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नवगीत - अविनाश ब्यौहार

नवगीत

फूलों को घाव मिले


काँटों को ताज।

पुष्पित पल्लवित
हो गया फरेब।
अब विशेष गुण
हो गया है ऐब।।

पंछी भी भूल गए
भरना परवाज।

मँझधार में
फंसने लगी नाव।
जीवन में आ
गया है बिखराव।।

सपनों के माँडव पर
गिरती है गाज।

खुशियों की महफिलें
गमगीन हैं।
मावस की रातें
क्यों हसीन हैं।।

पड़ती है खोखली
सुरीली आवाज।

अविनाश ब्यौहार

नवगीत

महानगर में हमनें


घरौंदा बनाया।
पर हमें गाँव खेड़ा
बहुत रास आया।।

ताल, अमराई,
मेड़ रही है।
पुरवा निगोड़ी
छेड़ रही है।।

कभी न किसी पे पड़े
दुर्दिन का साया।

कोलाहल, भीड़ है,
  दंगे हैं।
तनिक सी बात
में अड़ंगे हैं।।

जाड़े में धूप की
ठिठुरती है काया।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.

नवगीत

कतर दिए हैं पर


वादे वफाओं के।

तन पर पड़ते
जाड़े के कोड़े।
हैं गद गद अलाव
थोड़े थोड़े।।

दौड़ रहे सरपट
घोड़े हवाओं के।

मंत्र मुग्ध सी
निगोड़ी शाम है।
डाकिया ले आया
पैगाम है।।

कंठ अवरुद्ध हैं
कोकिल सदाओं के।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.

नवगीत

कानों में


गूँज रहे
वंशी के स्वर।

पंछी का दल
उड़ चला
आकाश में।
गाछ को लता
बाँधे हुए
पाश में।।

छाया सा
सिमट गया
अनजाना डर।

गलियों में
चहल पहल
राम राम है।
ठंड से
ठिठुरती ये
सुबह शाम है।।

खुशियों से
लबालब हैं
आठों पहर।

अविनाश ब्यौहार


नवगीत

फूलों का


खिंचा हुआ
बाग में चँदोवा।

पंखों पर
तितली के
गंध की सवारी।
है शेफाली
के फूलों की
छवि न्यारी।।

गुलाबों की
क्यारी का
अनोखा सँजोवा।

बंगले ने
कब से
पामेलियन पाले।
गली गली
घूम रहे हैं
फेरीवाले।।

रखा होगा
तौल के
तराजू पर चोवा।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.


नवगीत

अमराई में


कोयल करे
मुनादी।

महुआ, टेसू, सेमल
डरे डरे।
झरबेरी के
कोई कान भरे।

मानो पीपल
बना हुआ
है खादी।

खुशियों का है
सूबा तलबगार।
हैं अनमयस्क से
दिखते चिनार।

ढूंढती अमन को
कश्मीरी वादी।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.

नवगीत

लागू सभ्यता पर


जंगल का कानून

लूटपाट,
होती हैं
हत्यायें।
जीवन को
जो कि
मुहाल बनाएं।।

मानवीयता का
सफेद हो गया खून।

उम्मीदों पर
क्यों हमले होते।
है भय की शाखा
उल्लू रोते।।

हिस्से में
मजदूर के
आए दो जून।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.


नवगीत

लगता है


मरुथल-
रेत का बिछौना।

दूर दूर
तक नहीं
दिखता है जल।
नजर नहीं
आ रहे
पंछी के दल।

ब्यर्थ है
यहाँ-
हरियाली का बोना।

दिखते केवल
ऊँटों के-
काफिले।
इसी टोह में
आबशार-
तो मिले।

वक्त गोया
मुट्ठी की-
रेत होना।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.

नवगीत

है अथाह


जलराशि
प्यासी है प्यास।

ज्वार भाटा
सौंदर्य है
सागर का।
दुःख सुनता
कौन छूछी
गागर का।।

नखत हैं
फिर भी
सूना सा आकाश।

चक्षु में
आँसू-
सीपी में मोती।
दूर कहीं
आज-
पुरवाई रोती।।

सपनों पर
दुर्दिन-
फेंकता है पाश।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.


नवगीत

सुबह खड़ी होगी


लेकर-
रंग उदासी के।
न जाने
उल्टे प्रभाव क्यों
जटामासी के।।

सूरज बोता
है अंधेरा।
बदल रहा
उजियारा डेरा।

बने विधायक
पुत्र हैं-
महलों की दासी के।

भूखे, नंगे
गाँव अभागे।
महानगर सीमाएं
लाँघे।

आज दौलत
चरण चूमती
शहरवासी के।

अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.

रायल एस्टेट कटंगी रोड
माढ़ोताल जबलपुर

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