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सुरेश खांडवेकर के लघु व्यंग्य

(चित्र - शैलेन्द्र नामदेव की कलाकृति)


सूचनाओं की भूख

आज के समय में कोई भूखा तो रह सकता है, प्यासा भी रह सकता है, बिना कपड़े के भी रह सकता है। पर सूचनाओं के बिना उसका पेट नहीं भरता। यह भी सत्य है जब तक उसे अच्छी खबर सुनने को नहीं मिलती उसका पेट नहीं भरता। अच्छी और सनसनीखेज खबर शेयर करने के बाद बहुत खुशी होती है। इन खबरों से भूख प्यास भी मिट जाती है और संतोषधन भी मिलता है।

वस्तुतः आज का हर मनुष्य चाहे गरीब हो या अमीर। वह सूचनाओं का गुलाम भी है और सूचनाओं का प्रेणेता भी। सूचनाओं से वह अपडेट रहता है। वह सूचनाओं को एडिट करना, सम्पादित करना भी जानता है। इस तरह सामान्य व्यक्ति अध्ययन और सम्पादन करने लगा है।

ऐसे में क्या ऐसा गरीब मोबाईल फोन नहीं रख सकता? आज उसे रेाटी मत दो, उसे मोबाईल फोन दो, उसकी उंगलियां तुरंत गतिशील हो जाती है और आंखें रोटी के स्थान पर सूचनाओं में घुस जाती है। सालाना 72 हजार के साथ एक मोबाईल फोन, डबल सिमकार्ड भी सरकार साथ दे दे, तो गरीब दिनरात सरकार का गुणगाण करेंगे।

मुकेश अम्बानी, मानते हैं कि वह विश्व के अमीर लोगों में से एक है, उसने जियो सिम और मोबाईल इसीलिए निकाला है कि लोग जिओ और जीने दो के संकल्प को पूरा कर सके।


गरीबों का प्रतिशत कैसे निकालें

सुदामा गोकुल नगरी के बाहर निकला। वह सोच रहा था कि भारत की कुल जनसंख्या वास्तव में कितनी है। कोई कहता सवा सौ करोड़, कोई एक सो तीस करोड़ तो कोई एक सौ चालीस करोड़ कह रहा है। जनगणना सही नहीं है। फिर उसका बीस प्रतिशत निकालना और भी कठिन है। हां, इनमें से पांच करोड़ लोगों को गरीब माना जा रहा है। इससे तो एक आंकड़ा स्पष्ट होता है। आजकल तो किसान और गरीब एक ही श्रेणी में आ गये हैं।

मथुरा आने पर उन्हें जगह-जगह लंगर खाने वालों की भीड़ दिखाई दी। एक गरीब आदमी कह रहा था, ‘आप दिल्ली जाओ, हरिद्वार जाओ, पानीपत जाओ, सब जगह का हाल मथुरा जैसा ही है। आप मुफ्रत खाने की दावत दो, इतनी भीड़ इकट्ठी हो जाती है कि आपका डोना-पत्तल लेने में दम लग जाता है।’

दूसरा कहने लगा, ‘सारे भरे पेट वाले स्कूटर, मोटरसाईकिल वाले भी लाईन में लग जाते हैं।’

तीसरा कहने लगा, ‘दूर क्यों जाते हो ये कारें भी रुक-रुक कर खाना लेती हैं। लाईन में लगो तो पलभर में झगड़े होते हैं। यहां तो हर कोई भूखा है। दिल्ली में तो ऐसे लंगर में कारों से ही सड़कें जाम हो जाती है।’

एक गरीब महिला से रहा नहीं गया बोली, ‘मैं तो देख रही हूं, कुछ लोग तो तीन-तीन बार, चार-चार बार ले रहे हैं। हमारा है कि नम्बर ही नहीं आ रहा।

सुदामा यह दृश्य देख सहम गया।


क्या हर भूखा गरीब है?

लाला अमीरचंद ने यह निःशुल्क भोज रखा था। उन्होंने तो सोचा था गर्मी के दिन है। मंगलवार का दिन है। हनुमानजी के नाम से दो बोरे आटे की पूड़ी, आलू की सब्जी और थोड़ा हलवा खिला दें कुछ पुण्य होगा।

यह तो पांच बोरे आटा हो गया। चार बोरे सब्जी बन गयी। लेकिन खानेवालों की भीड़ है कि खत्म ही नहीं हो रही थी। हाथ जोड़कर बुदबुदाया, ‘मैं थक गया हूं। भगवान के लिए अब खाना खत्म हो रहा है।’

पंडित रामरत्न माथे पर लम्बा टीका लगाये बैठे थे। भीड़ जाने का नाम ही नहीं ले रही थी। दान होने वाला अन्न समाप्त होने लगा था। उन्हें बोलने का अच्छा अवसर मिल गया, ‘भाईयो और बहनो एक पेट ही ऐसा दिया है भगवान ने कि कभी भी नहीं भरता। आप मुंह में निवाला डालते जाओ, वह पेट में जाता रहेगा। पेट इलेस्टिक जैसे होता है। भर पेट खाने के बाद भी स्वादिष्ट भोजन मिल जाए तो वह खाता ही चला जाता है।’

‘अरे खाना मुफ्रत मिलता हो तो भी दुबारा खाने वाले भी हजारों हैं।’

एक ने पूछा, ‘क्या यह प्रसाद नहीं है? और प्रसाद है तो भी उसकी एक सीमा होती है। क्या तीन-तीन बार लेते हैं प्रसाद?’

‘तो क्या गरीब प्रसाद से पेट भरेगा?’

‘अगर प्रसाद है तो भर पेट क्यों? थोड़ा-सा होता है।’

‘पर ये तो भरपेट अन्न है ना?’

‘है तो सही पर मेरी भी तो सीमा है?’

‘कहां है?’

उसने बेटी की ओर इशारा किया, ‘सीमा, इनको समझाओ।’

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