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काना - लघुकथा - सुशील शर्मा

"मे आई कम इन सर " दिनेश की आवाज़ ने मास्टर जी को चौंकाया।

"क्यों यहाँ क्यों आये हो ,तुम्हारा एडमिशन तो बायो में हुआ था

?" मास्टरजी ने प्रश्न किया।

"सर मैडम कह रही हैं मुझसे बायो नहीं बनेगी आर्ट्स में ही पढ़ना पड़ेगा।" दिनेश ने टूटी आवाज़ में कहा।

"लेकिन तुम्हारे तो दसवीं में सत्तर प्रतिशत हैं मैडम ऐसा क्यों बोल रहीं हैं ? "मास्टरजी को बड़ा आश्चर्य हुआ।

"मैडम जी ने कहा है। "दिनेश बड़ा बेबस नजर आ रहा था।

"ठीक है मैं मैडम जी से बात करूँगा। "मास्टरजी ने कहा।

छुट्टी में मास्टरजी ने मैडम जी से पूछा "मैडम आपने दिनेश को आर्ट में क्यों भिजवाया ?"

"अरे सर उसकी एक आँख नहीं हैं सुबह सुबह उसी का चेहरा देखना पड़ता है। दो दिन से बहुत सारे अपशकुन हो रहें हैं वैसे भी वो तो अनुसूचित जनजाति में है, कुछ भी पढ़ ले क्या फर्क पड़ता है। वैसे ये बात आप को ही बता रहीं हूँ किसी से मत कहना।" मैडम ने धूर्तता से हँसते हुए कहा।

मास्टर जी को बहुत क्रोध आया उन्होंने मैडम से कहा "मुझे नही लगता आप शिक्षक बनने लायक है।"

"क्या मतलब आपका?"मैडम गुर्राई।

"सिर्फ इसलिए कि वो विकलांग है और उसके एक आंख नही है और आपकी बेसिरपैर की शंकाओं को पुष्ट करने के लिए आप उसकी जिंदगी से खेल रही हो,आपको शर्म आनी चाहिए।" मास्टर जी का चेहरा क्रोध से लाल हो गया।

"कल अगर आपके बेटे की आंख फूट जाए और स्कूल में उससे ऐसा व्यवहार हो तब आप पर क्या बीतेगी कभी इस बारे में सोचा है आपने?" मास्टर जी गुस्से में डस्टर को टेबिल पर पटकते हुए वहाँ से जाने लगे।

"आई एम सोरी सर मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया आप दिनेश को वापिस मेरी कक्षा में भेज दीजिए,आज आपने मेरी आँखें खोल दी।" मैडम ने लज़्ज़ित स्वर में कहा।

मास्टर जी के चेहरे पर आत्मसंतोष था।

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