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20 लघुकथाएं - सुरेश सौरभ

(१) पाती

हे ! सी•एम•पी•एम• महराज आप को सादर नमन।

मैं एक छोटे से गांव का एक छोटा सा किसान हूं। मैं अपने बाल -बच्चों को खेती-किसानी से पाल-पोस रहा था, पर इधर एक समस्या से अब मैं घिर गया हूं। जब मैं रात को सोता हूं, तो मुझे अजीब-गरीब सपने आने लगते हैं। मैं देखता हूं चारों ओर से तमाम गाय- बैल-सॉड मुझे हुडे़स रहे होते हैं। तब मैं परेशान हो जाता हूं। छटपटाता हूं। जोर-जोर से हांफता हूं । फिर सारी-सारी रात अजीब बेचैनी में नींद नहीं आती है । अजीब उलझन से जोर-जोर से छाती उछलने लगती है। सुबह उठकर जब अपने खेत देखने जाता हूं ,तो देखता हूं वही सपनों वाले गाय-बैल-सॉड सब मेरा खेत चर रहे होते हैं। मैं इन्हें भगा -भगा कर बहुत तंग हो चुका हूं। आधा हो चुका हूं। मेरा जीना मुहाल हो चुका है ,पर ये किसी भी कीमत पर भागने को तैयार नहीं। किससे अपनी फरियाद करूं ? कोई सुनने को तैयार नहीं। सभी इन आवारा जानवरों को ईश्वर का आवास बता रहें हैं। मैं क्या करूं हे ! महानुभावों हमारे परिवार का खाना-पीना दूभर हो गया है।

हे ! देश, राज्य और धर्म के रक्षकों मेरी तकलीफ दूर करो, वर्ना मैं टोपी वाला धर्म अपनाकर इन्हें मार -मार कर खाने लगूंगा। फिर आप कहते रहना, इसका साथ ,उसका साथ जनता का विकास।

आप का

दाता मॉझी

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(२) चक्कर

पहले लड़की उस युवक के चक्कर काटती रही , जब युवक ने उसकी एक नहीं सुनी तो वह थाने के चक्कर काटती रही, कहती रही - शादी का झांसा देकर शोषण। अब वह युवक कोर्ट के चक्कर काट रहा था।

(३) बदजात

हे ! प्रधानमंत्री जी

नमस्ते।

आखिर मेरा दोष यही है न कि मैंने एक छोटी जात में जन्म लिया, पर मैं क्या करता जन्म मेरा मेरे वश में नहीं था, पर कर्म मेरा मेरे वश में हैं। और अच्छे कर्म करते हुए देश की रक्षा करते हुए मैं कश्मीर में शहीद हुआ। तब मेरी लाश गांव में आई तो गांव के ऊंची जात के दबंग लोगों ने गांव में मेरा अंतिम संस्कार होने नहीं दिया। मेरी पत्नी मेरे बच्चे फूट-फूट कर रोते रहे पर ऊंची जाति के लोगों को मेरे परिवार के बहते आंसुओं पर जरा भी रहम नहीं आई । मैंने हमेशा खुद को भारत मॉ का लाल माना और देश के लिए हंसते-हंसते कश्मीर में कुरबान हो गया, पर ऊंची जात के लोगों ने जिस तरह मेरी जात पर हंगामा खड़ा करके पुरखों के मेरे गांव में मेरा क्रिया-कर्म नहीं होने दिया, उससे मेरी आत्मा जार-जार रो रही है , टूट रही है ,जब पूरा देश मुझे नमन कर रहा है ,तब मेरे ही गांव के दबंग कथित ऊंची जात के लोग मेरी जात पर उंगली उठा कर क्यों मुझे जलील कर रहे हैं ? क्यों मुझे गलीज कह रहे हैं ? क्यों मुझे गाली दे रहे हैं ? मैं बहुत दुखी हूं। क्या शहीद की भी कोई जात होती है? अगर ऐसे ही हंगामा होता रहा तो कोई भी छोटी जात वाला गरीब मॉ बाप अपने बेटे को सीमा पर मरने के लिए नहीं भेजेगा । आप ही बताइएगा क्या कोई डीएम एसपी, जज, इंजीनियर ,डॉक्टर , नेता, मंत्री , टाटा, बिडला या अंबानी का बेटा सेना में गया है मरने ?  ये पैसे वाले लोग क्यों जाएं देश के लिए गोली खाने। बम खाने। अधिकतर हम छोटी जात वाले गरीब ही जाते हैं मरने के लिए। फिर हमारी शहादत पर हमें क्यों दुतकारा, फटकारा जा रहा है। हे ! प्रधानमंत्री जी ऐसे नीच पापियों पर उचित कार्यवाही करें वर्ना एक दिन ऐसा आयेगा जब कोई छोटी जात वाला गरीब मॉ बाप अपने बेटे को सेना में नहीं भेजेगा फिर आप की सरकार को देश की रक्षा के लिए कोई भी सैनिक चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेंगे। मैं तो इस दुनिया से जा रहा हूं, बदजात का दाग लेकर , लेकिन अपने एक हमदर्द की आत्मा में घुसकर यह पत्र लिखाए जा रहा हूं । आशा है आप मेरी आत्मा की आवाज सुनकर मेरे साथ न्याय करेंगे। तभी मेरी आत्मा को सुकून, सुख और शांति मिलेगी। जय हिंद।

आप का दिवंगत एक सैनिक

मातादीन भंगी

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(४) तीन पागल

एक मानसिक रोगी सड़क पर भटक रहा था , एक पुलिस वाले ने उससे पूछताछ शुरू की। तब मनोरोगी ने पुलिस वाले से डंडा छीन कर उसे पीटने लगा। तब तक एक चौकी से दूसरा सिपाही वहां पहुंच गया फिर दोनों ने मिल कर विक्षिप्त को पीटना शुरू किया, जिसे देख कर वहां भीड़ इकट्ठा हो गई। लोग कहने लगे -पागल से बड़े पागल ये पुलिस वाले हैं।

(५)भूत

कई बाजो के बीच में फंसी वह निरीह चिड़िया छटपटा रही थी। फड़फड़ा रही थी। बहुत देर से बाज उसे लुटा रहे थे , उठा रहे थे, नोच रहे थे , खसोट रहे थे। बड़ी मुश्किल से जब वह छूटी, तो सारे बाज खींसे निपोर कर बोले -बुरा न मानो भाभी! होली है, देवरों की टोली है। पानी रंग से सराबोर वह चिडिया तब कातर स्वर में बोली-तुम्हारी भी बहनें किसी की भाभी हैं किसी की साली हैं, जो तुमने मेरे साथ किया वही उनके साथ भी होगा, यह एक अबला की बद्दुआ है। यह सुनकर सारे बाजों का मुंह लटक गया । वे सब शून्य में कुछ खोजने लगे। और उन पर चढ़ा होली का भूत उतरने लगा।

(६)बिकाऊ कवि

एक पार्टी चल रही थी। एक जगह इकट्ठा कुछ कवि आपस में बातें कर रहे थे।

एक बोला- मैं तो पूरे चालीस हजार लेता हूं।

दूसरा बोला- मैं तो पचास हजार लेता हूं।

तीसरा बोला- मैं तो पूरे एक लाख लेता हूं। और विदेश में पढ़ने के पूरे तीन लाख लेता हूं।

चौथा कवि बोला-मैं तो छोटी-मोटी गोष्ठियों में पढ़ लेता हूं भैया और कुछ छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में लिख लेता हूं। मेरे पास न तो अच्छा गला है और न तो ग्लैमर है। सच तो ये है, कि मेरा कोई रेट फिक्स नहीं क्योंकि मैं अपने को गणिकाओं की तरह बेचता नहीं।

अपना रेट बताने वाले अब मंचीय कवि अपनी-अपनी बगलें झांकते हुए दाएं-बाएं खिसक लिए।

(७) कामना

वह पक्षियों सी छटपटाती हुई इधर-उधर भागती हुई मदद की गुहार करती रही, पर किसी ने उस मोहल्ले में उसकी मदद नहीं की,आखिरकार शोहदे उसे पकड़ कर तेजाब उड़ेल कर भाग लिए । तेजाब से घायल वह लड़की अब अस्पताल में तड़प रही थी।

अब उसे शोहदों से न बचाने वाले, उस मोहल्ले के लोग पुलिस से शोहदों की कहानी बताते हुए उसके स्वस्थ होने की कामना कर रहे थे।

(८)नचाए सबको पैसा

     "भाई साहब कल आप बीजेपी की रैली में थे ,परसों सपा की रैली में थे। आज बसपा के जुलूस में जा रहे हैं, क्या बात है, आप रहते कहां हैं?

  'अरे यार हम लोग धंधे वाले लोग हैं, इसलिए एक ठिकाना कहां-जहां पैसा मिलता है, उसकी टोपी लगा लेते हैं, उसका बैनर लगा लेते हैं, पैसा बोलता है भाई । नचाता है। इसलिए मैं नाच रहा हूं । मेरे साथ तमाम नाच रहे हैं । तुम्हें नाचना हो तो तुम भी आ जाओ।" यह कहते- कहते वह आगे भीड़ में बढ़ गया। मैं ठगा सा उसे ताकता रह गया।

   (९)आर्तनाद

एक बुढ़िया का आर्तनाद-घर बंट गया,व्यापार बंट गया, सब सामान बांट डाला मेरे बेटे-बेटियों ने, पर एक चीज ना बांट पाए।

दोनों घुटनों के बीच सिर लटकाए बैठा बूढ़ा बोला-क्या नहीं बांट पाए भाग्यवान ।

बुढ़िया- मेरा तुम्हारा दर्द।

(१०) शूटिंग

      "पुताई सही नहीं है, पेंटिंग सही नहीं है। किताबें भी कम हैं। कामन गर्ल्स रूम पर ,कामन गर्ल्स रूम लिखा नहीं है ‌। यह देखो कितना यहां गंदा लिखा है। यह क्या लिखा रखा है? बढ़िया-बढ़िया लिखाइए ताकि लगे आप महाविद्यालय चला रहे हैं । ऐसे हौच-पौच चलाने से अच्छा है कि आप न ही चलाएं?   

तीन सरकारी अध्यापिकाएं वित्तविहीन महाविद्यालय के प्रबंधक और प्राचार्य पर बहुत जोर-जोर से भड़क रही थी, वे विश्वविद्यालय के पैनल में स्थाई मान्यता के लिए महाविद्यालय में निरीक्षण कर रही थीं। प्रबंधक-प्राचार्य उनकी बड़ी चिरौरी कर रहे थे, पर वे तमाम कमियां निकाल-निकाल कर लगातार उन्हें झाड़े जा रहीं थीं और मान्यता न देने की बात कर रही थीं। उनमें से सबसे उम्रदराज तेजतर्रार अध्यापिका तैश में बोलीं-आगे सब सही कराइएगा तब स्थाई मान्यता के लिए हम लोग आएंगे और तभी फोटोग्राफी वीडियोग्राफी कराई जाएगी। इस समय कुछ नहीं होगा। टका सा जवाब देकर वे सब चली ही थीं , तभी प्राचार्य ने उन्हें रोककर सब कुछ सात दि‌न में सही कराने का समय मांगा, बड़ी खुशामद की, तब उन्होंने समय दे दिया था ।

सात रोज के बाद वे तीनों देवियां उस महाविद्यालय में फिर प्रकट हुईं। चारों ओर सब कायाकल्प हो चुका था। गजब का रंग-रोगन हो चुका था, पराई मांगी-जांची चीजों से महाविद्यालय नया-नया दुल्हन सा चमक-दमक रहा था। जिसे देखकर तीनों देवियां खुश हुईं फिर फटाफट फोटोग्राफी वीडियोग्राफी शुरू हो गई। कुछ समय बाद शूटिंग पूरी हो गई। वे सब चलने को तैयार हो गईं और अपनी- अपनी गाड़ियों की ओर बढ़ने लगी तभी प्रबंधक और प्राचार्य उनकीं ओर दौड़े तब बड़ी दीनता से प्रबंधक और प्राचार्य की ओर वे तीनों देवियां देखने लगीं तब प्रबंधक ने उनकी दीनता को ताड़ते हुए, थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा -मैडम जी आप लोग जरा 10 मिनट के लिए कार्यालय में आ जाएं।' देर हो रही है ,देर हो रही है यह कहते हुए,तीनों देवियां दो महापुरुषों के पीछे ऐसे तेजी भागी जैसे पतंग के पीछे डोर भागती है। बाहर खड़े महाविद्यालय के सारे कर्मचारी इस देवयात्रा की वापसी देखने को अधीर थे और प्रश्नवाचक दृष्टि से एक-दूसरे को ताक रहे थे। कोई दस मिनट के बाद प्रसन्नता से खिलखिलाते हुए कार्यालय के बाहर वे निकलीं। अब उनके चेहरों पर दीनता और किसी शिकायत का भाव न था। क्योंकि अब उन्हें शूटिंग का भुगतान किया जा चुका था और इसी भुगतान के आधार पर मान्यता की पिक्चर तैयार होगी। भड़-भड़-भड़ करने वाली देवियों ने इन सात दिनों के बीच में प्रबंधक के बार-बार फोन करने पर कालेज को सजाने-संवारने की तरतीब बता चुकी थीं,जिससे यह पिक्चर पूरी हो सकी।

(११) पानी

उसके बेटे अपने बाप का अंतिम संस्कार करके लौटे तो देखा, मां अभी भी फूट-फूट कर रो रहीं थीं। बेटे मां को संभालते हुए शांत कराने की कोशिश करने लगे तो मां सुबकते हुए बोलीं-इतना सब बनाया। सब कुछ दिया तुमको और हमको ,पर अंतिम समय में मैं उन्हें दो घूंट पानी न दे पाई । बेचारे पानी-पानी कहते हुए मर गए ।"

बेटे बोले- मां जब डॉक्टर ने ऑपरेशन के बाद पानी देने से मना किया था तब भला हम लोग कैसे उन्हें पानी देते। तब मां बिलखते हुए बोली- मुझे यही बहुत दु:ख है ,पर सबसे ज्यादा दु:ख यह है कि उनकी अर्धांगिनी होते हुए भी उनके अंतिम समय में मैं उनको दो घूंट पानी भी न दे पाई ।

अब उनके बेटे मां को संभालते हुए शून्य में खोने लगे और उनकी आंखों का पानी भी बढ़ने लगा।

यह पानी भी कैसे-कैसे लोगों को रुलाता है । कैसे-कैसे जीवन के रंग दिखाता है । यह कोई नहीं जानता । अजब दास्तां है पानी की।

(१२) एक वेश्या की तहरीर

उस दिन मैं,काम से जा रही थी, तभी रास्ते में बहुत भीड़ लगी देखी,भीड़ को इधर-उधर हटाते हुए आगे बढ़ी,भीड़ के बीचोंबीच में खून से लथपथ एक बच्ची अचेत, अर्द्धनग्न अवस्था में पड़ी थी,जिसे देख कर मेरी आंखें फटी की फटी रह गईं , कलेजा मुंह को आ लगा। अवाक मूर्ति सी जड़वत हो गई मैं। लोग लानत-मलामत कर रहे थे-ऐसे भेड़ियों को जिंदा दफन कर देना चाहिए, ऐसे नराधमों की बोटी-बोटी काट डालनी चाहिए, ऐसे हवस के पापियों के अंग-भंग कर के नपुंसक बना कर सारी जिंदगी जेल में सड़ाना चाहिए। इस बच्ची के साथ न्याय होना चाहिए । अगर पुलिस ने सही न्याय न किया तो हम सभी मिलकर रोड जाम करेंगे। प्रशासन की ईंट से ईंट बजा देंगे।

गम और गुस्से का वहां सैलाब उमड़-घुमड़ रहा था। पुलिस को इत्तला की जा चुकी थी। बस पुलिस आने ही वाली थी। वहां के कातर स्वरों से मेरा दिल बैठने लगा। तभी मैं जाने कैसे एकदम आवेश में से आ गई और मेरी जुबान से अंगारे छूटने लगे-हां-हां आप लोग सही कहतें हैं,  बिलकुल ऐसा ही होना चाहिए। पुलिस आए तो चीख-चीख कर मैं कहूंगी इस बच्ची के साथ इंसाफ किया जाए। इसके साथ मैं यह भी कह रही हूं, आप सभी से, कि मैं एक रंडी हूं।" तब भीड़ उस बच्ची को देखना छोड़ कर मुझे हैरानी से घूरने लगी ,"हां हां मैं एक रंडी हूं। मैं पैसे से अपना जिस्म बेचती हूं। अगर कोई हवस का भूखा भेड़िया हो तो मेरे पास आए मैं मुफ्त में उसकी भूख मिटाऊंगी,पर हमारी इन बच्चियों को बख्श दे। इन मासूम कलियों को बख्श दे, इन नन्हीं चिड़ियों को बख्श दे।" मुझे ऐसा लगा अब सभी की नजरें मेरे जिस्म को बेध रही हैं ,अपनी रौ में मैं क्या कहती चली गई,मुझे कुछ होश न था ।अब चुपचाप भारी कदमों से चल पड़ी। मेरे कदम मन-मन भर के हो रहे थे और दिल पर दुनिया भर का भार महसूस करते हुए चली जा रही थी। अब ऐसा लग रहा था उस बच्ची की आत्मा मेरा पीछा कर रही है और मुझसे कह रही है 'मुझे न्याय दिलाओ, मुझे न्याय दिलाओ मैं, जल बिन मछली सी तड़पती सन्न में भागी जा रही थी, जैसे मेरा कोई पीछा कर रहा हो।

(१३) सालगिरह

बात पुरानी है ,जब भी याद आती है, दिल में सिहरन सी मच जाती है‌। वह मेरी शादी की पांचवीं सालगिरह थी। मैंने सोचा क्यों न इस बार थोड़ा धूमधाम से मनाई जाए, इस पर वो राजी हो गए और मैंने अपने आस-पास के मेहमानों को फोन से कह दिया कि फलां डेट को हमारी शादी की मैरिज एनिवर्सरी में आना है ।

उस दिन हमारी खुशी का कोई पारावार न था। हमने अपने घर के लोगों के साथ मिलकर घर को खूब सजाया संवारा था,और अच्छे-अच्छे व्यंजनों की व्यवस्था मेहमानों के लिए कराई थी। मेहमान नियत समय पर आ गए और एक छोटी-मोटी पार्टी जैसा माहौल घर में बन गया। हम बहुत खुश थे। शादी की प्रथम बेला में उनसे मुलाकात की, खुशनुमा हसीन यादों की, रात की उस, मधुरिम शहनाई से मेरा मन का कोना-कोना भीगने लगा,पुलकित होने लगा।

उन यादों की खुशनुमा तासीर से सारा घर महकने लगा। सब मेहमान कोई न कोई गिफ्ट लेकर आ रहे थे। जब केक काटा गया ,तब हमारी खुशियां हजार-हजार पंखों से परवाज भरने लगी।,हमने तय कर लिया था कि मेहमानों के जाने के बाद आज एक ही थाली वैसे ही खाना खाएंगे जैसे हमने उस दिन शादी की पहली रात खाया था ।

सब चले गए मेहमान। मैं गिफ्टों को उठा-धर रही थी, तभी कोई मुझे एक अजीब टाइप का गिफ्ट नजर आया और तब मैंने प्रतिक्रिया की-पता नहीं लोग गिफ्ट के नाम पर क्या-क्या दे जाते हैं।"

तब वे भी बड़ी ट्यून में बोले-अब ज्यादा बकवास न करो जल्दी-जल्दी सामान सेट करो मुझे बहुत जोरों की भूख लगी है।"

तब मैं गुस्से में बोली-तुमको कोई अकल नहीं है। यह भी नहीं देखते कि कौन क्या दे गया। और कुछ बताओ तो इन्हें बकवास ही सब लगती है।" और मुझे इतना कहना था, यह सुनते ही जाने कहां का उनके मन में बैठा क्रोध का ज्वालामुखी एकाएक उबल पड़ा, तेजी से उठे और दो-तीन करारे-करारे तमाचे हमारे जड़ दिए। मेरा फूल सा चेहरा कुम्भला गया और चेहरे पर छाईं सारी खुशियों की रंगत बेनूर हो गई। मैं मुरझा गई और गुस्से में चीख कर बोली-आज के बाद जिंदगी में कभी नहीं मैरिज एनिवर्सरी मनाऊंगी।

     "हां-हां कभी न मनाओ पूरा दिन दौड़-भाग करते-करते बीत गया और जरा सी बात पर मुझे बेअकल कह रही हैं ।"

उस रात हम दोनों बिस्तर पर मारे गुस्से के मुंह घुमा-घुमा कर लेट गए । देर रात तक मैं रोती रही और वह भी सुबकते रहे। फिर हमारी कब आंखें लग गईं पता न चला।

सुबह उठ कर मैंने कहा-सॉरी ।"

वे-बोले गलती मेरी थी मुझे भी इतना भड़कना नहीं चाहिए था और तुम्हारे ऊपर हाथ नहीं उठाना चाहिए था। लेकिन होनी थी और हो गई।

मैंने कहा- किस्मत की बात है ,सारे मेहमानों ने इंजॉय किया और अच्छे-अच्छे व्यंजनों का स्वाद लिया। और हमने-तुमने पाए सिर्फ गम के आंसू। इतना कहकर मैं उनके कंधे से लग कर फफक पड़ी।

वे हंस कर बोले-चलो हम अब दिन में मैरिज एनिवर्सरी मनाते है।

मैंने आंसू पोंछते हुए कहा-बिल्कुल हमेशा दिन में ही हम मनाएंगे और किसी मेहमान को नहीं बुलायेंगे। हमारा प्रेम दो आत्माओं का बंधन है, फिर इसमें कोई दिखावा या तामझाम की क्या जरूरत?

अब हममें मिलन की उस प्रथम बेला की भीनी-भीनी सुगंध समाने लगी। इस सुगंध से दुनियावी भौतिकता का कलुष जाता रहा और हमारे अंतर्मनों खुशियों के तानपूरे बजने लगे।

(१४)भाई-बहन का प्रेम

    'हां पिंकी बोल रही हो।'

    'जी'

    'हां मैं पार्टी मुख्यालय से रंगीलाल बोल रहा हूं। तुम मुझे जानती होगी।'

    'जी बिलकुल।'

    'देखो जो हुआ उसे भूल जाओ शाम को हमारे नेता जी आएंगे, वह तुमसे माफी मांग लेंगे, तुम उनको राखी बांध देना और सारा किस्सा खत्म करना।

    "आदरणीय आप जानते हैं कि आप के नेता ने मुझे लात-घूसों से सरेआम पीटा है। अगर मैं जनता की बात, जनता की समस्या जनप्रतिनिधि से कहूंगी तो क्या इसका फल मुझे यह मिलेगा। मैं इस का बदला ले कर रहूंगी। मुझे न्याय चाहिए।"

      "देखो ज्यादा जोश ठीक नहीं कुछ पत्रकारों ने तुम्हें पिटते हुए वीडियो बनाकर वायरल कर दी है। इससे हमारी पार्टी की इज्जत जा रही है‌। मेरा कहना मान लो वर्ना।'

    'वर्ना क्या करेंगे आप ।'

    'दरअसल मैं कितना नीच हूं। पार्टी कितनी ऊंची है। यह बात तुम बड़ी अच्छी तरह जानती हो। तुम्हारी खुशी और संपन्नता इसी में है कि तुम उस प्रकरण को भूल जाओ और हमारी पार्टी के नेता को माफ कर दो।"

पिंकी ने अब खामोशी से फोन रख दिया। वह ऊंची पार्टी के नीच नेता की आसुरी शाक्तियों से भलीभांति परिचित थी।

शाम को पीटने वाले नेताजी और उनसे पिटने वाली महिला पार्षद का रक्षाबंधन टीवी में सभी देखा।

(१५) रिक्शेवाला

पसीने से तरबतर वह सरदार पायडल मारते हुए सड़क किनारे अपना रिक्शा खड़ा करके, एक झुग्गीनुमा होटल पर रुका और अंगोछे से अपना बदन ओंछते-पोंछते हुए उस होटल वाले से एक चाय की फरमाइश करके टूटी-फूटी कुर्सी पर निढाल हो गया, फिर वहीं बेंच पर रखें एक मग से पानी सोखते हुए, सुस्ताने लगा, कुछ घड़ी बाद होटल वाले ने उसे चाय थमा दी।

अब वह सिप-सिप करते हुए तसल्ली से चाय पीने लगा। तभी एक लग्जरी गाड़ी उसके सामने आकर रुकी। उसमें से चार-पांच हट्टे-कट्टे सरदार बहुत तेजी से निकले, तड़ाक.. एक जोरदार तमाचा रिक्शेवाले सरदार की कनपटी पर पड़ा। चाय भरा कांच का गिलास दूर जाकर गिरा और चिंदी- चिंदी हो गया। अब तड़ा-तड़ तमाचों की बरसात होने लगी ।..साला,सरदार होकर रिक्शा चलाता है, और कोई काम नहीं मिला अरे! कोई काम नहीं मिला था, तो हम सब सरदार क्या मर गये थे। फिर मूसलाधार घिनी-घिनी गलियां वहां बरसने लगीं । रिक्शेवाले सरदार ने सफाई देने की कोशिश की....चोSप! ..अब ज्यादा सफाई न देना‌। हम लोगों से कहना चाहिए था, तूने तो पूरे सिख कौम की नाक कटा दी,  फिर उसको घसीटते हुए

अपनी लग्जरी गाड़ी में बिठा लिया।

अब गाड़ी चल पड़ी। रिक्शेवाला सरदार गाड़ी में चुपचाप उदास बैठा था, उसके चेहरे पर अनगिनत भाव आ, जा रहे थे और चेहरे की सिलवटें उसकी उसकी मजबूरियों का लेखा-जोखा करने में जुटीं थीं। अब उसे पीटने वाले सरदार कह रहे थे- तुमको जो रोजगार करना है, हम को बताओ हम करवायेंगे ,पर हमारी वीर कौम पर यह कलंक न लगाओ। रिक्शेवाला सरदार अब यह सोच रहा था इन लोगों का प्रतिकार करें या उपकार करने के लिए धन्यवाद ज्ञापित करे‌। उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अब वह शर्म गड़ा जा रहा था। सिर पर मानो घड़ों पानी पड़ा हो।

(१६) भूख और योग

सुबह का वक्त था। कुछ लोग पार्क में हा हा हा हूं हूं करते हुए कलाबाजी कर रहे थे। जब उनकी कलाबाजी खत्म हुई और तब सब चल पड़ें तभी एक भिखारी उनसे टकरा गया और वह मुंह फाड़कर कातर स्वर में बोला- बाबू लोगों बहुत भूखा हूं। बहुत देर से आप लोगों की कलाबाजी देख रहा था। सोच रहा था, जब कलाबाजी आप लोगों की खत्म हो, तब मैं आप लोगों से कुछ मांगूं।

तब सब बाबू लोग हंसते हुए बोले-अरे! भाई हम लोग अपना स्वास्थ्य सही करने के लिए यहां योगा करने आए थे, यहां पैसे की क्या जरूरत है इसलिए हम लोग पैसे नहीं लाए।"

तब वह भिखारी आंखों में आंसू भरकर बोला-बाबू लोगों आप लोग बहुत पढ़े लिखे हैं। मैं गरीब अनपढ़ जाहिल हूं। मैं आप लोगों से ये पूछना चाहता हूं कि गरीब लोगों की भूख के लिए कोई योगा है।

अब सब खाए-अघाए योगा वाले जीव एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे।

     (१७) चरित्र

वे सबसे अधिक विश्व में पढ़ने का रिकॉर्ड बना रहे थे । उनकी पत्नी का फोन आया बोलीं-आज रात सौ घंटे हो रहे हैं और अब उन्हें पढ़ने के लिए क्लासिकल बुक्स चाहिए। मैं शहर के बुक्स स्टॉलों पर ढूंढ-ढ़ूंढ कर परेशान हो चुकीं हूं। हमें जो चाहिए वो किताबें मिल नहीं पा रहीं हैं । मैं बहुत परेशान हो चुकीं हूं। क्या आप अपनी कुछ किताबें हमें देने की कृपा करेंगे।

मैंने उनकी विनम्रता को शिरोधार्य करते हुए कहा-यह तो हमारे लिए, हमारे शहर के लिए, सौभाग्य की बात होगी। मैं किताबें लेकर थोड़ी देर बाद आ रहा हूं और साथ में अपने दो मित्रों को भी बुला रहा हूं, वह भी अपनी सभी किताबें आपको भेंट कर देंगे। तब वे बोलीं-यह तो बड़ी अच्छी बात होगी। मैं किताब पढ़वाने के बाद आप लोगों को वापिस कर दूंगी। कल दोपहर तक उनका 120 घंटे पढ़ने का, विश्व रिकॉर्ड हो जाएगा और कल आप चाहे तो शाम तक किताबें हम से ले लीजिएगा।

मैं वहां पहुंचा ,जहां उनके पति रिकार्ड बनाने के लिए मंच पर बैठे किताबें बांच रहे थे। सामने कैमरे और मुट्ठी भर श्रोता उनकी निगहबानी कर रहे थे। उनकी पत्नी से दुआ सलाम हुई। परिचय हुआ उन्होंने हम लोगों से किताबें लेकर रिकॉर्ड बनाने वाले अपने महापुरुष के साथ हमारे चित्र खिंचवाए। हम लोग आह्लादित हुए।

फिर हम खुशी-खुशी अपनी-अपनी किताबें देकर वापस चलें आए।

खबर छपी कि फलाने ने 120 घंटे विश्व में पढ़ने का रिकॉर्ड बना लिया, तमाम अधिकारी उनके साथ खींसे निपोरते हुए अखबारों में प्रकट हुए।

मेरे मित्र एक शाम उनके घर पहुंचे और बोले-मैडम जी आपने मुझसे उस रिकॉर्ड के लिए किताबें लीं थीं। क्या वह किताबें वापिस करेंगी। आपने वापस करने को कहा था। उन्होंने उदासीन भाव से कहा-हां हां वापस कर देंगे। मुझे भी ज्यादा किताबों से इंटरेस्ट नहीं है। जहां-तहां हजारों पड़ी होंगी । अब देखनी पड़ेगी। कभी फुरसत से आओ तो आप की किताबें खोजें। उनका रुखा जवाब सुनकर लंबी उबासी लेते हुए मेरे मित्र बोले,"जब मिल जाएं तो फोन कर देना। वे उल्टे पैर लौट पड़े, तभी उनके सामने कबाड़ी वाला जाता दिखाई पड़ा, उसके ठेले पर तमाम किताबें बेतरतीब पड़ी थीं ।वह चिल्लाता जा रहा था, कबाड़ी वाले, कबाड़ी वाले । ठेले पर पड़ी तमाम किताबें देखते हुए वे आगे बढ़ रहे थे और अब उनके मन की हलचल बढ़ने लगी... और हृदय की गति धौंकनी की मानिंद तेज होती जा रही थी।

(१८) बाढ़

आज घर से सोच कर वह चला था कि जाल में खूब मछलियां फांसेगा। बाढ़ से उफनाई नदी के करीब पहुंचा। जाल फेंका। उसकी अन्तड़ियां बोलीं-आज अगर बढ़िया मछलियां फंस गईं,तो पैसों से खूब तर माल खाया जायेगा। मज़ा आ जाएगा। हृदय बोला-खाली तेरे खाने से काम न चलेगा घर में तेरे बीवी बच्चे कई दिनों से भूखे हैं। उनके आंसू मुझसे देखे नहीं जाते। तभी मन बोला-ये बाढ़ पता नहीं कब तक रंज और गम देती रहेगी।

मछुआरे ने अब जाल खींचना शुरू किया। ओह! बड़ा भारी लग रहा है .. लगता है ,आज मोटी कमाई होगी। नदी के बाहर जैसे ही जाल आया उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। आज मछलियां की जगह उसके जाल में एक मासूम बच्चे का शव था।

उसकी आंखों से अब आंसुओं की बाढ़ आ गई ।जाल छोड़ कर पागलों की तरह अब रोता हुआ अपने घर भागा जा रहा था।

(१९)जंगल

कहीं से एक पंछी उड़ता हुआ एक जंगल में दाखिल हुआ और एक पेड़ की डाल पर बैठकर जय श्रीराम जय श्रीराम बोलने लगा। उसकी आवाज को सुनकर जंगल के तमाम दूसरे पंछी आश्चर्यचकित रह गए और उस पर यकायक हमला बोल कर मार दिया।

कुछ दिनों बाद उस जंगल में एक पंछी फिर आया और अल्लाह-हू-अकबर कहने लगा उसे देख कर जंगल के सारे पक्षी फिर आश्चर्यचकित हो गए और सोचने लगे,यह कौन पक्षी है जो अजीबो-गरीब तरह से बोल रहा है, ऐसा न हो हमारी जान जोखिम में पड़ जाए। उसे अपने लिए खतरा समझा और फौरन हमला बोलकर खत्म कर दिया। इस जंगल में इंसानों की भाषा, ईश्वर की भक्ति और नाम को समझने वाला कोई न था। इसलिए जो भी गलती से इंसानों का रटाया पंक्षी यहां पहुंचता उसे मार दिया जाता, क्योंकि यह जंगल था। शहरी भाषा और संस्कारों को यह जंगल न समझता था।

(२०) पाप-पुण्य

पूरे गांव में हलचल थी। प्रधान जी ने छोटी काशी भेजने के लिए ट्रैक्टर-ट्राली का इंतजाम करा दिया ,साथ में खाने-पीने का भी इंतजाम था। सभी कांवरिये और शिवभक्त जाने को तैयार थे। शीलू और शीतल किशोरियां भी जाने को तैयार थीं। सभी ने कहा- दोनों किशोरियों को अगर शिव-पार्वती बना दिया जाए तो बेहतर रहेगा,और अगर वे ट्राली में बंधे डीजे पर डांस करते हुए चलेंगी तो बहुत ही भक्तिमय माहौल हो जायेगा।

किशोरियों की मां ने कहा-अगर सड़क पर नाचते गाते हुए चलेंगीं ,तो लोग क्या कहेंगे। उनकी चिंता पर पानी फेरते हुए भले लोगों ने कहा, "अरे! भाई ये तो पुण्य का काम है। बड़े भाग्यशालियों को ऐसा मौका मिलता है।

ट्राली चली। उसके पीछे कांवड़िये और सारे भक्त उछलते-कूदते चले... और डीजे पर नाचते हुए शंकर पार्वती भी चले ।

दूसरे दिन छोटी काशी से ट्राली लौटी । शंकर-पार्वती फफकते हुए अपनी मां से लिपट कर रोने लगे। मां ने बड़ी मुश्किल से उनकी व्यथा पता की ,फिर चीख-चीख कर गरियाने लगी-अगर कोई नालायक कांवडियॉ मेरे दरवाजे आ गया तो जूतों से बात करूंगी । उसकी आवाज सुनकर अडो़सी-पड़ोसी आ गये पूछा-क्या हुआ?

मां बोली-दोनों बेटियॉ छोटी काशी से पुण्य कमा कर आईं हैं ,वही सब चीख-चीख कर बखान कर रही हूं।

पड़ोसियों ने कहा-इसमें चीखने की क्या जरूरत है? और कांवरियों को गरियाने की क्या जरूरत है ?

मां ने कहा-मेरा बस चलता तो सारे कावडियों को कच्चा खा जाती। ऐसा पुण्य बेटियों को दिया है जिसे न मैं निगल सकतीं हूं, न उगल।

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सुरेश सौरभ

-निर्मल नगर लखीमपुर खीरी उ०प्र०

पिन-262701

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1 टिप्पणियाँ

  1. Suresh saurabh ji ki kahaniyon ne abhibhoot kar diya, kya khoob vartmaan samajik tana bana buna hai racha hai, racha hi nahin srijit kiya hai kisi ek ke liye kalam sikh bane, sadhuwad mitravar.
    Balbir Rana Adig uttrakahnd

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