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दर्द - डॉ आर बी भण्डारकर की लघुकथाएँ

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लघुकथा-

   (1) * सास और बहू *

                   -डॉ आर बी भण्डारकर.

सासू माँ अपने कमरे में, पति अपने ऑफिस चले गए; अकेली बैठी है नंदिता।

यह तो रोज का ही सिलसिला है।

एकाकीपन में सभी को याद आती है अपने छूटे हुए अपनों की, नंदिता को भी। किंतु आज नंदिता को कुछ अधिक ही याद आ रही है अपनी माँ की।

नंदिता जानती है कि वह दिन भर क्या काम करेगी, क्या पहनेगी ओढेगी, कब कहाँ कहाँ जाएगी

यह सासू माँ ही तय करती हैं,न पति किसी प्रकार का हस्तक्षेप कर सकते है और न कोई और दूजा।

सासू माँ से कैसे कहे मन की बात,मायके जाने की बात। बहुत ही सख्त स्वभाव है,सासू माँ का। अपने मन के विपरीत किसी की माँग,सलाह-मशविरा उन्हें कतई पसंद नहीं। बहू का बार बार मायके जाना या बेटे का बार बार ससुराल जाना उन्हें बहुत अप्रिय लगता है; उनका मानना है कि इससे प्रतिष्ठा कम होती है।

मायके जाने की इच्छा जब अत्यधिक बलवती हुई तो नंदिता पहुँच ही गयी सासू माँ रंभा के पास। डरती डरती बोली- "माँ जी,मुझे एक-दो दिन के लिए मायके भेज दीजिए न ; माँ की बहुत याद आ रही है। "

इतना कहकर वह सासू माँ के गले से लिपट गयी;उसके नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी।

सासू माँ एकदम शान्त। हाँ, नंदिता को यह अवश्य अनुभव हो रहा है कि उन्होंने उसे भींच-सा लिया है।

दोनों ओर निस्तब्धता है पर सासू माँ का मन अतीत में चला जाता है।

आज से लगभग 40-45 साल पहले का समय है। गौने के बाद वह ससुराल आ गई है। गाँव है,ग्रामीण-परिवेश,नियम,कायदे,परम्पराएँ ; सब पुरानी। डाकखाना, टेलीफोन जैसी कुछ भी सुविधायें हैं नहीं। जब से आई है, मायके की कोई खबर-अतर नहीं। ..... आज उसे अपने बापू, अम्मा और छोटे भाई मुन्ना की बहुत याद आ रही है।

मुन्ना ! अरे वह तो मुझसे ही चिपका रहता था दिन भर । रात को सोता भी तो मेरे ही साथ था !अब कैसा होगा? मेरे लिए रो तो नहीं रहा होगा?परेशान होकर कहीं अम्मा -बापू उसे डाँट तो नहीं रहे होंगे ?....सोचते-सोचते उसकी रुलाई फूट पड़ती है।

जब खूब रो चुकती है मन कुछ हल्का होता है तो सास के पास जाती है,बड़े आर्त्त स्वर में कहती है- "माँ जी, मुन्ना की बहुत याद आ रही है, अम्मा बापू की भी ,केवल एक दिन के लिए, मुझे मायके भिजवा दो माँ जी। "

सासू माँ फूट पड़ती हैं- "अभी दो ही महीने तो हुए हैं आये हुए,अभी से रट लगा दी मायके जाने की। ...मुन्ना की याद आ रही है !हुँ....कैसा होगा मुन्ना, अच्छा होगा, अपने अम्मा बापू के ही तो पास है।

....हाँ,कान खोलकर सुन लो,यह लभेरपन हमें पसंद नहीं है बिल्कुल। अब यही घर है,तुम्हारा,काम-काज में मन लगाओ; समझी । "

..............

जक्का खुलता है रंभा का। ....उसकी इकलौती बहू नंदिता अभी भी लिपटी हुई है उससे। लिपटी क्या खुद वही भींचे हुए है उसको।

..............

नहीं नहीं । उसने तो झेल लिया,लेकिन वह अपनी बहू का दिल नहीं दुखायेगी। आखिर जन्मदाता माता-पिता की याद क्यों नहीं आएगी ?उन्होंने जन्म दिया,पाला -पोसा। फिर माँ तो माँ ही होती है।

स्वर फूटता है- "हाँ बेटा जरूर भेज देंगे। शाम को रामू से पूछ लेंगे, उसे छुट्टी मिल जाये तो वह लेता जाएगा, नहीं मिल पाएगी तो रामू के दद्दा लिवाये जाएंगे। "

खुशी और गर्व की अकल्पनीय अनुभूति। बहू के आँसू बह रहे थे।

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लघुकथा-

    (2)   * दर्द *

                          -डॉ आर बी भण्डारकर.

ईश्वर ने सबकुछ दिया;रहने के लिए खुद का मकान है,जीवनयापन के लिए पति को पर्याप्त पेंशन मिलती है। बेटा सुयश है,सुंदर सी बहू नीता है और एक 4 वर्षीय तो दूसरा एक वर्षीय   दो प्यारे प्यारे पोते हैं। बड़ी प्रसन्न है,सविता।

उसके लिए यह और भी सौभाग्य  की बात है कि उसका एकमात्र बेटा एक नामी-गिरामी कम्पनी में इसी शहर में कार्यरत है।

पूर्वाह्न का समय है, बेटा अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए तैयार है।

"बेटा हेलमेट तो लगा ले; तुझ से रोज कहती हूँ और तू हमेशा अनसुना कर देता है। "

"माँ ऑफिस जाते समय तुम रोज किच-किच करने लगती हो। मैं तो बहुत सावधानी से बाइक चलाता हूँ,मुझे क्या जरूरत हेलमेट लगाने की?"

"जरूरत है। मैं माँ हूँ, किच-किच नहीं करती,अपने बेटे  के हित के लिए कहती हूँ। "

कुछ क्रोध की मुद्रा बनाये,बेटा बिना हेलमेट लगाए ही ऑफिस के लिए चला गया।

पति तो अपने पढ़ने लिखने में लगे रहते हैं। बहू ने बहुत विनम्रता से सविता कुछ काम सौंप दिए हैं। सविता भी प्रसन्न मन से उनका निर्वहन कर रही हैं।

सविता बैठक में अपने छोटे पोते को खिला रही है कि बहू की आवाज आती है- " मम्मी जी मुन्नू पार्क में खेलने जा रहा है। छुटकू को मेरे पास छोड़ दो और आप मुन्नू के साथ चली जाओ। "

यह तो रोज का ही काम है। घर पर रहो तब छुटकू को सम्हालो। फिर मुन्नू के साथ रोज पार्क जाओ।

मुन्नू  झूला झूलता है,फिसलपट्टी पर फिसलता है, उछलता-कूदता है, सविता पास में खड़ी होकर देखती रहती हैं कि मुन्नू कहीं गिर न जाय।

मुन्नू जब अन्य बच्चों के साथ दौड़ लगाता है तब सविता एक बेंच पर बैठ जाती हैं। ...भई,

अब उनकी भी उमर हो गयी, बच्चों के साथ साथ दौड़ना तो संभव नहीं।

अरे गजब हो गया;मु न्नू दौड़ते दौड़ते गिर पड़ा;सविता देख ही नहीं पायीं, जब रोने की आवाज सुनाई दी तब दौड़ कर गयीं।

"अरे, ड़ी ही तो चोट लगी है। ये ये...घुटना जरा सा छिल गया है। ..मेरा बेटा तो बहादुर है, कहीं ऐसे रोते हैं; चल घर टिंचर लगा दूँगी। "

दादी का स्नेह पाकर बच्चा चुप हो जाता है। दादी-पोता दोनों घर आते हैं।

"बहू  तुम्हारे फर्स्ट एड बॉक्स में टिंचर होगा,जरा देना मुन्नू को लगा दूँ। "

मुन्नू को लगी है यह जानकर ही बहू कुछ रुष्ठ सी होकर कहती है-"हुँह ! लो आप तो छुटकू को सम्हालो, मुन्नू को टिंचर मैं लगा दूँगी। "

सविता छुटकू को खिलाने लगती हैं, मुन्नू अपनी इनर्जी ड्रिंक लिए हुए बैठक में आकर दादी के पास बैठ जाता है। दादी-पोते के लिए यह उनकी रोज की दिनचर्या है।

सुयश आते ही नाराज होता है(लगता है कि फोन करके कान भर होंगे बहू ने )-"मम्मी तुम करती क्या हो, मुन्नू को भी नहीं देख सकती हो ठीक से ; निश्चित ही शर्मा आंटी से गपशप करने में लगी रही होगी, कितनी चोट लग गयी है मुन्नू को। "

"वाह बेटा ! तुम्हारे बेटे को जरा सी चोट क्या लग गयी,लाल पीले हो रहे हो। और जब तुम्हारी माँ अपने बेटे से हेलमेट लगाने को कहती है तो उसे "किचकिच" कहते हो। "

हमेशा चुप रहने वाले पति  से इतना सुनकर सविता सुकून की साँस ले रही थी।

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