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लघुकथा - सम्मान की रक्षा - -ज्ञानदेव मुकेश

       सम्मान की रक्षा

हमारे शहर में जलेबी की एक बड़ी मशहूर दुकान थी। उस दुकान की रस-भरी केसरिया जलेबियों की खुशबू सभी का मन मोह लेती थी। शाम होते ही वहां जलेबी-प्रेमियों का रेला लग जाता।
  एक शाम हमारे घर पर कई मेहमान पधारे हुए थे। मैं उन्हें रस-भरी जलेबी का आनंद दिलाने के लिए उस दुकान पर गया। बड़ी मशक्कत के बाद एक किलो जलेबी खरीद पाया। हाथ में जलेबी का ठोंगा लिए आगे बढ़ा, तभी एक छोटा लड़का हाथ में गुब्बारे लिए मेरी तरफ दौड़ा आया। वह मुझसे गुब्बारे खरीदने का अनुनय-विनय करने लगा। उसने कहा, ‘‘साब, मुझे जलेबी खाने का मन कर रहा है। मेरे पास पैसे नहीं हैं। एक गुब्बारा खरीद लो न!’’
मैं जल्दी में था। मैंने मना किया और पिंड छुड़ाकर आगे बढ़ा। तभी मेरे ठोंगे से दो जलेबियां अचानक नीचे गिर पड़ीं। यह देख, वह लड़का तेजी से लपका और उसने धूल-सनी दोनों जलेबियां झट से उठा लीं। उसकी आंखें चमकने लगी थीं। उसने धूल झाड़कर जलेबी खाने के लिए मुंह खोला। मुझसे यह देखा नहीं गया। मुझे लगा, गुब्बारा न खरीदकर मैंने भूल की है। मैं ग्लानि से भर उठा। मैं दौड़कर उसके पास गया और जलेबियां छीनकर नाले में फेंक दीं। मैंने कहा, ‘‘नीचे गिरी हुई गंदी जलेबियां नहीं खाते। अपने सम्मान की रक्षा करो। मुझे एक गुब्बारा दो और नई जलेबियां खरीदकर खाओ।’’
उसके चेहरे पर प्रसन्नता फिर खिल उठी थी। उसने गुब्बारा देकर पैसे लिए और जलेबियां खरीदने दौड़ पड़ा। उमंग से भागते उसके पांव देखकर मेरे मन में भी उल्लास भर गया। मुझे लगा, मैं अपराध-मुक्त हो गया हूं।
 
                                                -ज्ञानदेव मुकेश                          
                                  पता-
                                              फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                              अल्पना मार्केट के पास,
                                              न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                               पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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