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आया है मौसम फिर से बहारें लेकर - संजय कर्णवाल की कविताएँ

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1

इतने दुःख से कोई दुखी हैं,
समझो उसके दुःख को।
ढूंढ रहा है हर कोई यहाँ  वहाँ
चारों ओर सुख को।।
हम किसी का दिल न दुखाए
बस इतना सा उपकार करे।
कोई भी आए  परेशानी
उनका सहयोग बार बार करे।।
मन के कोने में जो दया है,
उसको तुम सब पर दिखाओ।
मिलकर रहो सबसे सदा
सबके लिए अपने हाथ बढ़ाओ।।

2

नेक नीयत वाले होते हैं कम दुनिया में
कौन बांटे दुःख यहाँ होते हैं गम दुनिया में

सच्चे ही पथ पर चलकर सबको दिखलाते है
एक सच्ची सीख दुनिया को वो सिखलाते है
जज्बे को उनके सलाम करता है ये सारा जमाना
रहता है मन में उनके हमेशा कुछ अच्छा कर जाना
हमेशा आते जाते रहे लोग इन मुक़ामों पे
मिला है उनको जो लगे रहे अच्छे कामों पे।

3
बढ़ते रहे कदम जहाँ में अपने साथियों
हो नेक कर्म जहाँ में अपने साथियों।
ये मुश्किलें जो सामने खड़ी है,
इनको गिरा दो बुद्धि से।
जो दुर्विचार तुमको करे भृमित
उनको गिरा दो मन की शुद्धि से
अपना जो जीवन का लक्ष्य
उसको तुम हासिल करो।
ये जो कदम उठाए, रुक न पाए
ज़िन्दगी में हौसले शामिल करो

4
जो रखे हैं कदम  हमने इंसानियत की राह में
अटल रहे अपना इरादा कुछ करने की चाह में

लोग सारे  सोचते  है  कुछ करेंगे जहाँ में।
कुछ ही कर पाते हैं नाम अपना ज़मीं आसमां में

खुद से कोई वादा करो,तुम वादा करो
कुछ करने का  इरादा करो हां इरादा करो

हम सब के लिए करते रहे अच्छे प्रयत्न
बढ़ता रहे हर इंसां और अपना वतन।
5

ये रास्ते जिन पर कदम चल रहे हैं
कदम से कदम पल पल बदल रहे हैं
जायेंगे हम एक दिन मंजिल तक
हमें खुद पर यकीं है इतना।
पाएंगे हम जीवन की खुशियां
ये जिंदगी का सफर मुश्किल हो कितना
आती जाती हवाएं बस यही कह रही है
कितना मस्ती में हो के धीरे धीरे बह रही है
हम भी चले हाँ आगे ही आगे
अपना हर कदम समय सा भागे।

6
आया है मौसम फिर से बहारें लेकर
और नजारे लेकर,इन हसीं वादियों में
जो मन में ख़ुशी है,वो कैसे बताऊँ
जी करे मैं नाचूँ इन   नई नई खुशियों में।
झूमता गाता अपना हर पल गुजरे
जग को सुधारें हम और बेहतर खुद सुधरे
रखे हम हर कदम सोच समझकर
निभाएं हम हर वादा आगे बढ़कर


7

बरसे रिमझिम मेघा देखो
तरसे अपने मन कब से यहाँ
हरियाली ने ली अंगड़ाई
फैला जोर शोर से पानी यहाँ वहां
बच्चे दौड़े दौड़े फिरते,
पानी में उठते गिरते
छपाक पानी से करके आगे बढ़ जाते।
भीग गये है मस्ती करते
कदम बढे डरते डरते
कभी पानी में कागज की नाव चलाते
खेल यही बस चलता रहता
जब तक बरसे मेघा मेघा
कितने खुश हैं यारों देखो
खेल ये सब ने देखा।


8
काले काले बादलों ने घेरा चारों ओर से।
मन की मुरादें पूरी हो जाएं बरसे जोर जोर से।
प्यासी है धरती , प्यासे है पंछी
बलखाने ,लहराने को तरसे नदी
तू जो बरस जा सबके चेहरे खिल जाय
बैठे इसी आस में सब,सबको जल मिल जाय
खिल उठेंगे धरती के सारे रंग
रह जाएंगे सोचके सारे ही दंग।
बरसेंगे जब जब मस्ती में झुमके
हो जाएंगे धन्य, बूंदों को चमके।


9
बूंदों ने छम छम करके हरदम
मन में हलचल मचा दी।
खुशियों से झूमे पेड़ ये पौधे
जीवन की नई आशा जगा दी।।
फैला धरती पे हरियाली का आँचल
उमड़ उमड़ कर आगे बढ़ते हैं काले बादल
झौके हवा के छूकर इनको बहक रहे हैं
पौधा पौधा गाता है फूल कलिया महक रहे हैं
गाए तराना कोई बुलबुल इस मौसम में
पत्ता पत्ता डोल रहा सुनकर बोली इस आलम में।


10

ख़ुशियों का जीवन से कोई नाता है समझो
कैसे कोई किसी के लिए मुस्काता है समझो
कोई तो कारण होगा,जो मन में उमंगें उठती है
एक मन से निकलकर तरंगें आगे बढ़ती है
जान सको तो जान लो तुम ,है कोई बात निराली
सोच रहा कोई न जाने कबसे इतना सवाली।
हमने तो बस इतना जाना,कोई राज है इसमें
कुछ तो करे हम ,जो भी हो हमारे बस में।

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