत्तर ना मिलने पर भी उसका प्रयास जारी था। उसे अंतिम आशा थी-अपने प्रेम को पाने की। आखिर रघु ने भी कॉल उठा ही लिया और बोला:-" क्या है?  क्यों बार-बार कॉल कर रही हो मुझे ? आज तुम्हारी शादी है न? तो मुझे कॉल मत करो। परिस्थिति को समझने की कोशिश करो। मैं कुछ नहीं कर सकता हूं। न तो मेरे परिवार वाले इस बात को स्वीकार करेंगे और न ही मैं अपने परिवार के खिलाफ कुछ करूंगा। तुम अपनी जिंदगी में खुश रहो। सोरी! मैं कुछ नहीं कर सकता और आज के बाद तुम्हारा कॉल दोबारा नहीं आना चाहिए।

वह भी कुछ कहना चाहती थी कि रघु ने कॉल काट दिया था‌। उसने फिर कॉल करने की कोशिश की लेकिन उसका नंबर ब्लैक लिस्ट में था। आंखों से आंसू की अविरल धारा ने इस सत्य को स्वीकार कर लिया था। अब अंतरमन भी कह उठा-धोखेबाज‌। उसने अपने घुटने जमीन पर टेक दिए और फूट-फूट कर रो पड़ी। अचानक उसके कंधों पर किसी के हाथों का स्पर्श ने उसको सम्भल जाने को मजबूर किया।

"आपको सब नीचे बुला रहे हैं‌ आप यहां क्या कर रहे हो ?"-यह उसकी छोटी बहन ललिता थी।

"नहीं बस,एक बार फिर अपने घर आंगन सारा का सारा देखना चाहती हूं। इसलिए छत पर आ गई।"

"अब दीदी इतना भी झूठ मत बोलो। रघु ने क्या कहा? मुझे पहले से ही लगता था कि वो ठीक लड़का नहीं है। वो धोखे बाज है।"-ललिता ने कहा और वह निरुत्तर थी।

"अब अपनी जिंदगी के बारे में सोचना आपको है। ऐसे कितने ही लड़के जीवन में आते हैं और चले जाते हैं। किसी के लिए भी जिन्दगी थमती नहीं। अच्छा हुआ न,जो उसकी सच्चाई अभी आपको पता चल गई। अब उसे अपनी जिंदगी से निकाल कर फेंक दो। हमेशा, हमेशा के लिए। तब ही आप खुश रह पाओगे।" जैसे-जैसे सलोनी बोले जा रही थी। वैसे वैसे उसकी आंखें से आंसू  झर रहे थे। वो तो इतनी असहय थी कि अपनी छोटी बहन से भी नजर नहीं मिला सकती थी और यह नहीं कह सकती थी कि यह सब कुछ इतना आसान नहीं है। जितना कि उसे लग रहा है।

उस समय वह पेड़ की वो शाख थी। जिसको आंधी ने गिरा दिया था। लेकिन अभी भी वो पेड़ से जुड़ी हुई थी। अब उसके पास निर्णय लेने के लिए ज्यादा समय नहीं था। ललिता के साथ कदम-ब-कदम मिलाती हुई सलोनी मंडल की ओर चली आई। संजय मंडप में बैठा था। उसे देख कर मुस्कुराया।

उसके चेहरे पर भी एक इंच की झूठी मुस्कान थी। उसके जीवन में अब किसी धोखे बाज के लिए कोई जगह नहीं बची थी। अब जो उसका निर्णय था। उसकी अपनी राह थी। नदियां भी तो पत्थरों को लांघ कर आगे बढ़ जाती है। नवजीवन से नवमार्ग  की ओर। वह भी अब  बढ़ेगी अतीत के चलचित्र को यहीं छोड़कर। जिसका कोई वजूद नहीं है और यह पथ यहीं समाप्त हो जाता है। उसकी एक इंच की मुस्कान भले ही बनावटी थी। जिसने उसके मन के  दर्द को ढक लिया था। लेकिन वह एक सशक्त मुस्कान थी। जिसने उसे जीवन का नया रास्ता दिखाया था ‌।उसके चेहरे पर एक इंच मुस्कान ने उसके जीवन के सारे रहस्य को अपने में छुपा लिया था। बस चेहरे की एक इंच मुस्कान ने...

~ तुलसी पिल्लई

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