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प्रेमचंद का महत्त्व और उनकी प्रासंगिकता - वीणा भाटिया

विश्व साहित्य में प्रेमचंद का महत्त्व युगांतरकारी है। प्रेमचंद ने उर्दू में लिखना शुरू किया और फिर हिंदी में लिखने लगे। शुरुआती दौर में प्रेमचंद के लेखन पर पुरानी किस्सागोई की शैली का प्रभाव है, पर बाद में वे यथार्थवादी शैली अपना लेते हैं। उसी के साथ भाषा भी बदलती चली जाती है और वे हिंदी गद्य को सर्वथा एक नया रूप दे देते हैं। वे एक ऐसे यथार्थवादी कथा-शिल्प का विकास करते हैं, जो उस समय के मूल सामाजिक अंतर्द्वंद्वों को कथा-वस्तु के रूप में उठाने से संभव हो पाती है। जाहिर है, प्रेमचंद के पहले और किसी ने ऐसा नहीं किया था। यही कारण है कि प्रेमचंद का महत्त्व सबसे बढ़ कर है और विश्व साहित्य में वे प्रथम श्रेणी के रचनाकार के रूप में समादृत हैं।

विश्व साहित्य में प्रेमचंद का स्थान वही है जो गोर्की, चेखव, लू शुन और अन्य महान क्रांतिकारी लेखकों का है। विश्व साहित्य में प्रेमचंद की हैसियत भारत के प्रतिनिधि लेखक की है। सवाल है, आखिर प्रेमचंद इतने महत्त्वपूर्ण क्यों हैं? इसका जवाब यही है कि उन्होंने औपनिवेशिक और टूटते हुए सामंती भारत में सबसे अधिक उत्पीड़ित सामाजिक वर्ग किसानों के जीवन का वास्तविक और सच्चा चित्रण किया। उन्होंने उस ऐतिहासिक विडंबना को महसूस किया जो अंग्रेजी राज में किसानों के जीवन में उत्पन्न होती है। भारतीय आर्थिक-सांस्कृतिक व्यवस्था के मूल आधार किसानों को अंग्रेजी औपनिवेशिक व्यवस्था सामंतों के सहयोग से इस कदर शोषण का शिकार बनाती है कि वे किसानी छोड़ने को विवश होने लगते हैं। लाख कोशिश करने के बाद भी किसान जीवन की मर्यादा को ‘होरी’ नहीं बचा पाता और ‘गोबर’ आधुनिक शहरी मजदूर बन कर अवतरित होता है। आधुनिक उद्योग तंत्र का उभार किसानों को उजाड़े बिना, उन्हें उनकी जमीन से बेदखल किए बिना नहीं हो सकता था। यह सच प्रेमचंद के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में से एक ‘रंगभूमि’ में सामने आया है। आज इसकी प्रासंगिकता इस रूप में दिखाई पड़ती है कि आधुनिक उद्योग तंत्र को अपने विकास के लिए अभी भी किसानों के रक्त-मज्जा की जरूरत है।

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जाहिर है कि अपने समय और समाज की गत्यात्मकता को जिस रूप में प्रेमचंद ने पकड़ा, उनका समकालीन दूसरा कोई अन्य कथाकार ऐसा नहीं कर पाया। प्रेमचंद ने दोहरे शोषण की मार से त्रस्त किसानों के जीवन का महाकाव्यात्मक चित्रण किया और कथा साहित्य में यथार्थवाद को उसकी चरम उंचाइयों तक पहुंचाया। आज प्रेमचंद के साहित्य का अध्ययन किये बिना बीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में किसानों के जीवन को और सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक संघर्ष की मूल धारा को समझ पाना अत्यंत ही कठिन होगा। यही है प्रेमचंद के साहित्य का चिरस्थाई महत्त्व।

पहले साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता था। यह सच है कि साहित्य समाज का दर्पण है, पर प्रेमचंद ने इस सरलीकृत परिभाषा की जगह साहित्य को ‘जीवन की आलोचना’ बताया। दरअसल, साहित्य जीवन की पुनर्रचना है और इस पुनरर्चना में ही उसकी आलोचना निहित होती है। इस परिभाषा से यह स्पष्ट हो जाता है कि साहित्य को सरलीकृत सूत्रों की सहायता से नहीं समझा जा सकता है। प्रेमचंद ने साहित्य को समझने की नयी दृष्टि दी। पहले साहित्य का उद्देश्य मनोरंजन मात्र समझा जाता था, पर साहित्य को नये रूप में परिभाषित करते हुए प्रेमचंद ने लिखा, “साहित्य उसी रचना को कहेंगे जिसमें कोई सच्चाई प्रकट की गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित एवं सुंदर हो और जिसमें दिल तथा दिमाग पर असर डालने का गुण हो।” उन्होंने लिखा, “हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो – जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं, क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।” उपरोक्त कथनों से प्रेमचंद के दृष्टि-विस्तार को समझा जा सकता है।

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प्रेमचंद शुरू में गांधीवादी थे। असहयोग आंदोलन के दौरान गांधीजी के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी पर लात मार दी थी और बनारस में सरस्वती प्रेस की स्थापना की थी। इसमें होने वाले लगातार घाटे ने उन्हें जीवन के अंतिम दिनों तक परेशान रखा। आर्थिक कठिनाइयों से उबरने के लिए वे फिल्मी दुनिया में लेखन के लिए भी गये, पर जन संस्कृति का पक्षधर भला अपसंस्कृति के माहौल में कैसे रह सकता था। वे जल्दी ही बम्बई से वापस आ गए। उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित होने वाली ‘माधुरी’ का संपादन किया। बाद में उन्होंने मासिक ‘हंस’ और पाक्षिक ‘जागरण’ का प्रकाशन-संपादन किया। इन पत्रों के प्रकाशन द्वारा उन्होंने न सिर्फ साहित्य, बल्कि विविध सामाजिक, राजनीतिक व सांस्कृतिक विषयों पर नये क्रांतिकारी विचारों का प्रसार किया।

वर्ष 1936 में जब सज्जाद ज़हीर और मुल्कराज आनंद जैसे लेखकों ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की तो लखनऊ में उसके प्रथम सम्मेलन की अध्यक्षता के लिए उन्हें आमंत्रित किया। वहां प्रेमचंद ने साहित्य के उद्देश्य पर सविस्तार व्याख्यान दिया। उस समय तक उनकी सभी कृतियां प्रकाशित हो चुकी थीं और वे ‘मंगलसूत्र’ उपन्यास की रचना कर रहे थे जो उसी वर्ष उनके निधन के कारण अधूरा रह गया। मात्र 56 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हो गया। लेकिन उनका जीवन और संघर्ष साहित्य के इतिहास में एक मिसाल बन गया।

प्रेमचंद जनता के लेखक थे। उन्होंने अपने आपको ‘कलम का मजदूर’ घोषित किया था और कहा था जिस दिन उन्होंने कुछ नहीं लिखा, उन्हें रोटी खाने का अधिकार नहीं है। लगातार आर्थिक कठिनाइयों को झेलते हुए, संघर्ष करते हुए उत्पीड़ित जनता का यह लेखक जीवन के आखिरी दिन तक लिखता रहा। हिंदी साहित्य का यह दुर्भाग्य है कि प्रेमचंद की परंपरा का समग्र विकास नहीं हो सका। विचारधारा के नाम पर साहित्य पर राजनीति हावी होती चली गई। लेखक संगठन टूट-फूट और बिखराव के दलदल में फंसते चले गए। वे राजनीतिक दलों के अनुगामी बन गए, जबकि प्रेमचंद ने कहा था कि साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली नहीं, बल्कि आगे-आगे मशाल दिखाते हुए चलने वाली सच्चाई है।

Email – vinabhatia4@gmail.com

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