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कविताएँ - "नरेंद्र भाकुनी"

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उषा को किरणों ने घेरा


बना लिया जो वहीं पर डेरा।
जाग उठी जो दुनियां सारी
जब जागो तो तभी सवेरा।

आज धरा को देखो जरा तुम
कितनी सुंदर, कितनी प्यारी।
पौधों के जो पाद हरें है
हर उपवन नन्हीं सी क्यारी।
सभी सुरों को आज जगा दे
जाग उठे जो यौवन तेरा।
जब जागो तो तभी सवेरा।

नीचे से आकाश से लेकर
जाग गई जो दुनियां सारी।
तेरे सुरों की तेरे गीत सब
करती हैं अवलोकन सारी।
आज शंखों की नाद ध्वनि से
जाग उठा जो सावन तेरा।
जब जागो तो तभी सवेरा।

गंगा की जो लहरों जैसी
उछल-उछल सी सुगम उमंगें।
प्रेमभाव से मिलें जो सागर
लेकर आई मधुर उमंगें।
इसी उमंग को आज जगाकर
धाम यहीं पर पावन तेरा।
जब जागो तो तभी सवेरा।

_"नरेंद्र भाकुनी"


युवा_हुंकार

रणजीत _विजय आगाज़ भी हो
कहीं सिंहराज हुंकार भी हो।
ये झर_ झर झरने कहते हैं
तुम झंकृत की झंकार भी हो।

मैं अपने कलम से कहता हूं
तुम युवा_क्रांति  आधार बनो।
गीत बनो,संगीत बनो
कहीं कर्म की गीता सार बनो।
इन कृति की गाथा तुमसे है।
इन कृतियों के रचनाकार भी हो।

ये युग_परिवर्तन तुमसे है
हो जाओ सब मस्त_मगन।
अपने पंख को फैलाओ
उड़ जाओ तुम नीलगगन ।
कहीं भाग्य_विधाता  आज कहीं
तुम विश्व_विजय अभियान भी हो।

कहीं धीर_वीर, गंभीर बनो
तुम हर प्यासे का नीर बनो।
रणधीर बनो, रणवीर बनो
कहीं पारंगत प्रवीण बनो
उस पतित_पावनी सरिता का
कहीं गंगा की जो धार भी हो

"नरेंद्र भाकुनी"



हवा से पूछा जाकर के मैंने,


कहां से आए, क्या कर रहे हो?
उसी हवा ने बताया मुझको_
सुगंध पुष्पों से ला रहे हैं
बिखरती जाए पुष्पों की चादर
हम आ रहे हैं, हम आ रहे हैं।

जाकर घटाओं से मैंने पूछा_
चमक रही है क्यों दामिनी सी?
उन्हीं घटाओं ने राग छेड़ा,
रिमझिम से सावन बरस रहे हैं।
शुष्क हुई थी धरती तो कब से
“तरस रही थी, तरस रही थी।

हमारी धरती हमें यह कहती
हम हैं धरोहर ,तुम हो सरोवर।
उन्हीं सरोवर में जाकर देखो
सुंदर से पत्तों से मिल रहे हैं।
जोड़ा कमल को कलियों ने सहारा_
“हम खिल रहे हैं हम खिल रहे हैं”
_नरेंद्र भाकुनी


आज धरा को देखा मैंने


  कैसा छाया राग।
सारी सृष्टि से पुलकित होकर
राग बना अनुराग।

आओ मिलकर ये गीत गाए
अपने पहाड़ों में खो से जाएं।
कितना सुंदर ,कितना प्यारा
इतना सुंदर तुम्हें बताएं।

यही छवि का यही कवि है
वसुंधरा पर हुआ उजाला।
प्रेम _भाव से यहीं पर देखो
बन जाऊं मैं मस्त _निराला।

सुंदर से गांवों में जाकर देखो
कहीं नजारा यह झिलमिलाए।
मानो  कहीं पर यह प्रेम _गंगा
सागर गले  से मिलने जाए।

कहीं हिमगिरी मेरा शीश मुकुट
कहीं झन _झन की झंकार है।
यह उत्तराखंड की माया है
जहां प्रकृति का श्रृंगार है।

_"नरेंद्र भाकुनी"


नवनित्य भरे अरमां तल के


हर बाग में भंवरा पुष्प_तले
क्या आश्चर्य_आगोचर सांझ परे
हर पुष्प_लता में कमल खिले।

ये यौवन है मधु कांच भरी
इस कांच में ढक्कन नीलम की।
इस हर्षित_पुलकित सावन में
जैसे भूतल में प्रियतम की।

ये धरती है उन वीरों की
उन वीरों के नित साहस मिले।
जैसे धरती की ज्वाला में
सोना_ कुंदन नित ज्वलंत जले।

ये उत्सव है ,उस उत्सव की
दीपों से मिलकर दीप जले।
मानों रंगो की होली में
सातों रंगो की डोली उठे।

ये भारत है , उस भारत की
ये पूजित रूप में आरत है।
हर सत्यमेव जयते का
हर जीवित रूप महाभारत है।

नरेंद्र भाकुनी


पुकारती है पुकारती है

पुकारती है, पुकारती है
तुम्हें ये धरती पुकारती है।
रुके पलायन कहीं अगर भी
कहीं से आए निहारती है।

भरत की भूमि जन्म यहीं है
ऋषि यहीं पर रमाते धूनी
बना यहीं पर बद्री विशाल
दुनिया ये कहती देवों की भूमि।
आओ कहीं से, आओ कहीं से
कहीं का जीवन संवारती है।
पुकारती है, पुकारती है
तुम्हें ये धरती पुकारती है।

भाई मेरे हो, युवा हमारे,
इस धरती के लाल है।
इस माटी से मांगा मैंने
कण_ कण में महाकाल है।
इन्हीं पहाड़ों की थाल बनकर
भव्य_कलश की ये आरती है।
पुकारती है, पुकारती है
तुम्हें ये धरती पुकारती है।

सुंदर से उत्सव, यहीं दीवाली
कहीं गुलालों में जैसे होली।
सातों सुरों में ये प्रेम_गंगा
मानों कहीं पर सुंदर सी डोली।
अलक कहीं पर, भागीरथी से
इन्हीं पुराणों में तारती है।
पुकारती है, पुकारती है।
तुम्हें ये धरती पुकारती है।

"नरेंद्र भाकुनी"


आज सुबह का रूप देखकर


उज्ज्वल रूप बताना
फिर से किरणें आती हैं
पहली रश्मि का आना।

डाली_डाली, पत्ती_पत्ती
फूलों में भी जान
अखिल लोक का सूरज बनकर
फूलों में मुस्कान।

आज उषा की गोद में सोकर
किरण ने डाला डेरा।
रात कहां का कहां खो गया
हो गया नया सवेरा।
ये ना सोचो हार गए तुम
कहीं बादलों का आना।
फिर भी सूर्य निकलता है
पहली रश्मि का आना।

"नरेंद्र भाकुनी"


मैं राग भी हूं, आगाज भी हूं


कहीं वाद भी हूं, संवाद भी हूं।
कहीं कीर्ति लताएं कहती है
मैं नवयुग का इतिहास भी हूं।

हर ऋषि  मुनियों का तेज भी हूं
कहीं पवन देव का वेग भी हूं।
हर सारी सृष्टि मुझ में है
मैं निरंकार निस्तेज भी हूं।

हर गंगा की जो धार भी हूं
कहीं युद्ध रूप तलवार भी हूं।
कहीं गद्द्धर के उत्साह मैं तो
मैं तीरों में आर पार भी हूं।

तू मुझमें है, मैं तुझमें हूं
मैं प्रेम राग का दीप भी हूं।
कहीं नदी रूप जो सागर में
मैं समन्वय का महाद्वीप भी हूं।

मैं प्रेम सुधा से कहता हूं
तुम नीर बहो जो पावनी का।
हर श्वास में फूकें प्राण यही
तुम कार्य करो संदीपनी का।

_"नरेंद्र भाकुनी"


हिमगिरि के उत्तंग शिखर से


ये गंगा जो सरिता है।
हर प्रेम से पूजित, भव्य कलश की
युवा राग की कविता है।

ये खुले हुए जो मेघ से कह दो
चमक उठी जो गर्जना है।
ये सात रंग को जो रंग बिखेरे
सुंदर सी जो रचना है।
इन कर्मों की सार से कह दो
ये कर्मवीर की गीता है।
आज देख लो अनुपम झांकी
युवा राग की कविता है।

सात सुरों की यहीं सादगी
घुली हुई रंगोली है।
कहीं दीप से जलकर दीपक जलता
कहीं मानवता की होली है।
उस मंदिर की मूरत बनकर
निश्चल कर्म की पुनीता है।
हर प्रेम से पूजित भव्य कलश की
युवा राग की कविता है।

"नरेंद्र भाकुनी"

अनुपम कृति, जहां प्रकृति


हैं अनमोल ख़ज़ाना।
और कहां से मैं बतलाऊं
रानीखेत में आना।

सुंदरता ने पता नहीं ये
कहां से गाया सारा।
लगता कहीं आसमान में चमका
चमक उठा ज्यों तरा।

मैंने देखा, तुमने देखा
देखा कहीं देवालय को।
लगता कहीं पर सबने देखा
छू लो आज हिमालय को।

प्रकृति का हैं द्वार यहीं पर
जो सबके दिलों में रहता है।
स्वच्छ जहां की मनोरमा है
डंके की चोट पर कहता है।

"नरेंद्र भाकुनी"


आगाज़ देख लो कितना है


पानी का पनघट हम बन जायेंगे।
युवा प्रेमी की ज्वाला हूं
आशिकों का जमघट हम बन जाएंगे।

अपने दिलों में भी इंतकाम तोलेगा
दिल में जो उबाल हैं
क्रांति का लहू खोलेगा।
अगर शहादत से हम रहें ना रहे
तो मेरे देश का बच्चा_बच्चा भी इन्कलाब बोलेगा।

अपनी जान से भी ज्यादा तुझे माना था हमने
तुझे हमने अपने खून से सींचा था।
तेरे लिए जान हाज़िर रहती थी_
"तू हमारे दिल का बगीचा है।"

तेरे लिए जो सोचा था हमने
अपने मुल्क में रोए थे।
ज़रा हमें भी याद कर लेना यारों_
"हम भी बारूद पर सोए थे।"

हम जा रहें हैं इस जग से
ऐसी फ़रियाद करेंगे।
ऐसे वतन की कीर्ति लहराना यारों_
"जिसे दुनिया वाले भी याद करेंगे।

नरेंद्र भाकुनी


प्रेम सुधा का नीर भरुं मैं


खुली हवा से बात करूं।
कहीं राजाओं के राजा
ने मैं कामना पृथ्वीराज करूं।

कहीं सिंह की भूमि जाग  उठी
ये रात जो कोसो भाग उठी।
कहीं अंधेरों में शेर मिला
उन अंधियारी में कमल खिला।

ये दिल्ली मेदनीपुर भी
यहाँ चमक उठा था जो शूर भी था।
मेरी कलम की दृष्टि दूर थी तो
मेरे पृथ्वीराज का नूर भी था।

कहीं राजपूत, कहीं धनुरप्रवीण
ये परिजन, कहीं प्रेम शयन
कहीं मुहम्मद गौरी ढ़ेर हुआ
ये भारतवर्ष का शेर हुआ।

"नरेंद्र भाकुनी"

इसी काव्य की धारा लेकर


कैसी है जो संरचना।
इन बच्चों की अखिल कांति की
लिखी है मैंने रचना।

अखिल लोक का सूरज बनकर
पत्तों में भी जान।
लहराती है , बलखाती है
फूलों में मुस्कान।

कई जवानियाँ बीत गई हैं
हो गए  जब पचपन की।
कभी अकेले बैठकर देखो
याद आयेगी बचपन की।

इस बचपन में खो जाते हैं
गाओ गीत मनोहर।
हम भी गाते, तुम भी गाते
कितने स्वच्छ_सरोवर।

मेरे कलम के सुंदर पन्ने
अद्भुत साझा करती हैं।
कहीं तो इसकी अनुपम छाया
यादें ताजा करती है।

"नरेंद्र भाकुनी"

3 टिप्पणियाँ

  1. "नरेंद्र भाकुनी" की कवितायेँ प्रस्तुति हेतु धन्यवाद!
    बहुत अच्छी लगी सभी रचनाएँ !

    जवाब देंहटाएं
  2. आपका कोटि कोटि धन्यवाद कविता जी
    ये आपका स्नेह है

    जवाब देंहटाएं
  3. आपका कोटि कोटि धन्यवाद कविता जी

    जवाब देंहटाएं

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