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मेरे लेखे: “अकेले की नाव अकेले की ओर” - शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव

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मेरे लेखे : “ अकेले की नाव अकेले की ओर ” कुछ तथ्य : “ अकेले की नाव अकेले की ओर ” मेरी प्रथम प्रकाशित काव्य-रचना है. इसकी कवितायेँ वर्त...

मेरे लेखे:

अकेले की नाव अकेले की ओर

कुछ तथ्य :

अकेले की नाव अकेले की ओर मेरी प्रथम प्रकाशित काव्य-रचना है. इसकी कवितायेँ वर्तमान में प्रचलित हिंदी की काव्य-परम्परा से एकदम हट कर हैं. ये एक संगुम्फन के रूप में हैं. मेरे प्रकाशक ने इस संगुम्फन को छापकर मुझे दे दिया. इन्हें पाठकों तक पहुँचाना मेरी जिम्मेदारी है. मैं पाठकों तक पहुँचने के लिए व्यग्र हूँ.

वर्तमान में प्रकाशन के उपरांत नयी पुस्तकों को पाठकों तक पहुंचाने हेतु दो बातें आवश्यक रूप से अपनाई जाती दिखती हैं– एक, पुस्तक का विमोचन और दूसरा, उसकी समीक्षा. विमोचन के लिए एक मंच चाहिए और समीक्षा के लिए एक कुशल समीक्षक. इन दोनों के लिए येन केन प्रकारेण स्थापित सरोकार चाहिए जो कुछ शर्तों के अधीन बनाना पड़ता है. आज के समय में साहित्यकारों और आमजन में कविताओं के पढ़ने के प्रति वह ललक नहीं है जो द्विवेदी युग या छायावाद युग में हुआ करती थी. कविता-लेखक भी अब उतने सरल नहीं हैं. स्वतंत्र समीक्षक भी बहुत कम दिखते हैं.

सन १९३६ के बाद के कवियों में पत्रकारों की संख्या अधिक थी. ये किसी न किसी पत्रिका के संपादक थे या उन पत्रिकाओं के लिए काम करते थे. ये कवितायेँ लिखते थे और एक दूसरे को प्रकाशित करते, और उनकी समीक्षा भी लिखते थे. इससे भी जब पाठकों तक इनकी पहुँच अच्छी नहीं बन पाई तो कुछ कवियों ने मिलकर सामूहिक रूप से एक संकलन निकालने की योजना बनाई. अज्ञेय ने इस सामूहिक संकलन के सम्पादन का भार संभाला. इन उत्सुक कवियों में से इन्होंने सात को चुना और उनकी कुछ चुनी हुई कविताओं को लेकर ‘तारसप्तक’ नाम से एक संकलन निकाला, उसका सम्पादकीय भी लिखा. यह सम्पादकीय तत्कालीन नयी विचारधारा वाले अमरीकी कवियों का आधार लेकर लिखा गया था (मुद्राराक्षस). यह संपादकीय ( परचिंतन से प्रेरित होने के बावजूद) विचारोत्तेजक था. देखते देखते हिंदी के समालोचना-क्षेत्र में इसकी धूम मच गई और नयी कविता की गाड़ी चल निकली. आगे चल कर यह ‘तारसप्तक’ सप्तकों की परंपरा की पहली कड़ी बना. इस संकलन की कविताओं की अपेक्षा इसका सपद्कीय ही अधिक चर्चित हुआ.

मेरे पास ये सब सुविधाएँ नहीं थीं. अतः इस संगुम्फन को सहृदय पाठकों तक पहुँचाने का मैंने एक भिन्न रास्ता अपनाया. इसकी कुछ प्रतियाँ हिंदी के कुछ विद्वज्जनों और कविजनों को भेजीं, अभी भी भेज रहा हूँ. मुझे उम्मीद थी कि ये इसपर दो-एक पंक्ति लिखेंगे ही. लेकिन इन महोदयों ने इस पर कुछ पक्तियां लिखना तो दूर, नंदकिशोर नवल जी, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के अध्यक्ष और प्रो महेंद्र भटनागर को छोड़, इसके प्राप्त होने की सूचना तक नहीं दी. अलबत्ता, दिल्ली विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्रोफेसर एस पी सुधेश ने ई-मेल पर लिखा- इसका विषय दर्शन है. यह विषय कविता के लिए अनुकूल नहीं है. हालाँकि, किसी दर्शन का अवलम्ब लेकर यह संगुम्फन मैंने तैयार नहीं किया है. गोरखपुर के प्रो. रामदेव शुक्ल जी को यह अवश्य अच्छा लगा. ओशो के शिष्यों को यह संगुम्फन बहुत पसंद आया. “यैस ओशो” के सम्पादक स्वामी संजय भारती ने लिखा- इसे एक बार पढ़ने से मन नहीं भरता. “ओशो धारा” के सम्पादक स्वामी चैतन्य कीर्ति ने अपनी प्रतिक्रिया ह्वाट्स-एप पर अंग्रेजी में यों दी-

It is a wreathe 0f flowered hindi poems from the heart of a sensitive poet to OSHO, the unparrellel

Being on earth of human perception. With his poems The poet is on journey in this wreathe towards the perception of OSHO to perceive the existence.

चूँकि ओशो को संबोधित कर यह काव्य लिखा गया है तो कोई भी कह सकता है कि उन्हें तो यह पसंद आएगा ही. लेकिन हिंदी काव्य-परंपरा पर जब मेरा ध्यान जाता है तो पाता हूँ कि बीसलदेव रासो, विनय-पत्रिका, भ्रमर-गीत और उद्धव शतक जैसे कुछ गीत-काव्य किसी न किसी नायक को ही संबोधित कर लिखे गए हैं. आलोचकों ने इनकी आलोचना में सम्बोध्य के नाम पर न जाकर इनकी काव्याभिव्यक्तियों के कव्यवैभव पर अपना ध्यान टिकाया है. मेरे संगुम्फन के गीत भी इसी काव्य-परंपरा में हैं. यह काव्य-वैभव की कसौटी पर कितना खरा उतरता है, वरिष्ठ साहित्यकारों से यह जानने की मैं अपेक्षा रखता था. पर मेरी यह आकांक्षा पूरी नहीं हो पाई. कनाडा से प्रकाशित ‘हिंदी चेतना’ पत्रिका के संपादक ने इसपर एक संगोष्ठी करने की मुझे सूचना दी थी. पर संगोष्ठी करने की कौन कहे उन्होंने मेरे ई-मेल पर यह पत्रिका भेजना ही बंद कर दिया. पता चला कि उनके संगोष्ठी के सदस्यों को ‘ओशो’ के नाम ने विचलित कर दिया था, ठीक वैसे ही जैसे ‘ओशो’ का नाम सुनकर नोबेल पुरस्कार बाँटने वाले विदक जाते थे.

भले ही हिंदी के प्रतिष्ठित साहित्यकार, जिन्हें इस संगुम्फन की प्रतियाँ मैंने भेजी हैं, इसपर मौन साधे बैठे हैं या इसे उपेक्षा की दृष्टि से देखते हों पर हिंदी के साहित्यिक क्षेत्र में कुछ ऐसे युवा साहित्यकार भी हैं जिन्होंने इस संगुम्फन का स्वागत किया है. नेट पर ‘कविता कोश’ के संस्थापक मनोदैहिक संघर्षों में पले बढ़े श्री ललित कुमार को इस संगुम्फन की कविताएँ इतनी पसंद आईं कि उन्होंने इसे मुझसे माँग कर अपने ‘कविता कोश’ में सम्मिलित किया. नेट के ‘साहित्य शिल्पी’ के रचनाकारों को भी इसकी कविताएँ भाईं.

मैं अनुभव करता हूँ कि समीक्षाएँ/आलोचनायें अब स्वतंत्र रूप से बहुत कम लिखी जा रही हैं. जो लिखी भी जा रहीं हैं इनमें कृति की समीक्षा के नाम पर समीक्षक अपनी ही बातें अधिक करते दिखाई देते है. कृति में जो नहीं है उसे भी वे उसमें ऊँडेल देते है. मुक्तिबोध पर लिखी समीक्षाओं में यह साफ़ दिखाई देता है. मुक्तिबोध कबीर से कैसे तुलनीय हो सकते हैं, समझ से बाहर है. जहाँ कबीर की कविताओं में मनुष्य-मात्र की चिंता है वहाँ मुक्तिबोध के लिए साम्यवादी-राजनीति और मनुष्य का एक वर्गविशेष ही चिंता का विषय है. इनकी “अँधेरे में” कविता की ‘परम अभिव्यक्ति’ की खोज की आकांक्षा उनकी ‘अस्मिता की खोज’ की आकांक्षा कैसे हो सकती है – ‘अभिव्यक्ति’ की समानार्थक ‘अस्मिता’?, अद्भुत. ‘अभिव्यक्ति’ किसी दृश्य अथवा भाव का मात्र प्रकटीकरण है जबकि ‘अस्मिता’, व्यक्ति की सत्यनिष्ठा अर्थात आइडेंटिटी है. अनिव्यक्ति की भाषा या तो तथ्य की हो सकती है या काव्य की. यहाँ शब्द-संयोजन के कौशल की समीक्षा हो सकती है कवि की अस्मिता की खोज की नहीं. सुधीश पचौरी कहते हैं साम्यवाद की चिंता में परम (absolute) शब्द का स्थान नहीं है. फिर परम अभिव्यक्ति की खोज का तात्पर्य ही क्या, वह भी तब जबकि कवि ने उसे आत्म्सम्भवा घोषित कर रखा है. इसपर कोई आलोचक बात ही नहीं करता, नामवर सिंह भी नहीं. फिर भी कृतिकार की कृति पर लेखनी चली तो. यह महत्वपूर्ण है. मैं भी अपने संगुम्फन पर प्रतिष्ठितों की टिप्पणियाँ चाहता था, इसकी स्वीकार्यता या अस्वीकार्यता पर. हिंदी के वर्तमान काव्य और आलोचनाओं का परिदृश्य वामपंथी सम्वेदानाओं, जिसमें हृदय के ऊपर बुद्धि प्रतिष्ठित है, से अटा पड़ा है. इस परिदृश्य से अपने को अलगाते और व्यष्टि की स्वतंत्र भूमिका को महत्व देते हुए मैंने यह संगुम्फन तैयार किया है. तारसप्तक के नयी राहों के अन्वेषी कवियों को हिंदी साहित्य ने अपना लिया. मैंने भी एक सर्वथा अलग राह अपनाकर कविता-पथ पर कुछ कदम चल दिए हैं. अब इसकी स्वीकृति या अस्वीकृति सहृदय पाठकों के हाथ में है.

यद्यपि मेरा संगुम्फन, ‘बीसलदेव रासो’, ‘उद्धव शतक’, ‘भ्रमर-गीत’ और विनय-पत्रिका की गीत- परंपरा मे है पर इसका ढाँचा कमोवेश तुलसी की विनय-पत्रिका की परंपरा में संयोजित दिखता है. विनय-पत्रिका दो खण्डों में बंटा है- पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध. पूर्वार्द्ध में स्तुति, उद्वोधन और विनय के पद हैं. ‘स्तुति’ में शिव, हनुमान आदि से राम के प्रति निष्ठ बने रहने की स्तुति की गई है. ‘उद्वोधन’ में तुलसी अपने मन का उद्वोधन कर उसे राम के प्रति उन्मुख करते है. और विनय में अपनी दीनता का वर्णन कर उससे उद्धार करने की प्रार्थना करते है. ‘उत्तरार्द्ध’ (जिसे आत्मबोध भी कहा गया है) में राम के प्रति भक्ति की याचना करते हुए तुलसी ने हनुमान आदि (भारत, लक्ष्मण व शत्तुघ्न समेत) से सिफारिश की है कि वे अपना अपना समय देख उनकी पत्रिका राम की सेवा में प्रस्तुत कर उसपर उनसे सही कर देने का अनुरोध कर दें. तुलसी की सिफारिश के प्रति हनुमान और भरत की रूचि देख लक्ष्मण जी उस पत्रिका को राम के सामने प्रस्तुत कर देते है. और राम उसपर सही कर देते है अर्थात उनकी भक्ति स्वीकार कर लेते हैं. तुलसी ने यहाँ एक प्रकार से राजनीति की है.

मैंने अपने इस संगुम्फन में कोई राजनीति नहीं की है. इस संगुम्फन में मैं भी अपने संबोध्य तक पहुँचने की चेष्टा में हूँ, इसमें मैं उनकी अनुभूति का साक्षी बनने की आकांक्षा लिए अपनी यात्रा पुरश्चरण (शुभ संकल्प) से आरंभ करता हूँ. और अपने अकेले की डोंगी लिए उनके अनुभूति-तट से जुड़ने की तत्परता के साथ अपने अकेले के पलों में प्रकृति में तिरते ऊनके मौन-ध्वनित प्रतिसंवेदनों की प्रतीति करते अपने अक्रले की ओर अग्रसर होता हूँ (ध्यान केन्द्रित करता हूँ). पर अपने अकेले तक की मेरी यह यात्रा पूरी नहीं हो पाती है. और तब मैं अपने बीज-संवेदनों का ध्यान कर बीते पलों के अनुस्मरण (पुनरावलोकन) में लग जाता हूँ. तुलसी तो राम के प्रति समर्पित हैं. पर मैंने ओशो की प्रतीति के आलोक में अनुभव किया है कि मै भी उन्हीं की तरह एक माता की कोख में अभिव्यक्त होकर एक भिन्न शरीर धारण कर संसार में आया हूँ. और संसार में मेरे संसरण (गतिमान होने का

दायित्व मेरा अपना है.

मित्र !

यह सामान्य-सा अनुभव है कि

कोख के अँधेरे में ही

प्रच्छन्न होती है कोई प्रभा

और कोख की ही ऊष्मा से पोषित हो

किसी माता की गोद में

वह आँखें खोलती है

कोई वपु धारण कर.

वह वपु कभी तुम्हारा होता है कभी मेरा

इस वपु में ही

हमें पूरी करनी होती है

अपनी जीवन-यात्रा. (-पतिसंवेदन)

ओशो के प्रवचनों में अक्सर दुहराया गया है कि उन तक या कहें उनकी अनुभूति तक पहुँचने के लिए किसी तरह की सिफारिश की आवश्यकता नहीं है.

यह संगुम्फन:

खैर, मैं इस संगुम्फन की समीक्षा लिखने का इरादा नहीं रखता. पर यह अवश्य बताना चाहता हूँ कि आखिर क्योंकर इन कविताओं को मैंने लिखा और इन्हें “अकेले की नाव अकेले की ओर” शीर्षक से संगुम्फित किया. सच कहूं तो इन कविताओं में, नयी कविता-धारा में प्रतिष्ठित खंड-खंड मनुष्य को एक अखंड इकाई के रूप में प्रस्तुत करने का सदा से मेरा इरादा रहा है. ऐसा कर इन कविताओं में मनुष्य को गरिमा देने की मेरी कोशिश है. अखंड मनुष्य अर्थात जो जीवन के पर-अपर हर क्षेत्र में रूचि लेता हो, पर करुणावान हो कर. यह शीर्षक देकर मैंने इन्हें एक प्रेमपूर्ण अलक्ष्य धागे में विभिन्न इयत्ताओं को गूँथा है. जिससे समाज की रचना होती है. मेरे कविता-प्रसूनों से तैयार इस संगुम्फन में भावी समाज प्रतीकित है.

दरअसल मैं अपने चित्त में एक अखंड मनुष्य की अस्मिता की गूँज सदैव महसूस करता रहा हूँ. मैं विभाजित मनुष्यता के पक्ष में कभी नहीं रहा. काव्य में भी मुझे समग्र मनुष्यता ही अभीष्ट है. किन्तु सन साठ के दशक के कुछ पहले और कुछ बाद तक की कविताओं में मुझे इसका आभाव-सा दिखा. इस काल का साहित्य बामपंथी कवियों की रचनाओं से अटा पड़ा था. आरम्भ में इन कविताओं में कुछ आकर्षण का अनुभव हुआ पर बाद में इसमें एकरसता आती गई दिखी और फिर एक राजनीतिक नारा-सी बनती दिखने लगी. इसमें मनुष्य की चिंता गौण होती गई दिखती है. इस काल में नीत्से ने मनुष्य को आईइज्म या इगो (मेरा ‘मैं’ ही सब कुछ है) के खोल से बाहर नहीं आने दिया और सार्त्र ने अपने एक नाटक में प्रतिस्थापित किया- “Hell is the other”, दूसरा नरक के सामान है. और हिटलर ने इसे चरितार्थ भी कर दिखाया. आज की दुनिया की यही पीड़ा है, यह मनुष्यता से दूर होती जा रही है.

सार्त्र के जीवन-काल में ही ओशो ने उनकी उक्त प्रतिस्थापना को नकार दिया. उन्होंने कहा -“The other is not hell, the otherness is hell”, दूसरा नरक समान नहीं है, दूसरापन का भाव नरक समान है. उनका यह कथन अधिक तर्कसंगत और अस्तित्वगत है. सार्त्र तक यह बात अवश्य पहुंची होगी पर इसपर उनका कोई प्रतिवाद नहीं आया.

ओशो के इस सूत्रवाक्य ने मुझे बहुत प्रभावित किया. परोक्ष रूप से इसमें मनुष्य की गरिमा अभिव्यक्त हो रही है. मैंने इसे ही अपनी कविता का विषय बनाया है. इसमें ओशो मेरे संबोध्य हैं. ओशो अपने को एक अग्नि-पुरुष व अग्नि-कवि कहते हैं, जो वस्तुत: वह हैं ही. वह भारतीय क्षितिज पर एक बवंडर की तरह उभरे और विश्व के समूचे बौद्धिक एवं भाविक परिदृश्य को आलोड़ित कर दुनिया में एक क्रांति ला दिए. इनके क्रांतिकारी विचारों के आगे अमरीकी महाशक्ति भी बौनी पड़ गई. इससे अमरीकी पादरी-वर्ग इतना डर गया कि वहाँ के राष्ट्रपति रीगन ने अपने पादरियों को तुष्ट करने के लिए ओशो पर अनाप-शनाप आरोप लगाकर उन्हें कैद करा लिया और जेल में डलवा दिया. अमरीकी जेलों में उन्हें थेलियम नामक धीमा जहर भी दिया गया ताकि वह शनै: शनै: मृत्यु को प्राप्त हों जाएं. फिर अमरीकी कानून के अनुसार कोर्ट के बाहर समझौता करवाया गया और उन्हें अमरीका छोड़ देने का आदेश दे दिया गया. ओशो ने अपने संन्यासियों के हितार्थ तीन झूठ बोल कर उस समझौते को स्वीकार किया और उरुग्वे में ठहरने के लिए चल पड़े. लेकिन अभी वह उरुग्वे हवाई अड्डा पर पहुंचे ही थे कि अमरीकी आदेश पाकर उरुग्वे सरकार ने उन्हें हवाई जहाज से उतरने नहीं दिया. इस तरह बाईस देशों तक अमरीका ने उनका पीछा किया और वहाँ उन्हें रुकने नहीं दिया. अंतत: ओशो ने अपने देश भारत की ओर रुख किया. उस समय की भारत की राजीव गाँधी सरकार ने अपने ही प्रतिष्ठित नागरिक को, अमरीका की तीन शर्तें स्वीकार करने के बाद ही अपने देश में प्रवेश करने दिया (जबकि छोटे-छोटे देश भी ऐसा नहीं करते, ऐसा देखने में आता है), शर्तें थीं- किसी पत्रकार को उनसे न मिलने दिया जाए, उन्हें कोई प्रेस-कान्स्फ्रेंस न करने दिया जाए आदि.

भारत आकर अपने रजनीश धाम में उन्होंने हमें एक अनमोल रचना दी- ‘रजनीश उपनिषद’, जो हमें उपनिषद के ऋषियों की याद दिलाती है. ऐसे महापुरुष के लिए, जिसके कलेवर में गौतम बुद्ध ने पुनर्जन्म लिया (कुछ दिनों तक उन्होंने अपना नाम मैत्रेय रखा भी पर बौद्धों के विरोध करने पर उसे छोड़ दिया), गीत लिखना मैंने अपना सौभाग्य समझा. उद्देश्य रहा उनकी अनुभूति का साक्षी बनना जिससे हमारा मनुष्य अपने जीवन यापन में संग्लग्न होता हुआ भी सामान्य व सरल बना रहे.

ओशो के सिखावन के केंद्र में मनुष्य है, सम्पूर्ण मनुष्य- पुरुष और स्त्री समेत. पुरुष को उन्होंने ‘स्वामी’ संबोधन दिया, ‘स्वामी’ अर्थात् स्वयं का मालिक, स्वयं में सम्राट और स्त्री को ‘मा’ संबोधन दिया, ‘मा’ अर्थात् सृष्टि की कारक, स्वयं में सम्राज्ञी. आजतक हर स्तर पर स्त्री उपेक्षणीय रही है. इतिहास में पहली बार स्त्री को ओशो ने इतनी गरिमा दी है. (कहानीकार राजेंद्र यादव स्त्री विमर्ष के नाम पर स्त्री को सम्मान देने की बात करते हैं पर वह इसके प्रति कितने ईमानदार रहे हैं इसका भंडाफोड़ उनकी कहानीकार पत्नी ने ही कर दिया है.). स्त्री और पुरुष पारस्परिक सहयोग के साथ जब द्वंद्व-मुक्त होते हैं तभी एक नए स्वस्थ मनुष्य का जन्म होता है, ठीक एक अंकुर की तरह. उस अंकुर के पौधे में विकसित हो जाने पर उसकी अगली यात्रा में फिर उसके सामने द्वंद्व उपस्थित हो जाता है अगले अंकुर को जन्म देने के लिए. इस यात्रा में साम्य को कोई ठौर-टिकाना मिलता नहीं दिखता. दुनिया तो पल पल परिवर्तनीय है. विकासवादी वैज्ञानिक डार्विन ने अपने अनुसन्धान के हर क्षण में इस परिवर्तन को महसूस किया है.

ओशो ने एक नए मनुष्य के जन्म की ओर इशारा किया है. हमें ही इस नए मनुष्य को जन्म देना है. मेरा यह संगुम्फन एक नए मनुष्य को जन्म देने की कोशिश भी है. ओशो का नया मनुष्य कैसा होगा यह उनके “New Evolution of Man” में देखा जा सकता है. वह नए मनुष्य को ‘जोरबा द बुद्ध’ कहते हैं. यह मनुष्य आइन्स्टीन (पदार्थवाद) और बुद्ध (आत्मवाद) के एकीभूत होने से विकसित होगा.

मैंने इन कविताओं में ‘मैं’ शैली अपनाई है. यह ‘मैं’ मेरा परसोना नही मेरा अपना अस्तित्व है, इसमें दूसरे का जिया अभिनीत नहीं है, आनुभूति के स्तर पर मेरा जिया हुआ ही पुरा है.

इन कविताओं को मैने फुटकल ही लिखा था बिना शीर्षक दिए. इसी दौरान ओशो की “नए भारत

की खोज” पुस्तक मुझे पढ़ने को मिली. उसमें मुझे एक वाक्य मिला- “मनुष्य की यात्रा अकेले से अकेले तक की है”. इसपर मैंने ओशो की भाषा में सोचा. सचमुच में मनुष्य दुनिया में अकेले ही आता है. जीवन के झंझावातों से अकेले ही रूबरू होता है, अकेले ही उससे निकलने की राह निकालता है और अकेले ही एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है. जीवन भर के झमेलों से निपटने में आत्मनिर्भरता या परनिर्भरता के रास्ते में से एक का चुनाव भी उसे खुद करना पड़ता है.

इस वाक्य का सन्दर्भ लेकर, मैंने मुड़ कर अपने बीते पलों की तरफ देखा तो महसूस किया कि इन कविताओं के प्रस्फुटित होने तक मेरी जीवन-यात्रा अकेले की ही रही है और अपने अकेले के पलों को ही अबतक जीता रहा हूँ. सोचा, कि क्यों न ओशो की नयी ऊष्मा से परिचालित हो जीवन की एक नयी यात्रा शुरू करूँ. निश्चय ही यह उनके ‘नए मनुष्य’ के जन्म की दिशा में उठा एक कदम- क्रन्तिकारी कदम होगा. अत: इन कविताओं में मैं अपनी अनुभूति के आकाश में अपने अस्तित्व की एक डोंगी लेकर अकेले की ओर की यात्रा पर निकल पड़ा हूँ. ओशो मेरे अकेले की यात्रा के गंतव्य-से हैं, मुझे लगता है ओशो मेरे अंतस्तल से उछली, सागर हो गए, एक बूँद हैं. मेरे अकेले तक की यात्रा कब पूरी होगी मैं नहीं जनता पर मैं अपने अकेले की ओर चल पड़ा हूँ, यह मेरे ध्यान में है.

इन फुटकल कविताओं को, जब मैंने एक संकलन तैयार करने के लिए सँजोना शुरू किया तो

मुझे लगा कि इन्हें कुछ खण्डों में बाँटा जा सकता है जिससे मेरा मंतव्य सहृदयों तक अच्छी तरह

पहुँच सकेगा. और जैसा मैं सोच कर चला हूँ वह भी चरितार्थ होता चलेगा.

इन कविताओं में मैं समय पर सवार हूँ. अपनी नौका के पाल मैंने खोल लिए हैं और अकेले के पलों में डूबते उतराते अपने अकेले की ओर के अभिगमन में ओशो की अनुभूति की दिशा में चल पड़ा हूँ. अत: इन्हें मैंने तीन खण्डों में बाँटा है – १. अकेले की नाव, २. अकेले के पल और ३. अकेले की ओर. कुछ कविताएँ ऐसी थीं, जिनमें मुझे लगा कि इनमें मेरी मूल चिंता को अभिव्यक्ति मिल रही है जो इन तीन खण्डों में प्रसरित हैं. इन्हें मैंने 'बीज-संवेदन’ शीर्षक के अंतर्गत स्थान दिया है. मुझे यह भी लगा की ये फूलों जैसी प्रस्फुटित हैं और ये उन फूलों की तरह संकलित करने योग्य नहीं हैं जो वृन्तों से अलग हो कर अलग थलग पड़ जाते हैं. इनको सँजोने के लिए मैंने करुणापूरित एक अदृश्य धागा तैयार किया और इन्हें फुनगियों से तोड़े विना उस धागे में गूँथ लिया है. फिर इसे एक माला का रूप देने के लिए आरम्भ में ‘पुरश्चरण’, ‘प्रतिसंवेदन’ और अंत में ‘अनुस्मरण’ अध्याय जोड़ दिया है. यह ‘पुरश्चरण’ वह शुभ मुहूर्त है जिसमें ये कवितायें मेरे भीतर प्रतिसंवेदित हुईं. ‘अनुस्मरण’ में मै कुछ क्षण के लिए ठहरा हूँ और अपने बीते पलों के पुनरावलोकन में ध्यानस्थ हो गया हूँ.

इस तरह इस संगुम्फन के सात खण्ड हैं= १. पुरश्चरण २. प्रतिसंवेदन ३. अकेले की नाव ४. अकेले के पल ५. अकेले की ओर ६. बीज-संवेदन और ७. अनुस्मरण. ये एक दूसरे में करुणा के एक अदृश्य धागे में गुंथे हुए हैं.

( अगली कड़ी, संगुम्फन की समीक्षा )

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अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,715,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,806,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,92,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,212,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: मेरे लेखे: “अकेले की नाव अकेले की ओर” - शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
मेरे लेखे: “अकेले की नाव अकेले की ओर” - शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव
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