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"धर्मराज की अनुज भीमसेन से गुप्तगू " - सुखमंगल सिंह

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(सुखमंगल सिंह)

"धर्मराज की अनुज भीमसेन से गुप्तगू "
कलयुग आने वाला मान,
घोर निशा और अन्धकार,
चंचल -चपल बह रही  बयार,
सबके सब संसय दुःखहाल।
             भाग्य का झटका  पटका,
              कवि हूँ मैं सरयू-तट का !

  सूर्य - किरणों का पता नहीं,
   अंधकार गहन  छटा नहीं,
   द्वारिकापूरी अर्जुन को भेजा,
   उनकी खबर  मिली नहीं।
           बीता कइयों मॉस उनका,
            कवि हूँ मैं सरयू-तट का!

क्रोध- लोभ -असत्य   बढ़ा, 
क्रिया कर्म सब उलटा -पुल्टा,
पापपूर्ण व्यापार बढ़ा - चढ़ा,
झगड़ा सबके सर पर चढ़ा। 
         हाल ज्ञात न उस नटखट का,
               कवि हूँ मैं सरयू-तट का !

भाई -भाई,पति -पत्नी लड़ते,
आस-पास में सभी झगड़ते,
बढ़ा लोभ - मोह - अत्याचार,
अपशकुन खड़ा सबके द्वार। 
         शब्द -अर्थ भी हुए खट पट का,
                कवि हूँ मैं सरयू-तट का !
   
लोभ -दम्भ अधर्म बढ़ा,
क्रिया की गति विकराल कड़ी,
ऋतुओं की चाल अनपढ़ी,
घर परिवार में अनबन खार,
             जीव जंतु का मन  भटका,
                कवि हूँ मैं सरयू-तट का!
 
मित्रों से मिलने गया था पार्थ,
श्री कृष्ण का लेने हाल -चाल,
धर्मराज ने अनुज से बोला,
भीमसेन बात सुनो अकेला।
          युधिष्ठिर का मन भटका भटका,
                     कवि हूँ मैं सरयू-तट का!
  
प्रकृति अरिष्ट को सूचित करती,
अपशकुन दीखता डगर  नगर ,
अब तो लगने लगा है मुझको,
सांप और बिच्छू से डर।
        मोह में बुद्धि, से  होगा खटका,
              कवि हूँ मैं सरयू-तट का!

बायीं आँख फड़क रही ,
लगेगा माना कोई झटका,
भुजाओं में धड़कन भारी ,
बढ़ा जगत में बड़ा लटका। 
        राज्य और राजा को खटका,
             कवि हूँ मैं सरयू-तट का !
 
सूर्य उदय में कुछ अड़चन पड़ा,
हवा का झोंके पर झोंका चला,
   कुत्ता रट में रोते  हुए खड़ा,  
घोर अन्धेरा माथे पर चढ़ा। 
               नर - नारी का जीवन अटका,
                     कवि हूँ मैं सरयू-तट का!

मूर्ति रो रही देवताओं की,
हिलती - डुलती चाल हाल,
श्री हीन आश्रम  हो रहे , 
शहर बगीचे और गांव।
           दिख रहा  कुदरत का झटका,
                 कवि हूँ मैं सरयू-तट का !
 
भयंकर उत्पातों पर मनन ,
युधिष्ठिर करने  लगे  चिंतन,
देखकर  उत्पात बढ़ी उलझन,
देखते  लोग दूसरे का तन मन।
        ध्यान- ज्ञान सबका भटका,
           कवि हूँ मैं सरयू-तट का!

कुत्ता निर्भय हो खुद से,
मेरी  ओर  देख चिल्लाता,
लगने लगा है मुझको ,
कुदरत कहर बरसने  वाला। 
         लगेगा इससे सभी को झटका,
                कवि हूँ मैं सरयू-तट का!

गाय और अच्छे पशु भी,
मुझे बायें करके चलते, 
दाएं रखते है वे पशु ,
जो गधे जैसे ही हों।
        सोच यह मन उलझा खटका,
             कवि हूँ मैं सरयू-तट का !
 
घोड़े - वाहन देख मुझे रोते,
और सियारिन  मुझे देख रोती,
उल्लू और प्रतिपक्षी कौआ,
रात में कठोर शब्द सुनाते। 
           सुख - दुःख सबका घट अटका,
                  कवि हूँ मैं सरयू-तट का !

बादल गरज रहे जोर -शोर ,
काँप उठी पृथ्वी - पहाड़ ,
बिजली गिरती धरा पर ,
धूलि का चारों ओर अम्बार। 
              गृह का अनकहा यह झटका
                    कवि हूँ मैं सरयू-तट का !

ग्रह -नक्षत्र की टकराहट घोर
मचा रहा दुनिया में शोर
सूर्य की प्रभा मंद पड़ रही
आंगन अन्धेरा और रोर
               आफत का बड़ा है लटका,
                 कवि हूँ मैं सरयू-तट का !
 
सूर्य -चन्द्रमा के चारों ओर,
मंडल -तारों  का फैला जोर ,
दिशाएँ हुईं  धुंधली धुंधली,
मुंह से निकलती है आग।
                  विवेकी मानव भी भटका,
                   कवि हूँ मैं सरयू-तट का !
 
भूतों की घनी भीड़  में पृथ्वी,
  नदी नद तालाब छुब्ध हो रहे,
अंतरिक्ष में लगी आग ,
भयंकर काल कलिकाल ?
             हालत देख सबका मन खटका ,
                    कवि हूँ मैं सरयू-तट का !

घी से आग नहीं जलती,
बछड़े भी दूध नहीं पीते,
और गौवें  दूहने नहीं देती,
बैल बैठे हुये सभी उदास। 
              प्रकृति का लटका - झटका ,
                कवि हूँ मैं सरयू-तट का !

उत्पात से उलझन सबको ,
शहर बगीचे गाँव ,
श्री चरण कमल बिना,
भाग्यहीन भूमि, गगन, ठाव।
              कलिकाल चढ़ा शर था,
            कवि हूँ मैं सरयू-तट का!
 
लटका मुख और व्यथित ,
लौटे द्वारिका से अर्जुन,
कान्ति विहीन वह खड़ा ,
नारायन का यह  गढ़ा ।
सर धर्मराज के पाँव पे पटका,
        कवि हूँ मैं सरयू-तट का !

कुदरत की मंशा को जान ,
मन से  युधिष्ठिर किए ध्यान
योग और विज्ञान महान,
नारद की बातें आयीं ज्ञान।
       लोभ -मोह सब  झटका- पटका,
         कवि हूँ मैं सरयू-तट का !
   
   -सुखमंगल सिंह ,अवध निवासी--
Sukhmangal Singh

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