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मुंशी प्रेमचंद "कलम का सिपाही - डॉ रचनासिंह"रश्मि"

*मुंशी प्रेमचंद "कलम का सिपाही"*

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मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के प्रमुख स्तंभ थे जिन्होंने हिंदी जगत को कहानियाँ एवं उपन्यासों की अनुपम सौगात प्रस्तुत की प्रेमचंद हिन्दी और उर्दू के महानतम लेखकों में से एक हैं।

साहित्य जगत ने उनके लेखन से प्रभावित होकर उन्हें ‘कलम के सिपाही’ का उपनाम दिया है

मुंशी प्रेमचन्द ने साहित्य के माध्यम से भारत के दलित एवं उपेक्षित वर्गों का नेतृत्व करते हुए उनकी पीड़ा एवं विरोध को वाणी प्रदान की उनकी रचनाओं का एक उद्देश्य होता था.अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने न केवल सामाजिक बुराइयों के दुष्परिणामों की व्याख्या की, बल्कि उनके निवारण के उपाय भी बताए .उन्होंने बाल-विवाह, बेमेल-विवाह, विधवा-विवाह, सामाजिक शोषण, अंधविश्वास इत्यादि सामाजिक समस्याओं को अपनी कृतियों का विषय बनाया एवं यथासंभव इनके समाधान भी प्रस्तुत किए‘कर्मभूमि’ नामक उपन्यास के माध्यम से उन्होंने छुआ-छूत की गलत भावना एंव अछूत समझे जाने वाले लोगों के उद्धार का मार्ग बताया है.उन्होंने लगभग अपनी सभी रचनाओं में धर्म के ठेकेदारों की पूरी आलोचना की है एवं समाज में व्याप्त बुराइयों के लिए उन्हें जिम्मेदार मानते हुए जनता को उनसे सावधान रहने का संदेश दिया है.‘सेवासदन’ नामक उपन्यास के माध्यम से उन्होंने नारी शोषण के खिलाफ आवाज उठाई है.अपनी कई रचनाओं में हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिकता पर गहरा आघात किया एंव ‘कर्बला’ नामक नाटक के माध्यम से उनमें एकता व भाईचारा बढ़ाने का सार्थक प्रयास किया ।

इस तरह देखा जाए तो अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रेमचन्द ने न केवल ‘कलम के सिपाही’ के रूप में ब्रिटिश सरकार से लोहा लिया, बल्कि समाज सुधार के पुनीत कार्य को भी बखूबी अंजाम दिया उनके उपन्यास ‘गोदान’ को यथार्थवादी उपन्यास की संज्ञा दी जाती है, क्योंकि इसके नायक होरी के माध्यम से उन्होंने समाज के यथार्थ को दर्शाया है गाँव का निवासी होने के कारण उन्होंने किसानों के ऊपर हो रहे अत्याचारों को नजदीक से देखा था, इसलिए उनकी रचनाओं में यथार्थ दर्शन होते हैं। उन्हें लगता था कि सामाजिक शोषण एंव अत्याचारों का उपाय गांधीवादी दर्शन में है, इसलिए उनकी रचनाओं में गांधीवादी दर्शन की भी प्रधानता है.प्रेमचन्द गांव के किसान एंव मोची से लेकर शहर के अमीर वर्ग एंव सरकारी मुलाजिमों तक को अपनी रचनाओं में यथार्थ चित्रण किया है। साहित्य जगत ने उनके लेखन से प्रभावित होकर उन्हें ‘कलम के सिपाही’ का उपनाम दिया है प्रेमचन्द को उनके महान उपन्यासों में उत्कृष्ट कथाशिल्प एवं प्रस्तुतीकरण के कारण ‘उपन्यास सम्राट’ भी कहा जाता है ।

मुंशी प्रेमचंद का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही नामक ग्राम में सन् 1880 ई॰ को एक कायस्थ परिवार में हुआ था । उनके पिता श्री अजायब राय तथा माता आनंदी देवी थीं । प्रेमचंद जी का वास्तविक नाम धनपत राय था । परंतु बाद में साहित्य जगत में वे ‘मुंशी प्रेमचंद’ के रूप में प्रख्यात हुए ।

प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक हैं। उन्‍होंने हिंदी और उर्दू में दोनों में. लिखा। उनकी अधिकांश रचनाएं मूल रूप से उर्दू में लिखी गई हैं लेकिन उनका प्रकाशन हिंदी में पहले हुआ। तैतीस वर्षों के रचनात्मक जीवन में वे साहित्य की ऐसी विरासत सौप गए जो गुणों की दृष्टि से अमूल्य है और आकार की दृष्टि से असीमित। उनकी सभी पुस्तकों के अंग्रेज़ी व उर्दू रूपांतर तो हुए ही हैं, चीनी, रूसी आदि अनेक विदेशी भाषाओं में भी उनकी कहानियाँ लोकप्रिय हुई हैं।

लंबी बीमारी के बाद 8 अक्टूबर 1936 को प्रेमचन्द का निधन हो गया | उन्होंने एक साहित्यकार के रूप में न केवल हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया, बल्कि समाज की समस्याओं का वर्णन करते हुए उनके निराकरण के उपाय भी बताए .उन्होंने साहित्य-सृजन को भारत के नवनिर्माण एवं जागरण का माध्यम बनाया उनकी महान रचनाओं, जिनके कारण हिन्दी को दुनियाभर में एक विशिष्ट पहचान मिली, के लिए हिन्दी साहित्य प्रेमचन्द का सदा ऋणी रहेगा .

डॉ रचनासिंह"रश्मि"

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