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[मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित - पहला भाग

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[मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित श्री दिनेश चन्द्र पुरोहित ने इस पुस्तक का शीर्षक “ अलाम ” श...

[मारवाड़ का हिंदी नाटक]

यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है।

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लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

clip_image004श्री दिनेश चन्द्र पुरोहित ने इस पुस्तक का शीर्षक अलाम शब्द से शुरू किया, जो पुस्तक की कहानी के लिए पूर्ण उपयुक्त है। हिंदी साहित्य के नाटकों में ऐसे भी पात्र होते हैं जो आदतन शरारती होते हैं, और उन पर किसी का वश नहीं चलता..ये अलाम, जबरे या कुबदी श्रेणी में आते हैं। इस पुस्तक में ऐसे अलाम किरदारों की गतिविधि के बारे में जब आप पढेंगे, तब आप हंसते-हंसते लोट-पोट हो जायेंगे।

रवि रतलामी

[संपादक, ई पत्रिका ‘रचनाकार’]

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प्रकाशक –

राजवीणा मारवाड़ी साहित्य सदन, १४९ अंधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, जोधपुर

[राजस्थान].

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प्राक्कथन

नाटक यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है

लेखक के विचार - यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है नामक हास्य-नाटक मैंने उन कर्मचारियों की हास्य-गतिविधियों को आधार बनाकर लिखा है, जो साथ में उठने-बैठने वाले अपने उन अफ़सरों से परेशान रहते हैं..जो इतने कंजूस हैं कि वे अपने साथ इन साथ उठने-बैठने वाले कर्मचारियों पर एक पैसा ख़र्च नहीं करते। बल्कि, सच्चाई यह है वे अधिकारी लोग इन अधीनस्थ कर्मचारियों से ख़र्चा करवाकर, यश ख़ुद लुट लेते है। ऐसे अफ़सरों से पैसा ख़र्च करवाना, आसमान से तारे तोड़कर लाने के बराबर है। आख़िर, इन कर्मचारियों ने इन अधिकारियों को सुधारने का बीड़ा अपने हाथ में उठा लिया। इस तरह, ये कर्मचारी अपनी तमाम कोशिशें करते हैं, मगर सफ़लता हासिल नहीं कर पाते। क्या कहें..? यहाँ तो इनके साथी अफ़सर मोहनजी इनके बराबर ही बड़े अलाम निकले। जो इनसे दस क़दम आगे रहते हैं, और वे कभी इनके फैलाए ज़ाल में नहीं फंसते। वे तो कोई सच्चा-झूठा बहाना बनाकर, किसी तरह पैसे ख़र्च करने से बच जाते। मोहनजी को इन कर्मचारियों के साथ उठने-बैठने से कोई एतराज़ नहीं है, कभी-कभार रेलगाड़ी में जगह न मिलने पर आली जनाब मोहनजी अपने इन साथियों के साथ पाख़ाने के पास बैठ जाया करते हैं..वहां बैठकर सभी ताश के पत्ते खेला करते हैं। मगर, दूसरे अधिकारी दयाल साहब को पाख़ाने के पास बैठना, अच्छा नहीं लगता। वे इनसे दूरी बनाकर, किसी दूसरे डब्बे में जाकर बैठ जाया करते हैं।

इन लोगों की हास्य-गतिविधियों को आधार बनाकर मैंने ऐसा ताना-बाना बुना है, जिससे नाटक का हर खंड एक-दूसरे से जुड़ा रहे। इस नाटक के कुल १५ खंड है। मुझे आशा है कि, हर खंड को पढ़ते-पढ़ते पाठक हंसते-हंसते लोट-पोट हो जायेंगे। मैंने इस नाटक की कहानी इस तरह तैयार की है, जिससे इस पुस्तक को पूरी पढ़े बिना पाठक की इच्छा इस पुस्तक को रखने की नहीं होगी। क्योंकि, इसकी रफ़्तार ही कुछ ऐसी है कि, पाठक इस पुस्तक को पूरी पढ़े बिना नहीं रह पायेगा। एक बात और है कि, इस नाटक के पात्रों की बोली-चाली और संस्कृति जोधपुर के भीतरी शहर के निवासियों से मिलती है, अत: पाठकों को कई दफ़े ऐसा लगेगा कि, वे इन पात्रों को अच्छी तरह से जानते हैं। इन पात्रों के संवादों में अदब भरा है, इसी कारण जोधपुर के निवासियों की तरह ये एक-दूसरे के नाम के पीछे “जी” या “सा” लगाकर उन्हें संबोधित करते हैं। जैसे गोपसा, मोहनजी, रतनजी आदि, ये इसके ज्वलंत उदाहरण है। इसके अलावा जिन लोगों का परिवेश जोधपुरी “खां” साहब लोगों का है, वे उनकी तरह “जा रिया है” अरे ओ नूरिया, आदि वाक्यों को जोधपुरी खां साहब की तरह बोलते हैं। इनकी यह ऐसी बोली है, जो हिंदी और मारवाड़ी भाषा के संगम से बनी है। मुस्लिम औरतों के वाक्यों में आप मरदूद, नासपीटे, करमज़ले, खबीस आदि गालियों को पायेंगे। ये अल्फ़ाज़, मैंने लबों पर हास्य-लहर लाने के लिए किये। मुझे पूरी आशा है, यह पुस्तक ज़रूर पाठकों को पसंद आएगी।

पाठकों से निवेदन है कि, वे इस पुस्तक को पूरी पढ़कर अपने विचार मेरे ई मेल dineshchandrapurohit2@gmail.com और dineshchandrapurohit2018@gmail.com पर अवश्य भेजें।

आपके ख़त की इन्तिज़ार में

दिनेश चन्द्र पुरोहित

१४९, अँधेरी-गली, आसोप की पोल के सामने, जोधपुर [राजस्थान].

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एफ़ सी.आई. के सेवानिवृत भाई यादव पुरोहित के विचार

श्री दिनेश चन्द्र पुरोहित ने इस नाटक को लिखने का सफ़ल प्रयास किया है। वास्तव में देखा जाय तो रतनजी, ओमजी, रशीद भाई जैसे कई कर्मचारी डिपो में मिल जायेंगे। कोई रतनजी और ओमजी की तरह मेहनती होतें हैं तो कोई रशीद भाई जैसे कर्मचारी अस्थमा, वी.पी. आदि बीमारी का बहाना गढ़कर काम से बचे रहते हैं। इस पुस्तक में डस्ट-ऑपरेटर, पीकर, मज़दूर आदि कर्मचारियों की समस्याओं का उजागर किया है, जो सत्य है। मैं ख़ुद इस महकमे में विद्युत तकनीकी के पद पर कार्य करता था, मैंने स्वयं इन कर्मचारियों की समस्याओं को इन आँखों से देखी है। जो सत्य है। कर्मचारी के सेवानिवृत हो जाने के बाद सरकार उस कर्मचारी की पोस्ट ख़त्म कर देती है व उसके स्थान पर कभी नए कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं करती। यह भी सत्य है, कर्मचारी के सेवानिवृत हो जाने के बाद उसे पेंशन नहीं दी जाती। इस तरह, काम का बोझ और भविष्य सुरुक्षित न होने से कर्मचारी सरकार से संतुष्ट नहीं है। इस नाटक में हास्य-रस की ओट में श्री पुरोहित ने, गुड़ में लपेटकर जिस तरह समस्याओं को पाठकों के सामने रखा है, यह इनका प्रयास तारीफ़े-क़ाबिल है।

यादव पुरोहित

सेवानिवृत विद्युत तकनीकी

जोधपुर।

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इस पुस्तक के कुल १५ खंड हैं, अब आप  - पहला खंड -

माल ज़रूर उड़ाओ, मगर घर का नहीं।

पढ़िए।

नाटक बड़ी अलाम है, यह चांडाल-चौकड़ी। का

पहला खंड

अफसर, जो कोहनी पर गुड़ चढ़ाए रखते हैं...?”

लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

[खंड १ से ख़ास कथन]

ये आली जनाब, चाय क्या पायेंगे..? अरे जनाब, आली जनाब ठहरे, अफसर। जो कोहनी पर गुड़ चढ़ाए रखते हैं..ख़ुद ख़र्चा करते नहीं, मगर अपने नीचे वाले कार्मिकों से ख़र्चा करवाकर यश ख़ुद लुट लेते हैं। ये महाशय तो...

[मंच पर प्रकाश फैलता है, जोधपुर पचेटिया पहाड़ी के पीछे सूरज देव उदय होते दिखायी देते हैं। रफ़त: रफ़त: चारों ओर उनका उज़ाला फैलता जा रहा है, अब उनकी रौशनी में जोधपुर का क़िला ‘मेहरानगढ़’ सोने की तरह चमकने लगता है। पेड़ों पर बसेरा करने वाले परिंदे अपने बसेरे को छोड़कर, भोजन की तलाश में जा चुके हैं। धूप बढ़ती जा रही है, मगर मकान की छत पर नींद के आगोश में पड़े मोहनजी, अभी तक उठे नहीं है। उनकी धर्म पत्नि लाडी बाई, उनको जगाने के लिए सीढ़ियां चढ़कर, मुंडेर पर आ रही है। सीढ़ियों की रेलिंग पकड़कर, वह ज़ोर से आवाज़ लगाती हुई उन्हें कहती जा रही है।]

लाडी बाई – [ज़ोर से आवाज़ देती हुई] – अजी ओ, गीगले के बापू। उठिये, जी। उठिए, जल्दी उठिए। अरे भगवन, धूप तेज़ हो गयी है..! अब कब उठेंगे, आप ?          

[लाडी बाई मोहनजी के बिल्कुल, निकट आ जाती है। फिर आवाज़ देती है, मगर मोहनजी ठहरे बड़े आलसी..जो उठने का नाम नहीं लेते। कई आवाजें लगाने के बाद भी, वे आराम से लेटे हैं। ऐसा लगता है, उनको किसी तरह का, व्यवधान नहीं पहुंचा है। इधर तेज़ हवा के झोंके से, लाडी बाई का रिदका सर से उतरकर कंधे पर आ जाता है। रिदके से वापस सर ढकती हुई, लाडी बाई एक बार और आवाज़ लगाती है। तभी मोहनजी बड़े आराम से अंगड़ाई लेते है, और ओढ़ी हुई चादर हट जाती है। अब उनकी नंगी टांगो का दिखना क्या, यहां तो जनाब मोहनजी ख़ुद ख़ाली कच्छे-बनियान अपने दीदार देने लगे ? यह मंज़र देखना, लाडी बाई को कहां बर्दाश्त...? गुस्से से काफूर होकर, वह अब उन्हें कटु शब्द सुना बैठती है।]

लाडी बाई – [कटु शब्द सुनाती हुई] – उठिए, क्या पड़े हो, सूअर की तरह ? चादर हट गयी है, नंगे दिख रहे हो..?  कहीं छत पर खड़े पड़ोसियों ने, यह नज़ारा देख लिया..तो रामा पीर की कसम, सारी इज़्ज़त ख़ाक में मिल जायेगी कि इसका.....!

मोहनजी – [आँखे मसलते हुए, कहते हैं] – उठ रहा हूं, भागवान। ज़रा, धीरज रखो।

[मोहनजी का यह तौर-तरिका देखकर, अब परेशान होकर लाडी बाई उनके समीप आती है। फिर तकिये के नीचे से लुंगी निकालकर, उनके मुंह पर दे मारती है। इतने में लाडी बाई की निगाह, पड़ोस की छत पर खड़ी पड़ोसन चूकली पर गिरती है। वह मोहनजी की नंगी जांघों को, टकटकी लगाए देखती जा रही है। इस मंज़र को देखकर, गुस्से से लाडी बाई चादर को नीचे खींचकर उनकी जांघें ढक देती है। फिर चूकली पर ज़हरीली नज़र डालती हुई, वह उसे गुस्से में देखती है। फिर क्या ? बेचारी चूकली डरकर झट, सीढ़ियां उतरकर चली जाती है। अब चूकली पर आये क्रोध को लाडी बाई, मोहनजी पर निकालने का प्रयास करती है। गुस्से से हुई लाल सुर्ख आंखो से, मोहनजी को ऐसे देखती है, मानो जंगल की कोई शेरनी अपने शिकार को देखती जा रही हो ? मगर जनाबे आली मोहनजी पर इन नज़रों का कोई प्रभाव होता दिखाई नहीं देता, फिर उनके उठने का सवाल कैसे पैदा होगा ? आख़िर परेशान होकर, उन्हें कड़े लफ्ज़ सुना बैठती है।]

लाडी बाई – [गुस्से से कहती हैं] – भले आदमी, धूप निकल चुकी है। [दोनों हाथों से अपना सर पीटती हुई] ए मेरे रामा पीर, अब तो ये पाली जाने वाली गाड़ी चुका देंगे। है राम। बाद में ऐसे बोलेंगे, जैसे..[मोहनजी की बोली की नक़ल उतारती हुई] के “ए चितबंगी गेलसफ़ी, मेरी गाड़ी चूका दी तूने..

[बेचारे मोहनजी उनके कटु शब्द सुनते-सुनते, कड़ाव में तली जा रही पुड़ी के माफ़िक झिल जाते हैं। वे होंठों में कहते है..]

मोहनजी – [होंठों में ही] – अरे रामसा पीर। यह नार तो नीचे जाती दिखायी देती नहीं, अगर यह कमबख्त यहां इतनी देर यहां खड़ी रह गयी तो सर-दर्द अलग से पैदा कर देगी।

[अब उठने के पहले, वे हमेशा की तरह जोधपुर के क़िले के दीदार करना चाहते हैं। इधर-उधर नज़र दौड़ाकर, वे क़िले को देखने की कोशिश करते हैं। और साथ में, कहते जाते हैं..]

मोहनजी – [किले के सामने नज़र दौड़ाते हुए] – अरे ठोकिरा कढ़ी खायोड़ा मेंहरान गढ़ के किले, तू कहां जा रिया है...?

लाडी बाई – [गुस्से से बेकाबू होकर, कहती है] – कहीं नहीं जा रहा है, यह जोधपुर का क़िला। कल जहां था, आज़ भी वहीँ है।

मोहनजी - क्या कहा, आपने ?

लाडी बाई - मारवाड़ के लोगों की हालत यह है, केइस जोधपुर के क़िले को देखे बिना, उनके हलक़ से रोटी का निवाला नीचे नहीं उतरता।

मोहनजी – भागवान, आगे कहिये।

लाडी बाई - जब भी उठो, उस वक़्त यह क़िला ज़रूर इनको दिखना चाहिए। क़िला चलेगा, तो हम चलेंगे।[परेशान होकर, कहती है] क्यों, मेरा तेल निकाल रहे हो..? उठ जाओ, अब तो भगवान के लिए।

[आख़िर मोहनजी लुंगी पहन कर, तनकर खड़े हो जाते हैं। फिर ज़र्दे की पुङिया, ढूंढने की कोशिश करते दिखायी देते हैं। जिसे वे कहीं रखकर, भूल गए हैं। पुङिया को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते, वे लाडी बाई से पूछ बैठते है।]

मोहनजी – [ज़र्दे की पुङिया ढूंढते हुए] – भली औरत, ज़र्दे की पुङिया मिल नहीं रही है..? [बड़बड़ाते हुए] ओ मेरी ज़र्दे की पुड़िया....तू कहां जा रही है, कढ़ी खायोड़ी.....?

[फिर क्या..? तकिये के नीचे रखी ज़र्दे, चूने की पुड़िया और पेसी बाहर निकालकर, लाडी बाई, उन्हें मोहनजी को थमा देती है। इनके ऐसे बर्ताव से परेशान होकर, लाडी बाई होंठों में ही बड़-बड़ करती है।]

लाडी बाई – [होंठों में ही] – अरे, मेरे रामा पीर। मेरी तो किस्मत फूट गयी, किस बदतमीज़ आदमी के साथ मेरी शादी करवा दी..मेरी मां ने। इस महापुरुष में कोई सभ्यता नाम की कोई चीज़ नहीं, ये तो ख़ाली नाम के मोहनजी है..मगर, काम में पूरे अघोरमलसा..और शक्ल में कहां कृष्ण की तरह मोहित करने वाले आदमी ? ये तो पूरे बुगला, भक्त ठहरे ? थोथा चना, बजता है बहुत। ये कैसे, हितंगिये अफ़सर..? ढाई कमाते हैं, और यहां खाने वाले हैं चार। बस, इनको तो दिखता रहे, जोधपुर का क़िला...और इनके जेब में पड़ी रहनी चाहिए, यह गेलसफ़ी ज़र्दा की पुड़िया।

[मगर, मोहनजी के व्यवहार में, कोई फर्क आने वाला नहीं..? वह क्यों सोचेंगे ? के ‘लाडी बाई अपने दिल में, क्या सोचती जा रही है..?’ वे तो झट ज़र्दे और चूने की पुड़िया खोलकर, पेसी भर लेते हैं। फिर अपनी हथेली पर ज़र्दा रखते हैं। फिर पेसी से चूना हथेली पर रखकर, उसे अंगूठे से ज़र्दे के साथ मसलते हैं। अच्छी तरह मसलने के बाद, दूसरे हाथ से लगाते हैं...उस पर, ज़ोर का फटकारा। ज़र्दे की खंक फैलती है, अब यह खंक लाडी बाई के नासा-छिद्र में चली जाती है। फिर, क्या...? लाडी बाई लगा देती है, छींकों की झड़ी। पल्लू से अपना नाक साफ़ करके, लाडी बाई क्रोधित होकर अनाप-शनाप बकने लगती है।]

लाडी बाई – [गुस्से से] – ऐसी ज़र्दे की तलब, क्या काम की ? पीक थूक-थूक कर, पूरे घर को नाथी का बाड़ा बना डाला आपने। ऊपर से झूठा प्रेम दिखाते हुए, झूठे सपने दिखाते जा रहे हैं आप..? [मोहनजी की आवाज़ की, नक़ल उतारती हुई] ‘लाडी बाई, मेरी जीव की जड़ी। तेरा-मेरा प्यार, महेंदरा-मूमल जैसा।’

मोहनजी – [ज़र्दे को होंठों के नीचे दबाते हुए] – भली औरत, मैंने क्या ग़लत कह दिया आपको..? राम राम, प्रेम की उपमा आप जैसी मोहतरमा को क्यों नहीं अच्छी लगती ?

लाडी बाई – [मज़ाक उड़ाती हुई कहती है] – वाह। क्या कहना है, आपका..?

मोहनजी – [खीजते हुए, कहते हैं] - और ऊपर से मेरे प्रेम को ख़ना जतालाकर, मेरी हर बात का तखालुफ़ करती हैं भागवान..अरे रामसा पीर, किस्मत अच्छी...जो मेरे जैसा धान का अफ़सर, मिला आपको...!

लाडी बाई – [तुनक कर] – अरे क्या कह दिया, गीगले के बापू। धान का अफ़सर..? कभी एक बोरी धान की, इस घर में लाये नहीं ? और कहने लगे, जनाब...

मोहनजी – [बात पूरी करते हुए] - अपने आपको, धान का अफ़सर ? धान का अफ़सर हूं, फिर मुझे कहने में क्यों शर्म आयेगी ?

लाडी बाई – [चिढ़ती हुई कहती है] - ऐसे अफ़सरों को तो मैं, कुत्तों के आगे डाल दूं..क्या काम के..?

मोहनजी – [आंखे दिखाते हुए] – क्या कह रही हो, भागवान..? दिमाग़, ठिकाने तो है..?

लाडी बाई – क्या ग़लत कह दिया, गीगले के बापू..? आप से तो अच्छे हैं, अपनी पड़ोसन चूकली के शौहर। जो जब कभी सरकारी दौरे से लौटते हैं, तब उस अनपढ़ गंवार चूकली के लिए कुछ ना कुछ लेकर आते हैं। और, हाय रामा पीर। यहां मेरी जैसी पढ़ी-लिखी विदुषी महिला, वंचित है..इन सुखों से।

मोहनजी – ऐसा क्या ? नवलखा हार लाकर दे दिया, उस चूकली को..? आप तो ऐसे कह रही है, जैसे कहीं से क़ारू का ख़जाना लाकर वे उस पर लूटा रहे हैं ?

लाडी बाई – [तुनक कर कहती है] – हां, हां..लाते हैं, लाते हैं। सोने-चांदी के गहने, बनारसी सिल्क की साड़ियां और पंच मेवा की मिठाई..और, और..अरे जी उनका क्या कहना है, सदका उतारुं...कहीं मेरी नज़र, उन्हें ना लग जाय ?

मोहनजी – [ज़र्दे से भरे मुंह से ज़र्दा उछालते हुए, कहते हैं] – क्या बोली, भागवान..? चोरी करके लाऊं, या डाका डालकर लाऊं, या लाऊं रिश्वत खाकर..? [आँगन पर, पीक थूकते हुए] ये खीं-खाफ़ की साड़ियां..ग्ग् ग्..गहने..? 

लाडी बाई – [पीक से बचने के लिए, दूर हटती हुई कहती है] – कीमती साड़ियां और गहने तो लाने की, आपमें औकात नहीं। मगर इस घर में चारों ओर थूककर, इसे खाकदान [कचरादान] ना बनाएं तो अच्छा।

[इतना कहने के बाद, सीढ़ियां उतरती हुई कहती है]

लाडी बाई – [सीढ़ियां उतरती हुई कहती है] - अब तशरीफ़ रखिये। आपको पत्ता नहीं, चाय ठंडी हो रही है..? फिर जनाब कहेंगे ‘ऐसी ठंडी चाय क्या पीनी ?’ अरे रामसा पीर, इनसे तो अपना सर खपाना... ?                                     

[लाडी बाई सीढ़ियां उतरती दिखाई देती हैं, और उनके पीछे-पीछे मोहनजी भी नीचे उतरते दिखायी देते हैं। सीढ़ियां उतरते वक़्त, वे सीढ़ियों पर छाये नीम के पेड़ की डाली से दातुन तोड़ लेते हैं। फिर नीचे आकर वाशबेसिन के पास खड़े होकर, दातुन करने लगते हैं। तभी उनका लाडका बेटा “गीगला”, उन्हें याद आता है। फिर क्या ? झट उसे आवाज़ देते हुए, वे कहते हैं।]

मोहनजी – [आवाज़ देते हुए] – ए रे, मेरे कालजे के टुकड़े..गीगलेऽऽ..! तू कहां जा रिया है, कढ़ी खायोड़ा ? अब कहां गिया रे, इधर आ तो सही..बेटा।

लाडी बाई – [सर पकड़कर, ज़ोर से कहती है] – अरे भगवन, कहीं नहीं गया आपका लाडेसर। तड़के उठकर आ गए इसके नालायक साथी, और ले गए इसे अपने साथ क्रिकेट खेलने। अरे गीगले के बापू, अब चाय पीकर जल्दी चले जाइये..बाथ रूम में।

[इतना कहकर, चाय से भरा प्याला पास रखे स्टूल पर रख देती है। फिर, लाडी बाई किचन में चली जाती है। मोहनजी आराम से कांच में देखते हुए, नीम के दातुन से दांत साफ़ करते जा रहे हैं। थोड़ी देर बाद, मंच पर अँधेरा छा जाता है। कुछ वक़्त बाद, घुसलखाने से निकलकर वे डाइनिंग रूम में चले आते हैं। वहां बालों में तेल डालकर, कांच को देखते हुए कंघे से बाल संवारते है। बाल संवारते-संवारते, वे ज़ोर से कह रहे हैं।]

मोहनजी – [बाल सवांरते हुए, ज़ोर से कहते हैं] – अजी ओ, गीगले की बाई। ज़रा सुनो, मैं क्या कह रहा हूं..? अरी भली औरत, ख़ाली पेट यात्रा करनी सहज नहीं है...ज़रा दो परामठों के साथ, आम का अचार लेती आना। रामा पीर, आपका भला करे, इस बन्दे को थोड़ा नाश्ता...

लाडी बाई – [गुस्से में, किचन से बोलती है] – भले आदमी, आपको दिखायी नहीं देता है या नज़र नहीं आता..? या जानकर भी अनजान बन रहे हैं, आप..? आटा पड़ोसन से, मांगकर लाई...फिर रोटियां-सब्जी तैयार करके आपका सट तैयार किया है, और अब सुबह के नौ बज गए हैं।

[चार खानों वाला “भोजन का सट” लेकर आती है, फिर उसे मेज़ पर रखकर कहती है।]

लाडी बाई – [हिदायत देती हुई] – सुन लो, गीगले के बापू। आपको रवाना होते वक़्त हिदायत दे देती हूं, के मुट्ठियों में थूक कर भाग जाने से काम नहीं चलता है, श्रीमानजी। अंधेरा होने से पहले-पहले आप आटा पीसाकर ला देना जी, नहीं तो आगे क्या होगा ? जो आप जानते ही हैं के...

मोहनजी – [बैग में सट और पानी की बोतल रखते हुए कहते हैं] – नहीं तो, क्या..? बोलो आगे, कैंची की तरह चल रही ज़बान पर...अक्समात, अलीगढ़ का ताला कैसे लग गया..?

लाडी बाई – नहीं तो, भूखे सो जाना..फिर, मुझे क्या...? रामजी राज़ी और झालर बाज़ी ...!

मोहनजी – [बैग को बंद करते हुए] – भली औरत, आपको पूरा दिन मिला। फिर क्या किया, आपने..? छोटा सा काम..आटा पीसाने का, आपसे होता नहीं..?

[मेज़ पर रखा क्रीज़ किया हुआ, सफारी सूट उठाकर पहन लेते हैं और तौलिये को खूंटी पर टाक देते है। तभी उन्हें, लाडी बाई की तल्ख़ आवाज़ सुनायी देती है।

लाडी बाई – [तल्ख़ आवाज़ में कहती है] – फिर, आप ख़ुद क्या करते हैं..? मेरी सास का धाबलिया, और मेरी धोती...टाका लगा-लगा कर, काम चला रही हूं।

[सब-टीवी चैनल के टी.वी. सिरियल ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ के नायक जेठा लाल जयंती लाल गड़ा की तरह, अपने दोनों हाथ कमर पर ऐसे रखती है, जैसे वह लड़ने के लिए उतारू हो..? फिर, वापस तल्ख़ आवाज़ में कहती है।]

लाडी बाई – [कमर पर, हाथ रखती हुई कहती है] – आपने शर्म-हया सब बेच खायी है, कब से पागलों की तरह बातें करते जा रहे हैं..आप ? सुनो, मैं आपको, सावधान कर देती हूं..अब आप, कभी इस तरह नहीं बोलोगे...

मोहनजी – तो चुप बैठ जाऊं, क्या..?

लाडी बाई – सुनिए, पहले। [मोहनजी की नक़ल, उतारती हुई कहती है] – नीत की हीणी, आपको शर्म नहीं आती...मेरे खारची जाने के बाद, आप माल-मसाला ठोकण में आगे रहती हैं ? और मुझ बेचारे कढ़ी खायोड़े को, राबड़ी के भी फोड़े पड़ते हैं। [हाथ नचाती हुई, अपनी आवाज़ में कहती है] फिर, मैं बोलूंगी..

मोहनजी – [जेब से रुमाल निकालकर, ललाट पर छाये पसीने को साफ़ करते हुए कहते हैं] – क्यों बिगड़ी सांडनी की तरह, रिड़क रही हो..? देरी हो रही है, मेरी लक्ष्मी। जल्द बांच लो..पाबूजी सा की पुड़।

लाडी बाई – [ठंडी सांसें लेती हुई, आगे कहती है] – देखिये गीगले के बापू, कल घर और आटे की चक्की के बीच चक्कर लगाते-लगाते मैं दोनों टांगों का दर्द ले बैठी। क्या करती, जी..? यह चक्की तो, बंद की बंद....

मोहनजी – आगे क्या हुआ, मेरी मां..?

लाडी बाई – आख़िर पूछा, पड़ोसी से। वह कहने लगा, के ‘बाई क्यूं खोटी हुवै..? चक्की वाळां छोटजी रा भईजी, श्रीजी सरण व्हेग्या है। अबै तौ उठावणा पछै इज़, आ चक्की खुलेला।”                                                       

मोहनजी – फिर, बाद में क्या हुआ..? फटा-फट बक दो, देर हो रही है..!

लाडी बाई – फिर, गयी...बाजरी का डब्बा लेकर, पड़ोसन के घर। वह मीठे नीम की तरह, जराफ़त से बोली, के “भाभीजी, आप क्यों पागलों जैसी बातें करती जा रही है ? बोलिये आप, सेर-भर बाजरी कैसे पीसी जाय ? कैसे कहूं, आपको...? घर में घटी तो है, मगर, उसके चाकड़ी और कील कहां है ? राजूड़े के बापू...”

मोहनजी – आगे बोलो, अपनी बातों की गाड़ी चलती रखो। रोको, मत।

लाडी बाई – आगे बोली के “राजूड़े के बापू, कल या परसों खाती को बुलाकर लायेंगे और....

मोहनजी – फिर क्या हुआ, भागवान ? [धीरे-धीरे कहने लगे] मां का माथा..स्याणी बन गयी..फिटोल कहीं की ? बैठ गयी होगी, पड़ोसन से हफ्वात हांकने..?

लाडी बाई – [आँखे तरेरकर, कहती है] – क्या बड़-बड़ करते जा रहे हैं, आप..? थोड़ा ज़ोर से बोलिए, तो मैं जानू।

[आराम से लम्बी सांस लेती है, फिर आले में पड़ी नशवार की डब्बी उठाती है। फिर चिपटी भरकर, नशवार सूंघती है। चार-पांच छींकें खाने के बाद, वो आगे कहती है।]

लाडी बाई – लो बेटी का बाप, आगे सुनों..क्या कह रही थी, मैं..? के, मेरी मां का माथा..अरे नहीं जी, आपकी मां का माथा। फिर गयी, गीगले के बापू..पाल गाँव, यह डब्बा ऊंचाये ?  

मोहनजी – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] – काहे वक़्त बरबाद करती जा रही हैं, भागवान..? आगे, क्या हुआ ? जल्दी, बयान करो। शहर के हर मोहल्ले में चक्की उपलब्ध है, फिर हफ्वात हांकने के लिए गयी होगी पाल गाँव..अपनी मासी की बेटी, बहन के घर..

लाडी बाई - वहां बड़-बड़ की आवाज़, करती हुई डीज़ल से चलने वाली चक्की से पिसाया आटा। आसियत का अंधेरा पड़ने के बाद घर पहुंची, और आपके इस लाडके गीगले को रोटी बनाकर खिलायी। बाद में..

मोहनजी – अब तो मैं, जाऊं..? अब तक बांच ली होगी आपने, पाबूजी की पुड़ ..?

लाडी बाई – अब मैं आपको सावधान कर रही हूं, वापस आकर बाजरे की बोरी पीसाकर रख देना...ताकि देर-सवेर गेंहू का आटा तैयार न हो तो बाज़री की रोटी तो बन सकती है। नहीं तो, आप जानते ही हैं..

[लाडी बाई का बोलने का भोंपू, बंद होने का सवाल नहीं..? वो तो बके ही जा रही है, रुकने का कोई नाम ही नहीं। लाडी बाई को तो यह भी मालुम नहीं, के ‘उनके शौहर, चुप-चाप जा चुके हैं। और वह यहां खड़ी-खड़ी, बकती जा रही है।’ बरसाली में दाख़िल हो रहे, गीगले ने देख लिया, के ‘उसकी मां खड़ी-खड़ी, पागलों की तरह बकती जा रही है..?’ फिर, क्या..? वह मां के निकट आकर, मां से कहता है।]

गीगला – बाई, आप किस से बातें करती जा रही हैं...? मुझे तो यहां कोई नज़र नहीं आ रहा है, जिससे आप बातें करती जा रही है ?

लाडी बाई – किस से क्या..? तेरे बाप से बात कर रही हूं, और किससे करूंगी..अब, तू बोल। आख़िर, तू कहना क्या चाहता है ?

गीगला – [हंसता हुआ कहता है] – मगर बाई, बापू को गए काफ़ी देर हो चुकी है। अब आप, इन दीवारों को, क्यों सुना रही हैं..? [हंसता है, फिर तालियाँ बजाता हुआ कहता है] बाई गेली, बाई गेली...!

लाडी बाई – [क्रोधित होकर, कहती है] – इधर आ तो एक बार, भंगार के खुरपे। मेरे सामने, बोलता जा रहा है...? तेरा बाप नहीं बोल पाता, मेरे सामने..और तू आया छोटा सा चूहा, मेरे सामने ज़बान चलाता जा रहा है..?  

[यह गीगला तो ठहरा, कुचमादी का ठीकरा। वह निखेत तो जीभ बाहर निकालकर, लाडी बाई को चिढ़ाता जा रहा है। लाडी बाई उसे पीटने के लिए, उसके पीछे दौड़ती है। मगर वह शैतानों का काका दौड़कर, बाहर चला जाता है। मंच पर अब, अंधेरा छा जाता है। थोड़ी देर बाद, मंच रोशन होता है। जोधपुर रेलवे स्टेशन का मंज़र, दिखायी देता है। प्लेटफार्म नंबर पांच पर जाने के लिए, मोहनजी उतरीय पुल की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं। इस वक़्त मोहनजी बहुत ग़मगीन है, वे अपने ज़ख़्मी दिल को संभाल नहीं पा रहे हैं। उनके दिमाग़ में पत्नि के बोले गये कटु-वचन, बार-बार चक्कर लगा कर उनके दिल के क़ुरह को कुरेदते जा रहे हैं। उनका दिमाग़ उनके काबू में नहीं है, बस बेचारे अंतर्मुखी बने बड़बड़ाते ही जा रहे हैं।]

मोहनजी – [बड़बड़ाते हुए] – ऐसी निखेत औरत मिली है मुझ बेचारे ग़रीब को, नालायक़ मेरा खून पी गयी। अरे रामसा पीर, आपको घणी घणी खम्मा। ज़रा, इस औरत को कुछ तो सदबुद्धि दे दो आप..! करूं क्या, इस नागिन पर मेरा कोई ज़ोर नहीं चलता..?

[उनके पास चल रही भिखारन खां साहबणी”, उनके बोले गए जुमले को सुन लेती है। फिर वह ऊंचा मुंह करके, इनको अचरच से देखने लग जाती है। इनकी बड़बड़ाने की आदत, उसकी समझ से परे है। वह होंठों में ही, कहती है..]

खां साहबणी – [होंठों में ही] – हाय अल्लाह पाक। यह आदमी लगता तो है, दानिशमंद समझदार इंसान। मगर, यह क्या ? यह आदमी अब ऐसी पागलपन की हरक़तें क्यों करता जा रहा है..?”

[तभी उतरीय पुल उतरते एक कुली की निग़ाह, इस भिखारन पर गिरती है। उसको इस तरह बांका मुंह किया हुए मोहनजी पर नज़र गढ़ाए, देखकर वह ज़ोर से हंस पड़ता है। फिर हंसता हुआ, एक जुमला बोलकर नीचे उतर जाता है।]

कुली – [हंसता हुआ कहता है] – ए, गतराली निक्कमी रांड। तू इस भोले आदमी के पीछे लग गयी, तो यह मासूम आदमी जिंदा भी नहीं बचेगा।

[मगर, मोहनजी तो अपने ख़यालों में ऐसे खो चुके हैं, उनको कुछ पता ही नहीं...उनके आस-पास गुज़र रहे लोग उनके बारे में क्या-क्या जुमले बोलते जा रहे हैं..? वे तो अभी भी, बड़ाबड़ाते जा रहे हैं..]

मोहनजी – [बड़ाबड़ाते हुए] – कैसे चले, इस पर मेरा ज़ोर इस जहरीली नागिन पर..? अरे, रामा पीर क्या कहूं आपसे ? यह औरत, मेरी ज़िंदगी में आयी पहली औरत नहीं है। [अमिताभ बच्चन की तरह, हथेली आगे बढाते हुए कहते हैं] पहली पत्नी मर गयी, दूसरी भाग गयी..अब, यह है तीसरी।

[मोहनजी की आदत है, वे अपने-आपको अमिताभ बच्चन ही समझते हैं..बोलते वक़्त वे अपने एक हाथ की हथेली, स्वत: आगे बढ़ा दिया करते हैं। जैसे कोई भीखमंगा, भीख मांगता जा रहा हो ? हथेली आगे बढ़ाये, इनको बड़बड़ाते देखते हैं आस-पास गुज़रते लोग। तभी पास से गुज़र रहे मियां कमालुद्दीन ने भी यही सोचा, के ‘शायद इस इंसान की खातूनेखान का, इन्तिकाल हो गया है..? इसलिए बेचारा यह ग़रीब, कफ़न के लिए रुपये मांग रहा है ? झट रहम खाकर बड़े मियां, उनकी हथेली पर दो रुपये का सिक्का रख देते हैं। फिर उनकी मृत बीबी के लिए, दो लफ्ज़ बोलकर आगे बढ़ जाते हैं।]

मियाँ कमालुद्दीन – [हथेली पर सिक्का रखते हुए] – अल्लाह तेरी मरहूम बीबी को ज़न्नत नसीब करे, आमीन। [आगे बढ़ जाते हैं]

[उनको देखकर पीछे आ रहे कई पाकिस्तानी जायरीन, सवाब लेने में पीछे रहने वाले नहीं। उनके पास भारतीय सिक्का न होने पर, वे उनकी हथेली पर पाकिस्तानी सिक्के रखते नज़र आ रहे हैं। मगर, मोहनजी को कहां होश ? वे तो बड़बड़ाते हुए, पुल की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं। प्लेटफार्म पर खड़े जी.आर.पी. इंचार्ज सवाई सिंहजी की निग़ाहें उन पाकिस्तानी जायरीनों के ऊपर उस वक़्त गिरती है, जब वे मोहनजी की हथेली पर पाकिस्तानी सिक्के रख रहे थे। अब वे मोहनजी को संदेह की नज़रों से देखते हैं, फिर कुछ दूर खड़े अपने जवानों को आवाज़ देकर अपने पास बुलाते है। मगर, मोहनजी को इस बात का कोई भान नहीं...वे तो बराबर बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ते ही जा रहे हैं।]

मोहनजी – [बड़ाबड़ाते हुए] – क्या कह रहा था, मैं ? याद आ गया, मुझे। दूसरी भाग गयी..मुझे छोड़कर। और यह तीसरी, मेरे ख़ानदान को चिराग़ देने वाली..मेरे लाडले गीगले को जन्म देने वाली..सौ नखरों में पली हुई, लाडी बाई है।

[तभी एक देहाती आदमी अपने छोटे बच्चे को कन्धों पर बिठाकर पुल उतर रहा था, बेचारे बच्चे को सू-सू लगी हुई है। बेचारा नन्हा-मुन्ना बार-बार अपने अब्बू को कहता आ रहा है, के..]

बच्चा – [रोता हुआ, कहता है] - अब्बू, मुझे सू-सू लगी है। सू-सू लगी है..ज़ोर की लगी है, अब्बू।

[मगर, वह देहाती उसकी बात सुन नहीं रहा था। क्योंकि, उसकी खातूनेखान उससे काफ़ी आगे निकल गयी थी। आख़िर उस बच्चे की लघु-शंका की समस्या नाक़ाबिले बर्दाश्त हो जाती है, बर्दाश्त न होने पर वह सू-सू की धार चला देता है। वह धार सीधी जाकर, ख़यालों में खोये मोहनजी के काली सफ़ारी सूट पर आकर गिरती है..खुदा जाने, क्यों नहीं उनकी ख़यालों की दुनिया में कोई ख़लल पैदा होता दिखाई देता है ? वे तो लगातार बड़बड़ाते हुए, पुल चढ़ते जा रहे हैं।]

clip_image002[4]मोहनजी – [ख़यालों में खोये हुए, जनाब बड़बड़ाते जा रहे हैं] - दस साल पहले इस गीगले का जन्म हुआ, उस वक़्त को याद करता हूं, तब वे सारी दर्द-भरी यादें उभर जाती है..मेरे मानस में।

[उतरीय पुल के मध्य समतल हिस्से पर खड़ा गुलाबा नामक हिज़ड़ा, अपने बैग से केला निकालता है। फिर केला छिलता हुआ, वह मोहनजी की कही बात सुन लेता है। वह सोचने लगता है..]

गुलाबा – [होंठों में ही] – अरे रामसा पीर। इस कमबख्त का छोरा भी पैदा हो गया, और मुझे मालुम नहीं ? अब कहां सारे मियें मर गये, और रोज़े घट गए..? अब भी मैं इसकी जेब ख़ाली करवाकर, नेत वसूल कर लूंगी।

मोहनजी – [बड़बड़ाते हुए] - तब जवानी ढल रही थी, पैसे से पूरा टूट चुका था। बस अस्पताल जाना, और भारी बिलों का भुगतान करना। मगर अब..मैं इस गीगले को अपनी पलकों से दूर होने नहीं देता, यह छोरा किधर भी जाता है..और बस फ़िक्र के मारे, एक ही जुमला बरबस मेरे मुंह से निकल पड़ता है के कहां जा रिया है, कढ़ी खायोड़ा..?”

[इस तरह बड़बड़ाते हुए मोहनजी, बार-बार अपना तकिया-क़लाम कहां जा रिया है, कढ़ी खायोड़ाको बोलते ही जा रहे हैं, और बदहवाशी में चलते-चलते आ जाते हैं....उतरीय पुल के, मध्य समतल हिस्से पर। जहां से, दूसरे प्लेटफार्म पर उतरने की सीढ़ियां लगी है। वहां चलते-चलते, वे आगे चल रहे सरदार निहाल सिंह से टक्कर खा बैठते हैं। टक्कर लगते ही बेचारे सरदारजी जाकर गिर पड़ते हैं, पास खड़े किन्नर गुलाबो के ऊपर। बेचारा गुलाबा किन्नर, खड़ा-खड़ा अरोग रहा था केला। केला खाकर जैसे ही वह छिलके को नीचे गिराता है, बस तभी सरदारजी धड़ाम से आकर उसके ऊपर गिर पड़ते हैं। वह बेचारा कोमल बदन वाला हिंज़ड़ा, कैसे सरदारजी का वज़नी शरीर को संभाल पाता ? बस, फिर क्या ? चिल्लाता हुआ आकर गिरता है, उस केले के..छिलके के, ऊपर। छिलके के ऊपर गिरते ही, वह बेचारा ऐसे फिसलता है मानो वह बर्फ की शिला पर फिसल रहा हो..? उठते वक़्त वह अपना पाँव वापस रख देता है, उसी केले के छिलके के ऊपर। बस, फिर क्या...? क़िस्मत का मारा, बेचारा गुलाबा, एक बार और गिरता है फ़र्स पर। उसके गिरने की आवाज़ सुनकर, मोहनजी ख़यालों की दुनिया से निकलकर लौट आते हैं वर्तमान में। अब इस मंजर को देखते ही, मोहनजी ठहाके लगाकर हंसते हैं। उनका ठहाका लगाकर हंसना, गुलाबा को काहे पसंद आये..? बस वह कुचमादिया का ठीईकरा, मोहनजी के गले पड़ जाता है। फिर, क्या ? वह उन्हें बाहुपोश में झकड़कर, उनके तकिया-क़लाम की..यूं के यूं, नक़ल कर बैठता है।]

गुलाबो – [तकिया-क़लाम की, नक़ल उतारता हुआ] – कहां जा रिया रे, कढ़ी खायोड़ा मेरे सेठ..? [मोहनजी को अपने बाहुपोश में झकड़ लेता है] अब मैं तो कहीं नहीं जा रही हूं, मेरे सेठ। खम्मा घणी सेठ, अब आप खोल दीजिये कड़का-कड़क नोटों की गड्डी...नहीं तो मैं आपकी पतलून की चेन खोल दूंगी, और फिर आपकी चड्डी का..? 

[इतना कहकर, गुलाबा उन्हें छोड़ देता है। फिर वह उनके चारों और ताली बजाता हुआ, नाचने लगता है। इतने में सीढ़ियां चढ़कर आ रहे उसके दूसरे साथी हिंज़ड़े भी, नाच में शामिल हो जाते हैं। इन हिंजङो को नाचते देखकर, सरदारजी का दिल भी नाचने के लिए उतावला होता जा रहा है। आख़िर, सरदारजी अपने दिल को काबू में नहीं रख पाते। और पंजाबी गीत गाते हुए, सरदारजी भांगड़ा डांस कर बैठते हैं।]

निहाल सिंह – [नाचते हुए, गाते हैं] – अरी कुड़ी पंजाबण आ गयी, मेनु दिल को चुरा कर ले गयी..हाय हाय रबा अब क्या करूं, ना इधर का रहा न उधर का रहा। अरी कुड़ी पंजाबण आ गयी, मेनु दिल को चुरा कर ले गयी।”

[अब इस पुल के ऊपर आते-जाते यात्रियों की भीड़ जमा हो जाती है, और अब इस भीड़ में खड़े ये तमाशबीन तालियाँ बजा-बजा कर मज़े लेते जा रहे हैं। कई मुसाहिब तो ऐसे रसिक हैं, जो खुश होकर, इन हिज़ड़ो पर रुपयों की बरसात करते जा रहे हैं। अब तो चारों तरफ़ कोलाहल-पूर्ण वातावरण बन जाता है, कई रेलवे मुलाज़िम भी वहां आकर, इस मज़में में सम्मिलित हो जाते हैं। शान्ति भंग होती जा रही है, तभी टी.टी.ई. आसकरणजी और जी.आर.पी. के जवान अपने इंचार्ज सवाई सिंहजी के साथ वहीँ आ जाते हैं। आसकरणजी बैग से चालान डायरी बाहर निकालकर, सवाई सिंहजी से कहते हैं, के..]

आसकरणजी – [सवाई सिंहजी से] – बोलो, सवाई सिंहजी। इस मूंछों वाले मानुष ने भीड़ एकत्रित करके, स्टेशन की शान्ति भंग की या नहीं...?

[अब सवाई सिंहजी को पाकिस्तानी जायरीनों वाली बात, याद आ जाती है। फिर, क्या ? वे इरादा कर लेते हैं, के ‘मोहनजी को हवालात ले जाकर, उनसे पूछ-ताछ करनी ज़रूरी है। आखिर, उनके क्या सम्बन्ध हैं इन पाकिस्तान जायरीनों के साथ ?’ अब वे झट, आसकरणजी से चालान डायरी ले लेते हैं..]

सवाई सिंहजी – [आसकरणजी से चालान डायरी लेते हुए कहते हैं] – जी हां, आपने शत प्रतिशत सही कहा। अरे जनाब, यह तो पूरा चार सौ बीस मिस्टर नटवर लाल है, इसने न मालुम क्यों इन पाकिस्तानी जायरीनों से..

गुलाबा – [रोनी सूरत बनाकर] – साहब, नटवर लाल क्या..? यह तो एक नंबर का गुंडा है, इसने धक्का देकर सरदारजी को मेरे ऊपर गिरा दिया। साहब, आप इसे गिरफ्तार कर लीजिये।

सवाई सिंहजी - [गुलाबा से कहते हैं] – क्यों रे, गुलाबा..? हवालात के अन्दर इसे ले जाने के लिए तेरी और सरदारजी की गवाही बहुत ज़रूरी है, या नहीं..? [मोहनजी से कहते हैं] बोल भाई, तेरा क्या नाम लिखूं..?

मोहनजी – [भयग्रस्त होकर धूजती जबान से] – हुकूम, फु..फु..फुठरमल कढ़ी खायोड़ा।

[कढ़ी खायोड़ा तकिया-क़लाम’ सुनते ही, वहां खड़े तमाशबीन ज़ोर से हंसी के ठहाके लगाते हैं। इधर चालान डायरी को देखते ही, मक्खी-चूष मोहनजी का पूरा बदन धूजने लगता है। फिर, क्या..? एका-एक मोहनजी के धूजते हाथों में पकड़ी हुई पानी की बोतल, नीचे गिर पड़ती है। इधर बेचारे मोहनजी को पत्ता नहीं, के ‘उस बोतल का ढक्कन ढीला था..!’ इस कारण गिरते वक़्त वह ढक्कन खुल जाता है, और पानी से उनकी पतलून [पेंट] गीली हो जाती है। अब वह गीली पतलून, सरदार निहाल सिंह की निगाहों में आ जाती है। वे इस गीली पतलून को देखते ही, ठहाके लगाकर हंस पड़ते हैं। फिर किसी तरह अपनी हंसी दबाकर, सरदारजी सवाई सिंहजी से शिफ़ाअत लगा बैठते हैं। और उधर ठोकिरे गुलाबे को, हास्य-विनोद की मीठी चिमटी काटने की कुबद पैदा हो जाती है। वह अपनी कमर लचकाता हुआ आता है, मोहनजी के पास। उनके पास आकर, ताली बजाकर उनसे कहता है।]

गुलाबो – ओ, मेरे सेठ। आप कहो तो, चार ठुमका लगाकर सवाई सिंहजी को रेडी-रेड कर दूं ? और, आपका मामला निपटा दूं चुटकियों में। मगर जनाब, आपको नोटों की गड्डी खोलनी होगी।

[मोहनजी को कहां पसंद, के कोई हिंज़ड़ा बीच में आकर उनके मामले को सुलझाये..? बस, फिर क्या..? जनाब एक धक्का मारते हैं, उस बेचारे को..और, उसे एक और धकेलकर हटा देते हैं। उस हिंज़ड़े को एक तरफ़ धकेले जाना, मोहनजी के लिए भारी महंगा सौदा साबित होता है। क्योंकि, धकेले जाने पर वह हिंज़ड़ा गिर पड़ता है सवाई सिंहजी के ऊपर। बेचारे सवाई सिंहजी मुंह बाएं गिर पड़ते है, सरदार निहाल सिंह के ऊपर। सरदार निहाल सिंहजी ठहरे, पंजाबी सरदार..! जिन्होंने पानी पी रखा है, पंजाब का। फिर क्या..? अपनी फड़कती भुजाओं से जनाब थाम लेते हैं, जी.आर.पी. के रणबंका बांकड़ली मूंछों वाले इंचार्ज सवाई सिंहजी को। फिर आंगन पर गिरी चालान डायरी को उठाकर, सवाई सिंहजी को थमा देते हैं। फिर हाथ जोड़कर, कह देते हैं..]

निहाल सिंह – [हाथ जोड़कर, कहते हैं] – अरे साहब, आपका रब भला करेगा..बस आप इस मूंछों वाले आदमी को छोड़ दीजिये, ना। देखो, इसकी पतलून की क्या हालत हो गयी ? यह तो डरकर मूतता जा रहा है, नामाकूल। वाहे गुरु, ऐसा मोटा इंसान मूतता मेनु कभी देख्या नहीं। आप तो इसे मुआफ़ करो, हुजूर।

[गुलाबा और सरदार निहाल सिंह की बातें सुनकर, सभी हाज़िर लोग मोहनजी गीली पतलून देखते हैं। अब इन महापुरुष की गीली पतलून देखकर, उपस्थित लोग अपनी हंसी को दबा नहीं पाते..बरबस सभी ठहाके लगाकर, हंसते जा रहे हैं। अब सवाई सिंहजी व आसकरणजी का दिल, इस तमाशे को देखकर बाग़-बाग़ हो जाता है। अब, वे भी ज़ोर-ज़ोर से, हंसी के ठहाके लगाते हैं। इन ठहाकों की गूंज, दूर बैठे मोहनजी के साथी सेवाभावी रशीद भाई के कानों में जाकर गिरती है। फिर, क्या...? सेवाभावी से वहां, बैठा रहा नहीं जाता। जनाब झट उठकर, आ जाते हैं यहां। यहां बेचारे मोहनजी को पुलिस और टी.टी.ई. के सीखंजे में पाकर, रशीद भाई दुखी हो जाते हैं। आसकरणजी को देखते ही वे पहचान जानते हैं, के ‘ये जनाब तो वही भा’सा है, जो बड़ी वाली चताणी व्यास की गली में रहते हैं..जो पुष्ठीमार्गीय वल्लभ कुल सम्प्रदाय के चौपासनी वाले गुसाईजी महाराज के चेले हैं, और बाल गोपाल के परम भक्त हैं।’ झट वे आसकरणजी के निकट आकर, उनसे शीरी ज़बान से कहते हैं..]

रशीद भाई – [शीरी ज़बान से, कहते हैं] – भा’सा, जय श्री कृष्ण। यह क्या कर रहे हैं, जनाब..? अजी जनाब, आपको क्या कहूं ? ये मोहनजी भी, हमारे एम.एस.टी. वाले साथी है। अब लीजिये, आप तैयार सुर्ती..

[जेब से ज़र्दे की पुड़िया बाहर निकालकर, हथेली पर थोड़ी सुर्ती रखकर उनकी मनुआर करते हैं।]

रशीद भाई – [हथेली पर सुर्ती रखकर] – भा’सा, लीजिये मालिक चखिए कलकत्ती जर्दा । इसको होंठों के नीचे दबाते ही, आपकी कली-कली खिल जायेगी..! जनाब आपकी दुआ से, अक़सर मैं असली कलकत्ती ज़र्दा ही रखता हूं ।

[आसकरणजी हथेली से सुर्ती उठाकर, होंठों के नीचे दबाते हैं। फिर अपने लबों पर मुस्कान छोड़कर, रशीद भाई से कहते हैं..]

आसकरणजी – जीते रहो, खां साहब। आपके घुटने, हमेशा सलामत रहे। अब कहिये, हमारे लायक कोई काम।

रशीद भाई – मालिक, माफ़ कीजिये, हमारे साहब मोहनजी को। भले आदमी है, बेचारे।

[मोहनजी से बैग लेकर, फिर उनसे कहते हैं]

रशीद भाई – [बैग लेकर, मोहनजी से कहते हैं] - अरे साहब, आप इनको जानते नहीं, ये टी.टी. साहब हमारे मालिक है...आप तो झट भूल गये, इन्हें।

मोहनजी – मैं तो भूल गया, रशीद भाई। अब आप, वापस याद दिला दीजिये।

रशीद भाई – [ज़र्दे की पुड़िया जेब में रखते हुए कहते हैं] - ये वही टी.टी. साहब “आसकरणजी भा’सा” है, जो आपको आरक्षित कोच में बैठने देते हैं। आप कभी इनसे, पगेलागणा करते नहीं। तब, ये कैसे पहचानेंगे आपको..? [रौब में] अब करो, इनको पगेलागणा।

[फिर, क्या..? रशीद भाई मोहनजी पर रौब गांठकर, जबरदस्ती उनसे पगेलागणा करवा देते हैं। आसकरणजी भा’सा राज़ी होकर, मोहनजी को खूब दुआएं देते हैं।]

रशीद भाई – अरे मोहनजी, बिदामें खाना चालू कर दो, आपकी भूलने की बीमारी बढ़ती जा रही है। कल तो आप हमारी भाभीसा को भी, भूल जाओगे..?

आसकरणजी – [सवाई सिंहजी को, जाने का इशारा करते हैं] – सवाई सिंहजी, अब आप जाइये। ये तो, अपने आदमी ही निकले।

[आसकरणजी को चालान डायरी सौंपकर, सवाई सिंहजी अपने कांस्टेबलों के साथ पुल की सीढ़ियां उतरकर चले जाते हैं। उन लोगों के चले जाने के बाद, मोहनजी आसकरणजी से कहते हैं, के..]

मोहनजी – [रोनी सूरत बनाकर, कहते हैं] – साहब, पतलून के अन्दर मैंने पेशाब नहीं की। जनाब, बोतल का ढक्कन ढीला था। उससे पानी निकलकर, पतलून पर गिर गया..!

रशीद भाई – [रौब गांठते हुए] – अरे साहब, अब झूठ मत बोलो। आसकरणजीसा स्याणा मिनख है, इसका मतलब यह नहीं के वे “गेले-गूंगे” हैं..मानो, उनको कुछ दिखाई नहीं देता..?

मोहनजी – क्या कहा, आपने..?

रशीद भाई - रामसा पीर की कसम खाकर कहता हूं, अब अगर आप झूठ बोले तो ज़रूर आसमान से धोलिये भाटे [ओले] गिरेंगे आपकी टाट पर।

[मोहनजी का हाथ थामकर, रशीद भाई उनसे कहते हैं।]

रशीद भाई – [उनका हाथ थामकर, कहते हैं] – अब चलिये मोहनजी, प्लेटफार्म नंबर पांच पर। गाड़ी आने का वक़्त हो गया है, चलिये..चलिए, जनाब।

[मोहनजी का हाथ थामकर, रशीद भाई पुल की सीढ़ियां उतरते दिखायी देते हैं। थोड़ी देर बाद, वे प्लेटफार्म नंबर पांच पर पहुंच जाते हैं। अब रशीद भाई उन्हें प्लेटफार्म पर रखे तख़्त [bench] पर बैठाकर, उनका बैग उन्हें सम्भला देते हैं। अब ठंडी ताज़ी हवा का अहसास पाकर, वे लम्बी-लम्बी साँसें लेते हैं। इतने में दाल के बड़े बेचने वाला वेंडर, अपना ठेला तख़्त के पास लाकर खड़ा करता है। अब तले जा रहे दाल के बड़ों की ख़ुशबू, चारों तरफ़ फ़ैल जाती है। यह ख़ुशबू, प्लेटफार्म पर बैठे यात्रियों की भूख बढ़ाती जा रही है। मोहनजी को उस झग़ड़े से बचाना, कोई हंसी-खेल नहीं था। बेचारे रशीद भाई, काफ़ी थक गए हैं। इधर इनको अस्थमा की बीमारी अलग से है, इस कारण वे हाम्फते-हाम्फते कहते हैं..]

रशीद भाई – [हाम्फते-हाम्फते कहते हैं] – खुदा रहम। अब कहीं जाकर साँसें ठिकाने आयी, और अब कलेज़े को ठंडक मिली। [वेंडर के ठेले में, तले जा रहे बड़ों को देखते हुए] मोहनजी, वाह क्या ख़ुशबू आ आ रही है इन लज़ीज़ बड़ों से..?

मोहनजी – [बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहते हैं] – रशीद भाई। आपको पूरे दिन दिखायी देते हैं, ये आकरे-आकरे बड़े..? अब क्या कहूं, कढ़ी खायोड़ा रशीद भाई आपको ? अगर खावण-खंडा कह दूं, वह भी ग़लत नहीं होगा। आगे क्या कहूं, आपको ? आपको यह दिखायी नहीं दिया, के...!

रशीद भाई – क्या फरमाया, हुज़ूर ? मैं तो सेवाभावी ठहरा, सबको एक नज़र से देखता हूं, जनाब।

मोहनजी – रशीद भाई कढ़ी खायोड़ा, एक नज़र से क्यों देख रहे हो भाई ? काणे हो, क्या ?

रशीद भाई – साहब आप मुझे कुछ भी कह दीजिये, मैं बुरा नहीं मानूंगा। मगर अभी आप इन तले जा रहे आकरे-आकरे बड़ों की बात कर रहे थे, मालिक ? अगर आपको बड़े खाने हैं, तो दे दीजिये पैसे। अभी ले आता हूं, ये आकरे-आकरे बड़े।

मोहनजी – बड़ों को मारो गोली, अब मैं यही बात साफ़-साफ़ कहूंगा..के, आपको कुछ दिखायी नहीं देता ? के, इस हिंज़ड़े के झगड़े में मेरे दो रुपये गुम हो गए..? आपको कुछ भी पता नहीं, फिर कैसे बन बैठे मेरे हितेषी..कढ़ी खायोड़े..?

रशीद भाई – [अन्दर ही अन्दर, पछताते हुए] – हाय ख़ुदा, यह कैसा है मेरा साथी..? यह पशु है, या इंसान..? तू जाने, मेरे परवरदीगार। इसको हिंज़ड़े से बचाया, टी.टी. बाबूजी के जुर्माने से बचाया, मगर..कहां गया, मेरा अहसान..? इस खोजबलिये ने तो, दो रुपये का इलज़ाम मेरे ऊपर लगा दिया..? अच्छा होता, मैं उस हिंज़ड़े की तरफ़दारी करता..! ख़ुदा रहम, उस हिंज़ड़े की दुआ तो काम आती..?                           

[अब रशीद भाई के चेहरे पर, ग़म के बादल छाने लगते हैं। इस स्थिति में उन्हें मालुम नहीं होता, के “रतनजी, ओमजी और अन्य एम.एस.टी. वाले मित्र यहां आ चुके हैं, और सभी उनके पास आकर तख़्त पर बैठ गए हैं।” तले जा रहे आकरे-आकरे बड़ों को देखकर, अब रतनजी कहते हैं..]

रतनजी – [बड़ों की सुगंध का अहसास पाकर, कहते हैं] – दाल के बड़े, वाह रशीद भाई कैसी ख़ुशबू आ रही है..? [रशीद भाई का कंधा थपथपाते हुए] अरे रशीद भाई, कहां खो गए भाई ? कही आप यहां बैठे-बैठे, इन लज़ीज़ बड़ों को खाने का सपना तो नहीं देख रहे हैं..? वाह क्या मंजर होगा, इस सपने का....? कहीं ये गरमा-गरम बड़े ख़ुद चलकर आपके मुंह में घुसते जा रहे हैं..?   

रशीद भाई – [अपना दिल जलाते हुए, कहते हैं] – सपना तो सपना ही होता है, जनाब। सच नहीं होता।

मोहनजी – [जेब में हाथ डालते हुए, कहते हैं] – केवल दो रुपये ही खोये हैं, या और कुछ..? [हथेली पर सिक्के रखकर, उन्हें देख़ते हुए] अरे रामसा पीर, ये पाकिस्तानी सिक्के कहां से उड़कर आ गए मेरे पास ? ओ कढ़ी खायोड़ा, सुन रहे हो..?

रशीद भाई – आये कहाँ से ? प्लेटफार्म पर आये पकिस्तान के जायरीनों ने आपको भिखारी समझकर दे दी होगी, खेरात...और क्या ? आख़िर, परायों की चुपड़ी रोटी खाने से ही आपको आनंद मिलता है।

ओमजी – [हंसी उड़ाते हुए कहते हैं] – अच्छा हुआ जनाब, पाकिस्तानी जायरीन भीख में इतने सारे सिक्के देकर चले गए आपको ? अब तो जनाब, हिसाब बराबर..?

रतनजी – रमजान चल रहा है, सवाब तो उनको लेना ही था..ये बेचारे, कब-कब जाते हैं ग़रीब-नवाज़ की मज़ार पर..? पाक-स्थान पर आयें और खेरात न निकाले...ऐसा कैसे हो सकता है ?

[अब उनके साथी ओमजी, रशीद भाई का उतरा हुआ चेहरा कैसे देखते ? मोटर-साइकल की चाबी को बार-बार घुमाते हुए, वे कहते हैं...]

ओमजी – [चाबी घुमाते हुए, कहते हैं] – अरे रशीद भाई, ऐसे मत बोलो मेरे भाई के ‘सपना तो सपना ही होता है।’ आप जानते नहीं, जहां अफ़सर बिराजमान होते हैं..वहां सपना नहीं, असली मंजर होता है जनाब।

[मोहनजी सिक्के गिनकर जेब में डाल देते हैं, उनके दिल को राहत पहुँचती है..जो पैसे गये हैं, वे डबल होकर लौट आये।]

मोहनजी – [सिक्कों को, जेब के हवाले करते हुए] – अब क्या गिनना, इन सिक्को को ? मगर दो रुपये का नुकसान तो हुआ ही है, इस गुलाबे के झोड़ में।

ओमजी – [मोहनजी पर, निग़ाह डालकर कहते हैं] – अब गिनने का काम, बंद कीजिये। जनाब मोहनजी, मेरी बात सुनिये। जो मैंने कहा, मालिक..वो सच्च है या नहीं..? मालिक, आप हो हमारे अफ़सर। बस अब आप, ये गरमा-गरम बड़े खिला दीजिये हमें।

रशीद भाई – [मुस्कराते हुए] – ऐसे कहो, भाईजान। के, ‘जहां अफ़सर बिराज़मान होते हैं, वहां खर्चा अफसरों को ही करना पड़ता है।’ बस यही क़ायदा है, इस ख़िलक़त का।

ओमजी – [मुस्कराते हुए] - अगर हम लोगों ने खर्चा कर डाला तो, आपकी थू-थू हो जायेगी। खर्चा तो हम कर देंगे, इसमें हमारा कुछ नहीं जायेगा। केवल आप ही बदनाम होंगे, के आपने हम जैसे छोटे आदमियों के बड़े खा लिए। [रतनजी से] कहिये रतनजी, सच्च कहा या झूठ ?

रतनजी – [हंसते हुए, मोहनजी से कहते हैं] – साहब, बात तो ओमजी ने मार्के की कही है। हम तो आपका ख़्याल रखकर, कह रहे हैं। खर्चा न करने से, बदनामी होगी तो आपकी होगी। हमें, क्या ?

[इतना सुनने के बाद भी, मोहनजी अपने मुंह से एक शब्द नहीं निकालते हैं। और बैठ जाते हैं, चुप-चाप..भोले पंछी जैसा मुंह बनाकर। कुछ देर बाद मुंह से थूक उछालते हुए, कहते हैं के..]

मोहनजी – [मुंह से थूक उछालते हुए, कहते हैं] – खिला देता, यारों..ये आकरे-आकरे बड़े। मगर करूं, क्या..? जेब में पड़े थे दो रुपये, इस गुलाबा के झग़ड़े में गुम हो गए। यह देखो इधर, ये बैठे हैं कढ़ी खायोड़े रशीद भाई..मेरे हितेषी। आख़िर, इन्होंने क्या ध्यान रखा मेरा..?

[बेचारे रशीद भाई, लाचारगी से उनका मुंह ताकने लगे। आख़िर यह कैसा है, यह इंसान..? यह तो बार-बार सुनाता ही जा रहा है, के ‘सारी ग़लती मेरी है..?’ फिर, क्या..? बेचारे रशीद भाई बैठ गये, चुप-चाप। उनको इस तरह चुप बैठे देखकर, मोहनजी का चुप बैठे रहना..उनके वश की बात नहीं। झट अपने बोलने का भोंपू, रशीद भाई की ओर घुमा देते हैं। और फिर वापस, बोलना शुरू कर देते हैं।]

मोहनजी – रशीद भाई, मेरे दो रुपये खो गये..यह बात, आपसे छुपी नहीं है। अब आप खरगू की तरह, चुप-चाप क्यों बैठे हैं..? कमबख्त इन बड़ों की सुगंध ने, अब भूख बढ़ा दी है मेरी...

रशीद भाई – [बात काटते हुए, कहते हैं] – साहब, आप घर से भूखे निकलने वाले पूत नहीं हैं।

मोहनजी – क्या करूं, रशीद भाई..? सुबह-सुबह भागवान ने नाश्ता करने नहीं दिया मुझे, कहने लगी मुझे के “नौ बज गयी है, अब आप गाड़ी चूक जाओगे।”

[जेब से ज़र्दे की पुड़िया और पेसी निकालते हैं। फिर सुर्ती तैयार करने के लिये, ज़र्दे व चूने को हथेली पर रखते हैं। उस ज़र्दे और चूने को मिलाकर, उन्हें अंगूठे से अच्छी तरह से मसलते हैं। फिर दूसरे हाथ से लगाते हैं, ज़ोर का फटकारा। फिर क्या..? ज़र्दे की खंक उड़ती है, पास बैठे सभी साथियों के नासा-छिद्रों को खोल देती है। और बिना सर्दी-जुकाम, वे छींकों की झड़ी लगा देते हैं। फिर आराम से उस तैयार सुर्ती को, मोहनजी अपने होंठों के नीचे दबाकर कहते हैं..]

मोहनजी – [मुंह से ज़र्दा उछालते हुए, कहते हैं] – बे-शउर भागवान के कारण, मुझे घर से भूखा आना पड़ा। अब मैं भूखा मर रहा हूं, आप लोगों में से कोई भला आदमी मुझे..

रतनजी – [बात काटते हुए कहते हैं] – भगवान का शुक्र है, साहब ने आज़ हम बदमाशों को भला तो कहा है। [मोहनजी से कहते हैं] अच्छा साहब, आप आगे क्या कह रहे थे ?

[मोहनजी के मतलब की बात, सुनने को तैयार हैं रतनजी। जानकर, वे खुश हो जाते हैं]

मोहनजी – [पीक थूककर, कहते हैं] – बाबा रामसा पीर के नाम कोई मुझे बड़े खिला दे, तो बाबा रामदेव उनका भला करेगा। [रोनी सूरत बनाकर] अरे रामसा पीर, हाय मेरे दो रुपये..कहां गुम हो गये..? अगर मेरे दो रुपये नहीं खोते, तो तो मैं ज़रूर आप लोगों को गर्म-गर्म बड़े खिला देता।

रशीद भाई – हां, हुकूम। अब तो सब लोग जान गये हैं, आपके दो रुपये गुम गये हैं और वे खोये रुपये वापस लौटकर भी आ गए हैं...पाकिस्तानी करेंसी बनकर। [होंठों में ही] बड़े आये, दानवीर कर्ण बनकर..? ऐसा वेंडर कहां मिलेगा, जो दो रुपये के बड़े तोलकर दे देता इनको  ?

[आख़िर सभी जानते हैं, तेल तो तिलों से ही निकलता है। इस कारण रशीद भाई को अपनी जेब से ही, बीस रुपये निकालकर उस बड़े वाले वेंडर को देने पड़े..! वेंडर को रुपये थमाकर, उससे कहते हैं..]

रशीद भाई – [वेंडर को बीस रुपये थमाते हुए, कहते हैं] – ऐ रे मेरे बड़े भाई, तू फटाफट ढाई सौ ग्राम गरमा-गरम बड़े तोल कर दे दे...

[ढाई सौ ग्राम बड़े तोलकर, वेंडर उन्हें बड़े अख़बार पर रखकर रशीद भाई को थमा देता है। साथियों को खिलाने के लिये, रशीद भाई बड़ो को तख़्त पर रखते हैं। फिर रशीद भाई, उनसे कहते हैं]

रशीद भाई – लो साथियों, अब चेप लो..आकरे-आकरे, गरमा-गरम बड़े। जल्दी करो, साथियों। कहीं ये बड़े, ठंडे ना हो जायें ? 

[अब बड़े खाने का मंजर कुछ अजीब सा लग रहा है, हर एक साथी एक-एक बड़ा जहां उठाता है, वहां मोहनजी उठाते हैं चार-पांच बड़े एक साथ। इस मंजर को देखते हुए, रशीद भाई सोचते जा रहे हैं..]

रशीद भाई – [सोचते हुए] – असली अफ़सर वे होते हैं, जो अपनी कोहनी पर गुड़ लगाये रखते हैं। वे कभी खर्चा करते नहीं, मगर अपने अधीनस्थ मुलाज़िमों से खर्चा करवाकर..ख़ुद दूसरों से, वाही-वाही लूट लेते हैं इन बेचारे ग़रीब मुलाज़िमों को तो, अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए खर्चा करना ही पड़ता है।

[इधर मोहनजी कुछ अलग ही सोच रहे हैं, के ‘मुझे बड़े खाते देखकर यह खोड़ीला-खाम्पा रशीद भाई, कहीं मुझ पर बुरी नज़र ना लगा दे..?’]

मोहनजी – [होंठों में ही] – क्यों मेरे सामने देख रहा है, कढ़ी खायोड़ा रशीद..? खाने दे रे, मत लगा रे नज़र। निखेत, करमठोक इंसान। क्यों इन एम.एस.टी. वाले लंगूरों को, बड़े खाने का न्योता दिया..? भूखा तो मैं था, मेरे लिए आये थे ये बड़े। ये है कौन, खाने वाले..? न जाने कहां से आ गए, ये फड़सा..?        

[आख़िर, मोहनजी उठा लेते हैं बड़ों का दूना। और एक साथ बचे हुए सारे बड़े, डाल देते हैं अपने मुंह में। फिर दूने को ज़मीन पर फेंक कर, बोलने का भोंपू वापस चालू कर देते हैं।]

मोहनजी – भाई लोगों, धीरज रखो। आपने खूब खा लिए बड़े, कब्बूड़ा बनकर। [इंजन सीटी देता है, उसकी आवाज़ सुनकर कहते है] अब, गाड़ी आ रही है। बैग उठा लो, और चलो जल्दी।

[धड़-धड़ की आवाज़ करती हुई, गाड़ी प्लेटफार्म नंबर पांच पर आकर रुकती है। सभी यात्री अपना बैग लेकर, गाड़ी के निकट चले आते हैं। डब्बों के दरवाज़े खुलते ही, लोगों की भीड़ धक्का-मुक्की करती हुई डब्बे में चढ़ती है। मगर इस भीड़ में फंसे हुए मोहनजी, एक क़दम आगे बढ़ा नहीं पाते। इधर डब्बे के अन्दर घुसते वक़्त, बेचारे मोहनजी का पाँव किसी यात्री के पांव के नीचे आ जाता है..और बेरहमी से, कुचला जाता है। फिर, क्या..? बेचारे वहीँ से चिल्लाते हुए, कहते हैं]

मोहनजी – [चिल्लाते हुए, कहते हैं] – ठोकिरा, मेरा पाँव कुचल डाला रे। अब दूं तेरे माथे पे, कहां मर गया, कढ़ी खायोड़ा..? [डब्बे में, चढ़ रहे यात्रियों से कहते हैं] अरे, नामाकूलों। काहे की उतावली करते जा रहे हो, शैतान कढ़ी खाने वालों...क्या कभी तुमने, रेलगाड़ी देखी नहीं ? मरो मत, तुम्हारी संख्या कम है..मगर, सीटें हैं बहुत। हटो रे करमज़लों, अब आने दो मुझे।

[मंच पर अँधेरा छा जाता है, थोड़ी देर बाद, मंच रोशन होता है। शयनान डब्बे का मंजर, सामने दिखायी देता है। इस शयनान डब्बे में, कई तो सरकारी और कई गैर सरकारी महकमे के मुलाज़िम यात्रा कर रहे हैं। ये रोज़, जोधपुर और खारची के बीच आना-जाना करते हैं। ये सभी, विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी महकमों में नौकरी करते हैं। इनमें कई लोग तो विशेषत: शिक्षा विभाग़, एफ़.सी.आई.डिपो, जलदाय और मेडिकल विभाग के कर्मचारी है। जो महानुभव अभी सामान रखे जाने वाली पछीत [बर्थ] पर बिराजमान है, वे मीणाजी हैं। जो सांवले वर्ण के हैं और इनके सर पर अफ़्रीकी लोगों की तरह बाल छोटे-छोटे है। जो एक मात्र, कृषि विभाग के हैं। अब इस वक़्त ये सज्जन, योगी बाबा रामदेव के बताये निर्देशों के अनुसार...अपने दोनोँ हाथों की अँगुलियों के नख, घिसते जा रहे हैं। इनका कहना है, के ‘इस तरह नख घिसने से, इंसान के बाल हमेशा काले रहते हैं।’ ये मूंछों वाले सज्जन, जो काली सफारी पहने बैठे हैं...मोहनजी है। इनको खिड़की के पास वाली सीट पर ही बैठना पसंद है, ये हमेशा ऐसी ही सीट बैठने के लिए ढूंढा करते हैं। सीट पर कब्ज़ा करने के बाद, मोहनजी का पहला काम है..पास लगी खाना खाने की फोल्डिंग टेबल पर, सट रखकर उसे खोलना और पहली पारी का भोजन अरोग लेना। यदि कभी पास में यह फोल्डिंग टेबल न हो तो, जनाब मोहनजी जिस तख़्त [bench] पर बैठते हैं...वे वहीँ बैठे-बैठे पास वाली सीट पर सट रखकर, खाना खाने बैठ जाते हैं। खाना खाने के बाद, वे कभी उस सीट को साफ़ नहीं करते हैं..जिस पर उन्होंने, अभी-अभी सट खोलकर खाना खाया हो। इस तरह वे अपने वस्त्र तो ख़राब करते ही हैं, मगर दूसरे यात्रियों को वहां बैठाकर उनके वस्त्र भी गंदे करवा देना उनका स्वाभाविक गुण है। उस तेल से सनी सीट पर किसी को भी बैठाकर उसकी पतलून ख़राब ज़रूर करेंगे ही, और इसके साथ जर्दे की पीक थूकते वक़्त ध्यान नहीं रखेंगे के ‘उनकी पीक, कहां जाकर गिर रही है..?’ कारण यह है, पीक थूकते वक़्त आस-पास की सीटें तो ख़राब करेंगे ही, मगर साथ में आस-पास बैठने वालों के कपड़े ज़रूर इस पीक से गंदे कर लिया करते हैं। ये जनाब बोलते हुए, मुंह से ज़र्दा और थूक उछालेंगे ज़रूर। और साथ में सामने बैठे सज्जन के चेहरे का मेक-अप, मुंह से उछलते जर्दे और थूक से कर डालते हैं। और इसे अपनी, शान समझ लिया करते हैं। कारण यही है, जैसे ही ये मुअज़्ज़म अपना मुंह बोलने के लिए खोलते है, तब थूक के साथ ज़र्दा उछलता रहता है। इन्हें कोई परवाह नहीं, के ‘वह ज़र्दा, कहां जाकर गिरता है..?’ चाहे वह ज़र्दा किसी के मुंह पर गिरे, या उनके वस्त्रों पर..मोहनजी जनाब को, इससे कोई सारोकार नहीं। मोहनजी का यह ख़ासा जिसको भी पसंद है, वही ख़ुशअख्तर इंसान इनके पास बैठ सकता है। अब डब्बे के अन्दर, जगह-जगह ये बूट-पोलिस करने वाले छोरे, भिखारी, चाय वाले वगैरा फ़ैल जाते हैं। अब इन लोगों की, आवाजें बढ़ती जाती है। डब्बों में ताश के पत्ते खेलने वालों का गुट, कुछ अलग ख़ासा रखता है। इनका बोस है, गालियां बोलने के उस्ताद श्रीमान १०१ जनाबे आली गोपसा। जो जल-दाय विभाग में काम करते हैं, और जोधपुर की जय नारायण व्यास यानी दाबो-कोलोनी में रहते हैं। ये श्रीमानजी करीब ३५ बरसों से इस गाड़ी से रोज़ का आना-जाना करते आ रहे हैं, अल्लाह पाक ने इनको इतनी ताकत दी है...के ‘ये अभी-तक, थके नहीं हैं..कभी-कभी तो ये भाईजान इतवार को भी, इस रेल गाड़ी में बैठ कर पाली चले आते हैं..और दफ़्तर में अपने सहकर्मियों को बुलाकर, ताश खेलने बैठ जाते हैं।’ इनके दल के लोग डब्बे में आते ही, अपने सारे दोस्तों को बैठाने के लिए उनकी सीटें रोक लिया करते हैं। इनके किसी भी मेंबर की सीट, यदि किसी यात्री को ख़ाली दिखायी दे जाय..और वह अभागा इन लोगों से, सीट के बारे में तहकीकात करने की ग़लती कर बैठता है, के “भाई साहब, क्या यह सीट ख़ाली है..” बस, फिर क्या ? ये लोग फटाक से तड़क कर, एक ही जवाब देने के तैयार रहते हैं के “ख़ाली नहीं हैं, साहब गये हैं पेशाब करने।” वह यात्री बेचारा, मुंह फाड़े खड़ा रहा..तो इन लोगों में से कोई, व्यंग में यह भी कह देगा के “यहां क्यों खड़ा है, भाया..? अगर आपके पास कोई काम नहीं है, तो लीजिये यह ज़र्दे की पेसी..और बनाइये हमारे लिए सुर्ती।” फिर, क्या..? उस बेचारे का जवाब बिना सुने ही, वे उसे थमा देते हैं पेसी। बेचारा लिहाज़ के मारे, अपनी हथेली पर ज़र्दा व चूना रखकर मसलता रहेगा। और उन महापुरुषों के लिये, सुर्ती बना-बनाकर इन लोगों को चखाता रहेगा। इधर आख़िर इनका साथी आता दिखायी नहीं दिया, तो ये लोग झट उसे भी जबरदस्ती ताश खेलने के लिए बैठा देंगे। ताश खेलने के पहले, इस नए खिलाड़ी को खेल के सारे नियम-क़ायदे बताने का फ़र्ज़ इनके दल के नेता “गोपसा” निभा लिया करते हैं। और उसे हिदायत देते हुए, यह अवश्य कहेंगे के “देख भाई, इस शर्त के साथ तूझे खेलना है..के, हारने वाला खिलाड़ी लूणी स्टेशन पर गरमा-गरम दाल के बड़े सभी खिलाड़ियों को खिलायेगा।” आज़ इन लोगों को छोड़कर सेठ करोड़ी मल भी यात्रा कर रहें हैं। इनका ख़्याल है, के “दुश्मन की नज़र, हमेशा आदमी के जूत्तों पर टिकी रहती है।” इस कारण ये जनाब, अपने जूत्तों पर धूल का एक कण भी जमा नहीं होने देते। यह मुअज़्ज़म जूत्ते तो रखेंगे उज़ले, मगर पहनेंगे फटे व पेबंध लगे कपङे। इस तरह ग़रीब दिखने का स्वांग, ये आली ज़नाब ज़रूर दिखाया करते हैं। इनका तो बस एक ही उसूल है, बूढ़े माता-पिता व फटे कपड़े आदमी का व्यक्तित्व निखारते हैं...बिगाड़ते नहीं। सेठ करोड़ी मल अपनी जूत्तियों पर नज़र गढ़ाये बैठे हैं, तभी एक दस बरस का छोरा, बूट-पोलिस की थैली थामे इस केबीन में आवाज़ लगाता हुआ आता है। इस बूट-पोलिस करने वाले छोरे का नाम है, अजिया।]

अजिया – [आवाज़ लगाता हुआ] – बूट-पोलिस..बूट-पोलिस। [थैली से ब्रश और पोलिस की डिबिया बाहर निकालता हुआ कहता है] सिलाई करा लीजिये, बैग की, जूत्तों की..[सेठ करोड़ी मल के पास आकर कहता है] सेठ, पोलिस..?

सेठ करोड़ी मल – छोरा बैठ जा यहां, फिर पोलिस कर दे मेरी काली जूतियों की।

अजिया – सेठ साहब, मैं तो पांच रुपये लूंगा। अच्छी तरह से देख लेना, चमा-चम क्रीम और असली चेरी पोलिस लगाऊंगा। अजी जनाब, फिर अपना मुंह देख लेना अपनी जूत्तियों में। आपको कांच की भी ज़रूरत नहीं रहेगी, सेठ साहब।

[सेठ साहब, बेचारे क्या ज़वाब देते..? उससे पहले हमारे मोहनजी चेत जाते हैं, झट उठकर उस छोरे से ब्रश छीनकर ले लेते हैं। फिर, अपने धूल लगे बूटों को साफ़ करने बैठ जाते हैं। इधर, उस छोरे का मुंह देखने लायक..? बेचारा मुंह में अंगुली दबाकर, बेहताशा उनका मुंह देखता जाता है। अपने बूट और सीट साफ़ करके, जनाबे आली मोहनजी ब्रश वापस पकड़ा देते हैं..छोरे को। यह तो मक़बूले आम बात है, के मोहनजी बेफिज़ूल के कामों में अपना पैसा खर्च करते नहीं...वे तो मुफ़्त में, अपना काम निकाल लेते हैं। उनका यह व्यवहार देखकर, अजिया आश्चर्य-चकित होकर कहता है..]

अजिया – [आश्चर्य करता हुआ, बोल उठता है] – यह क्या, सेठ...?

मोहनजी – अरे कढ़ी खायोड़ा, मेणे की तरह क्या देख रहा है.....? अबे ओ..कुचमादिये के ठीकरे। आँखे दिखा रहा है, मुझे....? कमबख़्त, तेरी आँखे निकालकर गोटी खेल लूंगा। समझता क्या है, अपने-आपको..? टीटी बाबूजी के बूटों की पोलिस करता है, मुफ़्त में..! और..

अजिया – [उनकी बात काटता हुआ, कहता है] – तो क्या हो गया, साहब..?

मोहनजी – तेरी मां का सर, और क्या...? अरे कढ़ी खायोड़े समझ थोडा, ये हरामजादे रेलवे के कर्मचारी सीटें साफ़ नहीं करते हैं..फिर, क्या..? ख़ाली सीटें ही, साफ़ की है मैंने। कोई, हीरे-पन्ने तो नहीं जड़े..?

[अब तो मोहनजी मालिक इस तरह आँखे तरेरकर उस बेचारे छोरे को ज़हरीली नज़रों से देखते हैं, जैसे अभी उठ कर छोरे को चार लाप्पे नहीं मार दें...? मगर, यहाँ तो जनाब मोहनजी को चुप रहना किसी ने नहीं सिखाया। वे तो धड़ा-धड़, बिना रुके बोलते ही जा रहे हैं ?]

मोहनजी – [आँखे तरेरकर, कहते हैं] – अब छोरे तेरी और इन रेलवे कर्मचारियों की शिकायत, दर्ज कराऊंगा रेलवे के मिनिस्टर लालू भाई के पास।

अजिया – [डरा हुआ कहता है] – शिकायत मत कीजिये, जनाब। [हाथ जोड़ते हुए] आपको हाथ जोड़ता हूं, जनाब। रहने दीजिये, इस बात पर मिट्टी डाल दीजिये।

मोहनजी – [गुस्से से काफ़ूर होकर कहते हैं] – नालायक कढ़ी खायोड़ा, मुझे क्या तू मेहतर समझता है, जो मिट्टी डालने की गेलसफ़ी बात करता जा रहा है ? मिट्टी डालेगा, तू और तेरा बाप..

[मोहनजी, अभी कहां चुप होने वाले ? वे तो अब उसकी सात पुश्तों को सुना रहे हैं, गालियां]

मोहनजी – अब तू देखना, कढ़ी खायोड़ा हरामखोर...क्या करता हूं, मैं ? मंत्रीजी को लिखूंगा, के ‘एक तो ये कमबख्त रेलवे कर्मचारी, ड्यूटी अच्छी तरह से करते नहीं..और, दूसरे तुम लोग..? दिन-भर गाड़ियों में बैठकर, मुफ़्त में सैर करते हो ? 

[मोहनजी की गूंज़ती हुई आवाज़ सुनते ही, पड़ोस के केबीन में बैठे रतनजी, रशीद भाई और ओमजी झट उठकर इधर चले आते हैं, इस केबीन में तीनों ही मुसाहिब मोहनजी के पास आकर बैठ जाते हैं, परायी पंचायती करने। फिर, क्या...? फिर, रतनजी उस अजिये पर प्यार न्योछावर करते हुए कहते हैं..]

रतनजी – अरे राम रे, राम। ऐसा कौन पापी है रे, जो इस बेचारे ग़रीब छोरे को डरा रहा है...? [मोहनजी की तरफ़ इशारा करते हुए, कहते हैं] अरे छोरे, सुन। ये हमारे अफ़सर है, मोहनजी।

ओमजी – ये अफ़सर तो बहुत रहम-दिल इंसान है, तू इनसे कुछ मांग ले। गधा, तूझे तो हमारे ये साहब दिल खोलकर बख़्सीस देंगे। मांग लेऽऽ, मांग लेऽऽ!

रशीद भाई – अरे छोरे, साहब लोगों की ख़िदमत किया कर। फायदे में, रहेगा तू। मैनेजर साहब है, धान के डिपो के। समझा, अब ? मांग ले, एक बोरी धान की।

रतनजी – [मुस्कराकर कहते हैं] – मोटे अफ़सर है, जनाबे आली। इनके जैसा दिलदार, इस दुनिया में कोई नहीं। [रशीद भाई और ओमजी की तरफ़ देखते हुए] आज़ तो हम यहीं कहेंगे, दोस्तों। अब लूणी स्टेशन पर, हमारे अफ़सर जनाबे आली मोहनजी ज़रूर पिलायेंगे एम.एस.टी. कट स्पेशल मसाले वाली चाय।

ओमजी – [मोहनजी की तरफ़ देखते हुए, कहते हैं] – क्यों साहब, ठीक है ? इंतज़ाम पक्का...?

मोहनजी – [होंठों में ही, कहते हैं] – ये तीनों ही मिले हुए हैं, गधे कढ़ी खायोड़े। क्या कहूं, इनको..? साले तीनों ही है, राहू, केतू और शनि। अब इस वक़्त ये लोग़ मेरी तारीफ़ कर रहे हैं, या मेरी इज़्ज़त की बखिया उधेड़ रहे हैं...? कहीं ये तीनों कढ़ी खायोड़े, मुझे मोडा करने का इरादा तो नहीं रख रहे हैं ?

ओमजी – [उनके दिल की बात जानकर, मुस्कराते हुए कहते हैं] – हुज़ूर, हम तीनों ग्रह एक साथ आपको लग गये..तो रामा पीर जाने, आगे क्या होगा ?

रशीद भाई – सच कह रहे हैं, अफ़सरों। आप कहे तो, कुछ करके दिखायें..?

[इतनी बातें सुनकर, बेचारे मोहनजी तो हो गए ऐसे चुप। और, ऐसा भोला चेहरा बना देते हैं अपना..मानो, उनके जैसा कोई सीधा आदमी इस ख़िलक़त में ना हो..?]

अजिया – [उनको चुप-चाप बैठा देखकर, सोचता है] – मैं अब समझ गया, के ‘यहां तिलों में तेल नहीं है, कमबख्त अपना टाइम पास कर रहे हैं ?’ फिर क्या..? अपुन क्यों, अपने धंधे का वक़्त ख़राब करेगा..?

[वह तो झट, रुख़्सत हो जाता है। अब इधर खिड़की के बाहर एक पुड़ी वाला वेंडर ग्राहकों को आवाज़ लगाता हुआ, ठेला लिए गुज़रता है।]

पुड़ी वाला वेंडर – [आवाज़ लगाता हुआ] – अरे भाई, पुड़ी-सब्जी खाइये। पुड़ी-सब्जी दस रुपये पाव, ले लो भाई ले लो। ले लो पुड़ी-सब्जी, दस रुपये पाव।

[मोहनजी के कानों में, उस पुड़ी वाले की आवाज़ गिरती है। इस आवाज़ को सुनते ही, उनके पेट में चूहे कूदने लगे। आख़िर भूख बर्दाश्त न होने पर, वे खाने का सट खोलकर सबसे कहते हैं..}

मोहनजी – [सट खोलकर, कहते हैं] – मैं तो भूखा मर रहा हूं, इस पेट में ये दाल के चार बड़े....क्या भूख मिटायेंगे, मेरी..? भूख कम होनी तो दूर, कमबख्त रशीद भाई ने चार बड़े खिलाकर भूख अलग से बढ़ा दी मेरी। अब अच्छा यही है, भोजन अरोग लूं।

रतनजी – [बीच में बोलते हुए] – यह ग़लत काम मत करना, अफ़सरों। खारची पहुंचोगे और तब लगेगी आपको भूख, उस वक़्त क्या खाओगे जनाब..? फिर तो खाने के लिए ख़ाली, रामजी का नाम है।

रशीद भाई – खाने की बातों को, मारो गोली। अगर इनको भूख लगेगी तो ये जनाब खा लेंगे सर, अपने दफ़्तर के मुलाज़िमों का। आप तो इनसे यह मालुम कीजिये, इन्होने पानी की बोतल भरी या नहीं..?

रतनजी – पानी की बोतल से, आपका क्या तात्पर्य..?

रशीद भाई – आप समझे नहीं, भाईजान। गाड़ी रुकी हुई है, अभी नीचे उतरकर, मैं पानी भर कर ला दूंगा। और, क्या ? आख़िर जनाब, हम ठहरे सेवाभावी।

मोहनजी – [खुश होकर] - लीजिये, जनाब। रशीद भाई को मेरी फ़िक्र सताती है, आप कढ़ी खायोड़ा रतनजी कितना ही भड़काओ इन्हें..अब, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला नहीं।

रतनजी – क्यों जी, ऐसी आप में क्या ख़ासियत है..?

मोहनजी – ख़ासियत रखते है जी, आख़िर हम है कढ़ी खायोड़ा मोहनजी। तभी तो जनाब, ये रशीद भाई ठहरे, मेरे शुभचिंतक। आप क्या जानते हो, जनाब ? ये तो निस्वार्थ सेवा करते आये हैं, मेरी।

रतनजी – [हंसते हुए कहते हैं] – नहीं तो फिर, आपसे मिलने वाला क्या ? केवल मुफ़्त में आप इनके मुंह का मेक-अप, अपने मुंह से उछलते ज़र्दे से कर सकते हैं ?

[किसी से मुफ़्त में काम करवाना, मोहनजी के लिए बाएं हाथ का खेल है..? अब इतनी बात होने के बाद, मोहनजी कभी किसी से यह नहीं कहते, के “भय्या, आप भी खाना खायेंगे..?” बस वे तो टिफ़िन खोलकर अपने मुंह में फटा-फट निवाले डालते दिखाई दे रहे हैं, कहीं कोई उनसे पूछ ना ले..के, “मोहनजी, क्या अरोग रहे हैं जनाब..? हमारे लिए भी, कुछ चखने के लिये रखेंगे या नहीं..?” ख़ुदा जाने, उनको तो यह भी मालुम नहीं ‘रोटी का निवाला कहां जा रहा है..? सब्जी, कहां गिर रही है..?’ वे क्यों देखना चाहेंगे, के उनकी मूँछों के बाल कढ़ी की सब्जी से भींग चुके है ? इधर इनका सफ़ारी बुशर्ट और मफलर भी, कढ़ी की सब्जी से ख़राब हो चुका हैं ? बस, वे तो झट कढ़ी खलास करके कढ़ी खायोड़ा बनने की कोशिश कर रहे थे। इस मंज़र को देख रहे रशीद भाई, कभी तो मोहनजी का इस तरह खाने का तरीका देख रहे हैं..कभी वह गोद में रखी अस्पताल की किताब में छपे व्यंग-चित्र को, देख डालते हैं..? दोनों में, इतनी समानता..? मोहनजी खाना खाते वक़्त वस्त्रों का ध्यान रखते नहीं, और इस व्यंग-चित्र में दिखाये नन्हे बालक को भी खाने की कोई सुध नहीं। इसलिए, उस नन्हे बालक की मां उस व्यंग-चित्र में कह रही है “इस बच्चे को खाने की कोई सुध नहीं, इस कारण मैं इस बच्चे को नग्न ही रखती हूं..अगर जनाब इसे कपड़े पहना दिये गये, तो यह बन्दर बार-बार कपड़े ख़राब करता रहेगा। और मैं अभागन कब तक, इसके कपड़े बदलती रहूंगी ?” इधर मोहनजी को, क्या मालुम ? रशीद भाई उनके बारे में, क्या सोचते जा रहे हैं..? बस वे तो रोटी का निवाला मुंह में डालते-डालते, बोलते ही जा रहे हैं..!]

मोहनजी – [मुंह से थूक उछालते हुए, कहते हैं] – रशीद भाई, कढ़ी खायोड़ा..मैं आपसे क्या कह रहा था, के..?

[आगे, जनाब क्या बोलते..? अचानक उनकी निग़ाह उस व्यंग-चित्र पर जाकर गिरती है, उस व्यंग-चित्र को देखते ही वे नाक-भौं सिकोड़कर कह बैठते हैं..!]

मोहनजी – [चिढ़ते हुए, कहते हैं] – क्या मैं इस छोरे की तरह, लापरवाह होकर खाता हूं..? कढ़ी खायोड़ा, कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे हैं....मेरे बारे में ?

रशीद भाई – [मुस्कराते हुएकहते हैं] – हम तो अच्छा ही सोचा करते हैं, मालिक। आप, क्यों फ़िक्र करते जा रहे हैं..?

मोहनजी – अरे नहीं रे, कढ़ी खायोड़ा..मेरा प्रश्न यह है, के ‘क्या मैं इस व्यंग-चित्र वाले छोरे की तरह, खाना खाया करता हूं..?’ अब आप लोगों का प्लान, मुझे नंगा करने का तो नहीं है..? 

रशीद भाई – [मुस्कराते हुए, कहते हैं] – वाह साहब, आप तो हमें जबानी बोल-बोलकर कढ़ी की सब्जी खिला रहे हैं..? हमने कोई कढ़ी खाई नहीं, ज़नाब आप काहे कहते जा रहे हैं हमें, के कढ़ी खायोड़ा...? मगर आपको एक सत्य बात कह दूं, पहले आप यह बता दें..क्या आप, नाराज़ तो नहीं होंगे ?

[मोहनजी मुंह में पानी का एक घूँट पीकर, नाराज़गी दिखाते हुए आगे कहते हैं]

मोहनजी – [नाराज़गी से कहते हैं] – अब तूझे बोलने की इज़ाज़त का इजरा जारी करके मारूं, तेरे मुंह पर ? बोल, अब क्या बकता है..?

रशीद भाई – साहब, मैंने कढ़ी की सब्जी नहीं खायी है। कढ़ी की सब्जी खा रहा है, आपका मफलर और आपका यह कीमती सफ़ारी सूट। आपको नंगा करने की, हमें कहां ज़रूरत..? [मारवाड़ी में कहते हैं] आप ख़ुद, नागा इज हो....आपनै म्हा लोग, कांई नागा करां ?

रतनजी – सच्ची बात है, रशीद भाई। [मारवाड़ी में कहते हुए] मालक तौ पैला सूं, नागा इज है सा। बतलावता ई, झौड़ करेला ?

रशीद भाई – [मुस्कराते हुए कहते हैं] – अरे सावंतसा, इन्हें आप “नंगा” बोलकर नंग-धड़ंग कालिया भूत मत बना देना। मारवाड़ी भाषा में ‘नागा’ शब्द का मतलब है ‘बिना बात झगड़ने वाला इंसान। और, मारवाड़ी में नागा शब्द का अभिप्राय नंगा भी माना जाता हैं।’

रतनजी – फिर, मैं क्या कह रहा हूं ? यही कह रहा हूं, के ‘ये जनाब ऐसे हैं, इनको बतलाते ही..ये जनाब झगड़ने बैठ जाते है।’ बस इनको बतलाना, और अपना सर फुड़वाना दोनों बराबर है।

[बात बिगड़ती देखकर, अवसरवादी जनाब मोहनजी रशीद भाई की खुशामद करने को उतारू हो जाते हैं।]

मोहनजी – [रशीद भाई की खुशामद करते हुए कहते हैं] - नाराज़ मत हो, मेरे रशीद भाई। आप तो मेरे शुभचिंतक क्या, मेरे कलेजे के टुकड़े हो। अब, सुनो। मैं यह कह रहा था, के...

रशीद भाई – [नाराज़गी से, उनकी बात काटते हुए] – मैं आपके कलेजा का टुकड़ा नहीं हूं, रोटी का टुकड़ा ज़रूर हूं..जिसे आप पूरा ही निगल जाते हैं, और डकार भी नहीं लेते।..

मोहनजी – [नाराज़गी से कहते हैं] – क्यों रे, माता के दीने..? एक तो तेरी तारीफ़ कर रहा हूं, और तू..ऊपर से मेरी क़ब्र ही, खोदता जा रहा है..? 

रशीद भाई – मैं क्यों खोदूंगा, साहब ? मैं कोई खारकान [कब्र खोदने वाला] तो हूं नहीं, मैं तो बेचारा एफ.सी.आई. का डस्ट-ओपेरटर हूं। जिसे आप चाहे तो यों कह दें, धूल उड़ाने वाला।

रतनजी – [मुस्कराते हुए] – डस्ट यानि धूल, और ओपरेटर...

रशीद भाई – [जुमला पूरा करते हुए] – ओपरेटर यानि उड़ाने वाला..पूरा मफ़हूम यह हुआ जी, ‘धूल उड़ाने वाला’।

मोहनजी – तुम, क्या मफ़हूम बताते हो ? मैं बताता हूं, सुनो। आप, क्या हैं ? ऑफ़िस का काम नहीं करके, एफ.सी.आई. महकमें की धूल उड़ाने वाला इंसान कह सकते हैं आपको।

रतनजी – इन्हें छोड़िये, आप कम कहां पड़ते हैं महकमें की धूल उड़ाने में..? इनसे तो आप, बेहतर उड़ाते हैं महकमें की धूल। अरे साहब, एक काम की बात कहता हूं। आपके बदन पर अगर धूल जम गयी है, तो हमारे रशीद भाई अच्छी तरह से झटक लेंगे। इनके हाथों में इल्म है, आप जब चाहे तब इन्हें बुला लीजिये।

रशीद भाई – मगर मालिक अर्ज़ है, काम करने के बाद मुझे उलाहने मत देना के [धीरे से बोलते हैं] हाथ भारी पड़ गया तो..!

रतनजी – साहब रहने दीजिये, आप तो बड़े साहब है। आपके बदन पर धूल जमने का सवाल, पैदा ही नहीं होता। आप तो मालिक, एयर-कंडीशन में बैठने वालें हैं। बस आप तो रशीद भाई को हुक्म दीजिये, उनको करना क्या है..?

मोहनजी – [खुश होकर, कहते हैं] - रशीद भाई आपसे निवेदन करता हूं, के आज़ शाम को आप उम्मेद अस्पताल चले जाइये। मगर जाना ज़रूर, बहाना मत बनाना। वहां जाकर मेरे मेडिकल बिलों पर डॉक्टर साहब से दस्तख़त ज़रूर करवा लेना, कढ़ी खायोड़ा।

रशीद भाई – मगर, बात यह है, के.....

रतनजी – अगर-मगर कहने की कहां ज़रूरत है, रशीद भाई..?

ओमजी – [बात काटते हुए, कहते हैं] – साफ़-साफ़ बोलो ना, दर्द हो रहा है पेट में..और, दिखला रहे हो सर..? शर्म करने की, अब कहां ज़रूरत..? साहब को अब आप घर का ही आदमी समझ लीजिये, मैं यह भी जानता हूं जनाब। के, ‘आप हैं पैदल चलने वाले पद-यात्री। स्कूटर रखते नहीं..फिर, क्या ? मांग लीजिये, साहब से..इनका, प्रिया स्कूटर।’

रतनजी – हम सब जानते हैं, के ‘साहब ने अभी-अभी नया प्रिया स्कूटर ख़रीदा है।’ अब आप मांग लीजिये इनसे, प्रिया स्कूटर..आराम से जाओगे अस्पताल।

मोहनजी – [मुस्कराकर] – क्या करूं, रशीद भाई..? मुझे तो आता नहीं स्कूटर चलाना, और गीगले की मां स्कूटर को बाहर निकालने देती नहीं। ऊपर से कहती है..

रतनजी – [बात काटते हुए] – ‘बाहर ले गये स्कूटर, तो आप फूटी हंडिया की तरह हड्डियां तुड़वाकर वापस घर आओगे।’ साहब, भाभीसा यही बात कहती होगी..?

मोहनजी – हां भाई रतनजी, सच्च कहा आपने। अब घर में पड़ा-पड़ा, वह स्कूटर दूध दे रहा है। अब क्या करूं और किसे क्या कहूं, मेरे रामा पीर..?

रशीद भाई – [गुस्से के आवेश में आकर, कहते हैं] – स्कूटर को घर पर रहने दीजिये, पड़ा-पड़ा अगर दूध देवें तो थोडा-बहुत दूध मेरे घर भी भेज देना साहब।

रतनजी – [प्लेटफार्म पर लगी, घड़ी को देखते हुए] – अरे साहब, सुनो मेरी बात। गाड़ी रवाना होने का वक़्त है, ९ बजकर १५ मिनट। इस वक़्त यह स्टेशन की घड़ी समय बता रही है, पूरे दस। जनाब, आपकी घड़ी में कितने बजे हैं..?                                                                     

मोहनजी – [तेज़ी खाकर, कहते हैं] – दस बजे हैं, दस। मगर भले आदमी, आप मेरे ऊपर भरोसा क्यों कर रहे हैं..? [रेडिओ पर उदघोषक की, एनाउंस की हुई आवाज़ सुनायी देती है।] अब सुन लीजिये, उदघोषक की घोषणा। वह क्या बोल रहा है ?                                          

[सभी उदघोषक की घोषणा सुनने के लिए, अपने कानों पर हाथ देते हुए दिखायी देते हैं।]

उदघोषक – [घोषणा करता हुआ] – सभी यात्री ध्यान दें “अहमदाबाद जाने वाली लोकल गाड़ी, प्लेटफार्म संख्या पांच से ९ बजकर १५ मिनट पर रवाना होगी..’’ ************

[उधर प्लेटफार्म पर सरदार निहाल सिंह और क़ाज़ी सईद अहमद सिद्दीकी, खड़े-खड़े बातें करते जा रहे हैं। इधर रशीद भाई को, साहब की ख़िदमत में पानी की बोतल भरनी याद आती है। वे साहब से कहते हैं, के..]

रशीद भाई – जनाब, पानी की ख़ाली बोतल दे दीजिये, भरकर ले आता हूं। ना तो आप..जब इंजन की सीटी सुनेंगे, तब आप कहेंगे के “अरे, जा रे रशीद भाई कढ़ी खायोड़ा, पानी ला। प्यासा मर रहा हूं।”

[अचानक रशीद भाई की निगाह, आली जनाब क़ाज़ी सईद अहमद सिद्दीकी पर गिरती है। उनके दीदार पाते ही, रशीद भाई झट अपना मुंह नीचा करके मुंह छुपाने का प्रयास करते हैं। जनाब क़ाज़ी साहब ठहरे, रशीद भाई के दोस्त। और साथ में इनकी रोज़ की आदत है, पांच वक़्त नमाज़ पढ़ने की। मगर रशीद भाई इस सरकारी नौकरी के चक्कर में, ख़ाली जुम्मा-जुम्मा नमाज़ पढ़ पाते हैं। ]

मोहनजी – [बोतल देते हुए कहते हैं] – लीजिये, बोतल। जाइये जनाब, अब मुंह काहे छुपा रहे हैं..? अरे ओ कढ़ी खायोड़े, सेवाभावी। इस तरह तो, औरतें भी मुंह नहीं छुपाती।

रशीद भाई – [बोतल लेकर जाते हुए कहते हैं] – पानी लाने में, मुझे कोई लज्जा नहीं आती। आख़िर आप लोगों ने, मुझको सेवाभावी का तुकमा जो दे रखा है।

[प्लेटफार्म पर खड़े क़ाज़ी साहब और सरदार निहाल सिंह, गुफ़्तगू कर रहे हैं। क़ाज़ी साहब की तरफ़, अंगुली से इशारा करते हुए रशीद भाई कहते हैं।]

रशीद भाई - इस काजी की औलाद की नज़रों से, बचना चाहता हूं...? कमबख्त मेरा रफ़ीक [मित्र] ज़रूर है, मगर यह मेरी निजी जिन्दगी में ख़लल डालने से बाज़ नहीं आता। बस, यही कारण है जनाब। मैं इसके सामने, जाना नहीं चाहता।

रतनजी – मियां रशीद, काहे की शर्म ? आप क्या, उनकी बहू बेग़म हैं..?

रशीद भाई - [झिझकते हुए] – सावंत भाई, क्यों उड़ा रहे हैं मेरी मज़ाक..? बात यह है, अभी यह माता का दीना पूछेगा के ‘रमजान चल रहा है, मस्जिद क्यों नहीं आ रहे हैं...नमाज़ पढ़ने..?’

[इनके कहने के इस अंदाज़ से, सभी हंस पड़ते हैं। मगर उनकी इस हंसी से, रशीद भाई को क्या एतराज़..? वे तो ठहरे, सेवाभावी। झट उस काजी की निगाहों से बचकर, जा पंहुचे शीतल जल के नल के पास। वहां जाकर वे बोतल में पानी भरने लगते हैं, मगर बदकिस्मत से सरदार निहाल सिंह से गुफ़्तगू करते हुए क़ाज़ी साहब उधर ही तशरीफ़ ले आते हैं, जहां रशीद भाई बोतल में पानी भर रहे हैं। अब बेचारे रशीद भाई, उस शैतान के चच्चा की काक निग़ाह से कैसे बच पाते..?]

सरदार निहाल सिंह – [गुफ़्तगू करते हुए] – अजी क़ाज़ी साहब, यह उदघोषक क्या बोल रहा है, मेनु तो की समझ में आया नहीं..? ऐसा लगता है, वह झूठ बोलता जा रहा है..अरे रब, अब तो सरकारी महकमें वाले भी सफ़ा-सफ़ झूठ बोलते जा रहे हैं..?

क़ाज़ी सईद अहमद सिद्दीकी – [रीश को हाथ से सहलाते हुए] – इन मुड़दो पर केस ठोकूंगा, मरदूद पुरानी केसेट चलाते हैं। अब इधर देखिये जनाब, इनको आख़िर समझायें कौन..? अब दस बज गयी, मगर....

[जनाब की निग़ाह, अचानक रशीद भाई पर गिरती है। फिर, क्या..? झट अपने बोलने के भोंपू की दिशा सरदार निहाल सिंह से हटाकर, रशीद भाई की तरफ़ कर देते हैं।]

काज़ी सईद अहमद सिद्दीकी – [रशीद भाई से] – असलाम वालेकम रशीद मियां, तशरीफ़ रखें हुज़ूर..इस तरह ईद का चाँद मत बनिए, जनाब। अभी रमजान का पाक महिना चल रहा है, आप नमाज़ पढ़ने मस्जिद क्यों नहीं आते ?

रशीद भाई – [पानी भरते हुए] – हुज़ूर, वालेकम सलाम। क्या करूं, जनाब ? घर में सबको हो गया, चिकुनगुनिया का बुखार। अरे जनाब, अल्लाह ने ऐसी बीमारी पैदा की है, जिसमें घुटने भी नहीं मुड़ते..फिर ख़ाक नमाज़ पढूंगा, मस्जिद में आकर..?

[इतना कहकर, झट-पट पानी भरकर चल देते हैं अपने डब्बे की तरफ़। पीछे से आली जनाब क्या फरमा रहे हैं, इनको करना क्या ? ये रशीद भाई आख़िर, सुनेंगे क्यों ? उनके लिए तो पीछे से क़ाज़ी साहब का बोलना, दीवारों को सुनाने के बराबर है। रशीद भाई तो झट घुस जाते हैं, डब्बे के अन्दर। केबीन में दाख़िल होते हुए, वे कहते हैं।]

रशीद भाई – यहां कौन सुने, उनका जवाब..? न सुनना ही अच्छा, ना तो नमाज़ पढ़ने जायें और ना रोज़ा गले पड़े..?  

मोहनजी – [रशीद भाई की आधी-अधूरी बात सुनकर] – तेरे गले कौन पड़ता है रे, कढ़ी खायोड़ा..? मै तो बेचारा, चुप-चाप बैठा हूं।

रशीद भाई – [मोहनजी को बोतल सौंपकर, कहते हैं] – अफ़सरों। वहां पाली दफ़्तर में तो, काम करके बदन से निकालना पड़ता है...पसीना। वो भी, ऐसी धूल उड़ाओ नौकरी में। मगर इस काजी की औलाद को लगता है, हम पाली में बैठे-बैठे मलीदा खा रहे हैं। [दोनों हाथ ऊपर ले जाते हुए] या ख़ुदा रहम कर, माफ़ी दिला दे इस रोज़े से।

[मोहनजी खाना अरोगने के बाद, सट को बंद करते हैं। फिर खिड़की से हाथ बाहर निकालकर, ठण्डे पानी की बोतल खोलकर अपने जूठे हाथ धोते हैं। हाथ धोने से उस बोतल का ठंडा-ठंडा पानी, खिड़की के नीचे सो रहे काबरिये कुत्ते के ऊपर गिरता है। पानी गिरने से, बेचारा कुत्ता घबरा जाता है। वह डरकर, सरपट दौड़ता है। उसके रास्ते के बीच में, बेचारे काजी साहब आ जाते है। फिर क्या..? वो तो झट उनके पिछवाड़े पर पेशाब की धार चला देता है, फिर उनके पायजामे से अपने बदन को रगड़ता हुआ उनकी दोनों टांगों के बीच में से निकलकर नौ दो इग्यारह हो जाता है। इस तरह उनके पहने पाक वस्त्र, नापाक हो जाते हैं। अब वे नाराज़ होकर, हाय तौबा मचाते हैं। और, वे सरदार निहाल सिंह से कहते हैं।]

क़ाज़ी सईद अहमद सिद्दीकी – [दोनों हाथ ऊपर करके, ज़ोर से चिल्लाते हुए कहते हैं] – अरे नापाक कर दिया रे, मुझको। हाय अल्लाह, अब कैसे जाऊँगा पीर दुल्लेशाह की मज़ार पे..? ओ मेरे बाबा, अब मैं क्या करूं..?     

सरदार निहाल सिंह – [हंसते हुए कहते हैं] – नहा लेना, यार। क्या फर्क पड़ता है, कौनसे आप रोज़ नहाते हैं..? जुम्मा-जुम्मा नहाते हैं, आप। इस रमजान माह में, रोज़ नहाया करो। आपको सवाब मिल जाएगा, मेरे यार।

[उन दोनों की गुफ़्तगू सुनकर, रशीद भाई अपनी हंसी रोक नहीं पाते..और वे, खिल-खिलाकर हंसते हैं। इनको इस तरह हंसते पाकर, रतनजी उनसे हंसने का कारण मालुम करना चाहते हैं।]

रतनजी – रशीद भाई, क्या बात है..? आप तो पागलों की तरह, काहे हंसते जा रहे हैं..?

रशीद भाई – [लबों पर, मुस्कान बिखेरते हुए कहते हैं] – वाह भाई, वाह। आख़िर, बाबा ने पर्चा दे ही दिया। दूसरों को मज़हब के उसूल बताना आसान है, मगर जब ख़ुद पर मुसीबत आन पड़ती है तब अहसास होता है। [काजी साहब को देखते हुए] अब जाइए, और मज़हब के कायदों को मानकर नहा लीजिये जनाब।

ओमजी – अरे रशीद भाई, बाबा ने कोई पर्चा नहीं दिया है। पर्चा दिया है, मोहनजी ने..बोतल का ठंडा पानी, कुत्ते के ऊपर डालकर।

मोहनजी – [आधी-अधूरी बात सुनकर] – ठोकिरा कढ़ी खायोड़ा। कैसी पागलों जैसी बातें कर रहे हैं, आप ? पर्चा तो मुझको मिल गया, क्यों मैं इतना जल्दी यहां आ गया..स्टेशन पर ? कुछ खा-पीकर आता तो अच्छा होता, क्योंकि गाड़ी तो अभी तक खड़ी है..

ओमजी – तो हो गया, क्या ? आपने गाड़ी में बैठकर, टुक्कड़ तोड़ लिए ना अब ? फिर, क्या ?

मोहनजी – अभी तक गाड़ी रवाना नहीं हुई है, इसलिए कह रहा हूं। के, आज़ फायदा उनको हो गया जो देरी से आये हैं।

रशीद भाई – अफसरों आप तो चुप-चाप बैठ जाइये, आपके कर्म ही ऐसे हैं..आप उठते हैं लेट, और भाभीसा के ऊपर आरोप जड़ देते हैं, के ‘उन्होंने नाश्ता, करने नहीं दिया।’ [खिड़की से, बाहर झांकते हुए] अरे देखो, गार्ड साहब ने हरी झंडी दिखला दी है।

[इंजन की सीटी सुनायी देती है, धीरे-धीरे गाड़ी स्टेशन छोड़ देती है। बाहर प्लेटफार्म पर खड़े यात्री दौड़कर, डब्बों में घुसते हैं। अचानक रशीद भाई की बुलंद नज़र दरवाज़े के पास गिरती है, वहां किसी को आते देखकर वे उन्हें ज़ोर से आवाज़ देकर अपने पास बुलाते हैं।]

रशीद भाई – अरे, दीनजी भा’सा आ गए हैं। [रास्ते में खड़े यात्रियों से कहते हैं] अरे, भले इंसानों। ज़रा भा’सा को निकलने का रास्ता तो दीजिये, ना। जानते नहीं, ये ज़रा भारी शरीर वाले ठहरे।

[यात्री गण थोडा परे हटकर, दीनजी भा’सा को निकलने की राह देते हैं। राह मिलते ही दीनजी भा’सा आते हैं, और उनके पीछे-पीछे नगर परिषद के दफ़्तरे निगार [लिपिक] बोड़सा आते हैं। अब सब अपनी-अपनी सीटों पर बैठ जाते हैं।]

रशीद भाई – [अपनी सीट से उठते हुए] – अरे भा’सा आपकी तो साँसे समा नहीं रही है, छाती में। ज़रा, सो जाइये..तबीयत दुरस्त हो जायेगी।

दीनजी – [अपने बैग को, खूंटी पर लटकाते हुए] – रहने दीजिये, रशीद भाई। मैं ठीक हूं, ठीक हूं। बस बात यही है, ग़लत प्लेटफार्म पर उतर गया था..इधर यह खुराफ़ती उदघोषक कभी कुछ कहता है, कभी और कुछ..

रशीद भाई – [सीट पर बैठते हुए] – फिर क्या हुआ, भा’सा ?

दीनजी – होना क्या ? पुलिया वापस चढ़ना, और उतरना और क्या ?

रतनजी – [हंसते हुए, कहते हैं] – और भा’सा, रामा पीर ने कसरत करवा दी आपको। यों तो आप, रामदेवरा जाने के लिए पद-यात्रा करते नहीं..?

दीनजी – [हाम्फते हुए, कहते है] – हां..हां जनाब, पहले मेरी बात सुन लो। इधर जनाब इंजन ने सीटी मार दी, और मेरा तो उस पुलिये से उतरना हो गया मुश्किल।

रशीद भाई – फिर क्या, हुआ भा’सा ?

दीनजी – [सीट पर बैठते हुए, कहते हैं] – हाम्फते-हाम्फते, पकड़ा इस डब्बे को। अब तसल्ली से बैठा हूं, जनाब।

बोड़सा – [अपना बैग थमाते हुए, कहते हैं] – अजी भा’सा, अभी कहां तसल्ली..? अब आप इस बैग का ध्यान रखना, मैं युरीनल जाकर आ रहा हूं। [सीट से, उठते हैं]

दीनजी – [बैग थामते हुए] – वाह बोड़सा, वाह। अभी तो आप स्टेशन के बाहर मूतकर आये, और यह क्या जनाब..वापस तैयार..?

रशीद भाई – [हंसते हुए कहते हैं] – बोड़सा उस्ताद, इतना जल्द मत उतारो यार..अभी तो आप..

ओमजी – [अधूरा जुमला पूरा करते हुए] – ‘जवान हैं।’ रशीद भाई, जाने दीजिये इन्हें। अभी तो मूतने का कोम्पिटेशन लगा है, आगे-आगे ही आपके उस्ताद मोहनजी युरीनल गये हैं।

[बोड़सा ठहरे मधुमेह के रोगी, वे अब कैसे रुक सकते ? वे तो सरपट दौड़ते हुए जा पहुंचे युरीनल के पास। वहां उन्होंने पतलून की चेन थामे, मोहनजी को खड़ा पाया। बेचारे बेसब्री से, युरीनल का दरवाज़ा खुलने का इंतज़ार कर रहे हैं। अब बीच में आ गए फाडी फंसाने वाले बोड़सा, उनको देखते ही वे कह देते हैं के..]

मोहनजी – पहले मैं आया हूं, पहले मैं जाऊंगा..

[तभी एक युरीनल का दरवाज़ा खुलता है, यात्री के बाहर आते ही मोहनजी झट युरीनल के अन्दर घुस जाते हैं। बेचारे मधुमेह रोगी बोड़सा की हालत पतली हो रही है, लघु-शंका नाकाबिले बर्दाश्त हो जाती है। तभी उनकी किस्मत से, पड़ोस वाले युरीनल का दरवाज़ा खुलता है। फिर क्या..? बोड़सा चैन की सांस लेते हैं, और झट बन्दूक की गोली की तरह वे दाखिल हो जाते हैं युरीनल के अन्दर। अब गाड़ी की रफ़्तार धीमी हो जाती है, भगत की कोठी का स्टेशन आ जाता है। गाड़ी रुक जाती है, उसके रुकते ही धक्का-मुक्की करते हुए यात्री डब्बे के अन्दर दाख़िल होते हैं। कई गाँव वाले, लाईनमेन भोमजी की घरवाली किसना बाई को ऊँचाये हुए डब्बे में दाख़िल होते हैं। और उनके पीछे-पीछे आते हैं, भोमजी। लूणी वाले भैरूजी के थान का भोपा भी, अलख निरंजन अलख निरंजन का गुंजारा करता हुआ डब्बे में दाख़िल हो जाता है। डब्बे के अन्दर, रास्ते में ठौड़-ठौड़ फ़कीर बैठे हैं। जो यात्रियों को आसानी से, आने-जाने नहीं दे रहे हैं। बड़ी मुश्किल से गाँव वाले, बीमार किसना को आँगन पर लिटाते हैं। लिटाते वक़्त, एक फ़कीर आँखे निकालकर गाँव वालों को देखता है। फिर वह नाराजगी ज़ाहिर करता हुआ, गाँव वालों से पूछ बैठता है।]

फ़क़ीर – [नाराज़गी से] – क्या हुआ, रे..?

एक गाँव वाला – होता क्या..? तेरी मां का सर, और क्या ? दिखता नहीं, इस औरत को भूतनी लगी हुई है। पास मत फटकना इसके, नहीं तो...

दूसरा गाँव वाला – [फ़कीर को डराता हुआ] - अब तू इससे दूर ही रहना, अगर तूझे भूतनी लग गयी तो..तू गाड़ी के मुसाफिरों को, आराम से सोने-बैठने नहीं देगा। अब दूर हट रे, बीमार औरत को सोने दे..हट।

[भूतनी का नाम सुनकर, अब सारे फ़क़ीर दूर हट जाते हैं। उनके दूर हटते ही, गाँव वाले किसना को अच्छी तरह से फर्श पर लेटा देते हैं। काम निपट जाने के बाद, गाँव वाले डब्बे से उतरकर चले जाते हैं। इंजन ज़ोर से सीटी देता है, गाड़ी प्लेटफार्म छोड़कर तेज़ी से पटरियों पर दौड़ने लगती है। अब भोमजी और भोपा सामान की गांठ व बाजरे के आटे की बोरी अच्छी तरह संभालते हुए, किसना बाई के निकट आकर बैठ जाते हैं।

भोपा – क्या-क्या सामान लाया रे, यजमान..? कागज़ बनाकर दिया, वो सारा सामान आ गया क्या..?

भोमजी – [हाथ जोड़कर कहते हैं] – हुकूम, आपके हुक्म से लूणी वाले भैरूजी के थान पर सवा-मन रोट चढ़ाने के लिए पीसी हुई बाजरी का आटा, माली-पन्ना, सिन्दूर, धान, तेल व गुड़ आपकी बतायी हुई सभी चीजें ला दी हुज़ूर।

भोपा – ला दिखा, क्या-क्या लाया तू ?

[भोमजी अब, बोरी व गांठ खोलकर दिखलाते हैं। अब भोपा गांठ से पतकाली मिर्चे, माली-पन्ना और माचिस निकालकर अपने पास रख लेता हैं। फिर अपना त्रिशूल ऊंचा-नीचा करता हुआ, अगम गाथा में लीन हो जाता हैं।]

भोपा – [गुंजारा करता हुआ, कहता है] – जय बाबा भैरू नाथ। कर दे, कल्याण। ओ यजमान, इस मिट्टी को फर्श पर अच्छी तरह से सुला दिया ? [त्रिशूल ऊँचा-नीचा करता हुआ] यह कोई आश्रम नहीं है, बाबा। गाड़ी का डब्बा है, बाबा।

[भोमजी और उनके पास बैठे यात्री भोपा को आश्चर्य से देखते हैं, उन्हें लगता है बाबा ज़रूर चमत्कारी है ? वह किस तरह, भैरू नाथ से प्रत्यक्ष बात कर रहा है ? अब यह भोपा, भोमजी को डराता हुआ वह बोलता जा रहा है]

भोपा – बाबा क्या करेगा जी, यह तो मिट्टी है बाबा। यह शरीर लगता है, दीमक है। मटके का नंबर चाहिए, बाबा। कैसे, बोलेगा..? किच-किच नहीं करेगा, बाबा। बोलो ना, बाबा। चिड़िया का वक़्त पूरा हो गया..सबका होता है, बाबा।

भोमजी – [होंठों में ही] – अरे रामा पीर, ये भोपा क्यों उलाहना देता जा रहा हैं..? इसका क्या मतलब है, के “चिड़िया का वक़्त पूरा हो गया..?” यह भोपा क्या बक-बक करता जा रहा है, रामा पीर ? क्या, यह इसकी चेतावनी है ?

[डर के मारे भोमजी की हालत बुरी हो जाती है, किसना बाई की सम्म्भावित मौत की आशंका समझकर वे घबरा जाते हैं। उनके हाथ-पाँव, कांपते जा रहे हैं। अब वे हाथ जोड़कर, उससे प्रार्थना करते हैं]

भोमजी – [हाथ जोड़कर कहते हैं] - बाबजी, मैं आपकी शरण में हूं । मेरी किसना बाई को बचा दे, बाबा। मेरा घर, टूटने मत दे।

[फिर क्या..? भोमजी तो घबराकर, ज़ोर-ज़ोर से रोते जा रहे हैं। इधर इन भोमजी को स्वत: अपने ज़ाल में फंसा पाकर, भोपा उन्हें लूटने की तरकीब सोचता है। थोड़ी देर बाद, वह उनसे कहता है]

भोपा  – देखो बच्चा, रोग बढ़ गया है। बस एक ईलाज़ बाकी है, मगर है महँगा। तेरी हिम्मत हो तो कर, इंतज़ाम ख़ाली पांच हज़ार रुपयों का। सुन, जाप करूंगा..मसान भैरू जगाऊंगा। जय भैरू नाथ, अलख निरंजन।

[इस भोपे की भाषा, बोली-चाली, जात-पांत, रहन-सहन ऐसे गड्ड-मड्ड लग रहे हैं, के ‘कोई समझदार इंसान इसको देखकर ही, समझ लेता है..यहां कोई ज्ञान, सिद्धि, और शक्ति कुछ नहीं है।’ भोपा तो एक नश्वरता का ज्ञान बखान करता हुआ, पल्ला झटक लेता है]

भोमजी – [भोपा के पांवो में, गिरकर कहते हैं] – कुछ करो, मेरे माई-बाप।

[अब उनके पास बैठे फकीर भी, भोपा से मिन्नत अलग से करते जा रहे हैं। इन बेचारे फ़कीरों के पास, रखा क्या है ? या तो बीड़ियों का बण्डल, या गांजे की चिलम। बस उन्होंने सोचा, के ‘किसी तरह इस भोपे को बीड़ी या गांजे की चिलम पिलाकर खुश कर दिया, तो वह जरुर तंत्र-मन्त्र से इस औरत को ठीक कर देगा ?’]

एक फकीर – [भोपा से] – बचा ले बाबा, इस औरत को। दुआ लगेगी तुझको, अल्लाह पाक तेरे सौ गुन्हा माफ़ करेगा।

दूसरा फकीर – [भोपा को बीड़ी देता हुआ, कहता है] – अरे बाबा इस बीड़ी के चार कश लगा ले, और बचा ले इस अल्लाह की बंदी को।

[अब मामला कुछ गंभीर होता जा रहा है, भोपा के आस-पास यात्रियों का जमाव होने लगा। इस तरह पाख़ाने की तरफ़ जाने वाला रास्ता, बिल्कुल जाम हो जाता है। अपने चारों तरफ़ इतने सारे तमाशबीन यात्रियों को देखकर, भोपा अपना रंग ज़माना चालू कर देता है। उसने झट पतकाली मिर्चे [लाल सूखी मिर्चें] जलानी शुरू की, फिर किसना बाई का नाक भींचकर मन्त्र पढ़ने का ढोंग करता है। पतकाली मिर्चों के जलने की गंध, किसना बाई के पास पहुंचती है..उस बेचारी की आँखे जलती है, उधर उस भोपे ने उसका नाक अलग से भींच रखा है ? तभी भगवान जाने अचानक किसना बाई के बदन में, न जाने कहां से इतनी ताकत आ जाती है..? के झट उस भोपे को, ऐसा ज़ोर का धक्का मारती है..जिससे बेचारा वह भोपा जाकर गिरता है, युरीनल से बाहर आ रहे मोहनजी पर। और मोहनजी जाकर गिरते हैं, दूसरे युरीनल से बाहर निकल रहे बेचारे बोड़सा के ऊपर। बेचारे बोड़सा को ऐसा लगता है, मानो किसी ने उनके ऊपर धान की बोरी डाल दी है..? इस तरह बेचारे बोड़सा के लिए, यह मूतने का कोम्पीटेशन पड़ जाता है महँगा। इधर हनवंत स्टेशन आ जाने से, अक्समात गाड़ी रुक जाती है। गाड़ी के रुकने से ज़ोरों का लगता है, झटका। इस झटके के कारण, यात्री एक-दूसरे ऊपर आकर गिरते हैं। यात्री जब-तक संभले, तब-तक टी.टी.ई. आसकरणजी रेलवे पुलिस कांस्टेबलों को साथ लिए डब्बे में दाख़िल हो जाते हैं। उनको देखकर, पूरे डब्बे में खलबली मच जाती है। सभी यात्री, अपने-अपने टिकट संभालते हैं। और अब मुफ़्त यात्रा करने वालों में, भय व्याप्त होना स्वाभाविक है। वे घबराकर, युरीनल में जाकर छिप जाते हैं। इस भाग-दौड़ में भोपे के पास रखे माली-पन्ने बिखर जाते हैं, इधर बेटिकट यात्रियों की धर-पकड़ कर रहे आसकरणजी के पांव उन माली-पन्नों के ऊपर रख दिए जाते हैं। यह मंज़र देखते ही भोपा नाराज़ हो जाता हैं, फिर कड़वे शब्दों का इस्तेमाल करता हुआ आसकरणजी को अपशब्द कहता है]

भोपा  – [गुस्से में त्रिशूल को ऊंचा-नीचा करता हुआ कहता है] – अरे, ओ नराधम प्राणी। तूने, यह क्या कर डाला ? अब तो तू ज़रूर, सीधा जाएगा नर्क में, तेरे पिछवाड़े में पड़ेंगे कीड़े।

आसकरणजी – [माली-पन्ने के सिट्टे गाड़ी से बाहर फेंकते हुए कहते हैं] – नराधम तू, और तेरा बाप। साल्ले पाखंडी, मेरी गाड़ी में बिछा रहा है, ज़ाळ। तुझको मेरी ही गाड़ी मिली, लोगों को लूटने के लिए..? कमबख्त, निकाल तेरा टिकट..!

[टिकट का नाम सुनकर, भोपा घबरा जाता है। उसका बदन, पसीने से तर-बतर हो जाता है। अब, टिकट हो तो बतायें..? फिर दारुण नज़रों से अपने यजमान भोमजी को देखता है, शायद भोमजी उसका टिकट दिखलाकर उसे बचा दे..?]

आसकरणजी – [क्रोधित होकर, कहते हैं] – इनको क्या देखता है रे, माता के दीने ? ये भोमजी तो है, हमारे स्टाफ़ के। तू अपना टिकट, दिखा। ना तो ठोकिरे, हो जा तैयार सरकारी ससुराल की हवा खाने के लिए।

[पुलिस वाले युरीनल से बे-टिकट सफ़र करने वाले यात्रियों को, बाहर निकालते हैं। फिर, आसकरणजी के सामने हाज़िर करते हैं। उनको देखकर आसकरणजी गरज़ती हुई आवाज़ से, उन पुलिस वालों को हुक्म दे डालते हैं।]

आसकरणजी – [ज़ोर से] – जवानों। इन सबको सरकारी गहने पहना दो, और साथ में इस पाखंडी बाबा को भी ले लो। यह कमबख्त तो, मेरी गाड़ी में ही भोले यात्रियों को लूटता जा रहा है..?     

[आसकरणजी की ज़ोरदार बुलंद आवाज़ सुनकर रतनजी, कई एम.एस.टी. वालों को साथ लेकर वहां चले आते हैं। आसकरणजी को देखकर, रतनजी कहते हैं।]

रतनजी – [आसकरणजी के नज़दीक आकर कहते हैं] – भा’सा, जय श्री कृष्ण। कैसे हो, जनाब ? क्या हाल-चाल है, आपके ? वाह भाई, वाह। आज़ तो जनाब, आपने इतने सारे सरकारी दामादों को इकठ्ठा कर लिया है। क्या आप इन्हें, सरकारी ससुराल ले जा रहे हैं..?

आसकरणजी – [बेरुखी से कहते हैं] – मैं तो ठीक हूं, भय्या। मगर, आपके क्या हाल हैं ? गपों का बाज़ार, गर्म करते जा रहे हैं आप ? और भूल गए आप, इंसानियत..? यह बेचारी बीमार औरत पड़ी है, ठण्डे फर्श पर। और आप अपनी सीटों पर बैठे-बैठे, हंसी-मज़ाक करते जा रहे हैं..?

रतनजी – क्या कहा, जनाब..?

आसकरणजी – सुना नहीं, आपने..? यह भोमजी की बेर [पत्नी] है, बेचारी तकलीफ़ पा रही है। क्या आप भूल गए, हमारे भोमजी बन्ना को..? बस इतना ही हमारे स्टाफ़ वालों का, आप लोग ध्यान रखते हैं..?

[अब रतनजी, भोमजी व उनकी बेर पर निग़ाह डालते हैं। फिर देखते हैं, उस पाखंडी भोपे को। जो सरकारी गहने पहना हुआ, बे-टिकट यात्रियों के साथ बैठा है। उन लोगों के पास ही, पुलिस वाले मुस्तेदी से खड़े हैं। भोमजी लाईनमेन को पहचानकर, रतनजी उन्हें उलाहना देते हुए कहते हैं।]

रतनजी – अरे ओ भोमजी, आप यहां इन फकीरों के पास आकर कैसे बैठ गए..? अरे बेटी का बाप, कहीं इनके पास बैठकर गांजा पीने की तलब तो नहीं आ गयी आपको ? अब उठिए, भोमजी..चलो हमारे साथ।

[इतना कहकर, पास खड़े एम.एस.टी. वालों से कह बैठते हैं।]

रतनजी – [एम.एस.टी. वालों से] – उठाओ रे, भाभी को। [भोमजी से] भोमजी, ज़रा आप भी थोडा हाथ लगाना।

[सब मिलकर किसना बाई को सहारा देकर, ले आते हैं, मोहनजी वाले केबीन में। वहां ले जाकर, सीटें ख़ाली करके उसे लिटाते हैं। पीछे से, भोमजी भी उसी केबीन में चले आते हैं।]

रशीद भाई – [तख़्त से सामान दूर लेते हुए] – आओ भोमजी, आओ। आप आराम से बिराज जाइए, खिड़की के पास। मोहनजी गए हैं, मूतने।

रतनजी – [हंसते हुए, कहते हैं] - आज़ तो यह काका बार-बार जा रहा है, युरीनल। वो आये तब, उन्हें भेज देना हमारे पास...हम लोग, पास वाले केबीन में ही बैठे मिलेंगे।

[अब सभी एम.एस.टी. वालें अपना सामान उठाकर, पास वाले केबीन की तरफ़ जाते हैं। भोमजी अब, मोहनजी वाली जगह पर आराम से बैठ जाते हैं। रशीद भाई अपने बैग से जोड़ मसलने की ट्यूब व पेरासिटामोल की गोलियां निकालकर, भोमजी को देते हुए कहते हैं।]

रशीद भाई – [ट्यूब और गोलियां देते हुए] – भोमजी सा, आप यह सोच लीजिये के भाभीसा को ना तो कोई भूत लगा है, ना भूतनी। यह लीजिये, ट्यूब और गोलियां। भाभीसा को हुआ है, चिकुनगुनिया का बुखार।

भोमजी – [ट्यूब और गोलियां लेते हुए, कहते हैं] – क्या, यह सच्च है..? 

रशीद भाई – शत प्रतिशत सही है, गाँव-गाँव और शहर-शहर में यह बुखार फ़ैल गया है। इसलिए जनाब, मैं जैसा कहता हूं आप वैसा ही कीजिये। अरे भोमजी सेठ, मैं तो अक़सर पेरासिटामोल की गोलियां व जोड़ मसलने की मूव ट्यूब, अपने बैग में अपने साथ ही रखता हूं ।

भोमजी – रशीद भाई, क्या यह सच्च है...किसना बाई को, कोई भूतनी नहीं लगी है ?

रशीद भाई – यही बात समझा रहा हूं, आपको। इस बुखार में बदन के सभी जोड़ टूटते हैं, औरतें तो जनाब अपने बाल खींचती है..अरे जनाब, आपको क्या कहूं ? गंवार समझते हैं, के ‘इसको भूतनी लग गयी है।’ फिर क्या ? फ़टाफ़ट बुला लाते हैं, किसी भोपे या ओझा को। वह इन्हें मूर्ख बनाकर, रुपये-पैसे लूट लेता है।

भोमजी – [हंसते हुए, कहते हैं] – अरे मालिक अब आप मुझे गंवार मत समझना, आप लोगों का साथ करके मैं तो समझदार इंसान बन गया हूं। अब आप यह बताइये, ये गोलियां कैसे लेनी हैं..?  

रशीद भाई – भोमजी यार आप तो अभी, भाभीसा के हाथ-पाँव के जोड़ों पर ट्यूब की मालिश कर लीजिये। अभी आराम मिलता है, लूणी स्टेशन आये तब...थड़ी वाले से चाय लेकर, भाभीसा को चाय के साथ गोली दे देना।

[अब रशीद भाई जाने के लिए अपना बैग उठाते हैं, फिर भोमजी से कहते हैं।]

रशीद भाई – [बैग उठाकर, कहते हैं] – अब चलते हैं, अब आप भाभीसा का ध्यान रखना।

भोमजी – जो हुक्म, मालिक। मेरे लायक कोई काम हो तो रशीद भाई, आप ज़रूर कहें।

रशीद भाई – मोहनजी आये तब उन्हें, पास वाले केबीन में भेज देना। अब आप आराम से बैठकर मालिश कीजिये, भाभीसा के जोड़ों की। अब हम, चलते हैं।

[रशीद भाई और उनके सारे साथी, पास वाले केबीन में चले जाते हैं। मंच पर, अंधेरा छा जाता है। थोड़ी देर बाद, मंच वापस रोशन होता है। मोहनजी अपने लबों पर मुस्कान लाकर, युरीनल से बाहर आते हैं। उनके बाहर आते ही, झट बाहर खड़े बोड़सा बन्दूक की गोली की तरह युरीनल में घुस जाते हैं। अब मोहनजी डब्बे के दरवाज़े के पास आकर, खड़े हो जाते हैं। वहां खड़े-खड़े, बाहर का नज़ारा लेते दिखायी देते हैं। गाड़ी की रफ़्तार, धीमी होती है। लूणी स्टेशन आता है, गाड़ी प्लेटफार्म पर आकर रुक जाती है। अब प्लेटफार्म पर चारों और थड़ी वालों की आवाजें गूंज़ती है, तभी सामने वाले प्लेटफार्म पर मोहनजी को एक मालगाड़ी खड़ी दिखायी देती है। वह मालगाड़ी, उन्हें धान की बोरियों से लदी हुई लगती है। अब कई यात्री चाय-नाश्ता करने के लिए, नीचे उतरकर प्लेटफार्म पर आते हैं। और इधर पुलिस वाले बे-टिकट यात्रियों व उस भोपे को साथ लिये, स्टेशन मास्टर के दफ़्तर की तरफ़ जाते दिखायी देते हैं...और उनके पीछे-पीछे, आसकरणजी क़दमबोसी करते हुए दिखायी देते हैं। धान की बोरियों से लदी हुई माल गाड़ी को पाकर, मोहनजी खुश हो जाते हैं। अब वे, बड़ाबड़ाते हैं।]

मोहनजी – [बड़बड़ाते हुए] – अरे ठोकिरा, यह तो विशेष मालगाड़ी है..जिसमें आस्ट्रेलिया के लाल गेंहू की बोरियां भरी है। वाह, अब तो अपनी किस्मत चमक गयी है। अब तो तीन-चार दिन का टूर पैदा हो गया। पहले से स्वीकृत की हुई छुट्टियां, अब रद्द समझो।

[प्लेटफार्म से गुज़रते हुए, एक ग्रामीण के ऊपर उनकी निग़ाह गिरती है। जिसने सर पर पचरंगी पगड़ी और बदन पर सफ़ेद कुर्ता व ऊंची धोती पहन रखी है। जो एक ही नज़र में, देहाती लग रहा है। उसे देखते ही, वे उसे ज़ोर से आवाज़ देते हुए कहते हैं।]

मोहनजी – [ग्रामीण को ज़ोर से आवाज़ लगाते हुए, कहते हैं] – अरे, ओ पगड़ी वाले भईजी। हम एफ़.सी.आई. के अफ़सर हैं, हमें थोडा बताकर जाओ..वह मालगाड़ी कहां से आयी है, और कहां जा रही है..?

[वह पगड़ी वाला ग्रामीण, एक बार ज़रूर मोहनजी की तरफ़ देखता है..मगर, कोई जवाब नहीं देता...बस, अनसुना करके, प्याऊ की तरफ़ क़दमबोसी कर बैठता है। हुक्म की तामिल नहीं होने से, मोहनजी को आ जाता है अफ़सरशाही का ताव। फिर क्या..? झट गाड़ी से नीचे उतरकर पहुँच जाते हैं, उसके पास। फिर उसका हाथ पकड़कर, ऊंची आवाज़ में कहते हैं।]

मोहनजी – [पगड़ी वाले का हाथ पकड़कर, कहते हैं] – कहां जा रिया है, कढ़ी खायोड़ा..? ए पगड़ी वाले भय्या, सुनता क्यों नहीं..बहरा है..? बता अब, यह मालगाड़ी कहां से आ रही है, और कहां जा रही है..? नहीं जानता है तो जा, माल बाबू को पूछकर आ।

[मगर वह कुछ बोलता नहीं, ऐसा लगता है मानो उसने अपने होंठों की सिलाई कर रखी है ? इधर गार्ड साहब ने, हरी झंडी दिखला दी। और उधर, मोहनजी के कानों में इंजन की सीटी गूंज़ती है। फिर, क्या ? मोहनजी तेज़ क़दम चलते हुए, अपने डब्बे की तरफ़ बढ़ते है। मगर रास्ते में पुड़ी वाला वेंडर उनका रास्ता रोकता हुआ, ऐसी करुण आवाज़ में उनसे निवेदन करता है....मानो, वह कह नहीं रहा है, बल्कि रोता जा रहा है ।]

पुड़ी वाला वेंडर – [रोवणकाळी आवाज़ में] – इंऽऽ इंऽऽ पुड़ी-सब्जी ले लो, पुड़ी खाइके। [मोहनजी से] ओ एफ.सी.आई. के अफसरों ले लो पुड़ी-सब्जी..पैसे कम लगा दूंगा। ले लो, दस रुपये पाव पुड़ी-सब्जी।

मोहनजी – [मोल-भाव करते हुए] – थोड़े और पैसे कम करो, भईजी। आप कौनसा बढ़िया तेल वापरते हैं, भईजी ? [इतने में गाड़ी प्लेटफार्म छोड़ती हुई, दिखाई देती है] अरे कढ़ी खायोड़ा, मेरी गाड़ी तो छूट रही है..

[गाड़ी, धीरे-धीरे चलने लगती है। मोहनजी दौड़कर, डब्बे के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ने का प्रयास करते हैं। बेचारे घबरा जाते हैं, इस घबराहट के मारे उनके हाथ-पांव फूल जाते हैं। दरवाज़े का हेंडल थामने की कोशिश करते हैं। मगर वो हेंडल, इनके कांपते हाथ से पकड़ा नहीं जा रहा है। वहां दरवाज़े के पास खड़े ओमजी, अपना हाथ बाहर निकालकर उन्हें पकड़ने की कोशिश करते हैं। बहुत मुश्किल से बेचारे मोहनजी की कलाई उनके हाथ में आती है, वे उन्हें खींचकर डब्बे में लाते हैं। तभी वह पुड़ी वाला वेंडर अपना ठेला बढ़ाता हुआ दरवाज़े के निकट चला आता है, और ज़ोर-ज़ोर से मोहनजी को आवाज़ देता हुआ उन्हें कह बैठता है।]

पुड़ी वाला वेंडर – [ठेला बढ़ाता हुआ] – अफसरों ले लो, सब्जी-पुड़ी। कढ़ी की सब्जी, आपको मुफ़्त में दूंगा। ले लीजिये, जनाब ले लीजिये।

[मुफ़्त की चीज़ छोड़ने की, मोहनजी की इच्छा होती नहीं। और वो भी मुफ़्त, उनकी फेवरेट कढ़ी की सब्जी..? अब वे गाड़ी से उतरने की कोशिश करते हुए, कहते हैं।]

मोहनजी – कहां जा रिया है, कढ़ी खायोड़ा..? पुड़ी-सब्जी देता जा रे, ठोकिरे।

[उतरने की, कोशिश करते हैं। मगर ओमजी उनकी कलाई थामें रखते हैं, जिससे वे नीचे उतर नहीं पाते। मगर उनका दिल, पुड़ी-सब्जी लेने का बना रहता है।]

मोहनजी – [उतरने की कोशिश करते हुए, कहते हैं] – कहां जा रिया है, पुड़ी वाले..? पुड़ी-सब्जी, देता जा। कढ़ी की सब्जी देना, भूलना मत।

ओमजी – [मोहनजी को खींचकर वापस लाते हुए, कहते हैं] – ख़ुदकुशी, करनी है क्या..? हम तीन ग्रहों से परेशान हो गए हो तो, मरो जाकर..हमें क्या ?

[मोहनजी की कलाई पकडे हुए ओमजी, उनको लाकर उनकी सीट पर बैठाते हैं। मंच पर अंधेरा छा जाता है, थोड़ी देर बाद मंच वापस रोशन होता है। लूणी स्टेशन का प्लेटफार्म दिखायी देता है, वहां प्याऊ के पास वो पगड़ी वाला खड़ा है। प्याऊ वाला इस समय, उस पगड़ी वाले को फटकारता हुआ कह रहा है।]

प्याऊ वाला – [डांटता हुआ, कहता है] – ओ भईजी, ऐसा किस बात का घमंड है..आपको ? उस एफ.सी.आई. के अफ़सर को जवाब देने में, आपको मौत आयी थी ?

[इतने में उसके पहलू में बैठा एक लाइनमेन, बोल उठा]

लाइन मेन – [पगड़ी वाले से] - वो बिचारा मासूम, कितना ज़रूरतमंद दिखायी दे रहा था ? आपके कारण बेचारे की गाड़ी छूट जाती तो, भईसा..आपके बाप का, क्या जाता ?                      

पगड़ी वाला – [हकलाता हुआ कहता है] – क..क क्या बताऊं ? मैं हक़ हकला हूं, झग..झगड़ा हो जाता।

प्याऊ वाला – [हंसता हुआ कहता है] – अच्छा हुआ, नहीं बोला तो। अभी बहन की ठौड़ रांड बोल देता, तो रामा पीर जाने तेरी क्या गत होती..?

[मंच पर अंधेरा छा जाता है, थोड़ी देर बाद मंच वापस रोशन होता है। मोहनजी और उनके साथी, केबीन में बैठे हुए दिखायी देते हैं। मोहनजी की साँसे अभी सामान्य नहीं हुई, इसलिए वे हाम्फते हुए बोलते जा रहे हैं।]

मोहनजी – [हाम्फते हुए, कहते हैं] – अरे..अरे रामा पीर, इतना दौड़ा इतना दौड़ा..बाद में मेरे हाथ में आया यह कमबख्त ह..ह हेंडल।

ओमजी – अफसरों झूठ मत बोलो, हेंडल नहीं..पकड़ में आया मेरा हाथ। बेटी का बाप, आज़ तो आप ख़ुद तो मरते, और साथ में..मेरी भी ख़ुदकुशी करवा देते..?

रशीद भाई – ख़ुदा रहम। देख लीजिये, जनाब। आप तो हमें, राहू, केतू और शनि ग्रह कहते हैं..फिर हम में से एक ग्रह का हाथ थामकर, आपने जीवन की डोर पकड़ ली। कहिये, हम लोग आपके मित्र हैं या दुश्मन..?    

मोहनजी – [लबों पर मुस्कान लाकर, कहते हैं] – रशीद भाई आप ठहरे, सेवाभावी। आप सच्च ही कहते होंगे, अब आप अपनी भरी हुई पानी की बोतल थमाकर मित्र का धर्म निर्वाह कीजिये। अरे यार, प्यासा मर गया..

[रमजान का पाक महिना, और यह अंगार उगलती गर्मी। और इधर, यह रोज़ का आना-जाना। गाड़ी में बैठे रशीद भाई ने रोज़ा न रख पाने की, अल्लाह पाक से माफी मांग ली थी। रोज़े से तो छुटकारा मिल गया, मगर अब मोहनजी को प्यासे मरते देखकर उनका दिल पसीज गया। वे अपने दिल में ही सोचने लगे, के..]

रशीद भाई – [सोचते हुऐ] – देखा जाय तो यह मोहनजी है कुपात्र, दया करने के लायक नहीं। अभी इसको पानी से भरी हुई बोतल दूंगा, तो यह ज़रूर मुंह लगाकर इसे जूठी कर देगा। फिर तो अल्लाह मियां, मुझे प्यासा ही रहना होगा ? इधर चल रहा है रमजान, रोज़े ना रखे तो क्या..? इसे पानी पिलाकर, अब सवाब ले लेना ही अच्छा है।

[इतना सोचकर, वे पानी से भरी हुई बोतल मोहनजी को थमा देते हैं। फिर कहते हैं, उनसे..]

रशीद भाई – [बोतल थमाते हुए, कहते हैं] – भर-पेट पानी पी लीजिये, जनाब। और इस बोतल को भी, अपने पास रख लेना। क्योंकि, हमारा तो पाली स्टेशन आने वाला ही है। [सोचते हुए] रोज़ा नहीं रखा, तो क्या..? प्यासे को पानी पिलाकर सवाब तो ले लिया, ख़ुदा के फ़ज़लो करम से।

मोहनजी – [बोतल लेते हुए कहते हैं] – ओ भले मानुष, रशीद भाई कढ़ी खायोड़े। तेरा भला हो..[केबीन में भोमजी को आते हुए देखकर, कहते हैं] अरे ये लीजिये, भोमजी सेठ भी आ गए..? अरे रामसा पीर, बोरी ऊंचाकर यहां क्यों लाये..भोमजी ?  

[रशीद भाई के पास, आटे से भरी बोरी लाकर रखते हैं। फिर हाथ जोड़कर, उनसे निवेदन करते हैं।]

भोमजी – [हाथ जोड़कर कहते हैं] – आपका भला हो, रशीद भाई। क्या गोली दी, आपने..? भागवान तो उठकर बैठ गयी है, जोड़ों का दर्द तो बिल्कुल ही खत्म हो गया। अब मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूं, आशा है आप मेरा काम ज़रूर करेंगे।

[इतना कहकर, भोमजी रशीद भाई के पहलू में बैठ जाते हैं।]

रशीद भाई – हुक्म कीजिये, भोमजी सेठ।

भोमजी – करमज़ला भोपा तो गया, धेड़ में..काला मुंह करने। भैरूजी बाबजी को रोट चढ़ाने के लिए, लाया था..मन भर, बाजरी का आटा। अब आप इस आटे की बोरी को, ले लीजिये..

रशीद भाई – अरे भोमजी सेठ, मैं क्या करूंगा इस आटे का ? सवाब के लिए निकाली गयी चीज़, घर ले जा नहीं सकता..इधर रमजान का पाक माह, अलग से चल रहा है....

भोमजी – [हंसते हुए, कहते हैं] – अरे साहब, रामापीर बचाये मुझको..आप जैसे भले आदमी को, पुण्य की चीज़ खिलाये तो ? अगर ऐसा हो गया तो, रामा पीर मुझे नर्क मिले। बस मालिक..

रशीद भाई – कहिये, भोमजी सेठ, क्या कहना चाहते थे आप..? शर्म मत कीजिये, आप फरमाइये।

भोमजी - मेहरबानी करके आप अपने दफ़्तर के ग्राउंड में, इस आटे से कीड़ी नगरे सींचते रहना। मुझे मालुम है, आपके वहां बहुत सारे कीड़ी नगरे है।

[भोमजी की बात सुनकर, मोहनजी को लाडी बाई के बोले गए कड़वे शब्द याद आ गये, के “अब मैं आपको सावचेत कर रही हूं, वापस आकर बाजरे की बोरी पिसाकर रख देना...नहीं तो, आप जानते ही हो...” अब उन्हें, अनायस बाजरे के आटे का इंतजाम होता दिखायी देने लगा। वे खुश होकर, अपने दिल में सोचने लगे के..]

मोहनजी – [होंठों में ही] – कहां जा रिया रे, कढ़ी खायोड़ा..भोमजी ? इसको मत दे रे, यह बोरी बाजरे के आटे की। यह रशीद ठहरा, धूल उड़ाने वाला। दफ़्तर में कुछ काम करता नहीं, अस्थमा की बीमारी का बहाना लेकर। मुझे यह बोरी दे दे यार भोमजी, मेरा काम सलट जायेगा।

[रशीद भाई के हां या ना कहने के पहले ही, मोहनजी झट बोरी को खिसका कर रख लेते हैं अपने पास। और फिर, शीरी जबान से कहते हैं।]

मोहनजी – [शीरी जुबान से, कहते हैं] - भोमजी सेठ। मेरे दफ़्तर के पास भी, बहुत सारे कीड़ी नगरे हैं। मैं यह बोरी ले जा रहा हूं, रोजाना कीड़ी नगरे सींचता रहूंगा..बस, आप बेफ़िक्र हो जायें। अब आप ऐसा कीजिये, भोमजी..

भोमजी – बोलो हुकूम, हुक्म दीजिये।

मोहनजी – देखो भोमजी, ऐसे तो यह बीमारी जाती नहीं, आज़ आप पाली उतर जाइए।

भोमजी – अच्छा साहब, आगे हुक्म कीजिये।

मोहनजी – पाली उतरकर आप दोनों सीधे रुई कटला जाना, वहां है डॉक्टर तुलसी दासजी पुरोहित की डिस्पेनसरी। वहां भाभीसा को दिखलाकर, ईलाज़ ले लेना। उनकी दी हुई दवाई, कार करती है। तुलसी दासजी पाली के, माने हुए अनुभवी डॉक्टर हैं।

[डायरी से पन्ना फाड़कर, उसमे डॉक्टर साहब का पूरा पत्ता लिखते हैं। फिर उस कागज़ को, भोमजी को थमा देते हैं।]

मोहनजी – [कागज़ थमाते हुए, कहते हैं] – लीजिये भोमजी, इसमें डॉक्टर साहब का पूरा पत्ता लिख दिया है। अब आप उनसे पूरा ईलाज़ ले लेना, भाभीसा जल्द ठीक हो जायेगी।

[भोमजी मोहनजी से पत्ता लिखा कागज़ ले लेते हैं, फिर कहते हैं..]

भोमजी – आपका भला हो, साहब। मेरे लिये और कोई काम हो तो, हुक्म दीजिये। मुझे बहुत ख़ुशी होगी, अगर मैं आपके कोई काम आ सका।

[भोमजी के ऐसा कहते ही, मोहनजी ने अपने लबों पर मुस्कान छोड़ दी..फिर अपने साथियों को खारी-खारी नज़रों से देखते हुए, भोमजी से कहते हैं।]

मोहनजी – [लबों पर मुस्कान लाकर, कहते हैं] – भोमजी सेठ, कहना नहीं चाहता। मगर, आप इतना ज़ोर देकर कह रहे हैं...

भोमजी – [उठते हुए, कहते हैं] - शर्म मत कीजिये, साहब। फरमाइए, हुकूम।

मोहनजी – अभी आप पाली में उतरो तब खारची के माल बाबू से मेरी सिफ़ाअत लगाकर कह देना, के ‘मोहनजी आपको जो माल देवे, वह माल जोधपुर पहुंचा देवे।’ वे जोधपुर में, गार्ड बाबू से माल ले लेंगे।

[गाड़ी के इंजन की सीटी सुनायी देती है। थोड़ी देर में, पाली स्टेशन आता हुआ दिखायी देता है।]

भोमजी – जय रामजी सा। पाली स्टेशन आ गया है, अब रुख़्सत होने की इज़ाज़त चाहता हूं । आप फ़िक्र करना मत, उतरते ही सबसे पहले माल बाबू को फोन लगा दूंगा।

[गाड़ी की रफ़्तार धीमी हो जाती है, गांठ ऊंचाये हुए भोमजी अपनी बेर के साथ डब्बे के दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाते दिखायी देते हैं। अब ओमजी रशीद भाई के कान में, कुछ कहते नज़र आते हैं।]

ओमजी – [कान में फुसफुसाते हुए कहते हैं] – देख लीजिये, रशीद भाई। साहब का चेहरा चमकने लगा है, आख़िर साहब ने सेटिंग कर ही ली।

मोहनजी – [लबों पर मुस्कान लाकर] – रशीद भाई सुबह आपने बड़े खिलाये, अब मैं शाम को आऊंगा तब आप सबको चाय ज़रूर पिला दूंगा। अब आप सब लोग, आराम से जाना। जय बाबा री, सा।

[गाड़ी रुक जाती है, मोहनजी को छोड़कर सभी साथी अपने बैग उठाकर प्लेटफार्म पर उतर जाते हैं। नीचे उतरने के बाद रतनजी, खिड़की के पास बैठे मोहनजी की तरफ़ देखते हुए जुमला बोल देते हैं।]

रतनजी – ये आली जनाब, चाय क्या पायेंगे..? अरे जनाब, आली जनाब ठहरे, अफसर। जो कोहनी पर गुड चढ़ाए रखते हैं..ख़ुद ख़र्चा करते नहीं, मगर अपने नीचे वाले कार्मिकों से ख़र्चा करवाकर यश ख़ुद लुट लेते हैं। ये महाशय तो...

ओमजी - मुट्ठियों में थूककर, अहिंसा एक्सप्रेस से भाग जायेंगे जोधपुर। सभी जानते हैं, यह गाड़ी कभी पाली नहीं रुकती है।

[सर्वोदय कोलोनी वाली रेलवे फाटक के पास, आया हुआ सिंगनल डाउन हो चुका है। सर्वोदय कोलोनी वाली फाटक, अब बंद दिखाई दे रही है। अचानक मोहनजी को कुछ याद आता है, झट खिड़की से मुंह बाहर झांककर रशीद भाई को आवाज़ लगाते हुए कहते हैं।]

मोहनजी – [खिड़की से बाहर झांकते हुए, कहते हैं] – कहां जा रिया रे, कढ़ी खायोड़ा रशीद भाई ? पानी की बोतल तो...

[आगे उनकी आवाज़ सुनाई नहीं देती है, क्योंकि मारवाड़ जंक्शन से आ रही एक माल गाड़ी की तेज़ रफ़्तार से पैदा हुई खरड़-खरड़ आवाज़ से प्लेटफार्म का कम्पन बढ़ चुका है। उसकी खरड़ खरड़ आवाज़ के आगे, कुछ सुनायी नहीं दे रहा है। मंच पर, अंधेरा छा जाता है।]

clip_image004[अब आप अगला खंड २ माल ज़रूर उड़ाओ, मगर घर का नहीं..]

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रचनाकार: [मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित - पहला भाग
[मारवाड़ का हिंदी नाटक] यह चांडाल चौकड़ी, बड़ी अलाम है। लेखक - दिनेश चन्द्र पुरोहित - पहला भाग
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