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कहानी : " माहौल " - उदय केसरी

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अमन आज की सुबह जागा तो जरुर पर बिस्तर से उठा नहीं और न ही अपना दफ्तर गया, बस बीती रात के एक स्वप्न में वह घंटों बाद भी खोया रहा। अमन भारती र...


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अमन आज की सुबह जागा तो जरुर पर बिस्तर से उठा नहीं और न ही अपना दफ्तर गया, बस बीती रात के एक स्वप्न में वह घंटों बाद भी खोया रहा।

अमन भारती राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, नई दिल्ली में कार्यरत एक अधिकारी है। वह अधिकारी जरूर है पर उसके दिलोदिमाग में मानवीयता का बेहद गहरा प्रभाव है। वह सांप्रदायिकता, जातीय भेदभाव व रूढ़िवादिता से बरबस ही दुखी हो जाता है। वह यह देखकर विचलित हो जाता है कि जिन लोगों की प्राकृतिक काया तक में ऊपरवाले ने भी कोई मूल फर्क नहीं किया, वे खुद आपस में इतने अलग अलग क्यों होते चले गए ?

अमन कल दफ्तर में एक फाइल पढ़ने के बाद से ही खुद को विचलित महसूस कर रहा था। फाइल राजस्थान से आई थी और उसमें वहां के गांव वीरपुरा की एक मामले का विवरण था। मामला था कि वहां एक वृद्ध महमूद अली को भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला। भीड़ का आरोप था कि वह अपने साथ एक गाय ले जा रहा था, जिसे वह कसाई को बेचने वाला था। भीड़ में शामिल लोग कथित तौर पर गौसेवा को धर्म मानने वाले थे, इसलिए उन लोगों ने महमूद के इस अपुष्ट दुस्साहस का दंड उसे सड़क पर बेरहमी से पीट कर दिया। वृद्ध यह दंड सह न सका, उसने सड़क पर ही दम तोड़ दिया। लेकिन जब इसकी खबर वृद्ध के घरवालों को लगी, वे दौड़े भागे घटना स्थल पर पहुंचे। वे उस वृद्ध की लाश को देख बिलख उठे। उस वृद्ध का बेटा करीम तो दहाड़मार कर रोने लगा। वह रोते रोते अपने अब्बू की लाश से कहता जा रहा था - " अब्बू... मैं आपको दो दिनों से रोक रहा था... अभी माहौल खराब चल रहा है, मत ले जाओ इस बीमार गाय को इलाज कराने... मत जाओ... जाओ... पर आपने मेरी नहीं मानी... मेरी गैरहाजिरी में घर से उस गाय को लेकर निकल गए... ओ अल्ला... वही हुआ, जिसका मुझे शक था... या अल्लाह, ये कैसा माहौल है ?.... " वहां सड़क पर खड़े दूसरे लोग उस वृद्ध के बेटे के विलास को सुनकर समझ तो गए कि सच क्या था और क्या समझ के गौसेवा दल की भीड़ ने उस वृद्ध की जान ले ली। लेकिन किसी को इस सच से जैसे फर्क नहीं पड़ा, वे सब तमाशबीन बने रहे और फिर चले गए।

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राजस्थान का यह मामला अमन को हिला कर रख दिया। वह दफ्तर में ही इसके अवसाद में ऐसा डूबा जा रहा था कि कैबिन में आकर चपरासी ने दोपहर की चाय कब रख गया, उसे पता भी नहीं चला। चाय दोपहर से शाम तक वैसी ही पड़ी रही। ... शाम में दफ्तर को बंद करने का समय हो गया। एक एक करके अन्य अधिकारी व कर्मचारी दफ्तर से चले गए। चपरासी अधिकारियों के कैबिन बंद करते हुए जब अमन के कैबिन में घुसा, तो उसने अपने अमन सर को अब भी किसी सोच में बेसुध बैठा हुआ पाया। सब जा चुके थे तो अब उससे रहा नहीं गया। उसने आवाज दी - " सर जी... सरजी... सभी बाबू निकल गए हैं...!!! " तब जाकर कहीं जाकर अमन अपने अवसाद से बाहर आया- " हां - हां... निकल रहे हैं। " यह कहकर अपना बैग समेटने लगा। तभी उसने केबिन से निकलते हुए चपरासी से अचानक पूछ बैठा- " दशरथ, एक गाय की जान क्या इंसानों की जान से भी बड़ी होती है ? दशरथ एक अधेड़ उम्र का बहुत ही धार्मिक आस्था रखने वाला व्यक्ति था। वह रोज पूजापाठ करके तिलक लगाकर ही दफ्तर आता। उसे हिन्दू धर्म ग्रंथों को पढ़ने में भी रुचि थी, सो कई बार वह बातों बातों में धर्म - अधर्म के फर्क को धार्मिक कथाओं व प्रसंगों के माध्यम से समझाने की कोशिश करता सुनाई देता था। शायद इसीलिए अमन ने यह सवाल उससे पूछा था। लेकिन दशरथ इस सवाल से अचरज में था कि खुद इतने पढ़े लिखे अधिकारी हैं अमन सर और मुझसे ऐसा क्यों पूछ रहे हैं। दशरथ को चुपचाप सोचता देख अमन ने टोका - " क्या हुआ दशरथ, कोई जवाब नहीं सूझ रहा क्या ?" " ओ नहीं सर... इसमें जवाब क्या देना... इंसान की जान से बढ़कर आखिर किसी की जान क्यों होगी...।"

चपरासी दशरथ का जवाब सुन अमन ने उससे फिर कुछ नहीं कहा और अपनी सरकारी गाड़ी से क्वार्टर के लिए निकल गया। ड्राइवर गाड़ी चला रहा था और पिछली सीट चुपचाप बैठा अमन चपरासी की बात व राजस्थान की उस घटना में फिर खो गया। तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी। किसी अनजान नंबर से कॉल था- " हैलो... हैलो... नो...नो ... इट्स रांग नंबर...!" रांग नंबर का कॉल काटते हुए अमन ने देखा मोबाइल में फेसबुक एप्प के कई नोटिफिकेशन पड़े हैं। उसने कुछ नोटिफिकेशन को तो बिना देखे पढ़े ही स्वाइप करके हटा दिया, पर इसी क्रम में एक नोटिफिकेशन को भूलवश हटाने की बजाय क्लिक कर दिया। फेसबुक खुल गया और सामने फ्रेंडलिस्ट के एक अपरिचित मित्र का पोस्ट था। पोस्ट में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का एक विचार क्वोट करके लिखा हुआ था - ( " मैं खुद गाय को पूजता हूं यानी मान देता हूं। गाय हिन्दुस्तान की रक्षा करनेवाली है, क्योंकि उसकी संतान पर हिन्दुस्तान का, जो खेती प्रधान देश है, आधार है। गाय कई तरह से उपयोगी जानवर है। वह उपयोगी जानवर है इसे मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे। लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं। जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी, फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिन्दू, उपयोगी हैं। तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा ? क्या मैं उसे मारुंगा ? ऐसा करने से मैं मुसलमान और गाय दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा। इसलिए मैं कहूंगा कि गाय की रक्षा करने का एक ही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की खातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए। अगर वह न समझे तो मुझे गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं है। अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती है तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए। यही धार्मिक कानून है, मैं तो मानता हूं।") - पोस्ट के अंत में लिखा था- (हिंद स्वराज, पेज नंबर 32 से 34, प्रकाशक-नवजीवन ट्रस्ट)

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अमन को यह पोस्ट पढ़कर मानों थोड़ा सुकून मिला हो, उसने पोस्ट को दिल से लाइक किया। लेकिन तभी उसके दिमाग में फिर एक सवाल खड़ा हो गया- " गांधी जी के यह विचार तो दशकों पुराना है। हिन्द स्वराज पुस्तक की रचना तो बापू ने 1909 में की थी। तो एक सौ दस सालों बाद भी हमारे देश में लोगों की सोच में अबतक कोई परिवर्तन नहीं आया ? मानों पलभर के सुकून के बाद फिर उलझ गया था अमन। तभी उसे अपने ड्राइवर की आवाज सुनाई दी- " सर, क्वार्टर आ गया है।" ड्राइवर की यह बात सुनकर अमन एकबारगी मानों झेप सा गया - कि मैं आज कुछ ज्यादा ही अपने ख्यालों में उलझ गया हूं। कि पहले चपरासी और अब ड्राइवर को मुझे टोकना पड़ रहा है। वह तेजी से गाड़ी से उतरकर क्वार्टर के अंदर चला गया।

अमन ने क्वार्टर में आने पर हाथमुंह धोकर टीवी के सामने जा बैठा, ताकि दिमाग में चल रही बातों व उलझनों से खुद थोड़ा बाहर निकाला जा सके। इसीलिए उसने बाकी दिनों की तरह टीवी पर न्यूज चैनल न लगाकर मनोरंजन चैनल लगा दिया। दो एक घंटे टीवी देखने के बाद उसने टीवी देखते हुए ही डीनर किया। और कुछ देर बाद वह सोने के लिए अपने बेडरूम में चला गया। अमन को कुछ पल में ही नींद आ गई... लेकिन यह क्या !!! स्वप्न में भी वह फिर से अपने उन्हीं सवालों और उलझनों के बीच खुद को घिरा पाया। वह विचलित सा आकाश में खुद को उड़ता हुआ देख रहा है। उड़ते उड़ते वह एक ऐसे स्थान पर पहुंचता है, जहां का नजारा बेहद मनमोहक, सात्विक और आध्यात्मिक है। तभी वहां उसे कहीं से एक आवाज सुनाई देती है- " अमन, तुम क्यों इतने विचलित हो पुत्र ?" वह बड़े आश्चर्य चकित भाव से इधर उधर देखने लगा कि आखिर यह आवाज किसकी है ? पर उसे कोई भी ऐसा शख्स दिख नहीं रहा, जिसकी इतनी आत्मीय आवाज उसे सुनाई दी थी। वह कह उठा- " आप कौन हैं ? आप मुझे दिखाई क्यों नहीं देते ?" इतने में अमन के सामने एक अद्भुत प्रकाशपुंज प्रकट होता है। तब भी वह कुछ समझ नहीं पाता। वह फिर पूछता है- " आप कौन हैं ? आप मुझे दिखाई क्यों नहीं देते ?" तब वही आत्मीय आवाज पुनः सुनाई देती है -" पुत्र, मैं परमात्मा हूं... तुम किसे खोज रहे हो ?"
अमन हैरान होकर फिर पूछता है - " परमात्मा!!!, पर आप मुझे किसी रूप में दिखाई क्यों नहीं देते ? " 
" पुत्र, मैं तो निराकार हूं, मेरे रूप तो तुम स्वयं हो।"
अमन यह सुनकर काफी अधीर होकर फिर पूछता है - " तो फिर धरती पर भगवान के इतने रूप कैसे हैं ? कोई अपने भगवान को अल्लाह कहता है, तो कोई राम, कोई कृष्ण, कोई जीसस क्राइस्ट... ऐसा क्यों ?
" पुत्र ये सभी भी मेरे ही रूप हैं।"
अमन की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी, उसने फिर पूछा - " हे परमात्मा, तो फिर इन्हें मानने और पूजने वालों के बीच इतना बैरभाव, नफरत और वैमनष्यता कैसे कहां से पनप गए ? "
" पुत्र, यह बहुत दुखद पहलू है। इससे कई बार मैं भी आहत और निराश हो जाता हूं कि मैंने तो मनुष्य को बनाते समय कोई भेद भाव नहीं किया और न ही कोई अंतर किया तो ये आपस में इतने भेदभाव से क्यों भर गए।"
परमात्मा के इस उत्तर के साथ ही अमन का यह स्वप्न टूट जाता है और उसके कानों में क्वार्टर के रसोईए की आवाज पड़ती है, जिससे उसकी नींद भी टूट जाती है- "सरजी... सरजी... उठ गए क्या... चाय लाया हूं...।"
----समाप्त----

नाम : उदय केसरी
राज्य : झारखंड
जन्मतिथि : 01/07/1979
जन्म स्थान : बरही (जिला- हजारीबाग)

शिक्षा : मास्टर ऑफ जर्नलिज्म , माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि. भोपाल

संक्षिप्त परिचय : देढ़ दशक तक पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय रहने के पश्चात अब स्वयं के व्यवसाय में सक्रिय ह़ूं। कुछ कहानियां पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। एक अरसे बाद के विराम के बाद पुनः कहानी लेखन शुरू किया हूं।


पत्राचार का पता :
ग्राम + पोस्ट : बरही
निकट : सरकारी बस स्टैंड ( ह. बाग रोड ),
जिला : हजारीबाग
पिन : 825405 ( झारखण्ड )

ईमेल : uday.kesari@gmail.com

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रचनाकार: कहानी : " माहौल " - उदय केसरी
कहानी : " माहौल " - उदय केसरी
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