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घर जलाकर - प्रांत-प्रांत की कहानियाँ - 9 - संकलन व अनुवाद - देवी नागरानी

प्रांत-प्रांत की कहानियाँ

(हिंदी-सिन्धी-अंग्रेजी व् अन्य भाषाओँ की कहानियों का अनुवाद)

देवी नागरानी

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उर्दू कहानी

घर जलाकर

इब्ने कंवल

बस्ती में हाहाकार मची हुई थी। आग फैलती चली जा रही थी, आसमान धुएं से भर गया था। आग पर काबू पाने की कोशिश के बावजूद आग काबू से बाहर थी। औरतें सर पीट-पीटकर चीख रही थीं। बच्चे खौफ से चिल्ला रहे थे और मर्द आग बुझाने की कोशिश में लगे हुए थे। पास और दूर, ऊंचे ऊंचे पक्के मकानों के आवासी तमाशाई बने धुएं और तपिश से बचने के लिए अपने घरों की खिड़कियाँ दरवाजे बंद कर रहे थे। शहर के बीच में रामलीला ग्राउंड के नज़दीक करीब करीब 500 झुग्गियों की यह बस्ती न जाने कब से आबाद थी और किस तरह आबाद हो गई थी, किसी को याद नहीं था, लेकिन अक्सर लोग उसे शहर की खूबसूरती पर बदनुमा दाग़ कहा करते थे, जबकि झुग्गियों में रहने वाले उन्हीं हाथों से शहर की गंदगी साफ़ करते थे। उन्हीं के दम से आलीशान घरों में चमक दमक कायम थी। यहाँ के रहने वालों का गंदापन गायब हो गया था।

शायद सबसे पहले यहाँ एक छोटी सी झोपड़ी थी। फिर एक और…एक और…फिर एक मुकम्मल बस्ती। छोटी सी इस बस्ती में सब कुछ था, बिजली हर जगह मौजूद थी। छोटे बड़े ब्लैक एंड वाइट टी.वी भी इन झुग्गियों में हर वक़्त चलते रहते थे। गंदे-गंदे बच्चे, नालियों में गंदा और सड़ा हुआ पानी, कूड़े के ढेर, मक्खी, मच्छर, कुत्ते सब कुछ था। वे सब उसके आदी थे। यहाँ मज़हब वतन का बंटवारा न था। हर सम्प्रदाय के लोग इन्सानियत के रिश्ते में बंधे हुए थे। दुख-सुख में एक-दूसरे के साथी, मौत पर सब एक साथ शोक मनाते और खुशी में सब एक साथ मस्त व ख़ुशी से झूमते गाते। शहर के विस्तार में उनकी मौजूदगी सियासी पनाह का सबब भी थी। हर नेता उन्हें वोट बैंक समझता था, सियासी जलसों में भीड़ बढ़ाने और नारे लगाने के लिए उन्हें लोगों की जरूरत पड़ती थी। कई बार उस बस्ती को हटाने की कोशिश की गई लेकिन हर बार कोई न कोई उनकी मदद के लिए आ जाता।

लेकिन अचानक आग लगने से सारा मंजर बदल गया, आग एक झुग्गी से शुरु हुई थी और देखते-देखते गर्मी और हवा की शिद्दत के कारण पूरी बस्ती उसकी लपेट में आ गई। उसकी वजह यह भी थी कि झुग्गियों में जलने का सामान मौजूद था&फूंस, सूखी लकड़ियाँ, प्लास्टिक, टायर और केरोसिन। आग जहन्नुम का मंजर दर्शा रही थी। फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ आते-आते सब कुछ खत्म हो गया। अजीब भागम-दौड़ी का आलम था। जलते हुए शोलों से लोग कभी खुद को निकालते, कभी सामान निकालने की कोशिश करते, कोई अपने बच्चों को झुग्गी से बाहर धकेल रहे थे, तो कोई बूढ़े माँ-बाप को उठाकर आग के शोलों से दूर ले जा रहा था। चारों तरफ एक कोहराम मचा हुआ था।

तमाशाइयों की भी एक भीड़ इकट्ठी हो गई थी। अखबारों के रिपोर्टर और टी.वी. के कैमरे से उस खौफनाक मंज़र की तसवीरें खींची जा रहीं थीं। मुसलसल कई घंटों की जद्दोजहद के बाद जब आग पर काबू पाया गया तो लोग अपनी जली हुई झुग्गियों की सुलगती हुई राख से अपने खोए हुए संबंधियों और सामान को ढूँढने के लिए पहुँचे। लेकिन वहाँ कुछ नहीं था, सिवा जले हुए सामान और लाशों के कुछ नहीं मिला। किशोर की बूढी माँ जो कमजोरी की वजह से भाग नहीं पाई जल गई थी। रामू काका का छोटा बेटा जल गया। वह अपनी बीवी के साथ अपनी बड़ी बेटी के दहेज को बचाने में लगा रहा। लगभग दस लोगों की मौत आग में जलने से हो गई। बहुत से लोग झुलसकर अस्पतालों में पहुँचाए गए। शोले दब गए थे लेकिन राख से धुआँ उठ रहा था। तमाशाइयों की एक अच्छी खासी भीड़ इकट्ठी हो गई थी। लोग मदद भी कर रहे थे और बातें भी हो रहीं थीं। समाज के ठेकेदारों और सियासी लोगों का आना जाना शुरू हो गया था।

सरकार ने मरने वालों को एक एक लाख और ज़ख्मियों को 50,000 देने का ऐलान किया। आग लगने के कारण की पूछताछ के लिए कमिशन बिठाया गया। जबकि सब जानते थे कि आग सबसे पहले बरपा की झुग्गी में स्टोव फटने से लगी थी, लेकिन सब अपनी-अपनी राय पेश कर रहे थे&

‘‘ये सब ज़मीन खाली करने का चक्कर है, यह ज़मीन सेठ दौलतराम की है। सुना है उसने इसे जसल बिल्डर के हाथ बेची है।’’

‘‘मैंने तो सुना है कि इसमें कोई राजनैतिक चाल है, इलेक्शन होने वाला है।’’

‘‘आग लगाकर मदद करके हर पार्टी हमदर्दी और वोट हासिल करने की कोशिश करेगी।’’

‘‘कारण कुछ भी हो लेकिन मरने वाले अपने खानदान को लखपति बना गए।’’

‘‘हाँ भाई, किशोर की माँ तो मरे बराबर ही थी, चल फिर भी नहीं सकती थी और दीनू का बाप भी अपाहिज था।’’

‘‘हरे मियाँ एक लाख रुपया कभी देखा भी नहीं होगा। यह तो मरा हाथी सवा लाख वाली बात हो गई।’’

बहुतों को इस बात का अफसोस था कि उनके घर का कोई सदस्य जल क्यों नहीं गया। दामाद अपनी सासों के न जलने, और बेटे अपने बूढ़े मां-बाप के बचने पर अफ़सोस कर रहे थे।

‘‘बुढ़िया मर जाती तो घर में खुशहाली आ जाती।’’

‘‘ऐ यार, मेरा बुड्ढा आग देखकर लौंडों की तरह झुग्गी से बाहर भागा, वैसे उठकर पानी भी नहीं पीता था।’’

इस हादसे पर कई दिन तक मेला सा लगा रहा। दूर दूर से तमाशाई जली हुई बस्ती को देखने आ रहे थे। खोमचेवाले भी वहाँ पहुँचे हुए थे, कोई छोले-पूरी बेच रहा था, कोई आइसक्रीम का ठेला लिए खड़ा था, कहीं भुट्टे भूने जा रहे थे, कोई पान-बीड़ी सिगरेट बेचने में व्यस्त था। वह गंदी झुग्गियों वाली बस्ती आग लगने से सबके लिए प्रकाश बिंदु बन गई थी। बड़े बड़े लोग, बड़ी बड़ी गाड़ियाँ वहाँ आकर रुक रही थीं। असीम उदारता का दिखावा करते हुए बेघर लोगों की सूची के अनुसार जरूरी सामान मौजूद करा रहे थे। उसमें मदद का जज़्बा कम और उसके बदले खुदा के यहाँ से 10 लाख लेने का लालच ज़्यादा था। दो तीन दिन में इतना घरेलू सामान और खाना जमा हो गया, जितना उन गरीबों ने पूरी जिंदगी नहीं देखा था। पहले से अच्छे कपड़े उनके बदन पर थे। पहले से अच्छा खाना बगैर किसी मेहनत के मिल रहा था। जिंदगी की यह बदली शक्ल देखकर वे शोलों की तपिश भूल गए। फिर झुग्गियाँ बन गईं, जिंदगी उसी रफ्तार से चलने लगी। वक्त गुजरता गया। आहिस्ता-आहिस्ता जिंदगी की वही गन्दगी, बदबूदार और लाचार शक्ल फिर उभर आई। अभाव और बेचारगी का अहसास फिर उस बस्ती में लौट आया। सबकी वक्ती हमदर्दियाँ खत्म हो गईं। फिर वह बस्ती शहर का बदगुमां दाग कहलाई जाने लगी। चूल्हे फिर ठंडे हो गए, बदन पर फिर फटे पुराने कपड़े नज़र आने लगे। सबकुछ पहले जैसा हो गया। नज्जू ने बड़ी हसरत भरी आवाज में अपनी माँ से पूछा,.‘‘माँ हमारी झुग्गियों में फिर कब आग लगेगी?’’

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