नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

एक अनार सौ बीमार - शाइर जस राज जोशी “लतीफ़ नागौरी”

clip_image002


कई सालों पहले नाथद्वारा मंदिर के गुसाइजी महाराज ने सोचा कि, ‘श्री कृष्ण के भक्तों की संख्या बहुत है, इन भक्तों में बेचारे भीलों को प्रसादी कभी मिलती नहीं। अत: हमें उनको प्रसाद वितरण ज़रूर करना चाहिए।’ इस तरह उन्होंने दीपावली के दूसरे दिन का समय तय किया और भील-समाज में घोषणा करवा दी कि, ‘इस दिन सभी भीलों को महाप्रसाद वितरित किया जाएगा।’ इस तरह उन्होंने इस महाप्रसाद को ‘अंकुट’ का नाम दिया। जिसमें मीठे चावलों का भोग रखा गया। निर्धारित समय पर गुसाइजी महाराज ने मंदिर के चौक में बड़े-बड़े भगोलों में मीठे चावल का महाप्रसाद रखवा दिया, फिर उन्होंने अपने सेवादारों को इन लोगों को प्रसाद वितरण करने का हुक्म दे डाला। बेचारे सेवादार कब-तक महाप्रसाद वितरण करते..? यहाँ तो इन भीलों की तादाद कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही थी। यह तो मामला ऐसा रहा, जैसे किसी गाँव में कोई महामारी फ़ैल गयी हो, और इन रोगियों के इलाज़ के लिए वहां एक-मात्र डॉक्टर हो। बस, यही हाल वहां रहा..बांटने वाले कम और प्रसाद लेने वाले टिड्डी-दल की तरह। राम-राम करके उन वितरण करने वालों ने यह प्रसाद बांटने का काम निपटाया। बाद में सभी सेवादार हाथ जोड़कर गुसाईजी महाराज के सामने खड़े होकर कहने लगे “महाराज। अब बस करें, अब आगे से यह प्रसाद वितरण वाला काम हमसे न होगा।” तब पास खड़ा भीलों का सरदार हँसता हुआ बोल उठा “वाह भाई, वाह। आपके लिए तो यह काम ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली बात हो गयी। अब आप ऐसा कीजियेगा, आगे से महाप्रसादी का चावल बड़े-बड़े भागोलों में डालकर इसी चौक में रखाव देना, हम-सब मिलकर प्रसाद को लुट लेंगे। आप फ़िक्र न करें, एक चावल का दाना आपको ज़मीन पर पड़ा नहीं मिलेगा।”

भीलों के सरदार की बात मान ली गयी, तब से दीपावली के दूसरे दिन तड़के महाप्रसादी के चावल चौक में रख दिए जाते हैं, और अचरज की एक ही बात रहती है न मालूम कहाँ से हज़ारों की संख्या में भील वहां आकर उस प्रसाद को लुट लेते हैं और चावल का एक भी दाना ज़मीन पर वे नहीं गिरने नहीं देते। आज़ शहर में रहने वाले भक्त प्रसाद को जूठा छोड़ देते हैं मगर जंगलों में रहने वाले श्री कृष्ण के भील भगतों के लिए प्रसाद का एक-एक दाना उनकी श्रद्धा का प्रतीक बन जाता है। यानी, वे एक दाना ज़मीन पर न गिराकर प्रसाद का अनादर नहीं करते।

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.