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लघु आलेख - दिव्य चक्षु - दीपक दीक्षित

dípak díkhchit


मैं जब इलाहाबाद में संगम देखने गया तो पानी की दो धाराओं के मिलने के स्थान पर नाव से ले जाकर मेरे गाइड ने बताया कि यहाँ गंगा, जमुना और सरस्वती नदी का मिलन होता है। मैंने कहा, “गंगा और जमुना तो मैं देख सकता हूँ पर सरस्वती नदी कहाँ है?” इस पर उसने कहा, “ये दुर्लभ दर्शन तो प्रभु कृपा से ही नसीब होते हैं। इसके लिए मन दर्पण की तरह साफ़ और दिव्य चक्षु खुले होने चाहिए।”

उसकी ये बात सुनकर मुझे अपने कोच हरीश की बातें याद आ गयी। वह अक्सर कहा करता था , “ खेल का असली मकसद जीतना / हराना नहीं बल्कि खेल भावना को जीवित रखना है”।

वह अक्सर घंटों बैठ कर मैच देखा करता था और न जाने उसकी आँखें क्या ढूँढा करती थी। अब समझ में आया कि क्यों वह और लोगों की तरह सिर्फ दो टीमों को एक दूसरे को हराते नहीं देखता था। वह तो सिर्फ खेल भावना का आनंद लेता था जो शायद सबको नसीब नहीं था। शायद उसका मन दर्पण की तरह साफ़ और दिव्य चक्षु खुले थे जिसके कारण उसे गंगा जमुना के साथ सरस्वती के भी दर्शन होते थे।

दो अलग अलग दिशाओं से आती धाराओं का योग अद्भुद होता है पर हमारा पूर्वाग्रह से ग्रस्त मन उसे पूरी तरह से देख नहीं पता और न ही उसका आनंद ले पाता है। योग साधना के माध्यम से अपने दिव्य चक्षुओं को खोला जा सकता है और फिर दिव्य तीसरी धारा का आनंद भी लिया जा सकता है।

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