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राष्ट्रपिता बापू - गीता दुबे

आजादी एक ऐसी चीज है जो उपहार में नहीं मिलती, उसे हासिल करना पड़ता है। ब्रिटिश शासन से भारत को एक लंबी लड़ाई के बाद आजादी मिली, सत्य और अहिंसा के पथ पर चलकर राष्ट्रपिता बापू ने भारत को आजादी दिलाई। गाँधी जी ने अपनी आत्मकथा ‘सत्य पर मेरे प्रयोग’ में लिखा है कि मैं बचपन से ही सत्य का पुजारी रहा हूँ, मेरे लिए यह सबसे सहज और स्वाभाविक वस्तु है, यदि मैं बिलकुल अकेला भी होऊँ तो भी सत्य अहिंसा पर दृढ़ रहूँगा क्योंकि यही सबसे आला दर्जे का साहस है जिसके सामने एटम बम भी अप्रभावी हो जाता है। वे कहते हैं कि समान्यत: सत्य का अर्थ केवल सच बोलना ही समझा जाता है, जबकि विचार में, वाणी में और आचार में सत्य का होना ही सत्य है। इस सत्य को जो संपूर्णतया समझ लेता है, उसे जगत में दूसरा कुछ भी जानने को नहीं रहता क्योंकि सारा ज्ञान सत्य में समाया हुआ है। गाँधी जी एक ऐसे महापुरुष थे जिनका कर्म आज भी बोलता है उन्होने जितना कहा और जितना लिखा, उससे ज्यादा किया, उनका व्यक्तित्व सिर्फ और सिर्फ सत्य पर आधारित था। वे कहते थे ‘ मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’।

गाँधी जी का मानना था जीवन का अर्थ है- विकास, उन्नति, सबका सह विकास, जीवन का अधिकाधिक सह विस्तार, एक साथ समान रूप से सबका उदय। गाँधी के चिंतन में सिर्फ गति, प्रगति नहीं है, विशिष्ट दिशा में अपने मुकाम की ओर कदम बढ़ाते जाना प्रगति है। व्यवहार का आदर्श की ओर बढ़ना प्रगति है। यदि आदर्श के विरुद्ध गति होती है तो उसे प्रतिगति अथवा पतन कहेंगे। गांधीवाद एक गतिशील विज्ञान है, एक सतत विचार  प्रक्रिया है, जीवन और जगत को देखने की एक आध्यात्मिक निगाह है। गाँधी के आर्थिक चिंतन के केंद्र में ‘राष्ट्रीय आय’ का उत्पादन और ‘उपभोक्तावादी संस्कृति’ न होकर सिर्फ ‘मनुष्य’ है। गाँधी को ऐसी कोई व्यवस्था पसंद नहीं थी जो मनुष्य के लिए हितकारी न हो। गांधीवादी अर्थशास्त्र की मंजिल ‘सर्वोदय’ है, सर्वोदय का प्राण ‘अंत्योदय’ है। हमें दूसरे की कमाई नहीं खानी चाहिए, अपना भार दूसरे पर नहीं डालना चाहिए। हमें अपनी कमाई का तो खाना ही चाहिए लेकिन यदि हम दूसरे का धन किसी तरह से ले लें तो उसे अपनी कमाई नहीं कहा जा सकता। कमाई का अर्थ है- प्रत्यक्ष पैदाइश। ये दो नियम हम अपना लें तो सर्वोदय समाज का प्रचार दुनिया में हो सकेगा। सबका जीवन साथ-साथ सम्पन्न हो, यही सर्वोदय की आस्था है। भारतीय संस्कृति के बारे में गाँधी कहते हैं कि- मेरी द्दृ मान्यता है कि हमारी संस्कृति के पास जितने समृद्ध भंडार भरे पड़े हैं, उतने किसी के पास नहीं हैं, हमने अपनी संस्कृति को पहचाना ही नहीं, हम अगर अपनी संस्कृति के अनुसार नहीं जिये तो एक समाज के रूप में हम आत्महत्या की ओर अग्रसर होंगे।

प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्सटीन और बापू समकालीन थे, बापू के बारे में उन्होने कहा था कि गाँधी ने राजनीतिक क्षेत्र में भी मानवीय संबंधों की उस उच्चस्तरीय संकल्पना का प्रतिनिधित्व किया जिसे हासिल करने की कामना हमें अपनी पूरी शक्ति लगाकर अवश्य ही करनी चाहिए। बापू के मृत्यु पर आइन्सटीन ने अपने संदेश में कहा था कि वे सभी लोग जो मानवजाति के बेहतर भविष्य के लिए चिंतित हैं, वे गाँधी की मृत्यु से अवश्य ही बहुत अधिक विचलित हुए होंगे, अपने ही सिद्धान्त यानि अहिंसा के सिद्धान्त का शिकार होकर उनकी मृत्यु हुई, आइन्स्टाइन ने गाँधी के बारे में यह भी कहा था कि आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही यह यकीन करें कि ऐसा हाड़-मांस का व्यक्ति कभी इस धरती पर रहा होगा। 

गीता दुबे

जमशेदपुर, झारखंड     

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