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हिंदी दिवस विशेष - हिंदी मतलब भाषा बहता नीर - डॉ. हरीश कुमार

आज की प्रमाणिक हिंदी कौन सी है ? ये प्रश्न बड़ा प्रासंगिक बन पड़ा है इस हिंदी दिवस के दौरान। देखिये एक है स्कूल कालेज में पढाई जाने वाली हिंदी। इसे परिमार्जित और परिष्कृत हिंदी मन जाता है , विशेषकर शिक्षा और शैक्षणिक क्षेत्र में। एक हिंदी है जिसे बोलचाल के हिंदी कहा जाता है ,जैसे की हम और आप जैसे कई लोग गली ,मोहल्ले,नुक्क्ड़ ,चौराहे पर बोलते है , घर पर भी ये लगभग चल रही है। सिनेमा में भी अभी कुछ साल पहले तक हिंदी का रूप ठीक ठाक था लेकिन अब उसमें या उसके द्वारा हिंदी का रूप बिगाड़ने की कोशिश जारी हो गई है।

आजकल वेब्सीरीज की फिल्मों में हिंदी का अलग ही रूप देखने को मिल रहा है। इसे सुनकर लगा जैसे ये भाषा हमारी नहीं है बल्कि हम पर थोपी जा रही है। पिछले कुछ साल पहले आई 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' टाइप फिल्में और सेकर्ड गेम्स 'नाम की वेब सीरीज की भाषा में हिंदी को लगभग निर्वस्त्र करने की बड़ी कोशिश हुई। गालियां, बेहूदा शब्द और अश्लीलता का वीभत्स भाषाई प्रसारण इनमें किया गया। और इस बात में कोई अतिकथनी नहीं कि इनकी देखा देखी ये बीमारी पूरे सिनेमा जगत में फ़ैल रही है।

भाषा को प्रदूषित करने का जघन्य प्रयास। कबीर ने भाषा को बहता हुआ नीर कहा था इसका अर्थ यह था कि भाषा नदी के जल की तरह बहती रहे तो उसमें रवानगी बनी रहेगी । आज हिंदी भाषा तटसँ ,तद्भव ,देसी और विदेशी शब्दों के अथाह रूपों को लेकर एक सागर बन चुकी है पर इसका यह मतलब नहीं कि इस सागर की निर्मलता को अपने चरित्र के कमजोर शब्दों से दूषित करें। आप इस सागर में फूल और ताम्बे के सिक्के नहीं दाल सकते तो ठीक है पर इसे अपने मस्तिष्क के कचरे को न डाले। याद रखिये जो हम भाषा को दे रहे हैं वही हमें मिल रहा है। ठीक भाषा में मन का हर भाव प्रदर्शित होना चाहिए पर उसे कैसे और किन शब्दों के माध्यम से प्रकट करना है ,ये हमारी शिक्षा दीक्षा ,लालन पालन और वातावरण पर प्रभाव डालता है और हमें प्रभावित करता है।

हमारे रचनाकारों ,फिल्कारों और निर्देशकों का इतना तो उत्तरदायित्व बनता है कि वे भाषा को एक अनुशासन देने का काम करे उसे बेलगाम और बेहिसाब करने का प्रयत्न न करें। पहले जो स्क्रिप्ट लेखन या फिल्म लेखन होता था उसे सुनने और सुनाने में कोई दिक्क्त नहीं होती थी पर अब जिस तरह के संवाद बोले और लिखे जा रहे है उनका सामाजिकों के बीच संवाद रचाना बहुत फूहड़ और दुरूह हो गया है।

आम बोलचाल की भाषा और संस्थानों में प्रयुक्त की जाने वाली भाषा में एक अंतर् होता है और रहेगा भी शायद। इसका एक बड़ा कारण यह है कि संस्थाओं का ये उत्तर दायित्व होता है कि भाषाओँ को एक परिमार्जित दशा और दिशा मिले ताकि उनका एक मानक तय हो सके। एक और अनपढ़ समाज के बीच अंतर् होता है और इस अंतर को मिटने के लिए भाषा का एक उचित मानक तय करना जरुरी है। तू तड़ाक से आप और जी जैसे शब्दों का प्रयोग ही इस मानक की जरूरत को आवश्यक बनाता है और हमेशा इसकी जरूरत बनाये रखेगा यदि हम समाज को एक अनुशासन में रखना चाहते हैं तो भाषा के इस बहते हुए जल को पवित्र बनाकर रखना पड़ेगा।

हिंदी भाषा की प्रगति और उसके बोलचाल के रूप को और भी लोकप्रिय बनाने में पिछले कुछ वर्षों में छपी कुछ पुस्तकों ने एक नया मानक सेट किया है जिसे साहित्य जगत नयी वाली हिंदी के नाम से जानने लगा है। अब हिंदी में किताबें बेस्ट सेलर घोषित हो रही है। लुगदी कहलाने वाला साहित्य जो जो पारम्परिक साहित्य से हमेशा बहिष्कृत रहा आज उनके लेखकों की आत्मकथाएं हिंदी के बड़े प्रकाशक छाप रहे हैं। बाजार की बहसः को अब हिंदी प्रकाशक समझ रहे है और नए लेखकों ने तो खैर समझा ही है। अब हिंदी के लेखक बेस्टसेलर कहलाते हैं ,विशेषकर युवा जिन्होंने न केवल युवा अवस्था की प्रेम कथाओं और,यात्रा वर्णन और कालेज लाइफ को रोचकता से लिखा है बल्कि अध्यात्म से जुडी कथाओं को भी सरलता से पॉपुलर साहित्य में लाकर खड़ा कर दिया है। इनमें सत्य व्यास ,निखिल सचान ,दिव्यप्रकाश दुबे ,देवदत्त पटनायक , आमिष त्रिपाठी ,आनंद नीलकंठन,विजय बैंकर , चेतन भगत ,नीलोतपल मृणाल ,अनुराधा बेनीवाल ,गौरव सोलंकी आदि कितने ही लेखक हैं जिनकी रचनाओं पर वेब सीरीज और फ़िल्में बनाए की योजना भी खूब जोर शोर से प्रफुल्लित है। इस नई हिंदी ने पुरातनपंथी लेखक लॉबी को तोडा है और बता दिया है की लेखक बनने के लिए पत्रिकाओं या आलोचकों के कंधे की जरूरत के दिन अब लद गए हैं।

मीडिया और समाचार पत्रों के तो क्या कहने। भाषा का जो प्रचार प्रसार इनमे हुआ है वो अपने आप में रोजगार भी बढ़ा रहा है और हिंदी को रोजगार की भाषा भी बना रहा है। आप खुद देखिये की हिंदी के समाचार पत्रों और समाचर चैनलों की संख्या पहले से अधिक हो गई है। हिंदी पत्रकारिता अपने आप में एक वैभव बना रही है।

इस प्रकार हिंदी भाषा का भविष्य उज्ज्वल है और हिंदी भाषा की नदी दिन ब दिन पूरी लय से बह रही है । आलोचकों ,बुद्धिजीवियों ,नए लेखकों का उत्तरदायित्व बनता है की इस भाषा को भदेसपन से बचाये रखें और इस के निर्मल स्वरूप को लोकभाषा के द्वारा सजाएँ ,जरूरी नहीं कि हर संवाद को जो का त्यों रखा जाये

भाषा का सौंदर्य उसकी प्रतीकात्मकता में है उसका प्रयोग भाषा के लिए सुलभ संवाद प्रदान करेगा।

1 टिप्पणियाँ

  1. सुन्दर आलेख। हाँ, जिन फिल्मों का आपने जिक्र किया है उन फिल्मों को अगर आपने देखा होगा तो हर किरदार गाली देता नहीं दिखता है। हमारे आस पास जैसा समाज है उसी का चित्रण उसमें किया है। मैं अपने आस पास ऐसे लोगों को जानता हूँ जिनकी बात की शुरुआत और अंत गाली से ही होता है। और वो लोग अच्छी कम्पनियों में अच्छे पदों पर हैं इसलिए इसमें पढ़े लिखे और अनपढ़ का तर्क नहीं आता है। हाँ, केवल सेंसेशनलाईज करने के लिए गाली ठूँसना सही नहीं है लेकिन फिर उस चीज को ऑडियंस नकार ही देती है। यही चीज पहले सेक्स के साथ होती थी लेकिन बिना वजह सेक्स भी ऑडियंस ने नकारा ही है।

    आपके लिखे बाकी बिन्दुओ से सहमत। लुगदी या नयी हिन्दी के साहित्य ने हिन्दी को युवाओं में अधिक प्रचारित किया है। पहले के मटाधीश इस बात से कुढ़ते थे और यही कारण था कि लोकप्रिय साहित्य को हिकारत की नज़रों से देखते थे जबकि मनोरंजन के लिए लिखा गया साहित्य, फिर वो चाहे किसी भी भाषा में हो, सबसे ज्यादा बिकता ही है। हिन्दी ने इसे नकारा था जबकि विदेश में लोगों ने इसे खुले हाथो से स्वीकारा है इसलिए उधर के बड़े प्रकाशन जहाँ गम्भीर साहित्य छापते हैं वहीं वो लोग अपराध साहित्य, हॉरर भी छापते हैं। यह बात आपको केवल हिन्दी में ही दिखेगी कि हिन्दी का बड़ा प्रकाशन इस विधा का साहित्य नहीं छापता। अभी भले ही उन्होंने सुरेन्द्र मोहन पाठक जी की आत्मकथा छापी हो लेकिन शायद ही वो अच्छा हॉरर या अपराध साहित्य छापें। अगर ऐसा होता है तो यकीनन यह सही दिशा में उठाया गया अच्छा कदम होगा।

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