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भटकी चिडिया को उसके घर पहुंचना - डॉ श्रीमती मृणालिका ओझा

*भटकी चिडिया को उसके घर पहुंचना*

*शाम 'सुनहरी' थी, और "सुनहरी" हो गई*

      सुनहरी शाम अब सितारों वाली चूनर की घूंघट ओढ क्षितिज की ओर चल पड़ी थी। मैं भी अपने दौहित्र (नाती) के साथ छत पर टहलने आ चुकी थी। इस वर्ष तो वर्षा ने बड़ी बेरूखी दिखाई है। बारिश हो नहीं रह रही और सारे वनस्पति,  पशु - पक्षी,  अग - जग - जीवन उसकी आशा में आसमान तक रहे है। गज़ब की गर्मी है।  तेज धूप की तपिश से मुक्त हो शाम को अधिकांश लोग चाय की चुस्कियां लेते हुए छत पर टहलने लगे हैं। वैसे यह दृश्य जून तक ही प्रायः नजर आता था, पर इस वर्ष तो जुलाई में भी। कुछ भी हो, प्राकृतिक हवा के आनंद के मुकाबिल ए. सी. और पंखे की हवा का स्थान तो बाद में ही आता है। मैं इस हवा को रोम रोम में महसूस कर ही रही थी कि अचानक ये क्या? बिटिया के कमरे की खिड़की, जो छत पर खुलती है, वहाँ से फरफराहट की आवाज़ आ रही थी। चौंक कर मैंने खिडकी से चेहरा टिका लिया। साथ में छोटा कियांश (नाती) और अचंभित होकर  नानी की इस हरकत को देखते हुए, खिड़की से टिक गया। मेरा चेहरा खिडकी पर टिका था लेकिन मेरी आंखें भीतर कमरे  का कोना-कोना तलाश रही थी और कान दीवार के हर हिस्से पर आवाज़ की संभावना पर टिके थे। मैं कुछ सुनूँ  - देखूं इसके पहले ही कियांश का मुंह खिला, खुला और 'चिया-चिया' की ख़बर ले आया।

      सचमुच वह मध्यम आकार की काली खुबसूरत चिडिया ही थी। मैं कुछ और सोचूं इसके पहले ही 'लायरा' भौंकने लगी। मैंने दौड़कर छत का दरवाजा बंद किया, क्योंकि 'लायरा' बिटिया के कमरे में गई ------ तो चिडिया तो ----। जंपिंग में लायरा की सानी नहीं, दिखने में जरूर भारी- भरकम लेकिन जंप करने में माहिर। खैर! मैंने लायरा को दूसरे कमरे में भगाया, फिर बिल्ली की तरह बिना आहट वाली चाल चल धीरे से कमरे के अंदर जाकर दूसरी ओर बल्कानी ( घर जब बन रहा था, तब ठेकेदार बाल्कनी को 'बल्कानी' ही कहता था। यह शब्द नया तो था ही आकर्षित करने और हंसाने वाला भी) का दरवाजा खोला और चिड़िया को इस खुले दरवाजे की तरफ़ हांकने लगी। नीचे ओझा जी भी समझ गए कि ऊपर कुछ ख़ास चल रहा है। वे भी सहायतार्थ पहुंच गए, पर चिडिया थी कि खुले दरवाजे की तरफ़ भागने का नाम ही नहीं ले रही थी।

    हमेशा की तरह यह चिड़िया भी कुछ डरी हुई थी, शायद शिकारी के पंजे या नटखट बच्चों की गुलेल से बचकर भागी हो। वैसे वह चोटिल या घायल तो नजर नहीं आ रही थी,  लेकिन उसका बाहर न जाना 'छूटे हुए के हाथों फिर आ जाना' का डर तो बता ही रहा था। साल में एक - दो बार ऐसी घटना हो ही जाती थी, इसलिए इस डर भय से मैं परिचित तो थी ही।  अभी तक हर बार अलग-अलग चिडिया ही आई, इस बार भी अलग।  सिर पर 'कलगी' धारण किये।

    बहुत कोशिशों के बाद भी जब वह बाहर नहीं गई तब मजबूरन मैंने उसे हाथ से पकड़ लिया। कियांश हैरान सा नाना की बाहों में सिमट कर सब कुछ देखता रहा। डर गले को सूखा देता है, मैंने चिड़िया को मिट्टी के सकोरे में पानी पिलाने का प्रयास किया लेकिन उसने एक बूँद भी पानी नहीं पिया। यह गले को सूखा देने वाला डर नहीं था शायद। मैंने थोडा पानी छींटक कर चिड़िया को गीला किया और फिर बड़ी मुश्किल से एक साफ़ रूमाल से उसे दोबारा पकड़ा। वह यहाँ से वहाँ पलंग के आस-पास ही बैठती रही, पर भागने की कोशिश नहीं कर रही थी। लगभग अंधेरा होने को था, तभी मैंने सुना छज्जे पर कोई चिड़िया आवाज़ दे रही थी। मुझे पुरानी घटना याद आ गई। प्रायः चिड़िया का साथी उसके आस-पास ही होता है, उसे ढूंढता भी है और पुकारता भी। अगर शिशु चिड़िया हो तो उसके माता-पिता उसे ढूंढते रहते हैं।

   उस आवाज़ ने उसे जीवंत कर दिया और वह लगभग फुदकने लगी। मैंने उसे फिर से पकड़ा और बल्कानी की दीवार पर बैठाया। छूटते ही वह सीधे उड़ी और साथ ही उड़ा छज्जे से उसका साथी। अब वे दोनों सामने आम के पेड़ पर बैठ गये थे। शायद एक सेकंड के लिए दोनों ने  इस ओर देखा भी। हो सकता है उस मासूम के दिल में कोई स्नेह रहा हो, या ये भी कि -'जान बची तो लाखों पाये।'

    जो भी हो मेरी आंखों में हमेशा की तरह खुशी के साथ थोड़ी नमी भी थी। कियांश उन्हें उड़ता देख दोनों हाथ हिला हिला कर खुशी जाहिर कर रहा था।ओझा जी भी मुस्कुरा रहे थे, और सिर्फ ओझा जी ही क्यों, मुझे तो लगा आस-पास, जड़-चेतन सभी मुस्कुरा रहे हैं। आकाश में कुछ तारें झिलमिलाने लगे थे और शुक्ल पक्ष के प्रदोष का उज्जवल चांद मुझे एकटक निहारता हुआ  मुस्कुरा रहा था, उसकी मधुर मुस्कुराहट का अंदाज़ तो आप भी लगा सकते हैं।

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डॉ श्रीमती मृणालिका ओझा,

पहाड़ी तालाब के सामने,

बंजारी मंदिर के पास,

कुशालपुर

रायपुर (छत्तीसगढ़) 492001


ईमेल

mrinalika.ojha@gmail.com

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