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15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस विशेष आलेख - राष्ट्रीय चरित्र से खुलेगा विकसित राष्ट्र का द्वार

15 दिवस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष...

राष्ट्रीय चरित्र से खुलेगा विकसित राष्ट्र का द्वार

० मुखौटा पहने लोगों के खिलाफ जंग जरूरी

देश के 73वें स्वाधिनता पर्व से पूर्व हम भारतीय अपने भारत के सत्य को ढूंढ रहे है। उसके उस सुंदर स्वरूप की तलाश कर रहे है, जो भारत माता को बेड़ियों से मुक्त कराने से पूर्व प्रत्येक भारतीय के मानस पटल पर तैरा करता था। हम आज उन आयामों की तलाश में है, जिन्हें अपने अंग्रेजों की गुलामी की जंजीर तोड़ फेंकने से पूर्व अपनी आत्मा में संजो रखा था। अब तो हम पूर्ण रूप से स्वतंत्र अपने देश में इन्हीं सुंदर भावनाओं की माला एक-एक भारतीय के कंठ में डालना चाहते है। इस बार के स्वाधिनता महोत्सव में हम सबकी मिली जुली जिज्ञासा जाग उठे और जागरण का महापर्व प्यारे तिरंगे की आन-बान और शान बन जाये तो राष्ट्रीय पर्व गौरवान्वित हो उठेगा। कहा जाता है कि भारत एक देश है, किंतु यह इसकी पूर्ण परिभाषा नहीं मानी जा सकती है। कारण यह कि भारत वर्ष एक भूगोल है। यह एक गौरवशाली इतिहास है। एक संपूर्ण समाज है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हमारे इस देश का एक सुनिश्चित, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक ताना-बाना है, जिसमें हम सभी बंधे हुए है। हमारे इस देश में बहुत कुछ ऐसा है, जो ज्ञात है, और उससे भी कहीं ज्यादा अज्ञात है। भारत वर्ष का प्रत्येक नागरिक स्वतंत्रता के बाद से अपने भविष्य को निहार रहा है। देखा जाये तो भारत वर्ष की तस्वीर आज भी ‘कल-आज और कल’ के सूत्र में पिरोई हुई उस प्रतिबिंब की तरह है, जिसमें से अब तक धूल नहीं हटाई जा सकी है।

राष्ट्र को उठाने के लिए, उसे विकसित करने के लिए राष्ट्रीय चरित्र की आवश्यकता होती है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय चरित्र को इस तरह परिभाषित किया जा सकता है-राष्ट्र के प्रति अपार सम्मान, त्याग और भक्ति तथा राष्ट्र से जुड़ी सभी चीजों को सर्वोपरि मानकर कार्य करने की इच्छा शक्ति। इस जाज्वल्यमान भारत को ही राष्ट्रीय चरित्र कहा जाता है। इस राष्ट्रीय चरित्र को जीवंत रखकर ही हम अपने राष्ट्र को प्रगतिशील एवं विकासशील से विकसित राष्ट्रों में शामिल कर सकते है। हमारे देश भारत वर्ष में ज्ञान का ऐसा दीव्य एवं अकुत भंडार भरा पड़ा है। हम इसी भंडार के माध्यम से समुचि मानव सभ्यता को नई दिशा दे सकते है। समस्त समस्याओं, भीषण कठिनाईयों एवं चुनौती से हम अपने आप को सहजता के साथ उबार सकते है। दुनिया की महान से महान संपदा और बड़े से बड़ा ज्ञान हमें विरासत में मिला हुआ है। इन्हीं संपदा और ज्ञान के भंडार में भविष्य की व्यापक संभावनाएं निहित है। समुचि मानवता के लिए जो राष्ट्र प्रकाश स्त्रोत था, मानवीय संभावनाओं का शिखर था, साहस और सहिष्णुता का प्रतीक था, सुचारू प्रशासन और सभ्य समाज की पराकाष्ठा था, सभी धर्मों का जनक, सारी बुद्धिमत्ता और दर्शन का शिक्षक  था, उस देश के लिए ऐसे कौन से कारण पैदा हुए, कि आजादी के 72 वर्षों पश्चात भी उसकी गिनती विकसित देशों में नहीं हो सकी?

राष्ट्रीय उत्साह का जागरण करने में जो देश सफल हुए है, वे छोटे होने पर भी विकसित होने की पंक्ति में खड़े है। इन देशों सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, मलेशिया और जापान का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। हमारा भारत वर्ष इतना विशाल देश होते हुए भी इन छोटे छोटे राज्यों की तुलना में कमजोर क्यों रह गया? शायद इन कारणों को खोजने का प्रयास अंतर्रात्मा से नहीं किया गया। कहीं न कहीं हमारी नीति गलत मार्ग पर चल पड़ी। हमारे नीतियों के गलत मार्ग को हम अब तक सही दिशा में लाने में कामयाब नहीं हो पाये है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारे जिस राष्ट का जन्म हुआ, उसका आधार राजनीतिक और भागौलिक था, परंतु यर्थाथ में हमारे राष्ट्र का मूल आधार जो ‘विविधता में एकता’ का प्रतीक बनकर अब तक खड़ा रहने की ताकत दिखा पाया है, शायद अब कहीं न कहीं डगमगाता दिखाई पड़ रहा है। सीधे शब्दों में कहूं तो वर्तमान में राष्ट्रीय चरित्र के लिए धार्मिक एकता की प्रबल आवश्यकता दिखाई पड़ रही है, ताकि सभी धर्मों के लिए एक साथ मिल जुलकर रह सके। हमारे अपने देश ने धार्मिक सद्भाव के विचारों को सम्राट अशोक महान के समय से अपने दिलों में सम्मान दे रखा था। शायद इसीलिए किसी शायर ने कहा है-

वतन है मेरा सबसे महान, प्रेम सौहाद्र का दुजा नाम।

वतन-ए-आबरू पर है सब कुर्बान, शांति का दूत है मेरा हिन्दुस्तान।।

प्रति वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर अपनी कलम चलाते हुए मैं यही सोचता हूं कि ब अगस्त और जनवरी में ही क्यों हमारा खून देश के लिए खौल उठता है, हम सभी के लिए यह विचारणीय मुद्दा होना चाहिए। आज हम स्वतंत्र है, हमें स्वतंत्रता के लिए नहीं अपितु देश के भीतर आतंकवाद एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ जी जान से लड़ना है। साथ ही मुखौटा पहने अपनों के खिलाफ बड़ी जंग छेड़ना है। यह लड़ाई आज और भी ज्यादा गंभीर है कारण यह कि कौन अपना और कौन पराया यह समझ पाना भी काफी जटिल काम है। इस वर्तमान सदी में देशभक्त की ज्यादा जरूरत है, क्योंकि आज दुश्मन अंग्रेज नहीं, न ही सीमा पर इतना खतरा है, जितना भ्रष्टाचारियों से देश को बचाने की जरूरत है। आज की स्थिति ऐसी है सीमा पर तैनात सिपाही ही नहीं आम नागरिक को भी देश की हिफाजत के लिए आगे आने की जरूरत दिखाई पड़ रही है। इस बार हम अपना 73वां  राष्ट्रीय पर्व मनाने जा रहे है। जहां तक मैं समझता हूं, इस बार का स्वतंत्रता पर्व नया इतिहास लिखने जा रहा है। हमारे हिंदुस्तान का अभिन्न अंग कश्मीर इस बार अपने माथे पर तिरंगे का सेहरा सजाता दिखाई पड़ेगा। 5 अगस्त को हमारे देश ने आजादी के बाद से अलग संविधान को मानने वाले कश्मीर से धारा 370 और 35ए हटाकर अपने देश के संविधान को लागू कर एक और स्वतंत्रता प्राप्त की है। बिना किसी हिंसा के कश्मीर की हसीन वादियों में अब हमारे अपने भाई हमारी तरह अधिकार पा सकेंगे। इसे मैं कुछ इस तरह कहना चाहता हूं-

तीन रंग का नहीं वस्त्र, यह ध्वज देश की शान है।

यही है गंगा, यही हिमालय, यही हिंद की शान है।

तीन रंगों में रचा हुआ, यह अपना हिन्दूतान है।।

यदि हम अपने देश से सच्चा प्रेम रखते है तो प्रत्येक व्यक्ति को यह सांस्कृतिक सूत्र अपने हृदय में उतारना होगा कि उसका भविष्य एक देश और सिर्फ एक देश से जुड़ा हुआ है। एक एक नागरिक का सफलता देश की उन्नति से प्रत्यक्ष संबंध रखती है। हमारे राष्ट्र भक्ति में यह रस कूट कूटकर भरा होना चाहिए कि राष्ट्र किसी भी व्यक्तिगत उन्नति से बढ़कर है। देश  का हित सर्वोपरि है। इससे बढ़कर कुछ और नहीं हो सकता। देश की सुरक्षा और प्रगति के लिए यदि किसी प्रकार के बलिदान, त्याग और कुर्बानी की जरूर पड़े तो हम सभी को सहर्ष स्वीकार होना चाहिए। देशवासियों की इस तरह की राष्ट्र भक्ति ही देश को विकसित एवं समृद्ध कर सकती है। बिना इस भावना के हम सफलता की कामना नहीं कर सकते। इस भावनाओं को ताकत देने के लिए चंद लाईनों में कहीं गई राष्ट्र भक्ति की बातें भी जरूरी है-

करता हूं भारत माता से गुजारिश कि तेरी,

भक्ति के सिवा कोई बंदगी न मिले,

हर जन्म मिले हिन्दूस्तान की पावन धरा पर,

या फिर कभी जिंदगी न मिले।

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डा. सूर्यकांत मिश्रा

न्यू खंडेलवाल कालोनी

प्रिंसेस प्लेटिनम, हाऊस नंबर.5

वार्ड क्रमांक-19, राजनांदगांव (छग)

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