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कहानी - पीड़ा कुछ ऐसी - तेजपाल सिंह ‘तेज’

अतीत के सागर में कुछ यादों की लहरें लेने लगीं तो आज गौरी की याद आ गई। जीवन में कई व्यक्तित्व कुछ ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जिन्हें शायद मृत्यु के समय ही पीछा छुड़ाया जा सकता है। गौरी भी उन्हीं में से एक है, ललिता ने सुबकते-सुबकते अपने और गौरी के बीच के संबंधों की कहानी सुनाई।

मुझे आज भी याद है कि जब पहली बार उसने हमारे घर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। 1997 का अगस्त महीना था। मैं छ्त पर खड़ी-खड़ी आकाश में उड़ती हुई रंग-बिरंगी पतंगे देख रही थी। गौरी की भौंकने की आवाजें नीचे से ऊपर तक आ रहीं थीं। कुछ ऐसी अजीब सी आवाजें, जो मैंने घर में पहले कभी नहीं सुनी थीं। शायद कारण यह था कि गौरी अभी केवल सात दिन की ही थी और आज ही पहली बार घर में आई थी। इसलिए अजनबियों को अपने आस-पास देखकर उछल-कूद कर जोर-जोर से चिल्ला रही थी। उसकी आवाज सुनकर मैं दौड़ी- दौड़ी छत से नीचे आ गई। गौरी मुझे देखकर और जोर से चिल्लाने लगी। उसे चिल्लाता हुआ देखकर मेरी भी चीख निकल गई और डर के मारे डाइनिंग टेबिल पर चढ़ गई। उसे देखकर मुझे बहुत ही डर लगता था। मेरी समझ से परे था कि वो अभी ठीक से चल भी नहीं पाती थी किंतु फिर भी मुझे उससे न जाने क्यों डर लगता था। डर के मारे मैं हमेशा किसी न किसी चीज पर चढ़ी रहती थी। लेकिन उसके घर में आने से परिवार में एक अजीब तरह का उल्लास था।

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जब वो चलने-फिरने लगी तो सुबह को पापा उसे घर से बाहर घुमाने ले जाने लगे। धीरे-धीरे छ: सात दिन में गौरी दौड़ लगाने लगी। शुरु-शुरु में वो बस दूध पीती थी। जब भी किसी बर्तन के खिसकने की आवाज उसे सुनाई देती तो वो तुरंत दौड़कर वहाँ पहुँच जाती। हाँ। याद आया जिस दिन मम्मी ने उसे “गौरी” नाम दिया था। उस दिन से छोटी सी डौगी सबके लिए “गौरी” बन गई। गौरी अब अच्छी तरह से चलने-फिरने लगी थी किंतु पलंग पर चढ़ पाना उसके लिए अभी भी मुश्किल था। इससे किसी को कुछ हो न हो, मुझे काफी राहत रहती थी। क्योंकि मैं अभी भी उससे डरती थी। घर के अन्य सदस्य जब उसे गोदी में उठाते और बाहर घुमाने ले जाते तब भी मैं उसे सिर्फ दूर से ही देखती रहती थी।

एक रोज दिन में सोते-सोते अचानक मेरी नींद टूट गई। आँख खुली तो मुझे कुछ अजीब-सा अहसास हुआ। देखने पर पता चला कि गौरी मेरी चोटी को चबा रही है। चोटी पलंगे से नीचे जो लटक रही थी। यह देखकर मैं जोर-जोर से रोने लगी। और जैसे ही मैंने उससे अपनी चोटी छुड़ाई तो वो सिर हिला-हिलाकर मुझे देखने लगी। दरअसल उसके दांत निकलने को थे, इसलिए उसका मन हर समय कुछ न कुछ चबाने को करता रहता था।

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गर्मियों में जब छत पर सोते थे तो वो मेरे छोटे भाई के साथ सोते-सोते उसका कान चूसा करती थी। उसकी इस हरकत को देखकर उसके लिए एक छोटा सा निप्पल खरीदा जिसे वो मुंह में डालकर दिनभर बच्चों के जैसे चूसती रहती थी। किसी कुत्ते के बच्चे को निप्पल चूसते हुए मैंने न केवल पहली बार देखा था अपितु कुछ अजीब भी लगता था। वो कुछ और बड़ी हुई तो उसकी निप्पल चूसने की आदत छूट चुकी थी। उसके शरीर के रोएं अब हल्के भूरे रंग के बाल बन चुके थे। उसकी छोटी-छोटी आँखें अब कुछ बड़ी और चमकदार हो गई थीं। उसने अब कूँ-कूँ छोड़कर भौंकना शुरु कर दिया था। उसके बड़े होने के साथ, एक बड़ी मुसीबत आई, वह थी उसको काबू में रखने की । क्योंकि अब वो भागने-दौड़ने लगी थी। उसे घर में आए पूरा एक साल हो गया। किंतु किसी ने भी उसे जंजीर (पट्टा) से बाँधने के बारे में सोचा तक नहीं। उसे जंजीर से बाँधने की जरूरत तब महसूस हुई, तब गौरी दरवाजा खुला होने पर घर से बाहर भागने की ताक में लगी रहती। अगर वो एक बार घर से बाहर निकल जाए तो उसकी मर्जी के बिना उसे अन्दर लाना असंभव होता था। वो गली में इधर-उधर बहुत तेजी से भागती रहती और जब थक जाती तो खुद-ब-खुद घर के अन्दर आ जाती थी।

उसके खाने का कुछ बंधा-बंधाया (तयसुदा) समय नहीं था। जब भी उसे भूख लगती, वो घर के किसी भी सदस्य के करीब आकर अपने पंजे से उसके पैर या हाथ को खुजलाने लगती थी। उसका कोई तय-सुदा बर्तन भी नहीं था। क्योंकि किसी भी बर्तन में खाना उसको पसंद ही नहीं था। जब तक उसे हाथ से ना खिलाया जाए, वो खाना नहीं खाती थी। जमीन पर रखा खाना भी वो नहीं खाती थी। जमीन पर बैठकर खाना भी उसे अच्छा नहीं लगता था। उसके मुंह में रोटी का टुकड़ा देने पर वो उसे बैड पर लेजाकर ही खाती थी। मम्मी के हाथ से खाना उसको बेहद पसंद था। मम्मी उसे सबसे ज्यादा डाँटती थी फिर भी वो मम्मी को ही ज्यादा पसंद करती थी। वो और कुत्तों से दूर रहती थी। बिल्कुल अलग। उसकी अजीबोगरीब आदतें उसे अन्य कुत्तों से अलग बनाती थीं। बैड पर हमारे साथ सोना, माँस न खाना, सब्जियों का शौकीन होना उसकी खास आदतें थीं। आलू और टमाटर खाना जैसे उसकी कमजोरी थी।

गौरी अब बहुत शरारती हो गई थी। उसे जंजीर से बाँधने की पूरी तैयारी कर ली गई थी। मुझे आज भी याद है, जब पहली बार उसे जंजीर से बाँधा गया, कितना चिल्लाई थी वो। जंजीर से बाँधने के पाँच मिनट बाद ही उसे खोल देना पड़ा था। और वो जंजीर घर के कौने में डाल दी। वो जंजीर हमेशा इसी तरह कभी इस कौने में, कभी उस कौने में पड़ी रहती। अब मैं गौरी से नहीं डरती थी। अब मैं उसे गोद में उठाकर सारे घर मे घूमा करती थी, जैसे कोई छोटी सी बच्ची। समय बीतता गया। गौरी बड़ी होती गई। लगभग चार साल होने को आए, गौरी हमारे घर का हिस्सा थी पूर्णरूप से। कोई उसे जानवर कहता भी तो बहुत बुरा लगता था। कोई पूछ्ता कि हमारे परिवार में कितने सदस्य हैं तो जवाब मिलता – आठ, गौरी को मिलाकर।

हमारे प्यार ने उसे बहुत आराम-तलबी बना दिया था। हमेशा हमारे पास लेटी रहती और सिर पर हाथ फेरने की जिद करती रहती। अपने ऊपर हाथ फिरवाना उसे बहुत पसंद था। हाथ फेरना जैसे ही बन्द होता तो उठ खडी होती और अपने पंजे से हमारा हाथ अपने सिर पर ले जाने की कोशिश करने लगती।

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एक दिन अचानक हल्की सी बीमार पड़ गई। घर पर ही ठीक हो जाएगी, यह सोचकर उसे डाक्टर के पास नहीं ले जाया गया। और जब वो ठीक नहीं हुई तो डाक्टर के पास ले जाना जरूरी समझा गया। वो दिन भुलाए नहीं भूलता जब मेरे बड़े भाई ने डाक्टर के यहाँ से आकर बताया कि गौरी को बहुत भयंकर बीमारी है, अब वो ठीक नहीं होगी। और चन्द दिनों के बाद हमारे घर का एक सदस्य कम हो जाएगा। मुझे एक बार तो यकीन ही नहीं हुआ। पर सच्चाई को कौन झुठला सकता है। ये मनहूस खबर सुनने के बाद जैसे ही गौरी को देखा, आँखों से आँ सू बहने लगे किंतु वो मासूम बच्ची अपने उसी पुराने अंदाज में सिर घुमा-घुमाकर हमारी ओर देखती रहती........उस सबसे अनजान जो उसके साथ हो चुका है और होने वाला है। मैं उसे कैसे बताती कि उसे जब भी देखती अंतर्मन से एक ही आवाज आती ... तुम इस तरह कैसे जा सकती हो?

धीरे-धीरे उसकी बीमारी नजर आने लगी। उसके सिर में निरंतर कुछ धड़कन जैसी होने लगी। वो दिन प्रति दिन कमजोर होती जा रही थी। उसे देखकर दिन-रात दुआ निकलती कि वो ठीक जो जाए पर चाहने-भर से तो सब कुछ नहीं हो जाता। कठोर से कठोर चीज चबा जाने वाली गौरी रोटी भी बड़ी मुश्किल से चबा पाती थी। वो कमजोर पर कमजोर होती जा रही थी। दौड़ना तो दूर वो हाथों का सहारा दिए बिना ठीक से चल भी नहीं पाती थी। थोड़े दिन और बीते, सिर्फ लेटे रहने और दर्द से चिल्लाने के सिवा वो कुछ भी तो नहीं कर पाती थी। उसे देखकर उसका सारा दर्द अपने अन्दर समेट लेने का मन करता था। दिनभर मैं ही क्या घर का कोई न कोई सदस्य उसके साथ बैठा रहता, उसके सिर पर हाथ फेरता रहता था। वो चुपचाप पड़ी रहती किंतु हाथ हटाते ही उसकी कराहट दिल दहलाने लगती थी। अब वो कुछ भी तो नहीं खा पाती थी। दूध में ब्रेड भिगोकर उसके मुंह में रखने पर सिर्फ दूध चूस पाती थी। मैं अथवा घर का कोई न कोई सदस्य रात-रात भर उसके पास बैठा रहता। दिन रात बैड पर बैठे रहने वाली गौरी का बिस्तर डाक्टर के कहने पर जमीन पर लगाना पड़ता और उसको गोद में उठाना मना था... इंफेक्शन का डर था। पर गौरी को देखकर डाक्टर की कोई बात घर के किसी भी सदस्य को याद नहीं रहती....।

सर्दियों में हमारे साथ हमारी रजाई में सोने वाली गौरी अब जमीन पर बिछे बोरी की टाट पर अलग पड़ी रहती। पापा ने कड़ाई के साथ मना किया था उसे गोदी में उठाने को....पर मेरा दिल नहीं मानता। दर्द से चिल्लाती गौरी को देखकर मन करता कि गौरी के आखिरी समय तक गोद में लिटाकर रखूं। मना करने के बावजूद मैं उसे गोदी में लेकर बैठी रहती। वो भी चुप पड़ी रहती। थोड़े और दिन गुजरे अब वो बिल्कुल जिन्दा लाश बन चुकी थी। आँखों को बार-बार साफ करने के बावजूद उनमें मवाद भर जाता । मेरा छोटा भाई उसकी दयनीय हालत देखकर जैसे मूक ही बना रहता था। गौरी की ये हालत देखकर किसी ने पापा को सुझाया कि उसे गुड़ में कोई जहरीला पदार्थ खिलाकर हमेशा के लिए सुला दिया जाए। पापा के बस में भला ऐसा करना कहाँ था। ऐसा कुछ करने की नौबत भी नहीं आई। 26 जनवरी 2000 का दिन था। पापा दो दिन पहले ही भारी मन से एक साहित्यिक सम्मेलन में भाग लेने चंडीगढ़ चले गए थे। उस दिन काफी सर्दी थी। गौरी को छत पर ही गर्म कपड़ों में लिटाकर हम नीचे आ गए। अगले दिन सुबह के लगभग नौ बजे जब मैं उसे कुछ खाना खिलाने पहुँची तो देखा गौरी अपनी अथाह पीड़ा से निजात पा चुकी थी। हमारे आठ लोगों के परिवार मे से एक सदस्य जो चार साल पहले हमारे घर आया था, आज वापिस चला गया था। उस दिन घर के हर सदस्य की आँखे गीली थीं, किंतु मेरी नहीं.... मैं उस दिन बिल्कुल नहीं रोई। लेकिन उसके अगले दिन से आज तक जब भी गौरी की याद आ जाती है, कोई ऐसा दिन नहीं होता जब गौरी के बारे में सोचकर मेरे आँखें गीली नहीं होतीं। मैंने गौरी के जाने के बाद निश्चय किया कि अब मैं कभी किसी को इतनी आसानी से अपने जीवन में प्रवेश नहीं करने दूँगी।

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