नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

गीत - अच्छे दिन थे आनेवाले - देवेंद्र कुमार पाठक

बड़ी आश-विश्वासों वाले,
अच्छे दिन थे आनेवाले.

आधी रात कहर टूटा,
हर शहर-गाँव बदहाली छाई;
पेट काट की जमा-जोड़ पर
यह काली छाया घिर आई;

उम्मीदों के उड़े परिन्दे,
जो बरसों से पोसे-पाले.

गिरी गाज हरियाते बिरवे
एकबारगी ठूँठ हो गये;
खरी कमाई के गर्वीले-सच
सहसा ही झूठ हो गये;

नित्य नये घोंपे जाते हैं
ऐलानों के बर्छी-भाले.

धनपशुओं ने थूथन भर-भर
खाया,नहीं डकार लगायी;
भोले भगत कंठनादों ने
हुलस-हुमक जयकार लगायी;

मनबतियों से कामयाबियों के
मनमाफिक अर्थ निकाले.

,बेदम दावे करती बहसें,
लचर दलीलें पीटें पानी;
और भवितव्य नये भारत का
बांच रहे हैं ज्ञानी-ध्यानी;

अंधियारों पर दोष धरें क्या,
भटका दें जब राह उजाले.

सँख्यांकों के लट्ठ भांजती
आत्ममुग्ध हो वाग्वीरता;
इम्तहान पर इम्तहान दे,
असफल रहती सहनशीलता;

बेज़ुबान हो गयी असहमति,
सहमतियों के ठाठ निराले.

बरसों-बरस,कई दशकों से
चर्चों-पर्चों की बस होड़ें;
दुबराते,श्रम-स्वेद-नदों की
आंखों के जलस्रोत निचोड़ें;

समाधान के नये शिगूफे,
बेलगाम हो खूब उछाले.

न्याय,नीति-संहितायें हतप्रभ,
कद-मद बढ़े-चढ़े ओहदों के;
बेबस मरें मजूर-खेतिहर,
अच्छे दिन आये शोहदों के;

खरी कहन के दुस्साहस पर
प्रतिबन्धों के लटके ताले.

एक महत्वाकांक्षा की
विषबेलि समूचा खेत उजाड़े;
नये-नये फरमान तुगलकी
लोकतंत्र का रूप बिगाड़ें;

सूखी नदी,मछलियां बेबस,
फिर  क्यों जाल मछेरा डाले.

बाधा-विपदाओं के बंजर,
वन,पहाड़,घाटियाँ खंगाली;
पाँव-फफोलों के दिन-दुपहर,
रातें आह-कराहों वाली;

अटके भ्रम,भुलाव में भटके
पर पांवों ने पंथ निकाले.

       ************
साईंपुरम कॉलोनी, कटनी;म.प्र.

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.