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व्यंग्य - लिंचिंग बनाम पिंचिंग - प्रभात गोस्वामी

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देश में आजकल 'लिंचिंग' शब्द का बड़ा शोर मच रहा है . इसे 'मॉब' के साथ जोड़कर तरह-तरह के दावे किये जा रहे हैं . कोई कहता यह शब्द हमारी डिक्शनरी में नहीं, आयातित है . अब अंग्रेजी भी तो कौनसी हमारी मादरी ज़बान है ? पर, सौतेली मां की मानिंद हमें इशारों में नचाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही . हर तरफ 'मॉब लिंचिंग' पर बहस छिड़ी हुई है . जहाँ भीड़ के बीच कोई झूठ की फुसकरी छोडो, लोग किसी पर भी टूट पड़ते हैं . समरथ को नहीं दोष गुसाईं . आज आम आदमी अन्याय , शोषण , गुंडागर्दी के विरुद्ध कुछ भी नहीं बोल पा रहा . मन इसी कुंठा से भरा हुआ है . सुबह से शाम जब भी इस कुंठा को निकालने का मौका मिले तो किसी असहाय, निहत्थे व्यक्ति पर भीड़ की भीड़ टूट पड़ती है .

सच में ये हमारी परम्परा तो नहीं है . हमारी परम्परा 'लिंचिंग' की नहीं 'पिंचिंग' की रही है . इसके लिए किसी हथियार, थप्पड़-लातों की ज़रूरत नहीं होती. बस ज़ुबान की ज़रूरत होती है . आप तानों का पिटारा खोलकर , जलीकटी, लगीबुझी सुनाकर किसी को भी मुफ्त में ही चारों खाने चित्त कर सकते हैं . यहाँ पिंचिंग में 'हींग लगे न फिटकडी, रंग आए चोखो', वाली कहावत भी चरितार्थ हो जाती है . और, किसी न्यायिक लफड़े में फंसने की सम्भावना भी बहुत कम होती है . तभी तो सालों बीत जाने के बाद भी पिंचिंग यानि चिकोटी काटने की यह परम्परा बदस्तूर जारी है .

तभी तो हम हाथों से नहीं ज़ुबान से पीटते हैं , शब्दों के ऐसे व्यंग्य बाण चलाते हैं कि सुनने वाला खड़े -खड़े गिर पड़े . हाथों , लाठियों , तलवारों के घाव तो थोड़े समय की चिकित्सा से भर जाते हैं . फिर , इस मॉब लिंचिंग में लिप्त लोगों को थाने से लेकर जेल तक की यात्रा भी करनी पड़ती है . अब भीड़ में किस-किस ने आपको मारा इसका पता नहीं चलता . सो, आपके मन -मस्तिष्क में मारने वाले की छवि या छवियाँ अंकित ही नहीं हो पातीं . तब आपको पिटने का दुःख तो होता है पर उसका दीर्घकालीन पछतावा नहीं हो पाता .

पर, पिंचिंग का दर्द तो इतना घातक होता है कि यह जीवनभर सालता रहता है . चिकित्सा के क्षेत्र में नित नई खोज हो रहीं हैं पर पिंचिंग के दर्द और घावों को भरने के लिए या ठीक करने के लिए कोई मरहम या दवा अभी भी नहीं बनी हुई है . कविवर राजिया जी कह भी गए कि- शब्दों के बाण देखने में छोटे ज़रूर लगते हैं पर ये इतना गंभीर घाव करते हैं जो जीवनभर दुखते रहते हैं . इनका दर्द भी लाइलाज होता है . पुराने युद्धों में काम आने वाले बाण तो अब संग्रहालयों की शोभा ही बढा रहे हैं पर शब्दों के बाण आज भी जुबान पर भरे पड़े हैं . मौका मिलते ही ये बाण आदमी-औरत के जिस्म को छलनी कर देते हैं .

अब मॉब लिंचिंग तो दुर्भाग्य से कभी-कभी हो जाती है पर इसका शोर खूब होता है. . थोड़े दिन समाजसेवी, नेता, पत्रकार इस पर चर्चा करते हैं , सोशल मीडिया में इसके फोटो , लिंचिंग के शिकार व्यक्ति की दास्ताँ बयां कर फिर अगले मुद्दे को पकड़ लेते हैं और एक नई बहस चल पड़ती है . हमारे मित्र भरोसी लाल को इस सब का बड़ा दुःख है . वो कहते हैं कि हमारे देश में घर-घर में , सामाजिक मंचों पर , टीवी के परदे पर और अख़बारों, ट्वीटर आदि पर 'लिंचिंग', के मामले तो प्रमुखता से उठाए जाते हैं पर 'पिंचिंग', के मामले पर सब मौन हो जाते हैं . गोया ये लिंचिंग तो अब होने लगी है लेकिन ये पिंचिंग तो इस सभ्य समाज में सदियों से चल रही है . इसका दर्द तो आम आदमी से लेकर प्रभु श्री राम तक झेल चुके हैं .

हमारे समाज में दहेज़ न ला पाने वाली गरीब घर की बहु तो ससुराल में पहला कदम रखती है तभी सगे -सम्बन्धी उसे कितना-कितना पिंच करते हैं . रोज़ तानों की बौछार होती है - अरे , हमारा पढ़ा-लिखा बेटा ठग लिया गया , क्या इस दिन के लिए इसे पढ़ा-लिखा कर इतना योग्य बनाया था ? आजकल तो डॉक्टर , इंजिनियर , गजटेड ऑफिसर की बोली लगती है , दहेज़ की मंडी में ऊँचे दाम देने वाले लोग तैयार बैठे थे पर इसकी तो किस्मत ही फूटी थी जो भूखे-नंगों से पाला पड़ गया, ये ऊँची डिग्री लेकर अब साइकल पर ऑफिस जायेगा क्या ? एक कार तो आजकल कमज़ोर से कमज़ोर आदमी भी दे देता है . वगैरह-वगैरह . ये पिंचिंग सुबह से शाम तक गाहे-बगाहे चलती ही रहती है .

कहीं इस पिंचिंग के घातक परिणाम बहुओं को जलने , आत्महत्या करने को मजबूर कर रहे हैं , कहीं ग़रीबी का दंश झेलने वाले को जीवन भर - लो आ गए साले भुखमरे, जैसे शब्द बाणों से छलनी किया जाता है . कहीं बहरेपन तो कहीं नेत्रहीन को समाज के तानों से छलनी किया जाता है . शारीरिक विकार से ग्रसित लोग भी भद्रजनों की हंसी की लिंचिंग से दुःख के पहाड़ के नीचे दब कर सिसकते रहते हैं . स्कूलों, कोलेजों में रेगिंग के साथ पिंचिंग भी छात्रों के साथ खिलवाड़ कर रही है . क्या इस मॉब 'पिंचिंग' पर भी कभी निरंतर बहस होगी ?

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पूर्व संयुक्त निदेशक (समाचार ),

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग , राजस्थान

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखक , पत्रकार

15/27, मालवीय नगर , जयपुर (राज.)

3 टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शुक्रवार 11 अक्टूबर 2019 को साझा की गयी है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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