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कविता संग्रह - मोहन मोती - डॉ॰ मोहन सिंह यादव

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अराजकता

डॉ॰ मोहन सिंह यादव


किस रावन की गर्दन काटूँ , किसकी भुजा उखारूँ |
घर – घर रावन , पग – पग लंका |
इतने राम कहाँ से लाऊँ |1|

किस कालिया को नाथूँ , किस कंस को मारूँ |
घर – घर विषधर , पग – पग अजगर |
इतने कृष्ण कहाँ से लाऊँ | 2 |

किस पापी को मारूँ , किस को कारा डालूँ |
घर – घर पाप , पग – पग स्वार्थ |
इतने तारक कहाँ से लाऊँ | 3 |

किस कपूत को डाटूँ , किस को देश – निकालूँ |
घर – घर कपूत , पग – पग सबूत |
इतने श्रवण कहाँ से लाऊँ | 4 |

किस हिंसक को हराऊँ , किस कामी को डराऊँ |
घर – घर हिंसा , पल - पल काम |
इतने बुद्ध कहाँ से लाऊँ | 5 |

कितने अपराध गिनाऊँ , कितने अन्याय बताऊँ |
क्षण – क्षण शोषण , दिन – दिन दोहन |
इतने भीम कहाँ से लाऊँ | 6 |

कितने भ्रष्टाचार भगाऊँ , कितने रिश्वतखोर डुबाऊँ |
मन – मन दूषन , धन – धन पूजन |
इतने सुजन कहाँ से लाऊँ | 7 |

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हम भूल गये

पूरब को हम तो भूल गये ,
पश्चिम में हम तो घुल गये ,
हम अपने को ही भूल गये |


महलों में रहना सीख लिया ,
छ्प्पर में रहना भूल गये |


हम श्रृंगार की बातें कर ली ,
करुणा की बातें भूल गये |


आदर्श की बातें खूब चलीं ,
यथार्थ से मुँह को मोड़ लिया |
रोटी तो खाना सीख लिया ,
गेहूं के दाने भूल गये |


कुछ दर्द की बातें कर ली ,
दर्द में रहना भूल गये |


जीवन तो मेरा बीत रहा ,
जीवन क्या है भूल गये ?
कुछ यस नो करना सीख लिया ,
अपने आचार को भूल गये |


सीसे चश्मे खूब सराहा ,
असली आँखें भूल गये
कुछ प्रेम की बातें कर ली ,
हम प्रेम में जीना भूल गये |


पश्चिम के अंकल याद रहे ,
भारत के चाचा भूल गये |


मम्मी – डैडी याद रहे ,
माँ – बाप की ममता भूल गये |
अब पैंट – शर्ट में शान जमे ,
हम धोती – कुर्ता भूल गये |


घास – पात से दूर रहे ,
हम मनी – प्लांट में चूर रहे ,
मंदिर – मस्जिद याद रहे ,
मन ‘ मोहन ’ मंदिर भूल गये |

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मन की व्यथा

ये तो रात है किसी तरह कट ही जायेगी ,
दिन के उजालों के लिए मायूस हूँ |


ये तो बात है किसी तरह बन ही जायेगी ,
उन वसूलों के लिए लहूलुहान हूँ |


ये तो मौत है किसी दिन आ की जायेगी ,
जिन्दगी की सफर के लिए मोहताज हूँ |1|


ये तो औरों की महफिलें हैं रंगीन ही होंगी ,
मैं अपनों की महफिलों में अजनबी हूँ |


ये तो दिल की बात है , जुबां पे आ ही जायेगी ;
मनमीत मैं बनावट का विरोधी हूँ |


ये तो बददुआएं हैं गैरों से मिल ही जाएंगी ,
आप की दुआओं के लिए शुक्रगुजार हूँ


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बचपन

हे बचपन फिर तू आ जा ,
वे भोली भोली बातें हों ,
वे बात – बात में कसमें हों |


वे तुतली - तुतली बातें ,
कितनी प्यारी लगती हैं |


गमों – रंजों से दूर ,
निराली दुनियाँ होती है |


हम बूढे होते जाते हैं ,
ईर्ष्या – द्वेष में जीते हैं |


हम बड़े सामाजिक बनते हैं ,
और बड़े पाप ही करते हैं |


जब हम थे बचपन में ,
बड़े अजनबी लगते थे ,
पर धोखा कभी न देते थे |


हम मिट्टी , कंकड़ , पत्थर से,
चिथड़े , कपड़े ,गत्तों से ,
नीम की टहनी , पत्तों से ,
हम खेल जमाया करते थे |


न पैसों की मजबूरी थी ,
न दिलों की कमजोरी थी ,
प्रेम की हर बोली थी |


लेकिन अब ,युवक हैं रंगीले ,
भड़कीले और चमकीले |


बुड्ढ़े हैं हठीले ,
रसीले और नुकीले |


वे भावों की गहराई ,
हम बढ़ते की भर देते हैं |


हम बड़े नाज से कहते हैं ,
बच्चों – सी बातें मत कर ,|


पर यहीं भूल हम करते हैं ,
वे बच्चे दिल के सच्चे हैं |


हे युवक , बुड्ढ़े सीख ,
वे डॉक्टर हैं दिल के ,
हम रोगी हैं , वे योगी हैं |


हम खुद ही कालिख पोते हैं |
उनकी किलकारी भूलें हैं |


मैं मिट्टी की दीवारें , बचपन में दुलारे ,
मैं उसमें अधिक सुरक्षित था ,
अब दुनिया की दीवारें ,
मुझे करती है किनारे |


हे बचपन फिर तू आ जा ,
देख जवानी झूठी है |


तू मेरी मीठी मुलेठी है ,
तेरी अदा बड़ी अनूठी है |

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दोस्त के नाम पैगाम

फूल मुबारक हो प्रियवर ,
काँटों की नियत ठीक नहीं |


सम्भल के सुगंध , ले लेना ,
नाक की आदत ठीक नहीं ,
ऐ कली कभी तुम मत हँसना ,
भौंरे की हरकत ठीक नहीं |


गाँव की बुलबुल शहर चली ,
शहरों की शोहरत ठीक नहीं |


ऐ दोस्त दुश्मनी कर लेना ,
दोस्तों की रंगत ठीक नहीं |


यार कभी तुम मिल लेना ,
सावन की संगत ठीक नहीं
जब वक्त मिले तब रो लेना ,
साँसों की हालत ठीक नहीं |


जब दिल चाहे ठुकरा देना ,
प्यार की सांसत ठीक नहीं |


तुम दिल दीवाना मत करना ,
हर औरत की तबीयत ठीक नहीं |


तेरी युगल जवानी बनी रहे ,
पर कोई मुसीबत ठीक नहीं |


तेरी चमक चाँदनी बनी रहें ,
हर रात शरारत ठीक नहीं |


तुम मेरी उमरिया जी लो ,
मेरे उम्र की कीमत ठीक नहीं |


मैं बुझता चिराग – अपनी मजार ,
तूफान सलामत ठीक नहीं |


तुम सफर सुहाना कर लो ,
मनमीत कयामत ठीक नहीं |

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जीवन

जीवन एक पहेली है ,
कुछ समझे हैं , कुछ ना समझे ,
कुछ हँसते हैं , कुछ गाते हैं ,
कुछ रोते हैं , रुलाते हैं |


हम दिन रात गमों में रहते हैं ,
कुछ गम से खाली होते हैं ,
तो बड़े विषैले हँसते हैं |


कुछ रोते – रोते सोते हैं ,
कुछ गाते – गाते सोते हैं |


कुछ रंगीन नजारों में रहते ,
कुछ नजरों से भी गिरते हैं |


कोई गम में आहें भरता है ,
कोई प्यार की बातें करता है |


कोई पश्चिम पाँव बढ़ाता है ,
कोई पूरब में उलझता है ,
इस उलझन में ही सुलझन है ,
प्यार की सच्ची तड़पन है |


हम सोते गए , वह सुलाती गयी ,
हम ऊपर उठे , वह उठाती गयी ,
हम गिरते रहे , वह समझाती गयी |


हाय ! जिंदगी की अनोखी कहानी हुई ,
हम ना समझे यह गूढ़ पहेली हुई |

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जिन्दगी है अनोखी

जिन्दगी है अनोखी , बाँस की बाँसुरी ,
जो बजाता रहा , सुर मिलाता रहा ,
वही पायेगा राग की रागिनी |


जिन्दगी तो नदिया की धारा हुई ,
कुछ बहती गई , कुछ उलझती गई ,
कुछ किनारों से जा टकराती गई ,
अंत जा के समन्दर में मिल तो गई ,
कुछ न समझे अजनबी बन तो गई |


जिन्दगी तो दीपक की बाती हुई ,
कुछ जलती गई , कुछ जलाती गई ,
कुछ सिसकती गयी , कुछ तड़पती गई |


जिन्दगी एक पुस्तक की वस्तु हुई ,
हम पलटते गये , वह पलटती गई ,
याद करते रहे , वह भूलती गई |


जिन्दगी तो माँ की ममता हुई ,
हम रोते गये , वह मनाती गई ,
हम हँसते गये , वह हँसाती गई |


जिन्दगी अमीरी की खुशबू रही ,
जिन्दगी गरीबी की गुस्सा रही ,
हम मुस्कराते रहे , वह पीड़ित रही ,
हम ना पूछे की गम है क्या ?
वह न बोली , निरन्तर लजाती रही |

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आज का सत्य

हम शहरी हों या देहाती ,
सब में धोखा ही रहता है ,
कुछ अधिक चोरियाँ करते हैं ,
कुछ कम लुटेरे होते हैं ,
पर यही सत्य तो होता है ,
कि सभी चचेरे होते हैं |


कुछ अधिक दर्द तो देते हैं ,
कुछ कम दर्द कर देते हैं ,
पर अंतर क्या है ?
सभी दर्द तो देते हैं ,
सब प्रेम – प्रीति की बात करें ,
सब अंत में धोखा देते हैं |


कुछ आहें भरते मिलते हैं ,
कुछ हँसते – हँसते मिलते हैं ,
कुछ ठंडी हवा में बहके हैं ,
कुछ गर्म हवा में जलते हैं ,
सबकी यारों क्या कहना ?
हम धोखा ही में पलते हैं |


छोटा हो या बड़ा हो ,
सब सत्य एक सा होता है ,
कुछ सत्य आप के पास है ,
कुछ सत्य हमारे पास |


पर फरेब यह क्यों ?
कुछ झूठ हमारे पास है ,
कुछ झूठ आप के पास |


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आँसू

आँसू की नहीं जवानी होती है ,
और नहीं बुढ़ापा होती है ,
सिर्फ उम्र का अन्तर है ,
कुछ खुशी के आँसू बहते हैं ,
कुछ गमों से बोझिल होते हैं ,
बचपन के आँसू हुए एक ,
युवा के आँसू हुए अनेक ,
वृद्धों के हैं , बहुल – विशेष |


आँसू में आग होती है ,
आँसू में प्यास होती है ,
आँसू से सृष्टि होती है ,
आँसू से वृष्टि होती है ,
आँसू का चक्र अनोखा है ,
देता मानव को धोखा है |


मन ‘ मोहन ’ क्यों भटकता है ?
जीवन - आँसू की घनता है |

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हमसफर .


ये दिल तू जवां है , तेरी जवानी का क्या |
हर दिल झुक गया , तेरी पानी का क्या ||

जवां हो हर जख्म , नया करते हो |
थम जा , बेहिसाब किये चलते हो ||

ये दर्द देने वाले , दवा भी दिये जा |
बहुत मुश्किल हो गया , मैं दीवाना हो गया ||

जिन्दगी बहुत कुछ है , हम भूल जाते हैं |
हम उधर जाते हैं , जिधर भूल जाते हैं ||

हम तनहा ही काटे हैं , दिन इंतजार के |
कभी तो मिल लिया करो , बिना प्यार के ||

झूठा ही सही , इकरार कर लो |
फूल ना सही , काँटे ही दे दो दिल को ||

एक मुद्दत के बाद , मुस्कराये हो |
फिर धोखा या प्यार का इरादा है ||

जवानी जिन्दाबाद तो , जहर की जरूरत नहीं होती |
जहर की हकीकत , मुसीबत में होती है ||

आंसुओं के डर से , मैंने भी रोना छोड़ दिया |
दुनिया के डर से , तूने भी मिलना छोड़ दिया ||

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