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लघुकथा वीडियो: "जेवर" | लेखक- सुरेश सौरभ | स्वर: शिव सिंह सागर | समीक्षा: डॉ० चंद्रेश कुमार छतलानी

सुरेश सौरभ जी द्वारा लिखी गयी और शिव सिंह सागर  जी द्वारा दिये गए स्वर में यह लघुकथा "जेवर" एक ऐसी मानसिकता को इंगित करती है जो महिलाओं ही नहीं बल्कि पुरुषों में भी अक्सर पाई जाती है। यह मानसिकता है - स्वयं को श्रेष्ठ साबित करनी की।

यह रचना एक विशेष शैली में कही गयी है, जब कभी भी समाज के विभिन्न वर्गों के विचार बताने होते हैं तो लघुकथा में वर्गों को संख्याओं में कहकर भी दर्शाया जा सकता है। इस रचना में भी वर्गों को जेवरों की संख्या के अनुसार विभक्त किया गया है। पहली महिला एक झुमके की, दूसरी झुमके से बड़े एक हार की, तीसरी अपने मंगलसूत्र की, चौथी पायल सहित तीन-चार जेवरों की बात करती है और उनके जेवरों की कीमत पहली महिला से प्रारम्भ होकर चौथी तक बढ़ती ही जाती है। पाँचवी स्वयं असली जेवर पहन कर नहीं आई थी लेकिन उसने भी अपने जेवरों की कीमत सबसे अधिक बताई और साथ में समझदारी की एक बात भी की कि वह उन्हें हर जगह नहीं पहनती है। एक झुमके से लेकर कई जेवरों से लदा होना महिलाओं के परिवार की आर्थिक दशा बता रहा है, जिससे वर्गों का सहज ही अनुमान हो जाता है। इसके अतिरिक्त यह लघुकथा एक बात और बताने में सक्षम है कि यदि जेवर खरीदे हैं तो कब पहना जाये और कब नहीं इसका भी ज्ञान होना चाहिए। हालांकि पांचवी महिला के अनुसार केवल घर में ही नहीं बल्कि मेरा विचार है कि विशेष आयोजनों में भी जेवर पहने जा सकते हैं।  आखिर जेवर हैं तो पहनने के लिए ही। लेखक जो संदेश देना चाहते हैं वह भी स्पष्ट है कि जेवरों की सुरक्षा भी ज़रूरी है। कई महिलाएं ट्रेन आदि में भी असली जेवर पहन लेती हैं जो कि सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं है।

-  डॉ० चंद्रेश कुमार छतलानी

3 प 46, प्रभात नगर

सेक्टर-5, हिरण मगरी

उदयपुर - 313002

राजस्थान

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