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शरद के दोहे - शिव कुमार 'दीपक'


                      ✍ शिव कुमार 'दीपक'

की अगुवानी महल ने, हुआ हास परिहास ।
लगे छलकने शिशिर में, मदिरा भरे गिलास ।।-1


देव दिवाकर धूप की, भेजें चादर आप ।
होरी करता रात भर, धूप-धूप का जाप ।।-2


कँपी  रात  भर  झोपड़ी, गर्म  रहे  प्रासाद ।
ठिठुर-ठिठुर दुखिया करे, जाड़े का अनुवाद ।।-3


भरी पेटियां शीत की, आयीं  मेरे  गाँव ।
तपने लगे अलाव पर, कई घरों के पाँव ।।-4


निष्ठुर मारे नारि को, ज्यों कोड़ों  की  मार ।      
शीत प्रकृति पर कर रहा, ऐसा तेज प्रहार ।।-5    


लक्ष्मण रेखा खींच कर, सो जाते  प्रासाद ।
लाँघ उसे कब जा सका, जाड़े का उन्माद ।।-6


वर्षा  और  समीर से, शीत  हुआ  बलवान ।
काँप-काँप कर कट रहा, रात और दिनमान ।।-7


भूखी  सोये  झोपड़ी, काँपे  सारी  रात ।
होरी का दिनमान क्या, बुरे हुए हालात ।।-8


सर्द पेटियां शिशिर की,लाया पवन तुरंग ।
जीव-जंतु कपने लगे, छिपने लगे भुजंग ।।-9


हाय ! निगोड़े शीत को, ऐसा चढ़ा जुनून ।
हँसते-खिलते जगत के, तोड़े मधुर प्रसून ।।-10


वसुधा ने जब ओढ ली, कुहरा वाली सौर ।
तब युग्मों में चल पड़ा, मधुर प्रेम का दौर ।।-11


क्यों देता जग को शरद, हँस-हँस गहरी पीर ।
तेरा  मधुऋतु  रश्मियां,  कर  देगीं  आखीर ।।-12

                       ✍ शिव कुमार 'दीपक'
                            बहरदोई,सादाबाद
                             हाथरस (उ०प्र०)

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