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महात्मा गाँधी की वर्तमान में प्रासंगिकता (गाँधी जी की 150 वीं जयंती के विशेष संदर्भ में) - आलेख- दयानन्द अवस्थी


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आज से लगभग सौ वर्षों पूर्व महात्मा गांधी ने कहा था कि “हमारी धरती के पास प्रत्येक व्याक्ति की आवश्यकता के लिए तो बहुत कुछ है, पर किसी के लालच के लिए कुछ नहीं।” यह एक ऐसी उक्ति है जो आज भी प्रासंगिक है , गांधी एक व्यक्तित्व ही नहीं वरन एक युग प्रवर्तक विभूति थे युग दृष्टा थे ,आज पूरा जहान “विश्व अहिंसा दिवस” के रूप में उन्हें नमन करता है. गांधी जी के आदर्शों को अपनाने के लिए दुनिया के लोग तैयार हैं लेकिन किसके नेतृत्व में हो यह बड़ा प्रश्न बन गया है । इस सबके बीच समूचा विश्व, चाहे वह समृद्ध ‘उत्तर’ हो या विकासशील ‘दक्षिण’, एक अंधी दौड़ में लगा हुआ है। एक दौड़ साधन सम्पन्नता की है दूसरी दो जून की रोटी की जिजीविषा की है. ऐसे समय में गांधी जी के तीन "स्व" -स्वदेशी ,स्वराज और स्वावलम्बन की विशेष आवश्यकता है . यह आदर्श बताने का नहीं वरन आत्मसात करने का समय है । जब गांधी युग था उस समय की परिस्थितियों में उतनी सकारात्मकता नहीं थी संचार के माध्यम अधिक न हो पाने की स्थिति में सर्वोच्च आदर्श के उदाहरण देखने सुनने में नगण्य थे . किन्तु आज ऐसा नहीं है यदि कहीं सदाचार का पालन बेहतर हो रहा है तो उसके प्रसार की व्यवस्था है, मानना और जानना यह मनुष्य की इच्छा पर निर्भर हो गया है इसे ही महात्मा ने आंतरिक परिशोधन के माध्यम से आचरण में ढालने के लिए प्रेरित किया था. वर्तमान के वैश्विक आचरण का अंदेशा उन्हें था इसी वजह से वे अहिंसा के प्रति हमेशा अपना नजरिया स्पष्ट रखते रहे।

गांधी जी का मंत्र था कि जब भी कोई काम हाथ में लो, यह ध्यानन में रखो कि इससे सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति को क्या लाभ होगा। यदि हम स्वराज के व्यापक लक्ष्य् को प्राप्त करना और समावेशी विकास चाहते हैं तो हमें गांधी जी के इस मंत्र को अपने जीवन का आदर्श बनाना होगा।

मानव मात्र की खुशी ही गांधी जी की मूल कसौटी थी। इनका विचार था कि प्रगति को मानवीय प्रसन्नता के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वे समृद्ध समाज के ऐसे आधुनिक दृष्टिकोण में विश्वास नहीं करते थे, जिसमें भौतिक विकास को ही प्रगति की मूल कसौटी माना जाता है। वे, बहुजन सुखाय-बहुजन हिताय और सर्वोदय के सिद्धांतों में विश्वास करते थे। स्वराज के बारे में उनकी संकल्पना एक ऐसे समाज के बारे में थी, जिसमें प्रत्येक व्‍यक्ति को सम्माननपूर्वक जीवन बिताने और विकास के लिए समान अवसर उपलब्ध हों। उन्हों ने एक ऐसे समाज का विचार दिया जिसमें आर्थिक प्रगति और सामाजिक न्याय, हाथ से हाथ मिला कर चल सकें। गांधीजी का कहना था कि मेरी अहिंसा वह अहिंसा है जहां सिर्फ एक मार्ग होता है अहिंसा का मार्ग। उनका विचार था कि अहिंसा के मार्ग का प्रथम कदम यह है कि हम अपने दैनिक जीवन में सहिष्णुता, सच्चाई, विनम्रता, प्रेम और दयालुता का व्यवहार करें। बहुत ही छोटे संदेश में उन्होंने बड़ी बात कही थी ‘आप बंद मुट्ठी से हाथ नहीं मिला सकते हैं”.गाँधी जी नें अँग्रेजी की एक कहावत Honesty is the best policy (ओनेस्टी इज द बेस्ट पॉलिसी) पर कहा था नीतियां तो बदल सकती हैं और बदलती हैं। परन्तु अहिंसा का पंथ अपरिवर्तित है।

गांधीजी ने अपने विचारों में स्वराज्य के साथ आदर्श समाज, आदर्श राज्य अथवा रामराज्य का कई बार प्रयोग किया है, जो वास्तव में लगभग एक हैं। रामराज्य को बुराई पर भलाई की विजय के रूप में देखते हैं। स्वराज्य को वे ईश्वर के राज्य के रूप में मानते हैं क्योंकि उनके लिए ईश्वर का अर्थ है सत्य। अर्थात सत्य ही ईश्वर है- सत्य ही चिरस्थायी है। सत्य की व्याख्या करते हुए गांधी जी यह भी कहते हैं कि किसी विशेष समय पर एक शुद्ध हृदय जो अनुभव करता है वह सत्य है और उस पर अडिग रह कर ही शुद्ध सत्य प्राप्त किया जा सकता है। वे और आगे इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि सत्य की साधना आत्मपीड़न एवं त्याग से ही संभव है।

गांधीजी के विचार में सत्य, अहिंसा से ही जाना जाता है। सत्य के समान अहिंसा की शक्ति असीम और ईश्वर पर्याय है। सत्य सर्वोच्च कानून है और अहिंसा सर्वोच्च कर्तव्य। वे कहते हैं कि अहिंसा का तात्पर्य कायरता नहीं है। इन दोनों का अस्तित्व एक साथ संभव नहीं है। उनके लिए अहिंसा न केवल संपूर्ण जीवन दर्शन है बल्कि एक जीवन पद्धति है।

गांधी जी नें “स्वदेशी” अपनाने व स्व उद्यम हेतु हमेशा वकालत की इसीलिये उन्होंने प्रौद्योगिकी प्रधान उद्योगों या मशीनों द्वारा उत्पादन का विरोध किया तथा इसके स्थान पर श्रम प्रधान उद्योगों को वरीयता दी। उनके अनुसार उत्पादन लोगों द्वारा किया जाए, फैक्ट्रियों द्वारा नहीं। उन्होंने ‘श्रम-सिद्धांत’’ के अन्तर्गत यह शिक्षा दी कि प्रत्येक व्यक्ति को शारीरिक श्रम करके अपने उपभोग की वस्तुओं में योगदान देना चाहिए। चूँकि इसमें प्रत्येक प्रकार की सेवा या श्रम को एक जैसा सम्मान दिया जाएगा, इसलिए श्रम की गरिमा स्थापित होगी तथा वर्गीय भेद मिट जाने से ‘वर्गविहीन’ समाज की स्थापना हो सकेगी।

वर्तमान परिदृश्य में समूचे विश्व में प्लास्टिक एक कचरा और प्रदूषण का बहुत बड़ा संसाधन बन चुका है स्वदेशी सिद्धांतों के पालन में यदि देखा जाए तो मिट्टी के बनाए जाने वाले पात्रों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। इसी प्रकार स्वतन्त्रता आंदोलन में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के दौरान प्रमुख रूप से कपड़ों की होली जलाए जाने में विदेशी कपड़ा मिलों का प्रतिरोध ही था जिसका यदि आज अनुसरण किया जाए इसे पुनः अंगीकृत किया जा सकता है अभी सूती व खादी उच्च वर्ग के चलन मात्र तक ही सीमित है जबकि इसे जन सामान्य तक पहुँच बढ़ानी होगी। खादी ग्राम्योद्योग को बेहतर संसाधन उपलब्ध करा कर इनके पुनर्जीवन की ओर प्राथमिकता में ध्यान देना होगा। ऐसे सामय में जब स्व सहायता समूहों नें बड़े बड़े कार्य प्रारम्भ कर दिये हैं कोई कारण नहीं बचता की उन्हें इस तरह के कार्यों से बेहतर ढंग से न जोड़ा जाए। हालांकि स्वदेशी का मूल आंदोलन “बंग भंग” के समय का है किन्तु गांधी जी के स्वतन्त्रता आंदोलन में केंद्र बिन्दु बनने के बाद यह और परवान चढ़ा और जन स्वीकृति का कारक भी बना। तत्कालीन विचारक व क्रांतिकारी अरविन्द घोष, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, वीर सावरकर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय स्वदेशी आन्दोलन के मुख्य कर्ता-धर्ता थे।

गांधीजी ने 'हिंद स्वराज' में जिन विचारों को अपनाने पर जोर दिया है उन्हें उनके जीवन काल में अनदेखा किया गया लेकिन आज उनके महत्व को पूरे विश्व में स्वीकार किया जा रहा है। यह गांधी के विचारों की वैश्विक स्वीकार्यता का ही परिणाम है की आज पूरे विश्व में यदि किसी के नमसे सड़कें चौराहे व मूर्तियाँ हैं तो वो हैं गाँधी वो विभूति न होकर अब विचार बन गए हैं सबको आज उन विचारों को आत्मसात करने की जरूरत है तभी विनाश के कगार में खड़े विश्व को राहत मिल पाएगी। उनका यह वाक्य हर आदमी के जेहन में होना चाहिए- मानवता की महानता मानव होने में नहीं है, बल्कि मानवीय होने में है।

-दयानन्द अवस्थी रायगढ़ छत्तीसगढ़
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