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गोवा ! सौन्दर्य भी, इतिहास भी। - कामिनी कामायनी

गोवा का नाम लेते ही, हृदय के गुप्त प्रकोष्ठों में, भावनाओं का अगाध सतरंगी समंदर लहराने लगता है। नीले नीले अंबर से आवृत सुंदर स्वच्छ सफ़ेद अनेक सागर तट और उसपर नाचते गाते, आत्मानुभूति में लीन , भावविभोर पर्यटक। लोग इसे भारत में विदेश कहते हैं, तो एक प्रकार से सही भी है। यहाँ विदेशी पर्यटकों का बाहुल्य और इस जगह की संस्कृति भी कुछ ऐसी ही किस्सा बयान करती है।

देखते देखते, सोचते, संभलते आखिर हम लोग एक दिन गोवा आ ही गए, गोवा! दिल्ली से गोवा !कोंकण रेलवे का सुहाना सफर जो था। यहाँ सब कुछ पहले से निर्धारित और प्रबंधित था ही, मडगांव आकर लगा किसी पुराने काल खंड के समक्ष हम जानकारी इकट्ठा करने के लिए खड़े हैं। सीधे अपने होटल आए, विश्राम किया और कुछ ही घंटों में समीप के सरकारी दफ्तर से गोवा टूर का दूसरे दिन का टिकट ले लिया। मन हवा के चंचल गति की भांति यहाँ वहाँ , न जाने कहाँ कहाँ उड़ा चला जा रहा था। थोड़ी देर इधर उधर यूं ही मस्ती से घूमते हुए अपने लिए इस नए अंजान शहर का नजारा लेते रहे थे।

चारों तरफ क्रिसमस की मनमोहक तैयारियां हो चुकी थी, शांता क्लोज, मरियम, ईसा मसीह की छोटी बड़ी मूर्तियाँ, झाँकियाँ, रंग बिरंगे लाईट्स आदि पुर्तगालिओं के गंध से युक्त वह परिवेश स्वप्न नगरी सी मोहक लग रही है।

जहां सुदूर उत्तर पूर्व के अरुणाचल में सुबह के चार बजते ही भांति भांति के पक्षी उषाकालीन आध्यात्मिक कलरव गान से नूतन उजाले का अभिनंदन करते हुए प्रमुदित हो उठते हैं, वहीं गोवा में छह बजे तक आकाश में अंधेरा थिरकता रहता है। हाँ, कुछ कौए रामेश्वरम के भोर की भांति कांव कांव अवश्य करते दिख जाते हैं। ‘ आओ! तुम्हारा स्वागत है, अरुण देव!”वरुण देव अपने दोनों हाथ फैला कर सागर के मध्य से क्षितिज में झाँकते हुए प्रमुदित हो रहे हैं जैसे।

शायद इसीलिए इसे भारत का ‘सनसाईन’ राज्य भी कहा जाता है। विश्वभर से हजारों लाखों की संख्या में लोग पिकनिक मनाने और तनाव रहित जीवन का आनंद उठाने के लिए यहाँ की जादूमयी, सुरमई रेत तट पर आते हैं तो इसमें कुछ बात तो अवश्य है।

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विस्तृत, खुले आसमान के नीचे इसका भौगोलिक परिसीमा, ऊंचे ऊंचे भांति भांति के फलदार पेड़, सुंदर खेत, जलाशय आदि से युक्त यहाँ का चित्ताकर्षक समुद्र तट काफी लंबा, करीब 106 किलोमीटर है। अर्ध चंद्राकार तटीय प्रदेश नारियल के पेड़ों से सुशोभीत और आच्छादित एक अत्यंत ही मनोरम दृश्य से आप्लावित नजर आता हैं।

अनेक समुद्र तटों, जिनमें से कुछ पर्यटकों के अत्यंत पसंदीदा हैं। उदाहरण स्वरूप, मोरजिम, बागा, अंजुना, मोबोर आदि जिनमें कोलबा और कलगुंटे संसार भर के पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है।

अत्यंत रौनक से लबरेज़, कलानगुटे- बीच पर देश विदेश के मदमस्त पर्यटकों की काफी भीड़ सदैव लगी रहती है। लोग, बच्चे, बूढ़े जवान, स्त्री सभी वहाँ के विस्तृत तट पर, कहीं कहीं, बालू के मध्य, वापस जाती हुई लहरों के, अटके ठहरे हुए पानी में आत्मविभोर हो जल क्रीडा करते हैं, यह नजारा वाकई बड़ा दिलचस्प होता है। वैसे यहाँ खतरे की चेतावनी देता हुआ लाल फ्लेग कई स्थानों पर लगा हुआ है। अतीत से सीख लेकर सावधान लाईफ गार्ड वाले वहाँ फैले अथाह बालुका राशि पर जीप से घूम घूम कर लोगों को चेतावनी देते रहते हैं, आगे खतरे की निशानी से न बढ़ें।कुछ उन्मत्त अति उत्साही जवानों को बलात खींच कर पानी से निकालते भी देखा जा जा सकता है।

मनोरंजक, जल क्रीडाओं के अनेक सुखद साधन भी यहाँ उपलब्ध हैं। भीड़ भाड़ और जीवन से भरे उत्साहित लोगों के जान माल की सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था रखी गई है। तटों पर भी संबन्धित अधिकारी टेंट लगा कर नजर गड़ाए रहते हैं। सरकार यहाँ काफी सतर्क सी दिख रही है। समुद्र के खारे पानी से नहाने के बाद, यहाँ मीठे पानी से नहाने के लिए कई स्नानागार और शौचालय आदि भी बने हुए हैंजो इसके रौनक को और भी द्विगुणित करती है।

यहाँ इस समुद्र तट तक जाने के लिए रास्ते के दोनों ओर, यहाँ ढेर सारी भांति भांति की दुकानें हैं, रेस्त्रां, बार आदि हैं।

यह इलाका काफी पौश और एक तरह से काफी समृद्ध माना जाता है। बहुत से विदेशी लोगों की रिहाईशी भी यहाँ है। आस पास, अनेक स्पा, बार हॉली डे होम, बंगलों के साथ गोवा सरकार की पर्यटन विभाग का कार्यालय भी है।

दूसरा अत्यंत प्रसिद्ध है, कोलबा बीच -यह बीच, विदेशियों में कम, मगर भारतीय पर्यटकों का अत्यंत चहेता है, ऐतिहासिक कोलबा चर्च बगल में ही है। यहाँ रात्रि मनोरंजन के कोई विशेष साधन नहीं है, इस बीच पर भारत की अपनी संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। अभूतपूर्व शांति और शांत, दैविक आध्यात्मिक प्राकृतिक सौंदर्य से ओतप्रोत यह जगह एकदम साधक बना देता है।

मिरामार बीच वैसे यह बीच सरकारी संपत्ति है और पर्यटकों के लिए उतना आकर्षित तट भी नहीं है, फिर भी, जैसा कि हमारे गाईड ने बताया था, पर्यटन विभाग यहाँ उन्हें जरूर लाने की कोशिश करती है, ताकि इसका भी भविष्य चमके। यह अनुपम स्थान भी लोगों का मिलन स्थल भी है। यह मिलन स्थल समुद्र और नदी के जल का भी है।

मछुआरों की रंग बिरंगी नावें और उदधि के हल्के नीले जलराशि को दूर दूर तक घेरे हुए नारियल के पेड़ देख कर यहीं बस जाने के लिए मुसाफिरों का दिल मचल उठना स्वाभाविक है।हमारा टॅक्सी ड्राईवर काफी फिल्मी टाईप का बंदा है। उसने यहाँ की अनेक दास्तानें, किस्से कहानियाँ सुनाना प्रारम्भ कर दिया था। जब यहाँ के होटल्स, रेस्तरा, यात्री निवास, लॉज सभी भरे, शहर में देशी विदेशी दर्शकों की भीड़ ही भीड़, समझ लीजिए क्रिसमस आ गया है।

वैसे, इसका इतिहास देखें तो, स्कन्द पुराण के अनुसार, कहा जाता है, , कि दक्षिण में अरब सागर के साथ, अठखेलियाँ करता हुआ, कोंकण का यह भू भाग[ महाराष्ट्र, कर्नाटक, और गोवा ], महान ऋषि परशुराम ने अपने आधिपत्य में, धनुष वाण के बल पर, समुद्र देवता से, हासिल कर लिया था।

इस सप्त कोंकण अर्थात, धरती का टुकड़ा, धरती का कोना, कोने का टुकड़ा आदि प्रकृति ने इसे भरपूर सौन्दर्य के साथ स्थापित किया है। समतल, नदियां, समुद्र, और पहाड़ यहाँ प्रकृति प्रायः अपने प्रत्येक खूबसूरत रूप में मौजूद है।

गोवा के अनेक प्राचीन नामों में एक नाम गोमांतक भी है जिसके नाम पर एक राजनीतिक पार्टी भी है।

इसका अत्यंत प्राचीन अस्तित्व इतिहास यह भी बयान करता है कि यहाँ कभी मौर्य साम्राज्य द्वारा संचालित बौद्ध धर्म का प्राबल्य था और यह दुर्गम स्थल भारत के विभिन्न भागों से जुड़ा हुआ भी था।

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इस नयनाभिराम अति सौंदर्यशाली और लुभावने प्रदेश का मध्यकालीन अतीत विदेशी आक्रांताओं की वजह से कुछ ज्यादा ही हृदयद्रावक और विनाशकारी रही है। लेकिन अत्यंत खून खराबा और उलट फेर के मध्य भी यह अपना अस्तित्व कायम रखने में कामयाब रहा।

प्रकृति के इस नायाब खूबसूरत तोहफे पर विदेशी लुटेरों की भी गिद्ध दृष्टि पड़ने लगी थी। तटवर्ती इलाका होने के कारण, सन 1510 में पुर्तगालियों ने बीजापुर के सुल्तान युसुफ अदिल शाह को पराजित कर यहाँ तकरीबन 450 वर्षों तक शासन किया था।

पुर्तगालियों के शासन काल में गोवा पूर्णतया कैथोलिक राज्य बन गया। एक तरह से यह छोटा पुर्तगाल ही बस गया था। मस्जिदों को तोड़कर गिरजाघर बनाए गए। गाँव के गाँव, हिन्दू ब्रांहनों को धर्म परिवर्तित करवा कर ईसाई बना दिए गए।

गोवा में ईसाई धर्म के प्रचार, प्रसार की सफलता और उन्नति देख कर वेटिकन सिटी से तत्कालीन पोप स्वयं यहाँ पधार कर उनलोगों का हौसला अफजाई किया था।

यहाँ सालों भर लोगों का आना जाना लगा रहता है, मगर सर्दियों में और विशेष रूप से क्रिसमस और नववर्ष वाले सप्ताह में गोवा अपने पूरे शबाव पर रहता है।

वैसे पाश्चात्य देशों की भांति यहाँ भी टैक्सी, मोटर साइकिल, साइकिल आदि किराए पर लेकर खास कर विदेशी पर्यटक बहुत आनंद उठाते हैं और उसका कुछ दुरुपयोग भी करते हैं।

मगर भीड़ की बेलगाम मस्ती का कु-परिणाम, यहाँ जश्न मनाने, पीने खाने के बाद की स्थिति से दृष्टिगोचर होने लगती है। बोतल खाद्य सामाग्री के रैपर आदि बेहिसाब बिखरी रहती है जिसे साफ करना प्रशासन के लिए भी एक चुनौती बन गई है। इसलिए वहाँ बढ़ती गंदगी को नियंत्रित करने के लिए सख्त कदम उठाने का प्रयास किया जा रहा है।

कहते हैं कि गोवा में एक ही चीज सबसे सस्ती है, और वह है शराब, लेकिन अब यहाँ सार्वजनिक स्थान पर बैठ कर मदिरापान करने पर सरकार जुर्माने लगाने की सोच रही हैं।

पुर्तगालियों के तकरीबन साढ़े चार सौ वर्षों के आधिपत्य का परिणाम यहाँ की सभ्यता संस्कृति, खानपान वेश भूषा और संगीत पर प्रत्यक्ष देखी जा सकती है।

यहाँ सात प्रमुख नदियां हैं, जिनमें जुआरी, मंडोवी सबसे प्रमुख हैं। गोवा की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ का समुद्र तट है। करीब एकसौ एक किलोमीटर का समुद्रीय तट है।

यहाँ का तापमान ट्रोपिकल मौनसून होने के कारण मौसम समान्यतया गर्म, और उष्ण ही रहता है। बारिश भी अपनी मर्जी मुताबिक भरपूर होती है।

देश की आजादी के बाद सन 1961 में, काफी मुश्किल परिस्थतियों और उथल पुथल के बाद सेना भेजकर गोवा को विदेशी ताकतों से मुक्ता कराया गया था। पहले इसे केंद्रप्रशासित राज्य बनाया गया, बाद में इसे भारत का 25वां राज्य घोषित कर दिया गया।

दो भागों मे बंटा हुआ गोवा, उत्तर और दक्षिण –यहाँ की प्रमुख शहरेन हैं वास्कोडिगामा, मरगाव, मापुसा, पणजी और पोंड़ा। पणजी यहाँ की राजधानी होने की वजह से बड़े बड़े इमारतों और ब्रिजों से सुशोभित है। यहाँ से लोक सभा के लिए मात्र दो सीट है।

पुर्तगालियों वर्चस्व के कारण उनके द्वारा प्रचलित गोवा सिविल कोड अभीतक कुछ हद तक कायम है।

प्रकृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध, यहाँ के अधिकांश जंगल सरकार के अधीन है। बांस, नारियल, टीक, काजू और आम, कटहल के पेड़, अनानास, ब्लैकबेरी और अन्य औषधीय पौधे की बहुतायत है। यहाँ के घने जंगलों में गीदड़, जंगली सूअर, मैना, तोता और जल में भांति भांति की मछलियाँ हैं।

जनसंख्या के हिसाब से यहाँ 66॰1% हिन्दू, 25% ईसाई 8.3% मुस्लिम, सिक्ख, बौद्ध और जैन हैं

गोवा में अन्य दार्शनिक स्थल भी हैं। यहाँ सिर्फ समुद्र ही नहीं है। सनातन सभ्यता और संस्कृति के कई दस्तावेज़ बिखरे हुए पड़े हैं, जिन्हें भरी संख्या में लोग देखना पसंद करते हैं।

मंगेशी मंदिर {गोवा } मंगेशी गाँव

छोटी पहाड़ी पर, हरियालिओं के मध्य बने अत्यंत रमणीय, व्यवस्थित, 450 वर्ष पुराना, यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।इसका एक अपना महात्म्य है। इस नए मंदिर में अनेक डोम, खंभों आदि बने हुए हैं। यहाँ नंदी और सात स्तरों वाला खूबसूरत दीपस्तंभ है। [यह सर्वविदित है कि गोवा पर पुर्तगालियों के आधिपत्य से पहले हिंदुओं “ब्रांहनों” का ही वर्चस्व था, इसलिए यहाँ हिंदुओं के अनेक मंदिर हैं, यह मंदिर प्रारम्भ में कहीं और था, मगर पुर्तगालियों द्वारा विनाश के भय से इस शिवलिंग को सारस्वत ब्रांहनों ने यहाँ मंगेशी गाँव में { हिन्दू राज्य में} लाकर स्थापित कर दिया था। बाद में पेशवाओं ने यह गाँव इस मंदिर के देख रेख के लिए दान में दे दिया था। ]

इसके सन्निकट एक मनोरम तालाब है जिसे इस मंदिर का सबसे पुराना अंग माना जाता है।

नवनिर्मित भवन के सभा गृह में पाँच सौ से ज्यादा श्रद्धालुओं के बैठने की व्यवस्था है। यहाँ प्रतिदिन स्थानीय रीति रिवाजों के साथ, अनेक प्रकार की पूजा अर्चना की जाती है। प्रत्येक सोमवार को मूर्ति को गर्भगृह से बाहर निकालकर गाजे बाजे के साथ पालकी पर जुलूस निकाला जाता है। हिंदुओं के प्रायः सभी त्योहार, रामनवमी, अक्षय तीज, अनंत वृतोत्सव, नवरात्रि, दशहरा, दिवाली, माघ पूर्णिमा, महाशिवरात्री आदि।वैसे यह मंदिर सार्वजनिक नहीं, निजी है, मगर फिर भी यहाँ पर्यटकों और श्रद्धालुओं की काफी भीड़ रहती है।

यहाँ लता मंगेशकर के पूर्वज प्रतिदिन भजन कीर्तन गाया करते थे {वैसे आदरणीय लता दीदी का जन्म इंदौर में हुआ था}।

शांता दुर्गा मंदिर – माता का विशाल मंदिर है, जो अवश्य देखने और पुजा अर्चना करने की जगह है।

गोवा लोग इसके विदेशी अवशेष को भी देखने आते हैं। अब पुर्तगाल जाना तो संभव नहीं, सर किसी को, तो यहाँ आ जाते है उसकी झलक पाने के लिए। इस लिए यहाँ आना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।

। पूर्वजों का गोवा।

गोवा के ऐतिहासिक परिदृश्य को देखने परखने के लिए यह अत्यंत सुंदर स्थान है। लोटोलिम या लोटली नामक गाँव स्थान पर कलाकार माइएन्द्र जोशीलीनों अरौजे एलवेयर का व्यक्तिगत रूप से संचालित है यह। यहाँ वैसे तो अनेक पुराने घर हैं, कुछ खंडहर हो चुके हैं, कुछ वर्तमान हैं। अरौजे का पुस्तेनी घर को जो उस समय के एक जमींदार के आधिपत्य में था, देश विदेश के पर्यटक देखने आते हैं। पुर्तगालियों का यह घर अत्यंत भव्य और विशाल है। करीब दो सौ वर्ष पुराने इस हवेली की साज सज्जा, रहन सहन पुर्तगालियों के भव्य जीवन शैली का प्रतिनिधित्व करती हुई खड़ी है। एक प्रसिद्ध जज की हवेली, जो वर्तमान में उनके वंशजों{अरौजे} द्वारा म्यूजियम के रूप में संभाल कर रखा गया है। यहाँ कई फिल्मों की शूटिंग भी हो चुकी है।

इसी हवेली में तत्कालीन पॉप भी इटली से आए थे, जिनका तस्वीर उनके भव्य दीवार पर लगा हुआ है।


फोर्ट अगुयाडा { गोवा }

पुर्तगालियों द्वारा सतरहवीं सदी में निर्मित अगुयाडा फोर्ट और लाईट हाउस जैसे सांस्कृतिक विरासत को अत्यंत सुरक्षित रूप से संभाल कर रखा गया है।

इस किले को पुर्तगालियों ने अपने शत्रुओं, डचो और मराठों पर नजर रखने के साथ साथ, यूरोप से आने वाले जहाजों के लिए एक प्रतीक चिन्ह या लाईट हाउस के रूप में निर्मित किया था।

मंदोवी नदी के किनारे, अरब सागर की ओर खड़ा इस सुंदर किले में मीठे जल का संग्रहण भी किया जाता था तत्कालीन समय में यह एशिया में सबसे बड़ा जलसंग्रन केंद्र था।उस जमाने में यहाँ 2, 376, 000 गैलन पानी जमा किया जाता था।

एक समय यहाँ कैदियों को भी रखा जाता था, जिसके लिए कई छोटे छोटे तहखाने बने हुए हैं।

पुर्तगालियों का खानपान – गाईड मिस्टर ब्रेगेंज़ा के मोतबिक, गोवा के खानपान पर अनेक देशों का प्रभाव है। पश्चिम भारत का यह तटीय प्रदेश समुद्री रास्ते के कारण बाहर की दुनिया से भी जुड़ा हुआ था। , दक्षिणी अमेरिका, ब्राज़ील आदि का आलू, लाल मिर्च, वेनेगर का प्रयोग खूब हुआ। महीनों जहाज में रहने के कारण, खाद्य सामाग्री जल्दी खराब न हो, इसके लिए अनेक तकनीक पुर्तगाली अपने साथ लाए थे।

पेशवाओं, मराठाओं के समय के व्यंजन भी यहाँ प्रसिद्ध हैं।। नाना फड़नविश शुद्ध शाकाहारी थे, उनके रसोई में पाँच प्रकार की सब्जियां, भरवा बैंगन शकरकंदी का खीर, मेवा दल चीनीआदि बनाए जाते थे। शिवाजी के वंशज मांसाहारी थे। होटलों में, रेस्तरां में ऐसे अनेक ऐतिहासिक व्यंजन मिल जाते हैं। पाँडरा रस्सा, एक प्रकार काजू, नारियल आदि डाल कर बनाया गया खाद्य पदार्थ है। ऐसा कहा जाता है कि मुंबई का वड़ापाव पुर्तगालियों द्वारा ही महाराष्ट्र में आया था।

कोंकण के निवासी मुलतानी व्यापारियों से भी काफी प्रभावित थे, इनका खानपान भी इनके संस्कृति को जिंदा रखे हुए है।

यहाँ के भोजन में हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई और पुर्तगाल का प्रभाव है।

यह भी सर्व विदित है कि पुर्तगालियों से आलू, टमाटर, अनानास, अमरूद और ब्राज़ील से काजू गोवा तक आया। यहाँ की संस्कृति भारत के अन्य प्रान्तों से एक दम भिन्न। वैसे यहाँ के भोजन में मिर्चों और मसालों का बहुत ज्यादा प्रयोग होता है, जो शायद सबों के लिए हितकारी भी नहीं है। यहाँ पूरब और पश्चिम की सभ्यता का सम्मिश्रण है।

संगीत यहाँ की जिंदगी में ऐसा घुल मिल कर रच बस गया है जिसे इससे अलग करना सर्वथा दुष्कर है।

यहाँ का पहनावा – नववारी अर्थात नौ यार्ड की साड़ी जिसे आकर्षक पारंपरिक गहनों के साथ पहना जाता है।

पानो भाजू यह भी महिलाओं की एक पारंपरिक परिधान है।

वल्कल –एक आदि वासी पहनावा।

मछुआरे, कोली खूब चटख रंग की शर्ट, हाफ पैंट और सिर पर बाँसों का बना हैट, पहनते हैं।हाथ में गिटार या कोई म्यूजिकल वाद्ययंत्र। यह परिधान अपनी लोकप्रियता के कारण गोवा का प्रतीक बन गया है।

भाषा – यहाँ की भाषा मूलतः कोंकणी है। लेकिन पुर्तगालियों के प्रभाव के कारण ईसाईयों की कोंकणी पृथक है और हिंदुओं की कोंकणी पृथक।

यहाँ हिन्दू, पुर्तगालियों की छोटी सी संख्या अभी भी वर्तमान है।

गोवा के लोग मुख्य रूप से हॅप्पी गो लकी प्रकार के होते हैं, वे ज्यादा व्यर्थ के चिंता में नहीं रहते और जीवन के एक एक लमहे का आनद उठाना चाहते हैं।

गोवा भारत का सबसे छोटा और जनसंख्या में भी चौथा सबसे छोटा धनी और सबसे कम आबादी वाला राज्य है।शिक्षा 88% है। अङ्ग्रेज़ी बोलने वाले बहुतायत लोग हैं

यहाँ का मुख्य व्यवसाय मछली पकड़ना ही है। वैसे यहाँ की भूमि बहुत उर्वर है। केला आम, अनानास कटहल , धन, ज्वार, बाजरा, दालें, नारियल काजू, आदि प्रमुखता से उपजाता है।

आदिवासी – यहाँ के मुख्य आदिवासी भारत के अन्य भागों की भांति ही आर्यों ने यहाँ प्रवेश किया था। इन्हीं के वंशज गौदास हैं, फिर द्रविड़ आए। गोवा के लोग इंडो आर्यन द्रविडियन आदि मूल के हैं।।

वैसे यहाँ चार प्रमुख आदि वासी हैं। गौदास, कुंबिस, वेलिप्स, धाँगर। मुख्यतया ये लोग आस पास के गांवों में

रहते हैं। इनकी जीवन शैली, रीति रिवाज, और परंपराएँ सब अलग हैं, ये अपनी जाति बिरादरी के बाहर शादी ब्याह करना पसंद नहीं करते हैं।

सन 1620 में पुर्तगालियों द्वारा इनका बलात धर्म परिवर्तन किए जाने की वजह से ये तीन भागों में बाँट गए। इनका मुख्य देवता मल्लिकार्जुन है, जिनका स्थानीय नाम शिव है।

कुंबीस हिन्दू धर्म के मानने वाले लोग हैं, पर धर्मांतरित ईसाई हैं। वेल्पिस यह कुंबिस के एक उप –जाति है

इसी तरह एक अन्य जाति धाँगर, ये गुजरात से स्थानांतरित होकर गोवा आए हुए माने जाते हैं। ये लोग पवित्र और धार्मिक होते हैं और बीरा देवा की उपासना कराते हैं।ये मुख्य तौर पर भेड़ बकरी या जन्य जानवर पालते हैं और घुमक्कड़ी जीवन जीते हैं। इस जाति के पुरुष अपनी बड़ी पगड़ी और कठियावाड़ी सफ़ेद कुर्ते के लिए जाने जाते हैं।

मुंबई से पास होनेऔर बॉलीवुड का अत्यंत प्रिय होने के कारण यहाँ अनेक फिल्मों की शूटिंग हुई है, और होती रहती है। वास्तव में गोवा को देखना और उसका अध्ययन कारण दोनों ही अत्यंत आनंद दायक रहा है।

॥ कामिनी कामायनी॥

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