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फिजूल ख़र्ची - दिनेश चन्द्र पुरोहित

फिजूल ख़र्ची

दिनेश चन्द्र पुरोहित

सुबह के नौ बजे होंगे, आज़ अमन ने फिर पेंसिल लाने की मांग अपनी अम्मा के सामने रख दी। मांग पेश करता हुआ, वह कहने लगा “अम्मा, कल चित्र-कला की परीक्षा है। मुझे अभी के अभी, पेंसिल चाहिए।” मांग सुनकर, उसकी मां कनक प्रभा को गुस्सा आ गया, जो अभी-अभी मधुरिमा पत्रिका पढ़कर आयी थी। जिसमें एक लेख छपा था। जिसका उद्देश्य था “बच्चों की फिजूल-ख़र्ची करने की आदत में सुधार लाया जाय”। इस लेख को पढ़कर, वह इस कमरे में अभी-अभी आयी ही थी। बस, फिर क्या ? झट उसने फटकारते हुए उसे कह डाला ‘अभी कल ही, पेंसिल बाज़ार से दिलवाई है। अब इतनी जल्दी दूसरी पेंसिल नहीं मिलेगी। यह बेकार की फिजूल-ख़र्ची करना, बच्चों को शोभा नहीं देता।’

बेचारा मासूम बच्चा उसके डर के मारे, खामोश हो गया। उसे डर था..न मालूम, कब अम्मा उसके कोमल गालों पर चपत लगा बैठे ? मगर यहाँ तो ख़ुद कनकप्रभा ध्यान रख न पायी कि, इस वक़्त अमन के पिताजी दीप टकटकी लगाकर उसकी गतिविधि बराबर देख रहे हैं।

कुछ समय बीता होगा, स्नान करके कनक प्रभा स्नानाघर से बाहर आयी। अलमारी से कीमती नयी साड़ी बाहर निकालकर उसने पहन ली, जो उसने कल ख़रीदी थी। जैसे ही वह बैठक के कमरे में बैठे दीप के पास आयी, और कहा “कहोजी, अमन के पापा। साड़ी कैसी लग रही है ?” दीप मुस्कराता हुआ, बोला “मेडम। कलर का क्या कहना ? साड़ी का कलर कोई हो, हरेक साड़ी आपके बदन पर अच्छी लगती है। आख़िर, करें क्या ? तुम तो हर दो माह बाद फैशन बदलने का बहाना बनाकर, जिद्द करके नयी महंगी साड़ी उठा लाती हो। आख़िर, हर माह तुम्हें किटी पार्टी में जाना पड़ता है।”

“क्या कह रहे हो, अमन के पापा ? मगर, आपको कोई कौन कहे ? सिगरेट के धुए उड़ाकर, हर सप्ताह सिगरेट के चार पैकेट खलास कर देते हो ?” तुनककर कनक प्रभा बोली।

“माफ़ करो, मोहतरमा। साड़ियों का खर्च बर्दाश्त करते-करते, छ: माह बीत गए..जब से हमने इस पाश कोलोनी में मकान किराए पर लिया है, तब से तुम्हारी साड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है। जिस दिन साड़ियों का खर्च बढ़ा, उसी दिन मैंने सिगरेट छोड़ दी। जानती हो, बेचारे अमन के लिए पेंसिल खरीदनी कितनी ज़रूरी है ? कल चित्र-कला की परीक्षा है, इसको पहले H- किस्म की पेंसिल-hh दिलाई थी, HB-किस्म की पेंसिल नहीं। तुमसे डरता हुआ उस दिन इसने HB-किस्म की पेंसिल खरीदी नहीं..जो चित्र-कला के लिए बहुत ज़रूरी थी। अब तुम बताओ, फिजूल ख़र्ची कौन कर रहा है ? तुम, या अमन ?”

सुनकर, कनक प्रभा आगे एक शब्द बोल न पायी। अब वह समझ गयी कि, “पहले बड़ों को फिजूल-ख़र्ची करने की आदत में सुधार लाना होगा, छोटे तो स्वत: अपनी आदत बड़ों को देखकर सुधार लेंगे।

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