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आप कतार में हैं - दीपक दीक्षित

मेरे घर के पास एक बस-स्टॉप है ।

मैं देखता हूँ कि जब कोई बस आने वाली होती है तो एक लम्बी लाइन लग जाती है और बस के आने तक लोग धैर्य के साथ अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं, पर बस आने पर अकसर लोग अपना धैर्य खो बैठते हैं और लाइन टूट जाती है। फिर शुरू होता है धक्का-मुक्की का एक दौर जिसमें अकसर बच्चे, बूढ़े ,स्त्रियां और कमज़ोर और बीमार लोगों का ही नुकसान होता है। फिर थोड़ी ही देर में सब ठीक भी हो जाता है और फिर किसी और बस के इंतजार में यही क्रम दोहराया जाता है।

क्या हो जाता है लोगों को थोड़ी सी देर के लिए?

‘आप कतार में हैं ....’, अकसर यह वाक्य हमारे कान में गूंजता है, जब हम अपने मोबाइल फोन / डिवाइस या कम्प्यूटर पर किसी ऑनलाइन प्रक्रिया से गुजर रहे होते हैं। और बार-बार इसे सुन कर बड़ी झल्लाहट होती है।। कभी-कभी लोग ऐसी परिस्थिति में अपना आपा खो बैठते हैं और इसका गुस्सा बेचारे मोबाइल फोन / डिवाइस या कम्प्यूटर पर निकाल डालते हैं। वहीं तीव्र बुद्धि लोग इस समय का सदुपयोग कर अपने छोटे मोटे काम निबटा लेते हैं।

इन उदाहरणों से ऐसा लगता हैं कि लोगों को कतार में बने रहना तभी तक स्वीकार्य हैं जब तक लोगों को यह विश्वास बना रहे कि देर से ही सही पर उनका नंबर अपने क्रम से आ जायेगा। जैसे ही किसी को यह लगता हैं कि अपने क्रम को तोड़ कर कतार में आगे भी कही प्रवेश किया जा सकता हैं, वह इसके लिए प्रयत्न करता हैं। और फिर देखा-देखी इस काम की होड़ लग जाती हैं और व्यवस्था पंगु हो जाती हैं।

कतार की सारी व्यवस्था विश्वास पर ही आधारित हैं। जैसे ही लोगों को विश्वास हैं कि कतार में रहना फायदेमंद हैं, वे इसमें बने रहते हैं अन्यथा शार्ट-कट अपना लेते हैं और कतार तोड़ डालते हैं।

अगर व्यवस्था बिलकुल सख्त हो तो किसी को भी कतार में अपनी बारी से आगे नहीं जाने देती । पर ऐसी व्यवस्था सिर्फ मशीनों के लिए ही बनाई जा सकती है, इंसानों के लिए नहीं । कुछ विशेष परिस्थितियों में हमें कुछ लोगों को वरीयता देनी ही होगी। कुछ अति विशिष्ट या फिर कमज़ोर और बीमार लोगों के लिए व्यवस्था में ही विशेष प्रावधान करने होंगे । पर इन्हीं प्रावधानों का कुछ चालाक लोग मनमाने तरह से फायदा उठा जाते हैं जिसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना होता है और व्यवस्था धीरे-धीरे चरमराने लगती है। इसके लिए जरूरी है कि ये प्रावधान सार्वजनिक व् पारदर्शी होने चाहिए। एक जागरूक समाज में ऐसे चालाक लोगों की पहचान करके उन्हें दण्डित करने का भी प्रावधान होना चाहिए।

प्रजातंत्र की व्यवस्था विकास का सूचक है पर यह जब व्यवस्था भीड़ के हाथों में जाने लगती है तो यह विनाश की और अग्रसर होने के लक्षण हैं। विनाश और विकास का चक्र यह तो सृष्टि में चलता ही रहता है। यही चक्र तो हमारे क्रमिक विकास का माध्यम है।

लेखक परिचय

रुड़की विश्विद्यालय (अब आई आई टी रुड़की) से इंजीयरिंग की और २२ साल तक भारतीय सेना की ई.ऍम.ई. कोर में कार्य करने के बाद ले. कर्नल के रैंक से रिटायरमेंट लिया . चार निजी क्षेत्र की कंपनियों में भी कुछ समय के लिए काम किया।

पढने के शौक ने धीरे धीरे लिखने की आदत लगा दी । कुछ रचनायें ‘पराग’, ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘अमर उजाला’, ‘नवनीत’ आदि पत्रिकाओं में छपी हैं।

भाल्व पब्लिशिंग, भोपाल द्वारा 2016 में "योग मत करो,योगी बनो' नामक पुस्तक तथा एक साँझा संकलन ‘हिंदी की दुनिया,दुनियां में हिंदी’ (मिलिंद प्रकाशन ,हैदराबाद) प्रकाशित हुयी है।

कादम्बिनी शिक्षा एवं समाज कल्याण सेवा समिति , भोपाल तथा नई लक्ष्य सोशल एवं एन्वायरोमेन्टल सोसाइटी द्वारा वर्ष २०१६ में 'साहित्य सेवा सम्मान' से सम्मानित किया गया।

वर्ष 2009 से ‘मेरे घर आना जिंदगी​’ ​(http://meregharanajindagi.blogspot.in/ ​) ब्लॉग के माध्यम से लेख, कहानी , कविता का प्रकाशन। कई रचनाएँ प्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं तथा वेबसाइट (प्रतिलिपि.कॉम, रचनाकार.ऑर्ग आदि) में प्रकाशित हुई हैं।

साहित्य के अनेको संस्थान में सक्रिय सहभागिता है । राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कई गोष्ठियों में भाग लिया है। अंग्रेजी में भी कुछ पुस्तक और लेख प्रकाशित हुए हैं।

निवास : सिकंदराबाद (तेलंगाना)

सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क​ : coldeepakdixit@gmail.com

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