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सुरक्षित है घर फिर भी ताले लगे हैं - अरुण कुमार प्रसाद

1.    अधूरा समुद्र मंथन
2.    निवेदन
3.    गजल--सुरक्षित है घर फिर भी ताले लगे हैं
4.    वृक्ष का जताना अफसोस
5.    चिन्ता
6.    काश वहाँ होते मेरे पिता
7.    जन्म कुंडली
8.    पूजा
9.    गज़ल-- वेद बदल जायगा
10.    क्रांति


1-अधूरा समुद्र मंथन


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समुद्र मंथन अधूरा है।
समुद्र मंथन में
निकला सब कुछ
राजकीय व अलौकिक वस्तु
अमृत भी।
क्यों नहीं ?
उपकृत कर देनेवाला
मानवीय जीवन को।
कोई भावना
हित साधन का संसाधन
या फिर सहानुभूति‚संवेदना।

इसलिए देवता और दानव
उद्यत हों
समुद्र मंथन को पुनः
मनुष्य के निगरानी में।
नहीं अब कोई छल नहीं।
अनवरत करें मंथन
जबतक कि
मानवीयता को‚
छान न ले
सुदृढ़ करनेवाले तत्व।

मैं मनुष्य
घोषणा करता हूँ कि
अधूरा है समुद्र मंथन
और देवताओं का धर्म।
असुरों का पराक्रम।

या फिर क्यों नहीं
बदल लेता है देवता
दानव को या
दानव देवता को
मानव के साथ
और
करता है मंथन ।
मथ कर निकालने के लिए
मानवीयता।
देवता
मानव के साथ
कर न पायेगा छल।
मानव महान छली है ही
खुद को ही करता है छला।
किस खेत की मूली देवता।
पराक्रमी दानवों से
रहेगा त्रस्त
जैसे रहता रहा है
बाहुबलियों से।
क्या कर पायेगा छल?
एकता का जुलूस निकालने वाला
अनेकताओं में विभाजित मनुष्य
कर न पायेगा छल।
अमृत का हर हिस्सा
रह पायेगा सुरक्षित।

समुद्र मंथन
दरअसल एक पूजा था
जिसे देवता और दानव ने
मिलकर किया और
पूजा के सारे नियमों को ताख पर रखकर
प्रसाद
बंदरबाँट की तरह खुद बाँट लिया
देवताओं ने।
और इस पूजा को
बना दिया
गिद्ध का कर्मकांड।

मानव दयनीय स्थितियों में जीने के लिए
मजबूर रह गया।
कितने सिर सिजदा में
झुकते रहे हैं हर प्रहर।
पर‚नहीं मिला
वह आशीर्वाद जिसके लिए झुका।
नहीं पूरी हुई किसी की चाहत।
इसलिए समुद्र मंथन
अधूरा है।
जिसे मिला
ईश्वर ने नहीं दिया।
वह तो छीन–झ्पटकर
लेने को
न्याय–संगत‚तर्कसंगत. और शास्त्र–संगत
ठहराता रहा है।
————————————


2-निवेदन


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निवेदन।
रोकिये अपराध।
अपराधियों के
मनोबल तोड़िये।
वोट पीछे किजिये,
अब देश आगे किजिये
शुद्ध मन से सभ्यता में
मानवीयता लाईये।
मानिये यह सच
कि अपराधियों के
जात होता‚धर्म है होता।
सत्य को सर तो
उठाने दिजिये।
जो कह रहा है
बेखौफ कहने दिजिये।
जाति क्योंकि‚धर्म क्योंकि
है उपज नफरत के गहरे
सोच का
विजय को आतुर
लालसा में लोभ का।
क्या सिखाता है नहीं
वह ग्रंथ ?
जिसको किये आधार
ये सारी सभ्यता का
भर रहे हम दम।
शोषण‚यातना के पथ?
कौन सा है कर्म किसका
जो न संचालित हुआ इससे।
वर्ण का वर्णन–विभाजन
धर्म के विस्तार हित
शस्त्र का धारण।
विजय की लालसा?
घृणा गुम्फित
करूणा‚दया के आवरण में।
दे सुरक्षा है रहा शासन
अपराधियें को
समीक्षा किजिये।
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3-गज़ल- सुरक्षित है घर फिर भी ताले लगे हैं


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सुरक्षित है घर फिर भी ताले लगे हैं।
क्यों रक्षित की चिन्ता बढ़ाने लगे हैं।

मची लूट बाजार में ऐ सियासत
खाद्यान्न छीनने अब निवाले लगे हैं।

कहीं सड़ रहा है कोई मर रहा है
कई मरने की तैयारी करने लगे हैं।

सुरक्षित घरों से निकल मेरे आका
किस्मत की पोथी अब सताने लगे हैं।

सिलसिला मौत का खेत–खलिहान में
अब अपना सब जौहर दिखाने लगे हैं।

प्रजा हूँ तुम्हें सौंप डाला सियासत
उठो सत्य हेतु, दुःख सताने लगे हैं।

बहस करते तूने बितायी है सदियाँ
बहस के विषय, विष चढ़ाने लगे हैं।

प्रभु के दिये संसाधनों को गिनो तुम
हम तक तो लाओ, जी जलाने लगे हैं।

सुव्यवस्थित नहीं क्यों होता है सब कुछ
भूख‚दर्द‚त्रास‚पीड़ा रूलाने लगे हैं।

अराजक नहीं राज होने दो राजा
क्रांतिवाले पुनः गीत गाने लगे हैं।
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4-वृक्ष का जताना अफसोस


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वृक्ष रोता था
कटने से डरकर
हँसता है अब
हमपर।
रोते हैं अब हम।
पर्यावरण का खौफ।
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5--चिन्ता


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चिन्ता।
रखना सहेज कर
छोटी सी गुड़िया के
सपनों का घर।
बाबा ने विनती की
बेटी को
ससुराल भेजकर।
डर था
दहेज का।
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6---काश वहाँ होते मेरे पिता


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काश वहाँ होते मेरे पिता!
क्रोध किया,
ईश्वर पर,
रोया–धोया।
आकाश में भरे शून्य को
इंगित कर।
ग्लानि से निहारा
अन्दर के मनुष्य को
उसे समझाने की कोशिश की
किन्तु‚
जब बाँध टूटता है तो
उसे बाँध कर रखना…।
नहीं चाहिए था करना नम,
पर‚आज भी हो जाती हैं
आँखें नम।

मैं घर के लोगों में,
परिजनों और पुरजनों में
ढ़ूँढ़ता रहा वह छवि।
संघर्ष में एक हौसला,
दुःख में एक कंधा,
दर्द में मरहम,
आसमान में सूरज,
रास्तों पर एक गाईड।
बार–बार आकर
मुझे परेशान किया
अमावस की रातों ने।
सुना था इसलिए
खोजता रहा
तारे के दिनों में
वह एक तारा।
जिद को जिन्दा रखने के लिए
खुशामद,
रूठने के लिए डाँट।
पर‚हवा रहा स्थिर
किसी ने इशारा नहीं किया
करता भी किधर
मैं स्पर्श करना चाहता था
एक आकार।
जिसमें मेरे खोज का अहसास था।
मैं ‘भाग–भाग’ कर बड़ा होता रहा
दर्द और दुःख का अहसास
पकड़ता और छोड़ता रहा।
खोजता रहा
कहीं खुश्बु।
मेरे किसी हँसी में
खुश्बु नहीं थी।
क्योंकि मुझे अहसास करके
फूलों ने उतार लिया था।
मैं ढ़ूँढ़ता रहा
नहीं मिला
मुझे बदमाशियाँ सिखाता,
मना करता,
या ढ़ाढ़स बंधाता,
हर जगह से मैं
अपने आपको समेटता रहा.
बस।
वह विशाल वृक्ष होता
मेरे ऊपर फैलता
पर नहीं।
मैं बार–बार मुड़कर देखा किया।
काश वहाँ होते मेरे पिता।
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7--जन्म कुंडली


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सचमुच क्या
जीवन का वर्ष
वर्ष का वक्त
वक्त का अंजाम
अंजाम की कहानी
कहानी का सच
सच का सौन्दर्य
सौन्दर्य का झूठ
झूठ का फैलाव
फैलाव की कुंडली
कुंडली का  लेख
लेख का लिखा
कुंडली की व्याख्याओं में
तलाशते हुए जीवन
जीवन में खोजते हुए
कुंडली
जाता है घट।
जीवन के एक छोर पर
खड़ा होकर
दूसरे छोर को देखना नहीं होता।
आँकना नहीं होता।
होता है एक अनुमान
अनुमान जिसकी कोई पक्की
छवि नहीं होती।
ब्रह्माँड का अस्तित्व है गति।
अतः ब्रह्माँड के स्वरूप का
हर क्षण बदल जाना
आवश्यक और स्वाभाविक
प्रक्रिया है।
इसलिए
जिसके जीवन में
है गति 
कुंडली उसकी
है बेहतर।
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8--पूजा


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पूजा क्या है?
सच पूजा का
पता नहीं चलता।
करते रहो उम्र भर
बढता कुछ भी नहीं
उम्र के सिवा।
पर‚उम्र का बढ़ना तो
घटना है।
घट जाता जरूर है
सपने और उम्मीद।
वस्तुतः जीवन की
घटनायें बदलने का
दंभ
पूजा नहीं भरती। 
पूजा में कोई जिस्मानी ताकत नहीं।
पूजा‚
रूह को करना है तैयार
निष्ठुर विश्व
झेलने हेतु।
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9--गज़ल-- वेद बदल जायगा


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वेद बदल जायगा‚तलवार टूट जायगी।
साहस के साथ दोस्तो पत्थर इसे दिखा।

धरती दरिद्रता नहीं सम्पन्नता का नाम।
आकाश को पानी के लिए आँखें जरा दिखा।

मजहब के सच को तार–तार कर रहे हैं जो।
मंत्रों के सच की उसे व्याख्या जरा सिखा।

रोके न आदमी के रूकेगा वन का पलायन।
भाग में पतन की कथा खुद ही है लिखा।

जंगल सिमट रहा है तो सागर बढ़ेगा ही।
मानव सभ्यता नष्ट होने अब बाँध ले शिखा।

पुस्तक से गायब हो रहा है शब्द‚वाक्य‚अर्थ।
आस्था‚श्रद्धा‚विश्वास व जीवन–परक शिक्षा।

आओ कि ह्रास होते युग को हे ॐ रोक लें यहीं।
अथवा विद्रूप होगा कितना चेहरा ये इसे दिखा।

छेड़ना ही चाहिए अब यहाँ जंग जटिल जवान।
वक्त जीतने का है‚ छुद्र पीठ मत दिखा।
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10--क्रांति


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स्याही का रंग जब लाल होगा,
मुर्दा पड़े लोगों में तब कमाल होगा।
इस कमाल को लोग कहेंगे भ्राँति।
पर‚ हम तो कहेंगे क्राँति।
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अरुण कुमार प्रसाद
शिक्षा--- ग्रेजुएट (मेकैनिकल इंजीनियरिंग)/स्नातक,यांत्रिक अभियांत्रिकी
सेवा- कोल इण्डिया लिमिटेड में प्राय: ३४ वर्षों तक विभिन्न पदों पर कार्यरत रहा हूँ.
वर्तमान-सेवा निवृत
साहित्यिक गतिविधि- लिखता हूँ जितना, प्रकाशित नहीं हूँ.१९६० से जब मैं सातवीं का छात्र था तब से लिखने की प्रक्रिया है.मेरे पास सैकड़ों रचनाएँ हैं.यदा कदा विभिन्न पत्र,पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ हूँ.

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