नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

समीक्षा - काश! मैं चिड़िया होती

जब भी छतीसगढ़ के बाल साहित्य परिदृश्य की चर्चा होती है तो केवल दो नाम जल्दी से याद आता है और वे हैं श्री शंभूलाल बसन्त जी रायगढ़ और आदरणीय श्री बलदाऊ साहू जी रायपुर, सम्भव है इनके अतिरिक्त भी कोई चर्चित नाम हो, पर मैं अपनी अल्पज्ञता के कारण उनसे परिचित न होऊं। बाल साहित्य एक कठिन विधा है। सबकी लेखनी में वह सामर्थ्य नहीं होती जो बल साहित्य को साध सके। भले ही कुछ लोग बाल साहित्य को दोयम दर्जे की विधा य आसान विधा कहने से गुरेज न करते हों। पर ऐसा कहने य मानने वाले साहित्यकार के सामने यदि एक उत्कृष्ट बाल साहित्य सृजन की कि चुनॉटी रख दी जाए तो मेरा दावा है उसमें से अधिकांश बगलें झांकने लगेंगे। मगर खुशी की बात यह है कि एक युवा साहित्यकार श्री टिकेश्वर सिन्हा गबदी वाले ने न केवल इस चुनॉटी को स्वीकार ही किया बल्कि अपनी लेखनी की सम्पूर्ण ऊर्जा बाल साहित्य सृजन हेतु लगाने को कमर कस कर जुटे हए हैं।

       बच्चों की प्रवित्तियों को आत्मसात किये बिना और उनके मनोभाव से पूर्णतः परिचित हुए बिना बाल साहित्य नहीं लिखा जा सकता। ये अलग बात है हम सभी बचपन के रास्ते से गुजरकर ही जीवन पथ पर आगे बढ़ रहे हैं, पर बचपन की कितनी बातें हमें याद है?

     बच्चों के परिवेशीय ज्ञान, उनके अल्प शब्द भंडार, उनकी उम्र और रुचि, उनके मनोरंजक खेल इत्यादि बातों को अपनी सर्जना में समाहित कर ही सफल बाल साहित्य रचा जा सकता है, बाल कविताएं लिखी जा सकती है।

       चूंकि टिकेश्वर सिन्हा जी शिक्षकीय पेशे से जुड़े हुए हैं तो जाहिर है उनका अधिकांश समय बच्चों के साथ ही व्यतीत होता है। उन्हें बाल मनोविज्ञान का ज्ञान है तभी वे " काश ! मैं चिड़िया होती" जैसे कविताओं का संग्रह देकर छत्तीसगढ़ के हिंदी बाल साहित्य संसार को समृद्ध करने में सफल हुए हैं।

      संग्रह के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि लैंगिक भेद और पुरातन परम्पराओं की बेड़ियों में जकड़ी यह किसी बालिका की ऊंची आकांक्षा है, जो अपने सपनों के संसार को वास्तविकता के धरातल पर उतार लाने को व्याकुल है, व्यग्र है पर शीर्षक में काश शब्द यह संकेत है कि वह विवश भी है। बालिका शिक्षा के प्रति समाज में जागरूकता लाने, उन्हें स्वावलम्बी और आत्म निर्भर बनाने के लिए समाज को प्रेरित करने के उद्देश्य से ही कवि ने यह शीर्षक दिया होगा ऐसा मेरा विचार है।

        संग्रह की कविताओं में बाल खेल, पर्यावरण, देशभक्ति, शिक्षा का महत्व, तीज त्योहार इत्यादि विषयों के साथ कवि ने बच्चों के अनुकूल शब्दों का प्रयोग करते हुए, बाल सुलभ चेष्टाओं को चित्रित करने का सफल और सुंदर प्रयास किया है।

         संग्रह की कविताओं का आनंद तो इसे पढ़कर ही लिया जा सकता है। मेरी शुभकामना है कि टिकेश्वर सिन्हा जी अपने उद्देश्य में सफल हों और बाल साहित्य को अपनी लेखनी से समृद्धि की ओर अग्रसर करते रहें।

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.