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कहानी– "सच्ची श्रद्धांजलि" - डॉ0 मृदुला शुक्ला "मृदु"

गर्मी का मौसम था, सूरज भी दिन भर अपनी प्रचण्ड किरणें बिखेरता रहता, गर्म-गर्म हवाएँ भी खूब झुलसाने में लगी रहतीं। गर्मी की छुट्टियों में विद्यालय भी एक महीने के लिए बन्द हो चुके थे। मेरी बी0ए0 की परीक्षा भी समाप्त हो चुकी थी, बस परीक्षा-परिणाम आना बाकी था। मेरे माता-पिता फॉर्म हाउस में रहते और मैं शहर में रहकर अपनी पढ़ाई करती । कॉलेज में छुट्टी हो जाने पर मैं भी फॉर्म हाउस जाने की तैयारी करने लगी।

           एक दिन सुबह होते ही तैयार होकर मैंने गाड़ी निकाली और ड्राइव करती हुई अपने फॉर्म हाउस के लिए रवाना हो ली। फॉर्म हाउस की दूरी तकरीबन 60 किलोमीटर थी। सबेरे-सबेरे मन्द-मन्द बहती हुई शीतल वायु, हरे-हरे खेत और नहर में तीव्र वेग से बहता हुआ कलकल करता हुआ पानी, ये सब कुछ मेरे कोमल मन को बहुत ही आनन्दित कर रहा था।

           कहीं खेत में मोर नाचते हुए केहाँउ-कहाँउ करते दिख रहे थे, तो कहीं हाथियों का झुण्ड एक साथ प्रसन्नतापूर्वक नहर में पानी पीता हुआ नज़र आ रहा था। गाड़ी की गति धीमी करके मैं इन सारे ख़ूबसूरत नज़ारों का आनन्द लेती हुई अपने फॉर्म हाउस पहुँचने वाली ही थी कि फॉर्म हाउस वाले गाँव के बाहर पेड़ के नीचे बैठे एक युवक को देखा, जो देखने में अत्यन्त उदास और दुखी लग रहा था।

            मैंने गाड़ी रोकी और गाड़ी से उतर कर मैं उस युवक के पास गई। उसे देखकर लग रहा था कि जैसे वह पूरी तरह से टूट चुका हो और उसके जीवन में अब कुछ भी शेष न हो।

          "तुम कौन हो ? यहाँ क्या कर रहे हो ? इतने मायूस और दुखी होकर क्यों बैठे हो ? वैसे तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारा घर कहाँ है ? कहाँ के रहने वाले हो ?"

             मेरे द्वारा उसके बारे में इतना सब कुछ बार-बार पूछने पर उस युवक ने बताना शुरू किया–

        "मैडम, मैं अखिल हूँ, इसी कल्याणपुर गाँव का रहने वाला हूँ। मेरे माता-पिता गरीब थे, उनकी इच्छा थी कि मैं खूब पढ़-लिख कर इंजीनियर बनूँ। इसलिए उन्होंने शुरू से ही मुझे बाहर अच्छे स्कूल में पढ़ने के लिए भेज दिया। मेरे पिता के पास चार बीघा खेत था, उसमें वो कड़ी मेहनत करके मेरी फीस भरते और मेरा पूरा खर्चा उठाते। मैं जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे ही मेरी फीस और अन्य खर्चे बढ़ते गए, इसलिए पिता जी साहूकार से भी रुपये उधार ले-लेकर मुझे पढ़ाते जाते और साहूकार को विश्वास दिलाते रहते – "कि जब अखिल इंजीनियर बन कर आएगा, तब सारा का सारा उधार का रुपया चुका देगा" ऐसा कहते-कहते अत्यन्त भाव-विभोर हो जाते, उनकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगते।"

       मैं भी पूरी लगन और कठिन परिश्रम से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने लगा।

       कुछ देर तक चुप रहने के बाद अखिल ने फिरसे बोलना शुरू किया–

           एक बार मेरी फीस भरने के लिए मेरे पिता साहूकार के पास रुपये उधार लेने के लिए गए। मेरे माता-पिता पढ़े-लिखे तो थे नहीं, इसका फायदा उठाते हुए खेत और मकान के काग़ज़ों पर उनका अँगूठा लगवाकर खेत और मकान धोखे से अपने नाम करवा लिया, जब मेरे पिता अपना खेत जोतने गए, तब साहूकार के नौकरों ने खेत जोतने को मना कर दिया और कहा–

           "ये तो साहूकार के खेत हैं" , जब मेरे पिता ने जाकर साहूकार से सारी बात बताई , तब साहूकार ने मेरे पिता को फ़टकार लगाते हुए कहा–

         "कैसा तुम्हारा मकान ? और कैसा तुम्हारा खेत ? वो मकान और खेत तो तुमने मेरे नाम कर दिया है। वो सब कुछ मेरा है, तुम्हारा कैसे हो गया ?" ऐसा कहकर साहूकार ने मेरे पिता को वहाँ से भगा दिया।

           मेरे पिता ने घर आकर सारी बात मेरी माँ को बताई। इतना बड़ा धोखा खाकर दोनों बहुत दुखी हुए और अपने आप को कोसने लगे–

        "हम अनपढ़ हैं, अँगूठा छाप हैं, इसीलिए उस साहूकार ने हमारे साथ धोखा करके हमारा सब कुछ हड़प लिया।"

         इसी चिन्ता, दुख और आत्मग्लानि से मेरे माता-पिता अस्वस्थ रहने लगे और एक दिन वे दोनों इस संसार से विदा होकर चले गए, मुझे बिलकुल अकेला छोड़कर। सूचना पाकर जब मैं यहाँ घर आया, तब लोगों ने मुझे सारी बात बताई।

            अखिल का गला बोलते -बोलते रुँध गया, फिर बोला–

         "अब मैं क्या करूँ ? मेरे जीवन का अब तो कोई उद्देश्य ही नहीं रहा। माता-पिता ने भी मेरा साथ छोड़ दिया। मैं पूर्णरूप से असहाय हो गया हूँ, अनाथ हो गया हूँ, अनाथ व्यक्ति भला क्या कर सकता है ?"

          वह रोता हुआ मुझसे कहता जा रहा था और मैं स्तब्ध होकर खड़ी-खड़ी सुनती जा रही थी। मेरी आँखों से भी आँसुओं की अविरल धारा बहे जा रही थी। मेरा मन भी बहुत दुखी हो गया।"

           थोड़ी देर बाद मैँने अपने आप को सम्हाल कर उसे सान्त्वना देते हुए कहा–

         "देखो अखिल ! तुम बिलकुल भी निराश मत हो, तुम्हारे माता-पिता तुम्हें पढ़ा-लिखा कर इंजीनियर बनाना चाहते थे। कितने कष्टों को सहन करके तुम्हें पढ़ाया-लिखाया, लेकिन तुम्हें अपनों कष्टों, अपनी परेशानियों की भनक तक नहीं लगने दी और तुम अपनी हिम्मत हारकर हताश होकर बैठ गए ? तुम्हें तो अपने माता-पिता की इच्छा पूरी करने के लिए दृढ़ संकल्प लेकर अत्यधिक उत्साहपूर्वक कड़ी मेहनत करनी चाहिए।"

         अब तुम्हें हिम्मत, साहस, धैर्य और लगन के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करना होगा। सुख-दुख तो आते-जाते रहते हैं। परिस्थितियाँ भी कभी एक जैसी नहीं रहती, हमेशा बनती-बिगड़ती रहती हैं। बादल अचानक आकर सूरज को ढक लेते हैं, लेकिन हमेशा के लिए ढक नहीं पाते।

        इसलिए तुम्हें आगे बढ़ना होगा, दृढ़ निश्चयी बन कर अपना लक्ष्य हासिल करना होगा, अपने माता-पिता की इच्छा पूरी करनी होगी, इंजीनियर बनना होगा, यही तुम्हारे माता-पिता के प्रति तुम्हारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

          इतना कहकर मैं अपनी गाड़ी में बैठ गई और उस युवक के विषय में सोंचती हुई धीरे-धीरे गाड़ी ड्राइव करती हुई अपने फॉर्म हाउस पहुँच गई।

         मैं तो प्रकृति के बीच अपने माता-पिता के पास छुट्टियाँ मनाने के लिए खुशी-खुशी गई थी, पर मैं  अत्यन्त थकान का अनुभव कर रही थी और मानसिक शान्ति का तो दूर-दूर तक वास्ता ही न था।

         मैं कुछ देर ही फॉर्म हाउस में रुकी थी, किन्तु मेरा मन अत्यधिक विचलित था। मैं पुनः उसके पास गई और बार-बार उसे सान्त्वना देती रही। मेरा उससे न जाने कैसा आत्मिक लगाव-सा हो गया था। मैं उसे बार-बार समझाती रही। मेरी एक महीने की छुट्टी तो थी ही, वहीं फॉर्म हाउस में अपने माता-पिता के साथ रहने लगी। अब अखिल भी वहाँ आने-जाने लगा और मैं लगातार उसे समझाती रहती, उत्साहित करती रहती।

        छुट्टियाँ खत्म होते ही मैं आगे की पढ़ाई करने के लिए वापस शहर आ गई, लेकिन उसका चेहरा मेरी नज़रों के सामने से हट ही नहीं पाता और हर क्षण मैं उसी के बारे में सोंचती रहती।

           कुछ दिनों के बाद ही मैं अपने माता-पिता से मिलने फॉर्म हाउस जाने के लिए निकली।

             गाड़ी ड्राइव करते हुए मैं अपने फॉर्म हाउस के पास पहुँची ही थी कि तभी मैंने एक बहुत बड़ा हॉल देखा, जिसकी सारी खिड़कियाँ और दरवाजे खुले हुए थे। मुझे यह देखकर काफी आश्चर्य हुआ और साथ ही तमाम सवालों को लेकर मेरे मन में काफी उत्सुकता भी जाग उठी। अपनी उत्सुकता को शान्त करने के लिए मैंने उस हॉल के पास जाकर अपनी गाड़ी रोक दी। गाड़ी से उतरते ही मेरे आश्चर्य का ठिकाना ही न रहा। मैंने देखा कि गाँव के तमाम बच्चे और कई बुज़ुर्ग महिला-पुरुष कुर्सियों पर बैठे पढ़ाई कर रहे थे और उन्हें पढ़ाने वाला शिक्षक था-वही युवक अखिल।

          अखिल अब पहले वाला हताश, निराश युवक नहीं था। अब उसके चेहरे पर अनोखी चमक और जोश से भरा उत्साह था, सन्तोष था, धैर्य था, अपूर्व खुशहाली थी।

           अखिल मुझे देखते ही अत्यन्त खुश होकर हॉल के बाहर आकर मुझे धन्यवाद देकर कहने लगा–

          "मैडम मैं इंजीनियर बन गया। मेरी पोस्टिंग इसी गाँव से सटे हुए शहर फूलपुर में हुई है। मैंने ये हॉल गाँव के बच्चों और बुज़ुर्गों को पढ़ाने के लिए बनवाया है। नौकरी करने के बाद जब खाली समय मेरे पास होता है, तब मैं रोज़ इन सबको यहाँ पढ़ाता हूँ, सिर्फ यह सोंचकर कि कोई अनपढ़ न रहे।

             मेरे माता-पिता पढ़े-लिखे नहीं थे, इसीलिए साहूकार ने उनके मकान और खेत के काग़ज़ों पर धोखे से अँगूठा लगवा लिया। यदि मेरे माता-पिता भी पढ़े-लिखे होते, तो कभी भी कोई उन्हें धोखा न दे पाता और न ही मुझे अनाथ होना पड़ता।

         अखिल बार-बार कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कह रहा था–

          "मैडम आपने तो मुझे नया जीवन दिया है। आपने ही मुझमें हिम्मत, साहस, धैर्य और लगन के साथ कड़ी मेहनत करना सिखाया है। मेरे अन्दर आपने ही नई ऊर्जा का संचार किया, जिसके कारण मैं अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पाया हूँ और अपने माता-पिता की इच्छा को पूरा कर पाया हूँ और यही मेरी अपने माता-पिता के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।"

          अखिल अबाध गति से बोलता चला जा रहा था, उसकी बातों में उसकी अथाह खुशी झलक रही थी। मैं भी उसके चेहरे और उसकी आँखों की चमक, विश्वास, लगन, परिश्रम, धैर्य, और दृढ़ आत्मविश्वास को देखकर उसकी तरफ स्वतः ही खिंचती चली जा रही थी, जिससे मेरा आत्मिक लगाव अत्यधिक बढ़ता ही चला जा रहा था। वह भी बहुत खुश था और उसे अत्यन्त खुश देखकर मैं भी बहुत खुश थी।

             उसकी प्रत्येक बात आज भी मुझे अद्वितीय अलौकिक आनन्द की प्राप्ति कराती है।

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        कहानीकार

डॉ0 मृदुला शुक्ला "मृदु"

114, महराज-नगर

लखीमपुर-खीरी (उ0प्र0)

सम्पर्क सूत्र-9919168464

कॉपीराइट–लेखिका डॉ0 मृदुला शुक्ला "मृदु"

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