कहानी - अकथ पीड़ा - धर्मेन्द्र कुमार

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पुरुषों के गृह त्याग की, निष्ठुरता की, छिछोरेपन की‚ सैकड़ों दास्तानें सुनी हैं। इन पुरुषों में‚ कई ऐसे महान पुरुष भी हैं, जो माता—पिता, बच्च...

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पुरुषों के गृह त्याग की, निष्ठुरता की, छिछोरेपन की‚ सैकड़ों दास्तानें सुनी हैं। इन पुरुषों में‚ कई ऐसे महान पुरुष भी हैं, जो माता—पिता, बच्चे–पत्नी, घर—गृहस्थी, राज—पाठ और वैभव को छोड़कर, परिवार के मोह से विरक्त होकर घर से निकल गये। वे कठिन तपस्या के उपरांत निर्वाण प्राप्त किये, और दुनिया को सच्चाई का मार्ग दिखाए, दुःखों से मुक्ति का उपाय बताये। आजकल तो युवकों और युवतियों को प्रेम में पड़कर गृहत्याग साधारण बात बनती जा रही है। किन्तु एक पैंतिस साल की शादी—शुदा, दो बच्चों की माँ, साधारण परिवार की, गाँव की घरेलू औरत अपने माशूक़ के साथ चुपके से रात के अंधेरे में निकल जाए, यह तो बिल्कुल असाधारण और हैरान कर देने वाली बात है। कैसे अपने कलेजे को कठोर करके, फूल जैसे अबोध, नाजुक, दूध मुँहे बच्चे को छोड़कर भाग गयी ? इतने दिन साथ रहने के बाद भी पति से नाता कैसे तोड़ गयी ? अपने दिल के टूकड़े को, जिसे नौ महीना अपना रक्त पिलाकर पालती रही, कष्ट सहती रही, दर्द से बिलखती रही; उसे क्योंकर छोड़ भागी ? उसके पाँव कैसे घर की दहलीज लाँधे होंगे ? वह मासूम चेहरा जिसकी हर एक अदा पर पत्थर दिल भी पिघल जाए, क्रूर से क्रूर व्यक्ति भी जिसकी मासूमियत के आगे नतमस्तक हो जाए, वह नवजात चेहरा, उनकी तोतली बोली, विनोद और मासूमियत से भरें उनके पाक कारनामें‚ उसकी पाँवों की बेड़ियाँ न बनी ! एक बार भी उन बच्चों के भविष्य के विषय में न सोची ! पति के प्रेम से नारियों का मन उबते देखा है, उनकी विरक्ति और घृणा से उन्हें मृत्यु का आवाहन करते या यमराज के साथ जाते देखा गया है; किन्तु वात्सल्य से, खासकर जब वह दूध मुँहा या पाँच वर्ष से कम उम्र की हो‚ छोड़कर किसी ग़ैर मर्द के साथ भागने की बात पहली बार ही सून रहा हूँ। पति—पत्नी का तकरार साधारण बात है। तलाक़ के बाद बच्चों पर एकाधिकार के लिए हजारों केस दर्ज़ होते रहते हैं। इन अबोध, मासूम बच्चों की क्या गलती थी कि दुनिया की सबसे अनमोल वस्तु‚ ममता की छत्रछाया से वंचित रह जाना पड़ा। इन दूध पीतें बच्चों को जननी रूपी शीतल और दुनिया की सारी बाधाओं से रक्षक कवच से अलग कर दिया गया। प्रेमी का प्रेम और वासना अंधा होता है‚ यह तो जानता था; किन्तु इस क़दर अंधा होगा कि वात्सल्य, ममत्व जैसे महान् पदों को ठोकर मार दे, संतान संसर्ग को अनदेखा कर दे, पुत्र—प्रेम जैसे अद्भुत विभूतियों को ठुकरा दे, इस स्वर्गमयी आनंद का तिरस्कार कर दे, यह पहली बार ही देख, सुन रहा हूँ।

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सुबह का समय है। लाला रामस्वरूप आंगन में सिर पकड़े बैठे हैं। लज्जा और क्षोभ से सिर झुका है। आंसुओं की लगातार धार से लेई भिंगती चली जा रही है। वहीं भूभि पर दोनों बच्चे‚ एक की उम्र तीन साल, दूसरे की पाँच साल, खेल रहे हैं। माँ को ढूँढते हुए बार—बार रसोई की तरफ़ जाते और निराश लौट कर पुनः खेलने लग जाते। जब छोटा बच्चा रोने लगा और रूपा से चुप नहीं हुआ तो वह उसका हाथ पकड़, सहारे से उठाकर पिता के पास ले गयी। रामस्वरूप एक बार सिर ऊपर किये, इन मासूमों को माता के लिए रोते देख और बिलख पड़े। यह वह समय था जब उन्हें गर्म दूध के साथ बिस्कुट, पावरोटी और भरपेट भोजन मिल जाता था। पाँच साल की बच्ची पिता को दुःखी, रोते देख कुछ न बोली‚ किन्तु मोहित भूख से रो रहा था। कनिका इस समय तक दोनों बच्चों को खिला देती थी। लाला उन्हें प्यार से गले लगा लिये।

रूपा—“अम्मा कहाँ है पापा ?”

लाला कुछ न बोले, आवाज़ ही न निकलती थी। रोते—रोते घिघ्घी बँध गयी थी। आँखों से अश्रुधारा रूकने का नाम न लेता था। वह उठे और आले से बिस्कुट लाकर खिलाने लगे। रोते थे और खिलाते थे, रूपा पिता की आँसू पोंछ रही थी।

सहसा दरवाज़े से दूधवाला आवाज़ लगाया। लाला झटपट आँखें पोंछ कर रसोई से बर्तन लेकर दरवाज़े पर जा पहुँचे।

दूधवाला दूध ढारते हुए, अंदर झंकता हुआ—“आज भाभीजी दिखाई नहीं दे रही है, तबीयत तो ठीक है न ?”

लाला को ऐसा ग़ुस्सा आया कि सब्जी काटने वाली चाकू से उसका सीना चीर दे। इन्हीं लालसा और वासना‚ पिपासायुक्त अधम, नीच लोगों के कारण मेरा घर बर्बाद हो गया; मेरे बच्चें अनाथ हो गये। वह ज़ब्त कर रह गया। अंदर आकर दरवाज़ा बंद कर दिया।

लाला की लाल—लाल अश्रुसिंचित सूजी आँखें, कपोलों पर सुखे आँसू और उदास, मलिन मुख देखकर दूधवाले को आशंका ने घेर लिया।

लाला दूध लेकर अंदर आये और गैस—चूल्हा जलाकर दूध गर्म किये, आटा निकाले और गुँथने लगे। रोते थे और आटा गूंथते थे। कई बूँद आँसुयें आटें के साथ सन गयी। उन्हें तो भूख बिल्कुल भी नहीं थी‚ किन्तु इन बच्चों के लिए रोटी बनाना आवश्यक था। दोनों बच्चे इन्हीं के पास आकर खेल रहे थे; किन्तु खेलने में उनका मन न लगता था। वे कभी इस कोठरी में जाते, कभी उस कोठरी में, कभी आशा भरी लोचनों से छत पर देखते तो कभी आँगन में, कभी मुख्य दरवाज़े पर जाकर उसकी सिटकनी खोलने का असफल प्रयास करते। शायद उन्हें अम्मा को पड़ोस में जाने का गुमान हो रहा था। उनकी निर्दोष, निश्छल, व्याकुल आँखें हर जगह माता को ढूंढ रही थी। उन्हें क्या पता उनके सिर से माता की छत्रछाया उठ गयी और अब इस जीवन में कभी न मिलेगी। नियति इन मासूम बच्चों के साथ कैसा हृदय—विदारक क्रूर मज़ाक़ करने जा रही थी।

रामस्वरूप कच्ची, टेढ़ी—मेढ़ी रोटियाँ पकाते हुए सोच रहे थे—ईश्वर किसी को रूप न दे, और रूप दे तो बुद्धि और शिक्षा न दे, सुन्दरता का अभिमान और घमण्ड न दे। मैंने अपने जाने कभी किसी चीज़ की कमी न होने दी। उसकी सारी आवश्यकताओं को पूरा करता गया। माँ—बाबूजी से लड़—झगड़ कर इसे यहाँ लाया। इसके कहने पर इसे मोबाइल ख़रीद दिया यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी। घर पर रहती तो उनकी देखरेख में रहती, स्वतंत्र छोड़ने का कारनामा भुगत लिया। इसलिए कहा गया है, औरत अधीन रहने के लिए ही बनायी गयी है। मैं दिन भर स्कूल में पढ़ाने चला जाता। ये न जाने किस—किस से बात करती रहती थी। एक बार भोलुआ मुझसे कहा भी था कि भाभी हरिया ड्राइवर से ज्यादा मेल—जोल रख रही है, शयात् मोबाईल से बात भी करती है। काश, तभी मैं सम्भला होता, उसपर लगाम कसा होता तो आज यह नौबत न आयी होती। मैंने इसकी ओर से सफाई देते हुए उसे ख़ूब डांटा था। तब मैं न जानता था यह इतनी बदचलन और बेहया निकलेगी। मेरे सामने तो ऐसे रहती थी मानों कहाँ कि सती—सावित्री हो। गलती मेरी ही थी, देखकर भी नज़रअंदाज़ करता रहा। उसके रूप पर बेजा मोहित हो गया था। हाय ! कनिका तुम इतनी बेवफ़ा निकली ! फिर बीती स्मृतियों में खो गया। ऐसा लगाता था कलेजा मुँह को निकल आएगा। बीच—बीच में ग़ुस्सा इतना आता कि इस समय वह सामने आ जाये तो उसका और हरिया ड्राइवर दोनों का ख़ून कर देता। चाहे उसे फाँसी ही क्यों न हो जाती।

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एकाएक विचारों ने पलटा खाया। वह आँसुओं को पोंछ लिया। मैं किसके लिए रो रहा हूँ एक नामुराद, बदजात, बदचलन, बेवफ़ा औरत के लिए‚ जिसे अपने पति और बच्चों की ज़रा भी परवाह नहीं। जो एक पत्र छोड़ आधी रात को चोरों की भाँति अपने माशूक़ के साथ भाग गयी। उसने अपने पतलुन की थैली से वह चिट्ठी निकाली और एक बार पुनः पढ़ा। सुबह से इस पत्र को पचासों दफ़े पढ़ चुका है। एक बार तो जी में आया की उस पत्र को जला दे; किन्तु कुछ सोचकर पुनः पॉकेट में रख दिया। वह समझती है कि जिसके साथ वह भागी है, वह उसका जीवन पार लगाएगा, तो वह धोखे में है। महीना दो महीना बाद ही वह ठुकरा देगा, तब कहीं की न रह जाएगी। यहाँ का दरवाज़ा अब उसके लिए हमेशा बंद है। कई दिनों से उसका चाल—चलन देख रहा था। छुप—छुप के बातें करते भी देखा था। पूछने पर कहती कि अपने गाँव बात कर रही हूँ। मुझे क्या पता था कि उसके मन मे ऐसे पाप पल रहे हैं। अभी तक तो इस बात को कोई नहीं जानता; किन्तु जब यहाँ सबको पता चलेगा तो कितनी बदनामी होगी। अपने गाँव में घर वालों को या पड़ोसियों को यह ख़बर मिलेगी तो कही मुँह दिखाने को न रह जाऊँगा। माँ—बाबूजी अलग बोलेंगे—यहाँ से झगड़ कर साथ ले गया। यहाँ थी तो हम उसे मज़दूरिन बना के रखे थे, दुःख देते थे, प्रताड़ित करते थे? अब किस भाव का पड़ा। अपने घर का काम कौन नहीं करता है? वह भी उसे पहाड़ लग रहा था। वह तो कहती ही थी‚ तुमने भी उसी का पक्ष लेकर वहाँ परदेश लेकर गये। नाक कट गयी तो अब रोयो नानी के नाम को। आज तक गाँव—घर में ऐसा न देखा, न सुना। गाँववाले अलग जान लेंगे। वह रोटी बनाकर दूध के साथ बच्चों को खिला दिया। बच्चें भूखें थे खा तो लिये‚ पर जब पेट भर गया तो माँ के लिए रोने लगे। रामस्वरूप ने चुप कराने का लाख प्रयत्न किया; किन्तु जब मोहित चुप न हुआ तो डाँट कर ग़ुस्से में आँगन में बैठा कर अलग हो गया। रूपा भाई को चुप कराने का असफल प्रयास कर रही थी। ख़ुद भी रोती और भाई को चुप कराती। यह डर भी था कि बच्चें की रोने की आवाज़ सुनकर कहीं कोई पड़ोसिनें न आ जाये और कनिका के बारे में पूछने न लग जाये। इसलिए उन्हें रूम के अंदर ले जाकर खिलौने और मिठाइयाँ देकर चुप करा दिया। इन नन्हें बच्चों को छोड़कर स्कूल भी न जा सकूँगा। क्यों न माँ—बाबुजी को इसकी सूचना दे दूँ। किन्तु नहीं, उन्हें इस मुसिबत में क्यों घसीटू ? उन्हें कितना दुःख होगा ? वे दोनों पहले जी भर के मुझे कोसेंगे, फिर चारों तरफ़ हल्ला मचा देंगे। केस फ़ौज़दारी तक कर देंगे। चारों तरफ़ थू—थू होगी, सोचो, कितनी जग हँसाई होगी, कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रह जाऊँगा। मान लिया न भी कोसेंगे‚ मेरे साथ सहानुभूति ही करेंगे तो किस मुँह से उनसे यह कहूँगा। इज़्ज़त लौटने से रहा, कनिका आने से रही। फिर ख़्याल आया‚ कहीं मकान मालकिन आ गयी और पूछने लगी तो क्या बताऊँगा या स्कूल से ही कोई हाल लेने न आ जाये, क्यों न किसी के हाथों पाँच—छः दिन की छुट्टी ही लिख भेजूँ। यह सोचकर बीमारी का बहाना कर, पाँच दिनों की छुट्टी की अर्ज़ी लिख कर पड़ोस में एक छात्र के हाथ में दे आया। वह आकर बाहर का दरवाज़ बंद कर अपने मुबाइल से कुछ नम्बर निकाला और फोन मिलाने लगा।

वहीं बच्चें जिनकी किलकारियों, हँसी, बालपन की ठिठोलियों से, भाग—दौड़ तथा खेलने, रोने—गाने, चिल्लाने से सारा घर गूँजा करता। वहीं अब सन्नाटा पसरा रहता। मानों आने वाली दुःखद परिस्थितियों का आगाज़ करा रहा है। जैसे घर में कोई है ही नहीं। केवल रोने और सिसकने की आवाज़ें आती। कभी, बेफिक्री, उन्मादित, हर्षोल्लासित और प्रफुल्लित रहने वाले बच्चें अब उदास, निराश और हताश चुपचाप बैठे रहते हैं। कभी थोड़े समय के लिए हँसने और खेलने भी लगते है; किन्तु कुछ देर बाद पुनः अम्मा, अम्मा की रट लगाने लगते। उनकी इस दुरावस्था को देख भला किसके हृदय पर आरे न चलेंगे, किसके चक्षु नम न हो जाएँगे। रामस्वरूप तो फिर भी उनके पिता है। वह कैसे इन परिस्थितियों का सामना कर रहा है, इन दो दिनों से कितनी मानसिक और शारीरिक कष्टों को झेल रहा है‚ यह वही जानता है। इन दिनों वह कितना अकेला, कितना दुःखी, कितना लाचार और बेबस है। यह अकथ पीड़ा ज्वाला बनकर अन्दर ही अन्दर उसे जलाए और गलाए जा रही है।उसे अपनी फिक्र न थी; बच्चों की चिंता थी, उनके भविष्य की चिंता थी। उनकी दुःख, व्यथा, कुसेवा और अकेलापन से वह तड़प उठता।

आज तीन दिन हो गये। रामस्वरूप पिता से माता बन गये हैं। उनकी हर एक आवश्यकताओं का ख़्याल रखते। उनकी टट्टी साफ करते, कपड़ा धोते, नहलाते, समय पर खाना खिलाते अब उन्हें आभास होने लगा था कि माता के कर्त्तव्यों का निर्वाह करना सहज नहीं हैं। बच्चों का पालन करना तपस्या करने से भी ज़्यादा कठिन काम है। इतना करने पर भी जब वे माता की रट लगाते तो उन्हें ग़ुस्सा आ जाता, वे क्रोधित हो जाते। बालकों को कोसने लगते। इन्हीं के कारण मैं भी फँसा हूँ वरन् मैं भी कहीं निकल गया होता। इन अभागों के किस्मत में माता का प्यार नहीं बदा है तो कोई क्या करे ? फिर कनिका पर ग़ुस्सा निकालते, वह क्या समझती है कि उसके बिना मैं और बच्चें मर जाएँगे। चाहूँ तो आज विवाह कर लूँ। मेरी हामी भरने की देरी है। किन्तु मैं उसकी तरह बेहया नहीं। पता न क्या देखकर ट्रक ड्राइवर के साथ भागी। मान—अपमान, इज़्ज़त—प्रतिष्ठा का ज़रा भी ख़्याल नहीं किया। वह तो निठल्ला साड़ था, इसकी तो अपनी घर—गृहस्थी थी, दो—दो बच्चें थे। आँखों की पानी गिर गयी है। इस उमिर में सबका साँसत कराने पर लगी है। इसका कारण मैं ही हूँ। मुझे सुन्दर स्त्री चाहिए थी। काली—कलूटी होती तो यह दिन न देखना पड़ता। जिसकी कभी मैं नाज़बदारी करता था‚ वहीं नाक कटा गयी। सुन्दर स्त्री इतना बेवफ़ा क्यों होती है ? ईश्वर किसी को नाज़नी पत्नी न दे !

इधर—उधर बहुत नम्बर लगाने के बाद तीसरे दिन शाम तक एक नम्बर मिला जिसपर फोन करने पर उधर से जो आवाज़ आयी‚ रामस्वरूप उसे पहचान गया। बोला—“इस वक्त तुम कहाँ और किसके साथ हो, इस तरह आधी रात को चोरों की तरह क्यों भाग गयी ?”

उधर से आवाज़ आयी—“ये तो मैं न बता पाऊँगी।”

“कब आ रही हो ?”

“आना होता तो भागती क्यों ?”

रामस्वरूप अधीर होकर बोले—“मेरी न सही, क्या तुम्हें बच्चों की भी याद नहीं आती। देखों, माता, माता कहकर कब से पुकार रहे हैं। तीन ही दिन में इनके चेहरे बेरंग हो गये, अनाथों–सी हालत हो गयी है। इनकी ख़ुशियाँ, बालपन, यहाँ तक की नींद भी उड़ गयी है। ये नींद में भी तुम्हें ही बुलाते हैं।”

“वो मेरे नहीं‚ आपके बच्चें हैं। आप उन्हें सम्भालों। मुझे अपना जीवन जीने दो। मैं बहुत ख़ुश हूँ।”

“इतना कठोर मत बनों कनिका ! मेरी न सही, इन मासूम बच्चों का ध्यान करो। जिनको देखे बिन एक छिन न रह पाती थी, जिनकी जुदाई असह्य था, जिनकी ज़रा—सी पीड़ा तुमसे बर्दास्त न होती थी, उसे इस क़दर छोड़ भागी ! वो भी अधम वासना के लिए। सोचों‚ कितनी बदनामी और बदगुमानी होगी।”

“यह सब बहुत पहले ही सोच लिया था।”

“ये तो बता दो भागी क्यों ? तुम्हें मुझमें क्या कमी नज़र आयी ? इतना बड़ा क़दम उठा ली‚ मुझे भनक तक न लगी।”

“अगर यही जानना चाहते है तो सुनिये, मेरा दिल हरि पर आ गया, अब क्यों, कब और कैसे आ गया, क्या कारण था, क्या देखकर आ गया ? यह तो मैं भी नहीं जानती। सुना था प्रेम उम्र, ऊँच—नीच, जात—पाँत, अमीरी—ग़रीबी देखकर नहीं होता। अब प्रत्यक्ष कर रही हूँ। इनकी जाति, पेशा और रूप से मुझे कुछ मतलब नहीं, यह आत्माओं का मिलन है। मैं नहीं जानती शादी—शुदा और बच्चों वाली होने के बाद भी कैसे मेरा दिल इनपर आ गया। ये भी मुझसे बेपनाह मुहब्बत करते हैं। शायद हम पहले जन्म के प्रेमी रहे होंगे। हमारे इस मिलन के दरम्यान‚ कोई आये यह मुझे पसंद नहीं। यदि तुमने मेरे ख़िलाफ़ कोई केस बनाया तो मैं भूल जाऊँगी कि तुम मेरे पति थे और मैं तुम्हीं पर प्रताड़ना, दहेज और ऐसे ही हजारों केस बनाकर तुमको और तुम्हारें घरवालों को फँसा दूँगी। अब कुछ मत पूछना, ना कभी फोन करना। मुझे मेरा जीवन जीने दो।” यह कहकर कॉल कट कर दी।

रामस्वरूप को जीवन में इतना आश्चर्य और हताशा कभी न हुआ था। इतना बड़ा नीच, अधम कृत्य करने के बाद भी कितनी साफगोई और निर्भीकता से बात कर रही है। उसकी बातों में ज़रा भी लज्जा और वेदना का अंश नहीं है। गोया कोई सुकर्म और प्रशंसनीय काम की हो। वे क्रोध और निराशा के उस पराकाष्ठा तक पहुँच गये थे। जहाँ से जीवन की रेखा पतली होकर क्षीण हो जाती है। वह भिंगी हुई तिली है जिसे आशा की लाख चिंगारियाँ भी नहीं जला सकती। उन्हें अभी विश्वास था कि ये शब्द उसके अपने नहीं थे। वह दबाव में या क्षणिक वासना और प्रेम के बहाव में अथवा बहकावे या सिखावे में ऐसा कह रही है। नारी का यह रूप उसने पहले कभी नहीं देखा था। वह नारी जो उसकी पत्नी है, जिसे सात सालों से वह जानता है, दिन—रात जिसके संसर्ग में रहता था। कोई दूसरा उससे ऐसी किसी घटना की चर्चा करता तो वह कदापि विश्वास नहीं करता। अबतक उसे एक, विश्वास, एक आश, अंतःमन के किसी कोने में उम्मीद की एक चिंगारी जला रखा था; किन्तु कनिका के इन कटु, शुष्क, निष्ठूर वचनों की आँधी ने उसके हृदय के निविड़ता में जलते उस चिंगारी को भी बुझा दिया। वह उस जगह पर खड़ा था‚ जहाँ इस घटना के बारे में किसी को बताते शर्म आती है, इज़्ज़त और प्रतिष्ठा दाँव पर लग जाती है। किन्तु वह छुपा भी कितने दिन सकेगा ! प्रसूति का पेट भी कहीं छिपता है !

रात के दस बज रहा है। दोनों बच्चें अम्मा, अम्मा की रट लगाये अभी—अभी सोये हैं। उनके कपोल आँसुओं से अभी गिली है। कभी—कभी भौचक नींद से उठकर अम्मा, अम्मा पुकारने लगते हैं। मानों स्वप्न में या स्मृतियों में माता का दर्शन हुआ हो। किन्तु उन्हें न पाकर रोते हुए निराशा में पुनः सो जाते हैं। तीन ही दिन में बच्चों का सुकोमल, प्रफुल्लित बदन कुम्भला गया है। माता–वियोग ने उनके चेहरे की रंगत और बदन की स्फूर्ति छिन लिया था। कुछ देर के लिए भूल कर खेलने लगते है; किन्तु तुरन्त अम्मा, अम्मा की रट लगाने लगते हैं। वे उन्हें सारी चीज़े देते, उनकी हर एक आवश्यकताओं का ख़्याल रखते जो कनिका उसे देती थी; किन्तु न जाने वह कौन सी कमी रह जाती कि वे उसकी रट लगाये ही रहते। वे सोचे कि एक—दो दिन में माता को भूल जाएँगे; परन्तु कनिका के प्रति उनका विरह और तड़प बढ़ते जा रहा था। उसे पाने की उत्कंठा और व्याग्रता तेज़ होती जा रही थी। निराशा ने उनकी हालत बद से बदतर कर दिया था।

रामस्वरूप बगल के कुर्सी पर बैठे चिंता के अथाह सागर में डूबकी लगा रहे हैं। तीन दिन से भोजन का एक कौर ग्रास भी गले से नीचे नहीं उतारे हैं। न घर से निकलते, न कहीं आते—जाते, न किसी को अपने यहाँ आने देते। सारा दिन दरवाज़ा बंद कर घर के अंदर ही रहते। ख़ुद की नहाने, खाने की सुधी तक नहीं रहती। उसी तरह मैले कपड़ों में पड़े रहते। अब तो कमज़ोरी से चलने में भी झाँई का आभास होता था। तीन ही दिन में पहचान में नहीं आते थे। बच्चें बाहर जाकर दूसरे लड़कों के साथ खेलते या दूसरे लड़के ही यहाँ आते तो उनका मन बहल जाता; किन्तु ऐसी परिस्थिति में भेद खुलने का डर था। तीन रात में घण्टा दो घण्टा से अधिक कभी न सो पाया। सोते ही अजीब—अजीब सपने आने लगते और वह जाग जाता। अब तक तो वह किसी तरह इस बात को छुपाये हुये था। उसे उम्मीद थी कि कनिका आयेगी। वह इतना निष्ठूर नहीं हो सकती, शादी के सात फेरे, वे कसमें, वे वादें, साथ बिताए स्मृतियों को किसी भी हालत में वह विस्मृत नहीं कर पाएगी। किन्तु फोन से जो बात हुई उससे साफ ज़ाहिर हो गया कि अब वह लौट के आने की दशा में नहीं है। पहले तो वह सोचा था कि वह आएगी तो सबक सिखाऊँगा, डाँटूँगा, मारूँगा, रौब जमाऊँगा और भगा दूँगा। किन्तु जस—जस उसके आने में देर होता और दिन बितते जाता उसका यह अभिमान चिंदी होते जाता। और अब नौबत यह आ गयी थी कि उसे बुलाने के लिए वह उसके पैरों पर गिरने को तैयार था। इसके लिए दुबारा उसने फोन भी किया था। मिन्नते किया, रोया, गिड़गिडाया किन्तु वह प्रेम की अंधी एक न सुनी और उसके सारे व्यक्त भावनाओं और मनोभावों को ठुकरा कर फोन कट ही नहीं कि बल्कि दुबारा फोन करने पर पुलिस फ़ौज़दारी की धमकी भी दी। एक बार इसके मन में आया कि नहीं आती हो मेरी बला से‚ अब मैं तुम्हें बुलाने भी नहीं जाऊँगा। दूसरी शादी कर लूँगा। शादी के लिए पैसा होना चाहिए। फिर मेरे पास तो नौकरी है‚ जब चाहूँ तुमसे नाजनीन ला सकता हूँ। किन्तु विचारों ने तुरन्त पलटा खाया। यहाँ और गाँव में जो बदनामी होगी उसका क्या करूँगा ? शिक्षक की नौकरी, कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहूँगा। घर वाले ऊपर से ताने देंगे। और करो‚ मेहरियाँ की ग़ुलामी, माँ—बाप से लड़कर यहाँ लाये‚ तकलिफ़ होती है, जाएगी तो समय से खाना बनाएगी। बच्चों में मेरा भी मन लगा रहेगा। नाक कटा गयी। अब मरो कहीं डूब के, राँड कही के न छोड़ी। अब वह समझ गया था कि स्त्री चाहे तो पलभर में पुरुष को जलील कर सकती है, उसकी और उसके खानदान की इज़्ज़त को तार—तार कर सकती है। उसे मृत्यु तक काँटों में घसीट सकती है। इस बदनामी के जीवन से तो मौत अच्छा है। एक ही बार पीड़ा होगी, जीवन भर का कलंक को न ढोना पड़ेगा; ज़हरीले और हृदयभेदी तानों को न सुनना पड़ेगा। अकथ, असहनीय पीड़ा तो न सहनी पड़ेगी। वह इन्हीं ख़्यालों में खोया था कि रूपा अम्मा, अम्मा करते हुए बाँहें फैलाए उठ बैठी। बिजली बत्तियाँ जल रही थी। वह कुर्सी से उठकर उसे गोद में उठा लिया और प्यार से गले से लगाकर बोला क्या हुआ बेटा ? कोई स्वप्न देख रही थी ? बच्ची ख़ुशी में—“अभी अम्मा आयी थी हाथों में चाकलेट छुपाई थी। एक मोहित को दी मुझे देने के लिए बुलाई, मैं दौड़कर आयी किन्तु न जाने वह कहाँ छुप गयी। कहाँ है पापा‚ बाताओं न ? मुझे मम्मी के पास ले चलो पापा।” यह कहती हुई रोने लगी। रामस्वरूप भींगे नयन से उसे सीने से चिपका लिया। रूपा फिर बोली—“सुबह मम्मी आएगी न पापा ?”

रामस्वरूप—“हाँ बेटा।”

“चाकलेट लाएगी न ?”

“हाँ, लाएगी।”

उस समय उसे ऐसा लग रहा था कि अपना कलेजा निकालकर रख दे। इन बच्चों की ख़ुशी के लिए जो उसे प्राणों से बढ़कर थे, क्या कुछ न कर जाता। अपने शरीर के एक—एक बूँद रक्त से यदि इन बच्चों की एक—एक पल की ख़ुशियाँ मोल मिल जाए तो वह कदाचित पीछे न हटता। अपने को दुनिया का सबसे भाग्यवान व्यक्ति समझता। बच्चों का दुःख अब और नहीं देखा जाता। उनकी मूक और प्रगल्भ वेदनाएँ इसके सहन की सीमा का अति कर रही थी। उसके आत्मा के टूकड़े हो रहे थे, हृदय—विदीर्ण हो रहा था। बच्चों की पीड़ा का अनुभव वास्तव में शरीर को कँपा देने वाला, मन और आत्मा को झकझोर देने वाला था। कुछ देर बाद वह उसी तरह कंधे पर सो गयी। उस मासूम को क्या पता कि आज की रात उसकी ज़िन्दगी की आख़री रात है। कल का सूर्य देखना उसे नसीब न होगा। प्रारब्ध उसके साथ कुछ और ही सोच रखा था।

आदमी अपनों से लड़ लेता है, परायों से लड़ लेता है; किन्तु जहाँ इज़्ज़त की बात आती है। वह चारों चित पटकनी खा जाता है। दुनियाँ क्या कहेगी, समाज क्या सोचेगा ? वह उस समाज की परवाह करता है, जो उसे भूखें और नंगे देखकर मुँह फेर लेता है; जो पथों के किनारे धाव से बिलखते, मरते‚ देखकर बिना परवाह किये अपने रास्ते चला जाता है। जो सड़क या स्टेशन पर किसी वस्त्रविहिन या चिथड़ों में लिपटी स्त्री, दरिद्र को देखकर रास्ता बदल लेता है या नज़रें घूमाकर तेज़ी से निकल जाता है। उस समाज के कहने के, उसकी ताड़ना और प्रताड़ना के डर से आदमी कितना बड़ा अनर्थ कर देता है। इसकी आपने कल्पना भी न की होगी। रामस्वरूप के चेहरे से आज एक भयानक संकल्प झलक रहा था।

सुबह आठ बजे जब दूधवाला आया और कई बार आवाज़ लगाये जाने और दरवाज़ा पीटने पर कोई जवाब न आया, न दरवाज़ा ही खुला। आस—पड़ोस से और भी कई लोग आ गये। काफी आवाज़ लगाने के बाद भी जब दरवाज़ा न खुला तो लोगों के मसक्कत के बाद किसी अनहोनी की आशंका से किवाड़ के पल्ले निकाल दिये गये। अंदर जो कैफ़ियत देखी गयी वह बेहद दर्दनाक, और दिल को दहला देने वाला था। दोनों मासूम बच्चें पंखे की रस्सी से लटक रहे थें। दूसरे कमरें के पंखे से रामस्वरूप लटक रहा था। यह दारूण दृश्य देख आस—पास की कमज़ोर दिल औरतें मूर्छित होकर गिर पड़ती। इतने सुन्दर, कोमल, मासूम, दूध पीते‚ फूल से बच्चों को एक पिता कैसे फाँसी के फंदों पर लटका सकता है ? वो भी अपने ही हाथों से। वहीं पिता जो उसकी एक ख़ुशी के लिए धरती के अंतिम छोर तक दौड़ लगाने को तैयार रहता था, जो उनकी ज़रा सी खरोच पर बिलख जाता था, वे कभी गिरते तो कलेजा मुँह को आ जाता। जिनके लिए कितनी ही बार पड़ोसियों से, पत्नी से लड़ जाता। उन्हीं बच्चों को कोई पिता मृत्यु के फंदे पर कैसे लटका सकता है ? उनके सुकोमल, नाजुक गर्दन को फाँसी के फंदे में कैसे डाल सकता है ? इन नवजातों के गले में रस्सी डालते समय हाथ न काँपे होंगे, दिल में हुक न उठी होगी ? जिन हाथों से उन्हें खेलाता था, पोषण करता था, खिलाता था, स्नेह जताता था। जिन्हें देख लेने से ही सारी थकान और नैराश्य मिट जाती थी, जो आँखों को आनंदित और मन को प्रफुल्लित, गद्गद् कर देते; जिन्हें गोद में लेने को बाँहे फैलाये रहता, मन उनके एक झलक देखने को ललायित रहता। आँखें उन्हें ढूँढती रहती, देखने को व्याकुल रहती, जिन्हें एक दिन भी देखे बिन कल न पड़ता, जी घबड़ाने लगता, मन अशांत हो जाता, जिनकी तोतली बोली में पापा, पापा शब्द सुनने के लिए कान उतावले, व्यग्र रहते, उन्हीं हाथों में इतनी हिम्मत कहाँ से आ गयी ? आँखें कैसे इस करूण दृश्य को देख पायी, कान कैसे अंतर्नाद ध्वनि सुनकर भी खामोश मुक बने रहे कि यमराज के गोद तक पहुँचा दी। लटकाते समय बच्चें के दर्द, चीख और वेदना को कैसे सहन कर पाया होगा ? उनकी आँखें अंतिम छवि कैसे देख पायी होगी ! दिल को इतना कठोर, निर्मम‚ निर्दयी और क्रूर कैसे बनाया होगा ?

रामस्वरूप के पाँकेट से मिला पत्र से सारा भेद उजागर हो गया। वह फाँसी लगाते वक्त यह भी नहीं सोचा कि मैं भी किसी का बेटा, किसी के आँखों का तारा और दुलारा हूँ। मेरे माता—पिता पर क्या गुजरेगी ? वह कैसे, किसके सहारे जीवन गुजारेंगे ? उसे केवल अपनी निजी इज़्ज़त और प्रतिष्ठा का ख़्याल रहा, वह इतना आत्मस्वार्थी, बुजदिल और कायर कैसे हो गया ?

पिता तो वह है; जो अपनी संतान के लिए सारी दुनिया से लड़ जाता है। दुनिया के बदनामी के डर से मासूमों के साथ फाँसी पर नहीं लटकता। एक बदचलन स्त्री के कुकर्मों का दण्ड इन निरपराध मासूमों को देना कहाँ तक उचित है ? बच्चें के सहारे वह अपनी ज़िन्दगी काट सकता था। जिस समाज के तिरस्कार के डर से वह यह अधम कर्म कर गया, वह कुछ दिनों में इस बात को भूल जाती। उसने जो किया वह कायरता, नीचता, अन्याय और कुकर्म है। इससे नीच और हृदय—विदारक कर्म दूसरा नहीं हो सकता।

।।समाप्त।।

सम्पर्क सूत्र –:

शीर्षक-अकथ पीड़ा

विधा—कहानी

लेखक—धर्मेन्द्र कुमार

ग्राम—भवानीपुर (बढ़ैयाबाग) ‚ पोस्ट—बाजार समिति तकिया

थाना—सासाराम‚ जिला—रोहतास‚ राज्य—बिहार‚ भारत

पिन कोड— 82 11 15


bZesy&dharmendra.sasaram@gmail.com

शिक्षा—स्नातकोत्तर (दर्शन शास्त्र) ‚ नेट‚ बी०एड०‚ लाइब्रेरी साइन्स‚ कई साल पत्रकारिता का अनुभव‚ कई कहानियाँ और कवितायें पत्र—पत्रिकायों में प्रकाशित हो चुका है। प्रकाशित कहानी संग्रह—‘शराबी की बीबी’ (बिहार सरकार के अंशानुदान से)।

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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ 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रचनाकार: कहानी - अकथ पीड़ा - धर्मेन्द्र कुमार
कहानी - अकथ पीड़ा - धर्मेन्द्र कुमार
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रचनाकार
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