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पांच लघुकथाएं -सुरेश सौरभ

     1- जंगल 

  कहीं से एक पंछी उड़ता हुआ एक जंगल में दाखिल हुआ और एक पेड़ की डाल पर बैठकर जय श्रीराम जय श्रीराम बोलने लगा। उसकी आवाज को सुनकर जंगल के तमाम दूसरे पंछी आश्चर्यचकित रह गए और उस पर यकायक हमला बोल कर मार दिया।

     कुछ दिनों बाद उस जंगल में एक पंछी फिर आया और अल्लाह-हू-अकबर कहने लगा उसे देख कर जंगल के सारे पक्षी फिर आश्चर्यचकित हो गए और सोचने लगे,यह कौन पक्षी है जो अजीबो-गरीब तरह से बोल रहा है, ऐसा न हो हमारी जान जोखिम में पड़ जाए। उसे अपने लिए खतरा समझा और फौरन हमला बोलकर खत्म कर दिया। इस जंगल में इंसानों की भाषा, ईश्वर की भक्ति और नाम को समझने वाला कोई न था। इसलिए जो भी गलती से इंसानों का रटाया पंक्षी यहॉ पहुंचता उसे मार दिया जाता, क्योंकि यह जंगल था। शहरी भाषा और संस्कारों को यह जंगल न समझता था।

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  2- पाप-पुण्य

        पूरे गांव में हलचल थी। प्रधान जी ने छोटी काशी भेजने के लिए ट्रैक्टर-ट्राली का इंतजाम करा दिया ,साथ में खाने-पीने का भी इंतजाम था। सभी कांवरिये और शिवभक्त जाने को तैयार थे। शीलू और शीतल किशोरियॉ भी जाने को तैयार थीं। सभी ने कहा-इन दोनों किशोरियों को अगर शिव-पार्वती बना दिया जाए तो बेहतर रहेगा,और अगर वे ट्राली में बंधे डीजे पर डांस करते हुए चलेंगी तो बहुत ही भक्तिमय माहौल हो जायेगा।

     किशोरियों की मॉ ने कहा-अगर सड़क पर नाचते गाते हुए चलेंगीं ,तो लोग क्या कहेंगे। उनकी चिंता पर पानी फेरते हुए भले लोगों ने कहा, "अरे! भाई ये तो पुण्य का काम है। बड़े भाग्यशालियों को ऐसा मौका मिलता है।

      ट्राली चली। उसके पीछे कांवड़िये और सारे भक्त उछलते-कूदते चले... और डीजे पर नाचते हुए शंकर पार्वती भी चले ।

       दूसरे दिन छोटी काशी से ट्राली लौटी । शंकर-पार्वती फफकते हुए अपनी मां से लिपट कर रोने लगे। मॉ ने बड़ी मुश्किल से उनकी व्यथा पता की ,फिर चीख-चीख कर गरियाने लगी-अगर कोई नालायक कांवडियॉ मेरे दरवाजे आ गया तो जूतों से बात करूंगी । उसकी आवाज सुनकर अडो़सी-पड़ोसी आ गये पूछा-क्या हुआ?

   मां बोली-दोनों बेटियॉ छोटी काशी से पुण्य कमा कर आईं हैं ,वही सब चीख-चीख कर बखान कर रही हूं।

  पड़ोसियों ने कहा-इसमें चीखने की क्या जरूरत है? और कांवरियों को गरियाने की क्या जरूरत है ?

         मॉ ने कहा-मेरा बस चलता तो सारे कावडियों को कच्चा खा जाती। ऐसा पुण्य बेटियों को दिया है जिसे न मैं निगल सकतीं हूं, न उगल।

3-राक्षस  

       एक राक्षस झाड़ियों के बीच से जा रहा था, तभी उसे कुछ शोरगुल की आवाज सुनाई पड़ी। वह उधर बढ़ता गया, बढ़ता गया। तभी एकदम से कुछ गुथते-मथते  इंसानों को देख ,हैरान हो गया। वे इंसान एक मासूम बालिका को नोंच-नोंच कर खा रहे थे। बालिका कातर स्वर में चिल्ला रही थी। यह देख कर वह बेहोश हो गया। कुछ घड़ी बाद मर गया। जब उसकी आत्मा ईश्वर के पास पहुंची तब ईश्वर ने कहा-तुम बेटाइम कैसे मर गये।

      राक्षस की आत्मा बोली-हे!भगवान आप ने छोटी-छोटी  बच्चियों को नोंचकर खाने वाले ये भयानक इंसानी राक्षस कब पैदा किए? जिन्हें देख कर ही मैं भय से मर गया।

      ईश्वर उस‌ आत्मा की टीस-दर्द सुनकर कर शून्य में खो गए। फिर उनका चेहरा शर्म से मुरझा कर लटक गया।

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4-नकाब

       आज वकील साहब कचेहरी से लौटे तो बहुत उदास थे। उनका लटका चेहरा देखकर पत्नी ने बड़े आहिस्ते से पूछा-क्या हुआ आज आप बहुत दुःखी लग रहे हैं।

     वकील साहब बहुत नरम लहजे में बोले -तुम सही कह रही हो सोनम। आज मुझे झूठ बोल कर बड़ा दुःख हुआ।

    सोनम-हुंह ! इसमें कौन नई बात है। आप तो रोज ही झूठ बोलते हैं। यही तो आप का पेशा है।

    "पर आज के झूठ से बहुत दिल दु:खा है।"

      " कैसा झूठ पूरी बात बताओ जी।"

     "आज एक कार्यक्रम में जाना हुआ। वहां सब वक्ताओं को मां पर बोलना था। मैंने कहा,मेरी मां बहुत गुणवान, चरित्रवान और संस्कारवान थीं।"

   " ये तो आप मुझसे भी कहते रहे हैं। इसमें क्या झूठ।"

     "दरअसल, मेरी मां बचपन में हम तीन भाई-बहनों को छोड़ कर एक पड़ोसी के साथ भाग गईं थीं। तब बड़ी मुश्किल से मेरे पिता ने हमारी परवरिश की।"कहते-कहते वकील साहब का गला भर्राने लगा, सिर झुक गया और पैरों के नाखूनों से जमीन कुरेदते हुए अपनी भर आईं आंखों को पत्नी से छिपाने लगे। तब पत्नी उनके करीब आ गईं और ठोढ़ी से उनका सिर ऊपर उठाकर उनके आंसूओं को पोंछते हुए फफक पड़ी। वकील साहब पत्नी को अंक में भरते हुए, सिसकते हुए बोले-सोनम मुझे माफ़ करना। मैं बहुत सालों से, तुमसे यह झूठ बोलता रहा ,पर आज अपने दिल पर रखा सारा बोझ मैंने उतार दिया। सारा दर्द मैंने बहा दिया।"

    पत्नी के, समझ में नहीं आ रहा था कि पति पर गुस्सा करें या मनुहार ,पर जो भी हो आज से वकील साहब सच बोलने लगे। उनकीं आंखों में भी पानी है, यह सोच कर उसका अंर्तमन और पूरा तन पुलकित हो रहा था।

5-मीटिंग

    अंदर हाल में मॉब लींचिंग रोकने के लिए बड़े साहब अपने अधीनस्थों को समझा-बुझा रहे थे। चपरासी श्यामू चाय-पानी देने के लिए बार-बार अंदर जाता-आता, फिर बाहर बैठ कर सुस्ताने लगता।

    जब दो घंटे बाद मीटिंग खत्म हुई,सब जाने लगे तब बड़े साहब श्यामू के करीब आए और सौ रूपए उसे थमाते हुए बोले-आज बड़ी लगन से काम किया तूने।"

      नोट थामते हुए श्यामू की आंखें जगमगा उठीं,और कृतज्ञता से बोला-जब भी आगे ऐसी मीटिंग हो तो साहब जी बस हमें याद करना। सर के बल दौड़ते आ जाऊंगा।"

     साहब नि:शब्द होकर अपनी गाड़ी की ओर चल पड़े। अब गाड़ी का गेट खोलते हुए मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।

     साहब की गाड़ी चली गई। अब श्यामू की आंखों की चमक कई गुना बढ़ चुकी थी।


लेखक-सुरेश सौरभ

निर्मल नगर

लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश पिन-262701


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