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मेरी कहानी- साहित्यकार पैदा होता है - रतन लाल जाट

 


वैसे तो बचपन में दूसरे बच्चों की तरह मैं भी तरह-तरह के खेल खेला करता था। फिर पाँचवीं-छठी में पढ़ता था। तब गाँव में एकाध घरों में टीवी आ गयी थी। तो मैं भी समय निकलते ही चला जाता था पड़ोस में। मम्मी-पापा पता चलते ही आ जाते थे बुलाने। चलो, पढ़ना नहीं है। खूब देख ली टीवी। रविवार के दिन सुबह से ही हम सब साथी बच्चे रामायण का बहुत ही बेसब्री से इन्तजार किया करते थे। नौ बज गये हैं, बारह बज गये हैं और चार बज गये हैं। अब तो आठ बजने ही वाले हैं। आठ बजे रामायण शुरू होने से पहले ही हम सब कमरे में इकट्ठे हो जाते थे। हमारे साथ बहुत सारे बड़े-बुजुर्ग भी आ जाते थे रामायण देखने।

धीरे-धीरे हमारा ध्यान रामायण के साथ ही फिल्मों की तरफ आ गया था। फिर हम रामायण की तरह ही फिल्मों का इन्तजार करते थे। शुक्रवार रात आठ बजे राम-लखन, शनिवार रात नौ बजे विश्वासघात और रविवार दिन में दो बजे मिस्टर इंडिया।

सच ही मैं दूसरों से भी रामायण और फिल्म आदि देखने में बहुत ही ज्यादा रूचि लेता था। मैं ज्यादा कैसे? तो इसका अन्दाज़ इससे लगता है कि मैं ही दूसरे सभी लड़कों को बताया करता था और वे भी पूछा करते थे कि आज कौन-सी फिल्म आयेगी और कल कौन-सी? हम जो टीवी पर देखते थे, उन सबका हमारे ऊपर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। रामायण देखकर हम तीर-कमान बनाकर चलने लगते थे। तो फिल्मों से चोर-पुलिस का खेल खूब खेला करते थे और खजूर की टहनी से बन्दूक भी अच्छी बनाते थे। इसके बाद बाल बनाना, गाना और पुलिस की तरह शर्ट इन व टोपी लगाना भी सीख गये थे।

इस तरह के वातावरण

के बीच रहते हुए जब मैं सातवीं-आठवीं कक्षा में आते-आते मौखिक रूप से फिल्मनुमा कहानियों की कल्पना करने लगा था, उनके नाम भी रखता और फिर दूसरे लड़कों को सुनाता कि हम एक फिल्म बनायेंगे बड़े होकर, जिसमें दो दोस्त होंगे और उनके गाँव में आये हुए डाकुओं से लड़ते हुए एक दोस्त मरा जाता है। तब दूसरा दोस्त उसके घर जाकर माँ-बाप की सेवा में जुट जाता है आदि।

इस तरह बचपन बीतते ज्यादा समय नहीं लगा था और मैं दसवीं पास होकर निकट शहर में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने लग गया। तब दीपावली की छुट्टियों के एकाध दिन पहले की बात थी। हमारे हिन्दी वाले सर हमको साहित्य का उद्देश्य नाम से प्रेमचन्द का कोई निबंध पढ़ा रहे थे। उसी निबंध के बीच आया था कि साहित्यकार बनाया नहीं जाता है। वह तो पैदा होता है। इसी पंक्ति को समझाते हुए सर ने हमको कहा था कि आप में से भी कोई कवि-साहित्यकार हो सकता है। बस, जरूरत है आपके भीतर छिपी हुई सृजन शक्ति को जगाने की। फिर यह कहा कि आपके मन में भी कोई बात आये, तो लिखने का प्रयास करना चाहिए।

गुरूजी की बतायी यह बात में मन में घर कर गयी थी और कानों में वही शब्द गूंजते थे कि साहित्यकार पैदा होता है।

संयोग

और संयोग भी देखिए। उन्हीं दीपावली की छुट्टियों में जब धनतेरस की शाम आयी और मैं अपनी कॉपी-पेन लेकर बैठ गया। सबसे पहले पृष्ठ पर लिखा कविता और मेरी आत्मा में बैठी कुछ पंक्तियाँ निकल आयी।

ज़िन्दगी कठिन मेहनत से जीता,

धनिकों के धन-वैभव से न्यारा।

न शान-शौकत न ऐश-आराम,

बस, जरूरतों को पूरा करने का है सवाल।

कुछ इस तरह की तुकबंदी कर बैठा था। इसके बाद जब पौष की सर्दी आयी, तो मैंने एक और कविता लिख दी। उसका नाम रखा था पौष की प्रभात।

पता ही नहीं चला था और मैं दस-बारह कविता लिखकर एकदिन उन्हीं गुरूजी के पास पहुँच गया कि मेरी कविताएँ कैसी है? आप देखिए। तब उन्होंने पूछा, तुम कविता कैसे लिखते हो? मैंने उनको कक्षा में उनके द्वारा कही गयी सारी बात बता दी थी। वह बहुत खुश हुए थे और मुझे कुछ सुधार करने की सलाह देते हुए कहा कि तुम इन्हें मधुमती पत्रिका में भेजना। मैं तुम्हें भेजने का पूरा पता बता दूँगा।

इस प्रकार मैं कविता-गीत के साथ कहानी-उपन्यास आदि विधा में लिखने लगा हूँ। जब कोई बात बार-बार आत्मा को झकझोरती है। तो मैं कलम उठा लेता हूँ। उस वक्त यह पता नहीं होता है कि यह रचना छपेगी भी या नहीं। मेरी आत्मा को लिख चुकने के बाद ही परम सन्तोष मिलता है। फिर कभी आत्मा यह प्रश्न कभी नहीं करती है कि अमुक रचना छपी है या क्यों नहीं छपी है।

मैं इतना ही समझता हूँ कि मैं अपने आसपास की दुनिया में जो कुछ देखता और जीता हूँ। उसमें से कोई बात या घटना मेरे अन्तरतम में जाकर बैठ जाती है। कई दिन गुजर जाने के बाद भी वो शांत नहीं होती है। बार-बार बाहर निकल आने को हिल्लोरे मारती रहती हैं। तब फिर एकदिन अवसर पाकर हाथ में कलम उठाने को बाध्य कर देती है और उसे कागज पर उतार चुकने के बाद ही मुझे सुकून मिलता है।

मुझे पता नहीं कि उस दिन कक्षा में प्रेमचन्द की लिखी पंक्ति को सर विस्तार से समझाकर यह नहीं कहते कि आप भी प्रयास करना। तो शायद मैं कविता लिख पाता या नहीं। यह कहना मेरे लिए तो नामुमकिन है।

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लेखक-परिचय

रतन लाल जाट S/O रामेश्वर लाल जाट

जन्म दिनांक- 10-07-1989

गाँव- लाखों का खेड़ा, पोस्ट- भट्टों का बामनिया

तहसील- कपासन, जिला- चित्तौड़गढ़ (राज.)

पदनाम- व्याख्याता (हिंदी)

कार्यालय- रा. उ. मा. वि. डिण्डोली

प्रकाशन- मंडाण, शिविरा और रचनाकार आदि में

शिक्षा- बी. ए., बी. एड. और एम. ए. (हिंदी) के साथ नेट-स्लेट (हिंदी)


ईमेल- ratanlaljathindi3@gmail.in

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