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परीक्षा पास करने के लिए नहीं, जीवन संवारने के लिए पढ़ें किताबें - डा. सूर्यकांत मिश्रा

परीक्षा पास करने के लिए नहीं, जीवन संवारने के लिए पढ़ें किताबें

० ज्ञान के परिमार्जन के लिए मोबाइल नहीं किताबें पढ़ें

हम सदियों से यह सुनते चले आ रहे हैं कि किताबें इंसान की सबसे अच्छी मित्र होती हैं। उसमें लिखी बातें हमारा मार्गदर्शन करती हैं। हमें जीवन की स्वर्णिम राहें दिखा सकती हैं। हमारे व्यवहार में मिठास घोल सकती हैं। बावजूद इन सारी खूबियों के आज हम इन्हीं किताबों से दूर होते जा रहे हैं। वर्तमान व्यस्त समाज पर इस दृष्टिकोण से नजर डाली जाए तो हमें यह तस्वीर स्पष्ट दिखाई पड़ती है। आज के युग में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो किताबें पढ़ने की आदत को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना रहे हो। वास्तव में यह एक ऐसी आदत है जिसमें मनोरंहन नहीं बल्कि भविष्य की सुनहरी किरणें आगे का मार्ग प्रशस्त करती दिखाई पड़ती हैं। हमें इस बात पर चिंतन करने की जरूरत है कि आखिर हमारी पीढ़ी किताबों से किनारा क्यों कर रही है? टीव्ही, स्मार्टफोन, वीडियोगेम, इंटरनेट और आधुनिक रंग में रंगे व्हाट्सएप्प तथा इंस्टाग्राम ने हमारी पीढ़ी के हाथ से किताबों को छीन लिया है। इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग के चलते आज लोगों के पास इतना वक्त नहीं कि वे किताबें पढ़ सकें। आज के समय में किताबें केवल परीक्षा पास करने के लिए ही पढ़ी जा रही हैं, ज्ञान के परिमार्जन के लिए नहीं ! हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतवर्ष में ज्ञान की गंगा बहाने में पंचतंत्र से लेकर हितोपदेश, रामायण, गीता और महापुरुषों के जीवनगाथा से परिपूर्ण किताबों की अहम भूमिका रही है। पुस्तकें मात्र ज्ञान के अभिवर्धन के लिए आवश्यक नहीं होतीं वरन वे हमारी कल्पना शक्ति तथा वैचारिक क्षमता में भी वृद्धि करती हैं।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि किताबें हमें एक अच्छा संचारक बनाती हैं। अपने जीवन में सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ने में किताबों की बैसाखी बेहतर साथी होती हैं। किसी अन्य पर अपना प्रभाव जमाने में भी एक अच्छे संचारक को जल्द सफलता मिलती है एजो किताबों में छिपी बहुमूल्य कला है। कम्युनिकेशन शैली उतनी ही ज्यादा निखरती जाती है, जितनी ज्यादा किताबों की संगति हमारे मस्तिष्क को प्राप्त होती है। हमारी अपनी शब्दों की डिक्सनरी भी उतनी ही समृद्ध होगी जितनी उसे किताबों में समायी शब्दों की दुनिया से अवगत करा सकेगी। अधिक से अधिक किताबें पढ़ने वाला हर विषय पर अपने विचारों को बेहतर तरीके से प्रुफ करते हुए अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकता है। लिखने की कला से लेकर हर तरह की समस्या से निपटने के तरीकों को भी हम इन किताबों से ही भलीभांति समझ सकते हैं। आज जिस तरह से हमारी वर्तमान पीढ़ी किताबों से दूर हो रही है, उससे एक भय उत्पन्न हो रहा है कि हमारी पीढ़ी को स्मृति क्षमता, कल्पनाशक्ति, विचारशक्ति, रचनात्मकता कहां से मिल पाएगी? कारण यह कि हमारे नव-निहाल अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए आज मनोरंजन की दुनिया में गोते लगा रहे हैं। जीवन के समग्र विकास का मार्ग उन्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है। जब हम पुस्तकें पढ़ते हैं, घटनाओं, कहानियों तथा उदाहरणों को पढ़ते हुए बातों को समझते हैं तो यह निश्चित है कि हम सकारात्मक ढंग से जिंदगी को देख और समझ पाते हैं।

अच्छी किताबें

हमें जीवन जीने का सलीका सिखाती हैं। इनसे हमें एक नए दृष्टिकोण की प्राप्ति होती है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि वर्तमानकाल में हमारी पीढ़ी गूगल पर ही समस्याओं के समाधन ढूढने व फेसबुक पर दोस्त बनाने में इतनी व्यस्त हो गई है कि उनके लिए बाकी सब कुछ व्यर्थ ही प्रतीत होता हूं। सामान्य मनुष्यों के अलावा अब तो वैज्ञानिक नहीं इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि हमारी भावी पीढ़ी का किताबों से दूर होना एक बड़े खतरे का संकेत है। एक शोध का निष्कर्ष भी यही बताता है कि पुस्तकें पढ़ना न केवल हमारे मानसिक बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी काफी उपयोगी होता है, क्योंकि पुस्तकों के अध्ययन से सकारात्मक विचारों की त्रिवेणी हमारे मस्तिष्क को तरोताजा कर मन को सक्रिय कर जाती है। इन्हीं पुस्तकों के विषय में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड रीगन ने कहा था...मैं कई पुस्तकों को पलटकर देखता हूँ तो लगता है कि इन्हीं की बदौलत बुराई पर अच्छाई की एक दृढ़ आस्था मुझमे पैदा हुई है। पुस्तकें न केवल हमारी कल्पनाओं के द्वार खोलती हैं, बल्कि जीवन में विकास और तरक्की के स्वर्णिम अवसर भी प्रदान करती हैं। जो व्यक्ति जितनी किताबें पड़ता है उसका सीधा प्रभाव उसकी जीवन शैली और व्यक्तित्व तथा व्यवहार पर दिखाई पड़ता है। बेशक हमारे मन-मस्तिष्क पर टीवी, सिनेमा, इंटरनेट तथा गैजेट्स अपनी छाप छोड़ते हैं, किंतु इनसे हमारी रचनात्मक शक्ति का वह विकास नहीं होता जो, किताबों में लिखी बातों को पढ़ने से होता है।

21वीं शताब्दी की इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में लोग दिन-प्रति-दिन तनाव और अवसाद का शिकार हो रहे हैं। इस परिस्थिति से हमें केवल किताबें ही छुटकारा दिला सकती हैं। किताबें पढ़ने से हमारा ध्यान एकाग्र होता है, शरीर शांत रहता है, दिमाग पढ़ने में व्यस्त रहता है। परिणाम स्वरूप इधर-उधर और फालतू की बातें सोचने के लिए हमारा मन नहीं भटकता है। बड़े-बड़े मनोवैज्ञानिकों का भी यही मानना है कि किताबें यदि हमारे हाथ में हैं तो मन को शांत एवं फ्रेश करने के लिए ली जाने वाली चाय और काफी भी फेल हैं। किताबों को पढ़ते रहने के दौरान हमारे शरीर की नसों को आराम मिलता है और आनंद का अनुभव होता है। पढ़ाई एक ऐसा औजार है जिससे हमारी कल्पनाशक्ति को नए पंख मिलते हैं। हमारी सोच का दायरा विस्तृत होता है। परिपम्ता और विस्तार के चलते हम अच्छी और सकारात्मक पहल की ओर कदम बढ़ा पाते हैं। किताबों को पढ़ते समय हम लेखक की रची हुई दुनिया में खो जाते हैं। लेखक जो कहना चाहता है, हम उसके हर शब्द में छिपे हुए अर्थ को समझने का प्रयास करने लगते हैं। वास्तव में देखा जाए तो जिस तरह हम प्रतिदिन घर की सफाई के लिए झाड़ू लगाते हैं, उसी तरह मन में जमी धूल को झाड़ने के लिए हमें नियमित रूप से पुस्तकें भी पढ़नी चाहिए।

एक सामाजिक दृष्टिकोण का अध्ययन किया जाए तो आज के युवा समाज, संस्कृति और साहित्य से दूर होते जा रहे हैं, जिसका परिणाम भविष्य में अच्छा नहीं होगा। आज की मोबाइल संस्कृति पर हम जिस भाषा का प्रयोग कर अपने संदेश अन्य लोगों तक पहुंचा रहे हैं, उस भाषा का वास्तविक जीवन से कोई सरोकार नहीं है और न ही वह साहित्य का रूप पा सकती है। मैं तो उस दृश्य की कल्पना कर कांप उठता हूँ जब किताबों से दूरी के कारण हमारी पीढ़ी आने वाले समय में पुस्तकों में समाए ज्ञान को अर्जित करने के लिए इसे एक अबूझ पहेली मानकर और दूर भागने लगेगी। वैचारिक दृष्टि से अपरिपम् और परावलंबी होने वाली इस पीढ़ी को बचाने हमें स्वयं आगे आना होगा और पुस्तकों का महत्व अन्य उपकरणों की तुलना में कहीं अधिक है इसे इस पीढ़ी को समझना होगा।

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डा. सूर्यकांत मिश्रा

न्यू खंडेलवाल कालोनी

प्रिंसेस प्लेटिनम, हाऊस नंबर-5

वार्ड क्रमांक-19, राजनांदगांव (छ.ग.)

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