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कहानी - परछाई मूल लेखक – निर्झरी महेता - अनुवादक - डॉ॰ रानू मुखर्जी

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कलचरल सेन्टर के समीप ही नम्रा खड़ी थी, पार्किंग से गाड़ी लाकर सुजीत ने एकदम से उसके नजदीक ही खड़ी कर दी। पीछे से आने वाली गाड़ियों का हो हल्ला शुरू हो उससे पहले ही नम्रा दरवाजा खोलकर झटपट कार में बैठ गई। अपनी कॉन्फिडेंट अदा के साथ कार को गेट से बाहर निकलते हुए सामने के रोड कट से घूमकर अपने घर के रास्ते की ओर दोनों बढ़ गए। तीन दिवसीय संगीत समारोह के दूसरे दिन की सुबह के सेशन की सुर लहरी की खुमारी में नम्रा डूबी हुई थी। संगीत के सुमधुर माहौल ने उसे अपने में लपेट लिया था।

घर गृहस्थी और बैंक की नौकरी ने उसके पूरे समय पर अपना कब्जा जमा लिया था। नौकरी में से निवृत होने पर उसे थोड़ा वक्त मिला था। दोनों बच्चे विदेश में रचबस कर अपना-अपना घर संभाल रहे थे। घर गृहस्थी का काम तो अपनी रॉ में चल ही रहा था पर उसमें व्यस्तता की क्षण अब पहले से कम हो गए थे। नम्रा को संगीत से प्रेम था। ईश्वर की मेहरबानी से उसका कंठ भी सुरीला था। कॉलेज में होनेवाले संगीत स्पर्धाओं में और यूथ फेस्टिवल में भी उसे अनेक इनाम मिले थे। फिर तो पारिवारिक जीवन की व्यस्तता के कारण संगीत से वह एकदम से सब कट सी गई थी फिर भी घर के बाहर होने वाले कार्यक्रमों में या गेट टू गेदरों में कभी कभार थोड़ा बहुत गा लेती थी। वी॰ आर॰ एस॰ लेने के बाद एकदिन वे शहर की प्रतिष्ठित संस्था ‘सूरदीप’ के एक कार्यक्रम में गए थे। वहीं इन्टरवेल में संस्था के संगीत प्रेमी उपाध्यायजी से मुलाक़ात हो गई। शायद उन्होंने नम्रा को कहीं किसी गेट टु गेदर में सुना होगा। नम्रा के निवृत होने की बात सुनते ही संस्था से जुडने का आग्रह किया।

“नम्रा आप “सूरदीप” में आइए न, आपका कंठ बहुत सुरीला है। नियमित प्रेक्टीस से कंठ में और निखार आएगा”।

और फिर तो नम्रा संस्था से जुड़ गई। नियमित रियाज़ होने लगा। स्थानीय कार्यक्रमों में वह गाने लगी। बाहर से निमंत्रित गायकों के कार्यक्रम में गाए जाने वाले प्रार्थना आदि के लिए उसका ही चुनाव होने लगा। इन सब से उसे आंतरिक संतोष मिलता था। फिर तो पति सुजित भी रिटायर हो गए। कार्यक्रमों में नम्रा के साथ वो भी जाने लगे। जिस संस्था से नम्रा जुड़ी थी वहाँ भी जाने लगे। पर वो तो ठहरे मैनेजमेंट वाले । मौजिले, व्यवहारिकता से लबरेज। ऐसे निपुण व्यवस्था वाले व्यक्ति कुछ ही दिनों में संस्था के, कलाकारों के चहेते बन गए। सुजित के “व्यवस्थास्पर्श” से वहाँ के सभी कार्यक्रम सुचारू रूप से सम्पन्न होने लगे।

इस बार तीन दिवसीय संगीत समारोह का आयोजन किया गया। स्थानीय और बाहर से निमंत्रित संगीतज्ञ कलाकारों के लिए अलग-अलग बैठकों की व्यवस्था बड़ी तटस्थता पूर्वक की गई। सुबह तथा शाम की बैठक के पश्चात कलाकारों कार्यकारों के भोजन की व्यवस्था तथा बाहर से आनेवाले कलाकारों के लिए ठहरने आने-जाने की बड़ी शानदार व्यवस्था की गई थी। अंतिम दिन में रात के कार्यक्रम में शहर के प्रतिष्ठित संगीतकार चन्द्रेश शर्मा जी और संगीत रत्न पं. विमल प्रसाद जी का था। कार्यक्रम के पश्चात चन्द्रेश शर्मा जी को बाहर जाना था। अतः वे कार्यक्रम समाप्ति के तुरंत बाद ही निकल जाने वाले थे। परंतु संगीतरत्न जी का कार्यक्रम तो रात के दस-ग्यारह बजे तक चलनेवाला था। पहले दिन प्रार्थना श्लोक के पश्चात नम्रा की अगुवानी में सभी का आरंभागान था। इसकी पूरी कल्पना नम्रा की थी। “सत सृष्टि तांडव रचयितां धिक-ताम” – स्तुति गान में सप्तक के विभिन्न सूरों का एक के बाद एक का प्रयोग करके नम्रा द्वारा किए गए इस स्वरायोजन ने सभी को मोह लिया। आज सुबह का आरंभगान उसका सोलो गान था। “सात सूरों के संग हम आपसे मिलने आए” – लगातार बजते रहने वाली तालियों की गड़गड़ाहट से वो अभी तक उबरी नहीं थी। ऐसे में गाड़ी के स्टियरिंग को मोड़ते हुए सूजित ने नम्रा की भावनाओं को भी मोड दिया।

“नमु कल रात को संगीतरत्न पं॰ विमल जी के प्रोग्राम के बाद मे होनेवाला डिनर हम अपने घर पर रख लें – कमिटी के दस बारह मेम्बरो के साथ।“

इसे सुनकर नम्रा के की जुबान से अचानक “हें” निकल गया। सुनसान अंधेरी राह पर अनमने भाव से चले जा रहे हो और अचानक हॉर्न बजाते हुए वाहन चारों ओर से आकार घेर लें तो जैसी हालत होती है वैसी हालत नम्रा की हो गई।

“ऐसे हें। हें। क्या कर रही है? जैसे मैंने डिनर की नहीं स्पेसटूर पर जाने की बात की हो!”

घर गृहस्थी की ज़िम्मेदारी को उसने बड़ी सिद्धत से निभाया। साथ ही साथ अतिथिपरायणता की ज़िम्मेदारी को निभाने में भी उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने अंतर की गहराई में छुपे संगीत के बहते रसमय प्रवाह का आनंद तो उसने अभी आभी ही लेना आरंभ किया था। इस समारोह का आनंद तो और किसी भी व्यवस्था से जुड़े बिना ही पूर्ण रूप से उठाना होता है। सभी व्यवस्था बाहर से ही किया गया है केवल नाश्ते के सिवाय। बड़ी किस्मत से ऐसे मौकों में हिस्सा लेने का अवसर मिलता है। इसके आयोजन के समय से ही वह मन ही मन में झूम रही थी कि न जाने कहाँ से बास के अंकुर की तरह रात के भोजन वाली बात फूट निकली।“ पंडितजी ने तो कहलवाया है न कि अक्सर रात के प्रोग्राम देर से समाप्त होते है, उम्र अधिक हो जाने के कारण देर रात में केवल खाखरा और दूध लेने का ही निश्चय किया है। नर्मदाबहन से कह देंगे वो दो चार तरह के खाखरा बना देगी। वही डिनर के लिए लेकर चलेंगे।“

“इतने उम्रदराज और विख्यात संगीतकार को हम लोग बाहर खाना खिलाएँगे?“

“सूजित – जो खिलाएँगे उसे मुझे ही खिलाना है। हम लोगों नहीं। तीन दिन के संगीत समारोह का आयोजन इस शहर में पहली बार हुआ है। सारा दिन मैं उसमें व्यस्त रहती हूँ। पंद्रह लोगों के लिए रात के भोजन का पूरा आयोजन अकेले कैसे कर पाऊँगी?”

“नमु तुम्हारे लिए डिनर की तैयारी करना कोई नई बात नहीं है न ! न जाने कितने लोगों के लिए डिनर की व्यवस्था की है तुमने अकेले ही की है। पंडित जी का प्रोग्राम तो अंतिम दिन पर है।उस दिन देर तो होगी ही, सो होटलवाला असंतुष्ट हो रहा था बड्बडा रहा था। दूसरे कार्यकर्ता तो बाहर खा लेंगे। पर उपाध्याय और उनसे जुड़े दूसरे लोग पंडित जी को खिलाने के लिए बाहर ले जाने में अचकचा रहे थे। तो मैंने भी उनकी समस्या का समाधान कर दिया । बोला – हमारे घर भोजन करेगें पंडित जी। आप सब भी उनके साथ आना। उनका जितना संगत तुम्हें मिले उतना समय ही तुम्हारे लिए खास है क्यों ठीक है न?”

इस प्रकार के इवेंटस तो उसके गृहणी पद की कलगियाँ थी। गृहस्थी की परछाई की तरह कभी न छूटने वाली। पर पीछे से पड़नेवाली परछाईयों से पार पाया जा सकता है पर जब पढ़ने लिखने के लिए या किसी सूक्ष्म काम के लिए पीछे से पड़ने वाली रोशनी की परछाई से तो अभी भी छुट्कारा पाया जा सकता पर है अगर परछाई सामने पड्ती हैं तो हमारी ही परछाई ह्मारे लिऍ विघ्न उपस्थित करती है।और तभी अंधेरे का ये कटआउट बहुत भारी पड जाता है। किस्मत से मिलनेवाले संगीत समारोह का आनंद उठाने में झूमती नम्रा के झूले में रुकावट आ गई। वह फंस गई। कल रात के डिनर की व्यवस्था के लिए उसका मन बेचैन हो उठा था। उसका मन उसी दिशा में दौड़ने लगा।

घर पहुँचकर सेंटर टेबल पर कार की चाबी को रखकर बेडरूम की ओर जाते हुए सुजीत ने कहा, “नमु मैं एक झपकी ले लेता हूँ फिर तो शाम की दौड़ा-दौडी को भी संभालना है न!”

नम्रा डाइनिंग एरिया में रखे फ्रिज की ओर मुड़ गई – देख ले जरा सब्जियों का कितना स्टॉक है॰॰॰? खाने पीने की सारी व्यवस्था तो तीन दिन तक समारोह में ही होनी थी। इसलिए, स्टॉक तो भरपूर होनी चाहिए – सब भरपूर था। बनाने वाले व्यंजनों के अनुसार जरूरी चीजों की लिस्ट वो बनाने बैठी। अब॰॰॰ सुजीत तो शाम की व्यवस्था के लिए अभी से तैयार बैठे थे। उनसे कुछ मदद की आशा नहींवत थी। सब्जीवाले और किरानेवाले को फोन कर लिस्ट लिखा दी। और तुरंत सामान भेजने की व्यवस्था करने के लिए कहा। वह बाहर पड़े सोफ़े पर ही लेट गई। माल अभी आता ही होगा। आधे घंटे में ही फोन की रिंग घनघनाई, “हमारा आदमी खाना खाकर अभी तक नहीं लौटा हैं और आने की संभावना भी नहीं है। आपको माल लेकर जाना पड़ेगा।“ टू व्हीलर और घर की चाबी लेकर वो निकाल पड़ी। लौटते वक्त किराने के साथ-साथ सब्जियाँ भी लेती आई। सब्जियाँ काटने-कुटने के काम को लेकर डाइनिंग टेबल पर बैठी। चार बजे सुजित उठे।

“अरे तुम्हारा यज्ञ तो शुरू हो गया।“ कब उठी?”

“आपकी महरबानी ने सोने ही कब दिया?”

“ओह यस॰॰॰! ये डिनर तो तुम्हें ज्यादा महेनत कराएगी”

“चलो अब चाय तो बनाओ। निकलना भी तो है न!”

टेबल पर के सारे सामान बिखरे के बिखरे ही पड़े रहे। चाय बनी। और तैयार होकर समारोह में जाने का वक्त भी आ गया। रह गया तो बस कल के अधिवेशन के आरंभगान का रियाज। शाम और रात के अधिवेशन की समाप्ति के पश्चात डिनर के समय मन खोलकर कार्यक्रम की सफलता पूर्वक समाप्ति की चर्चा होती है। कल तो उसे इस प्रकार की चर्चा में बड़ा मजा आया था। पर आज तो वह अधीर हो रही थी। टेबल पर बिखरे सामान उसे आवाज दे रहे थे, “आ जा, आ जा।“ बेसब्र होकर उसने सुजीत को घर चलने के लिए इशारा किया। वो उठा तो सही पर पूरे रास्ते बड़बड़ाता ही रहा।

“नमु तुम्हें कुछ समझ में नहीं आता है। ये संगीत समारोह तो तुम्हारे लिए बहुत महत्व रखता है और तुमहें ही आज घर लौट आने की जल्दी पड़ी थी।“

“समारोह मुख्य तो जब था तब था। अब तो कल का डिनर “मुख्य” हो गया है। उसके लिए पहले से तैयारी न की जाय तो हंसी होगी न?” समारोह के कार्यक्रम में से जितना हो सके समय निकालकर उसने अपनी तैयारी जारी रखी। तीसरे दिन का आरंभगान के समय तो उसने एकदम से तद्रूप होकर गाया। तालियाँ भरपूर पड़ी। पर उसके मन को छू न सकी। सुबह के सेशन के पश्चात के लंच को छोड़कर वह घर चली गई। भर ग्लास जूस पीकर वह काम करने में जुट गई। दो कूकर और एक मिक्सर की मदद से रसोई के कार्यक्रम को आंजाम देने में वह जूट गई। देर रात के लिए तो पूरी पराठा रोटी रखना ही है। पर एक अकेली से तो इतना संभव नहीं था। इसलिए दो परतों वाली रोटियों की थप्पी भर उतार ली। चौकोंन-त्रिकोणाकार में घी लगाकर डब्बे में बंद करके रख दिया। रात को सबसे पहला काम यह करना है कि गरम पानी की देगची में इनको गर्म करने के लिए रख देना है। चलो कुछ तो निपटा।

आज तो सुजीत एयरपोर्ट पर पंडित जी को लेकर होटल पर ही उपाध्याय तथा अन्यलोगों के साथ ही रहनेवाले थे। तैयार भी उधर ही होने वाले थे। डिनर के लिए क्रोकरी आदि की व्यवस्था भी कर ली। नहा धोकर रिक्शा में बैठकर वह हाल पर पहुँच गई। उसे आया देख सुजीत और उपाध्याय उसकी ओर दौडे आए। “नम्राजी, सभी का कहना है कि पंडित जी के बैठक से पहले “सतसृष्टि” प्रस्तुत की जाय।“ उपाध्याय जी बड़े उत्साहित होकर बोल रहे थे। रसोई की सारे झमेले से और मसाले की गंध से तो वह निपट आई थी पर क्या वह “सतसृष्टि” गाने की हालत में थी। पर इसे तो करना ही है। उसने प्रस्तुत किया। तालियाँ भी खूब पड़ी। पंडित जी की बैठक ने तो सबका मन मोह लिया। समारोह की सफलता परिपूर्णत: संतोष आनंद की लहर चारों ओर लहरा रही थी। उसने मोबाइल देखा – ग्यारह बजे हैं। हाल से निकल आई – कोई घर पहुंचाने वाला मिल जाए तो .... सुजीत तो आने से रहा। पंडित जी को घर लाने का काम वो किसी दूसरे पर छोड़ सकता है भला।

बाहर अंकित खड़ा मिला – “हाय मैडम!।“

“तुम घर जा रहे हो अंकित? मुझे घर छोडते हुए जाओगे?”

“स्योर मैडम। पर मेरे पास बाइक है मैडम।“

“कोई बात नहीं” अंकित की बाइक पर जैसे तैसे बैठकर वह घर की ओर भागी। अंकित संस्था से 4/6 महिने पहले ही जुड़ा है, पर गाता अच्छा है। इसलिए “सतसृष्टि” के कोरस में उसे शामिल कर लिया गया है। रास्ते से ही उसने सुजीत को व्हाट्सएप्प कर दिया कि “मैं घर जा रही हूँ।“ फिर भी घर पहुँचते ही फोन बज उठा।

“कहाँ हो? पंडित जी को साथ लेकर घर जाना तुम्हें अच्छा लगेगा सोचकर मैंने उन्हें अपनी गाड़ी में घर ले जाने का सोचा है।“

“सुजीत मैं घर पहुँच गई हूँ। डिनर के प्रिपेरेशन के लिए घर तो आना है न। आप लोग आ जाइए।“

फिर तो उसने गरम पानी का पतिला – माइक्रो कूकर के साथ व्यंजनों को गरम किया। सब कुछ केसरोल में सही तरीके से जमा दिया। पानी के जग-प्याले-पेपर-नेपकिन को सही जगह पर रखा। और तभी सब वहाँ आ पहुंचे। ड्राइंग रूम में डिनर बुफ़े की व्यवस्था की गई थी। शुरुआती दौर में तो सभी ने अपने आप ही परोस लिया। पंडित जी को नम्रा ने अपने हाथों से डिश में भोजन परोस कर दिया। उनके लिए खाखरा रखा था वो भी दिया। सुजीत के उत्साहभरे अतिथ्येतता की फरमाइश भी कभी कभार हो रही थी – “प्रदीप को पापड़ सेककर दो न ! उसे तला हुआ नहीं खाना है।“ “उपाध्याय को सब्जी जरा माईक्रों करके दो न। उसे गरम गरम व्यंजन प्रिय है।“ अपनी डिश को किनारे पर रखकर सुजीत के सभी आदेशों को पूरा करते हुए वह सभी की जरूरतों को पूरी करती रही। अंत में जब वह पंडित जी के लिए खाखरा लेकर गई तब उन्होने कहा – “नम्रा जी आओ यहाँ बैठे, मुझे कुछ नहीं चाहिए।“ वह अपनी डिश लेकर बैठ गई। उसके पाँव में पीड़ा हो रही थी। शायद मन में भी। “आपका नाम नमना जी है न?” पंडित जी पूछ रहे थे। नम्रा या नयना जो भी हो – अपने मन की करने के बदले उस पर जो कुछ भी थोपा जाय उसे नतमस्तक होकर निभाते जाना है क्यों?” उसका ध्यान भटक गया था। देखा तो पंडित जी कुछ कह रहे थे।

“नमना जी मैंने कहलवाया तो था कि मैं केवल दूध और खाखरे ही लूँगा। क्यों इतनी सारी झंझट कर दी आपने! हम कलाकारों को मिताहारी होना चाहिए, तभी तो हम सूर के सर्वोच्च शिखर तक अटारी तक पहुंच सकेंगे ।“ वह मुस्कुराई। पंडित जी ने अपने जीवन के कुछ वर्ष गुजरात में बिताए थे पर मूलतः वे हिन्दी भाषी थे, उनकी मिश्र भाषा बहुत मधुर थी। उन्होने फिर से बात करना शुरू किया। ऐसा लग रहा था जैसे कि उनको नम्रा के साथ बहुत सारी बातें करनी हो और नम्रा को भी तो बातें करनी थी।

“आपने सतसृष्टि गीत में सात सप्तकों का सुंदर विन्यास किया है। संगीत को इसी तरह संभालते रहिए। अभिनंदन आपको।“ डिश लेकर टहलते हुए उपाध्याय जी ने पंडित जी की अभिव्यक्ति को सुना।

“पंडित जी, उदघाटन अधिवेशन में तो नम्राजी ने out of the world गाया था। आज उनकी श्वासों में जरा भारीपन का आभास हो रहा था।“

पंडित जी ने डाइनिंग टेबल की ओर भोजन कर रहे सभी लोगों की ओर भर नजर देखा। और फिर बड़ी सहृदयता से नम्रा की ओर देखा। नम्रा के मन में शीतलता छा गई। बाकी तो क्या कहे और किससे कहे।

“आपका नाम नम्रा है। पर मेरा मन कहता है सात सूरों को नमन करती नमना हो। आपने उदघाटन अधिवेशन में जो गाया था उसकी रेकोर्डिंग तो होगी न?” नम्रा के कुछ कहने से पूर्व ही वहाँ सुजीत आ पहुंचे, “नम्रा उधर उपाध्याय जी को जरा ॰॰॰॰ तभी उनका ध्यान पंडित जी की ओर गया। “ओह! पंडित जी साथ हैं।“ नम्रा सुजीत की ओर ताकती रह गई – इन सारी व्यवस्था का “एक कारण” और है, “ये कि तुम्हें पंडित जी के साथ थोड़ा समय मिले!” किसने कहा था?

“अरे सुजीत इस सत्कार समारंभ की धूरी है नम्रा जी जाइए आप अपना कर्तव्य संभालिए हम बाद में बात कर लेंगे।“ वह उठी, उपाध्याय जी का उनका पसंदीदा व्यंजन परोसकर लौट आई। सुजीत अब भी वहीं बैठे थे। “आ गए आतिथ्य धर्म निभाकर। अति उत्तम। मैं सुजीत से आपके गीतों की रेकार्डिंग के विषय में बात कर रहा था।“

“होना तो चाहिए ही। सभी सेशन के रेकार्डिंग की तो मैंने पूरी व्यवस्था की थी। पता करता हूँ।“ कहते हुए सुजीत उठ गए।

“पता चल रहा है मेनेजमेंट के क्षेत्र से है।“ सौम्य मार्मिकता से भरे मुस्कुराए पंडित जी।

“इनके जुडने से हमारे संगीत क्षेत्र के कलाकार इन सभी व्यवस्था से निश्चित रहते हैं।“ वो जानती थी “व्यवस्था में व्यस्त इंसान” दूसरी व्यवस्था में फँसकर इस “पता” करनेवाली बात को भूल जाने वाले है। इसलिए उसने बात को आगे बढाते हुए कहा,

“मैंने मेरे फोन पर रेकोर्डिंग तो चालू किया था, पर पूरा नहीं हो पाया होगा – मेरे इन्स्ट्रुमेंट में टाइमरेंज ज्यादा नहीं है।“

“कुछ हर्ज नहीं। जितना है उतना ही मेरे फोन पर भेज देना। मुझे अधूरा भी सुनना अच्छा लगेगा। और ये तो मुझे यह भी याद दिलाता रहेगा कि आप स्त्रियाँ अपना कितना कुछ अधूरा छोडकर हमें भरपूर देने में अपने जीवन की कितनी अवधि बीता देती हों।“ भारी आँखों से उसने पंडित जी की ओर देखा। संगीत के सात सूरों के साथ साथ जीवन की अनेकानेक आभाओं की न जाने कितनी छटाओं को उन्होने अपने भीतर उतारा है।

“पंडित जी यह स्पष्ट है कि संगीत के साथ-साथ जीवन संगीत का भी आपने गहन अध्ययन किया है। ऐसा योग बड़ी मुश्किल से देखने में आता है।

“बहना ! आपको ये सब संभालते हुए देखकर एक बात कहने का दिल करता है – कहूँ?” पंडित जी पूछ रहे थे। नम्रा की दबी हुई मुस्कान में छिपी मौन स्वीकृति को समझकर उन्होने कहा,

“नमना जी आपका कंठ स्वर तो ईश्वर का वरदान है। पर नादब्रहम के सूर की साधना तो आपकी तपस्या है। अधिकांशत: हमारे जीवन के संयोग सूर से हमें दूर रहने पर मजबूर करते हैं। पर सही बात यह है कि इस जगत के प्राण ईश्वर ने ऋग्वेद में कहा है कि वह इस जगत में सर्वत्र व्याप्त है, छाया हुआ है। फिर भी वह इन सबसे दस अंगुली ऊपर रहता है। वो तो ठहरा ईश्वर और हम तो इंसान है। दस अंगुली भले न सही, पर जीवन की घनघटाओं से भले न सही, पर जीवन की घनघटाओं से अपने विशेष अहम सत्व को एक आध अंगुली भी ऊपर रख सकें तो भी बहुत है।“ फिर तो अंगुली की एक नोक को दिखाकर कहा, "इतना भी रहे तो भी बहुत है। आपके पिंड में वह सामर्थ्य है। यह मैंने महसूस किया है।“

पंडित जी की बातों से नम्रा का अंतर परितृप्त हो गया। उनके स्वाती योग जैसे बोल उसके मन में एक अद्भुत भाव जगा रहे थे। अचानक उसका ध्यान बंट गया। उसके पीछे से गुजरते लोगों की परछाइयाँ “स्पार्कलिंग व्हाइट” दीवार पर पड़ रही थी। मकान के रंग रोगान के समय सुजीत ने इस रंग सी दीवार को रंगने का विशेष दबाव डाला था। और आज सुबह ही कार्यक्रम में जाने से पहले कम वोल्टवाले बल्ब को बदलकर हाइवोल्ट वाले बल्ब को लगा दिया। “डाईनिंग एरिया में रोशनी तेज रहेगी तो तुम्हारे लिए ही ठीक रहेगा आँखें चुधियाएंगी नहीं।“ सामने की दीवार पर उसी बल्ब की रोशनी से होती परछाइयाँ अंग प्रत्यंग को तोड़ मरोड़कर छाया नृत्य करती मुद्राएँ ध्यान को भटका रही थी। और तभी सुजीत ने सूचित किया, “अरे नम्रा इन सबको क्लीयर करके स्वीट डिश सर्व करें क्यों? – “मधुरेन समापयेत” कहते हुए सुजीत अपनी विशेष मुद्रा में अट्ठाहास कर उठा। उठाते हुए नम्रा ने पंडित जी की डिश उठा ली । “आप उठाओगे, ये नहीं हो सकता” आप तो हमारे विशिष्ट अतिथि हैं। ये तो सौभाग्य है हमारा।“ “चलो बुजुर्ग हूँ तो फ़ेवर स्वीकार करता हूँ। वर्ना जो नहीं होना चाहिए वही हो रहा है।“ कहते हुए उन्होने तिपाई आदि पर बिखरी पड़ी डिश पेपर नैपकिन के ढेरों की ओर नजर डाली। प्लेट लेकर वह खड़ी हो गई। सामने की दीवार पर उसकी ही परछाई डोल उठी। डिशों को लेकर वो डाईनिंग टेबल के पास गई। दीवार के नजदीक रखे स्टूल पर के प्लास्टिक टब में कुछेक डिश पड़े थे उसने अपने हाथ के डिश को कोटन में उंडेल दिया।

“सब क्लीयर कर देते हैं” कहनेवाला सुजीत दो तीन लोगों के साथ, डाईनिंग टेबल के पास के प्रकाशोज्ज्वल लेम्प के नीचे निश्चित होकर खड़े थे। उन सभी के प्लेट और टिश्यू पेपर भी टेबल पर बिखरे हुए थे। हेंड वाईपर की मदद से उसने प्लासटीक के टब में सब को डाल दिया। फिर हाथ धोकर कटोरी में स्वीट डिश परोस कर सबको अपनी-अपनी जगह पर पकड़ा आई।

पंडित जी की अनुभवजन्य बातों को सुनने का मन हो रहा था। उनके साथ बैठना चाहती थी – नोक जितना नहीं तो नाखून के कोने जितना समय भी संसार के झमेले में अपने लिए निकाल सको तो बहुत है। परंतु गृहस्थी और साथ जुड़े ये मेहमानवाजी सियामी जुडवे जैसे है। चेहरे पर पड़ने वाली परछाइयों की तरह ही बाधा उपस्थित करती है। सामने से पड़नेवाली छाया हमारा ध्यान भंग करती है तो फिर सामने से पड़ती रोशनी से आँखों में अंधेरा छा जाता है। फिर भी रोशनी का सामना तो करना ही पड़ता है न। परछाई के कट आउट को रन आउट किए बिना छुटकारा नहीं है। “ऊंगली भर का हो या नोक जितना” – छोड़ सबको - मन ही मन में कहकर “अवाउट टर्न” लिया। अब तो इस समारोह रूपी समुद्र अपने आप को पूरी तरह स्वाहा कर देता है भल्ली वाई। नहीं तो शौम्य उजाले की शीतलता स्वास्थ्यता रन आउट हो सकती है और वह डाईनिंग ड्रोईंग के जोइण्ट पर बिखरे अवशेषों को इकट्ठा करने में लग गई।

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