मुझपर कहानी लिखो - प्रांत-प्रांत की कहानियाँ - संकलन व अनुवाद - देवी नागरानी

SHARE:

प्रांत -प्रांत की कहानियाँ (हिंदी-सिन्धी-अंग्रेजी व् अन्य भाषाओँ की कहानियों का अनुवाद) देवी नागरानी -- मराठी कहानी मुझपर कहानी लिखो द. ब. म...

प्रांत-प्रांत की कहानियाँ

(हिंदी-सिन्धी-अंग्रेजी व् अन्य भाषाओँ की कहानियों का अनुवाद)

देवी नागरानी

--

मराठी कहानी

मुझपर कहानी लिखो

द. ब. मोकाशी

सोलह साल की उम्र में मैं महान लेखक था। हमारी गली में कहीं भी आपको मेरा नाम सुनने में आता। वैसे देखा जाए तो मेरी एक भी कहानी छपी न थी। पर गली से गुज़रते छोटे-बड़े राहगीर, आते-जाते हमारे घर की खिड़की की ओर मुँह करके, ज़ोर से आवाज़ देते हुए पूछते&‘लेखक जी, लेख लिख रहे हो क्या?’

उन बेवकूफों को लेख और कहानी के बीच का फ़र्क मालूम न था। फिर उनकी यह बात सुनकर, मैं ख़ुद पर बहुत खुश होता और उस वक़्त बाबा ने जो पैसे भेजे हुए होते, उनका अगर हिसाब चालू होता, तो पाँच रुपयों का हिसाब-किताब ग़ायब होता, मैं उसे मुख़्तलिफ़ खाते में लिख देता था। हिसाब जैसी मामूली बात में मन लगाना, कोई लेखक का काम है?

सोलह साल की उम्र! हर बात करने को दिल चाहता, पर कोई भी बात पूरी नहीं होती थी। हर किसी से प्यार करने को जी चाहता था, पर मन कहीं भी ठहराव नहीं पाता था। घाघरा पहनने वाली दस साल की छोकरी भी सुंदर लगती थी और साड़ी पहनने वाली अपनी उम्र की लड़की के साथ भी दोस्ती करने को दिल करता था।

इसलिये पड़ोस में रहने वाली दस साल की रागिनी ने रोते-रोते कमरे में आते ही जब मुझसे कहा&‘नाना, अभी के अभी मुझपर कहानी लिखो!’ तब मैंने क़लम तैयार कर ली। रागिनी मुझे अच्छी लगती थी इसलिए अगर मैं छिड़ गया तो इसमें कौन-सी नई बात हुई।

मैंने उससे पूछा&‘कौन-सी कहानी लिखूँ? एक रागिनी नाम की प्यारी...!’

आधे में मेरी बात काटते हुए वह बोली&‘ऊँ...हूँ...। मेरा नाम नहीं डालना है, यही तो मेरी शर्त है।’

‘शर्त क़बूल है, आगे...?’

‘कहानी इस तरह हो&एक शहर में राधा नाम की एक लड़की रहती थी। उम्र मेरे जितनी, मुझ जितनी पढ़ी-लिखी। घर मेरे घर जैसा ही, और माँ भी मेरी माँ जैसी। बाप के बारे में अच्छा लिखना है। पर माँ के बारे में बहुत बुरा लिखना। राधा को एक बार पाँच गज़ वाली साड़ी पहननी थी, पर उसकी माँ बहुत ख़राब थी न? आसपास की सब लड़कियाँ साड़ी पहनती थीं, क्या वे सब ख़राब बन गईं? फिर भी राधा की माँ...’

पर फिर अचानक ज़ोर से सिसकी आने पर, रागिनी को राधा की कहानी अधूरी ही छोड़नी पड़ी। आस-पड़ोस की लड़कियों को पहनी हुई पाँच-गज़ वाली साड़ियाँ, अपनी ज़िद, माँ का मना करना, सब उसे याद आया होगा। मुझे उसपर तरस आ गया। मैंने उससे कहा&‘रागिनी, बस करो। ऐसी कहानी लिखता हूँ कि तुम्हारी माँ तुम्हें एक क्या, दो साड़ियाँ लेकर देंगी! माँ का ऐसा खौफ़नाक बिंब खीचूँगा, कि पूछो ही मत। ज़ालिम, खट-पट करने वाली, काली, मारपीट करने वाली, बिलकुल ऐसी जो आस पड़ोस में मुँह दिखाने के क़ाबिल न रहेगी।’

तालियाँ बजाते हुए उसने कहा&‘हाँ, हाँ ऐसी ही लिखो!’

उसके बाद मैं बिलकुल गंभीर होकर कहानी लिखने लगा। इस शौक़ में मुझे ध्यान ही न रहा कि इस बीच रागिनी पाँच गज़ वाली साड़ी पहनकर, नुमाइश करने के लिये रास्ते पर घूम फिर रही थी। रागिनी की कहानी से तालमेल खाती कहानियाँ पढ़ी, उनमें से कई हिस्से अपने पास दर्ज किये। ‘कैकई’ के कितने ही गुण काम आएँगे, इसलिए उसकी कई बातें अपनी चोपड़ी में लिख ली। ग़रीब राधा&खट-पट करने वाली माँ। ऐसा खौफ़नाक दिल में दरारें पैदा करने वाला शीर्षक दिया कहानी को। क़रीब एक महीने में कहानी लिख ली। फिर रागिनी को बुलवाया और रौब के साथ उसे कहानी दी। उसने कहानी का शीर्षक पढ़कर कहा&‘अल्ला! जैसी कहानी लिखने को कही थी, वैसी ही है? पढ़ती हूँ, अच्छा!’

वह कहानी पढ़ने लगी। मैं उसकी ओर निरंतर निहारता रहा। पलकों को झपकाया, अब कुछ हँस पड़ी, जैसे लड़की को देखने के लिए आए हुए लोगों के चेहरों पर उभरते छोटे-बड़े भाव, जैसे लड़की के माँ-बाप जाँचते रहते हैं, वैसे ही मैं कर रहा था। कहानी कैसी लगेगी? अच्छी लगेगी या नहीं?

आख़िर कहानी पढ़कर पूरी की और मुझे लौटाते हुए कहा&‘कहानी कितनी खौफ़नाक लिखी है! हमारी माँ इतनी खट-पट करने वाली, इतनी काली, इतनी ज़ालिम है क्या? नहीं, ना, ना, ना,! अम्मा कितनी स्नेहमयी है। वह डाँटती भी है तो ऊपरी मन से। उस दिन मैं स्कूल से लौटी तो पाँच-गज़ वाली दो साड़ियाँ मेरे लिए लाकर रखी थीं। यह देखी है? कितनी सुन्दर है?’

पर मुझमें साड़ी की ओर ध्यान देने के लिए होश कहाँ था?

मैंने कहा&‘पर हमने फ़ैसला किया था कि...’

‘उस वक़्त मैं ग़ुस्से में थी, इसलिए रोई थी और तुमसे कहा था। पर, इसीलिए क्या मेरी माँ को खट-पट वाली और ज़ालिम कहोगे?’

ग़ुस्से में आकर वह वहाँ से चली गई।

इस बात को पाँच साल हो गए। रागिनी को अब साड़ी के लिये ज़िद करने की कोई वजह नहीं थी। हमारी बातचीत पहले से अब कुछ कम हो गई थी। अब मेरी एक दो कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं, इसलिये मैं नए लेखकों की सूची में दाख़िल हो चुका था।

कुछ दिनों से रागिनी के बारे में सरगोशियाँ सुनाई देने लगीं। कोई कहता&वह स्कूल का बहाना करके बाहर जाती और एक लड़के के साथ घूमती दिखाई देती। धीरे-धीरे उस लड़के के बाबत सारी मालूमात मिल गई। किसी मुद्रणालय में वह मुंशी था, उसे शायरी का शौक था, इसलिए ही दोनों की जान-पहचान हो गई।

एक दिन शाम को रागिनी मेरे कमरे में आई। रो-रो कर उसका चेहरा सूज गया था। अंदर आकर, मेरी तरफ़ देखे बिना, मेज़ के पास जाकर, उस पर माथा टिकाकर, वह रोने लगी। मै चुप रहा। कुछ देर बाद उसने गर्दन ऊपर उठाकर कहा -‘नाना! प्यार करना गुनाह है क्या?’

मैंने कहा&‘ऐसा कौन कहता है?’

‘तुम कहानियाँ लिखते हो, प्रेम के बारे में तुम्हें ज़्यादा मालूम। किसी भेड़िये की तरह सभी मुझपर टूट पड़ते हैं। क्यों? कहते हैं, मेरा एक लड़के के साथ प्यार है। प्यार के बिना मैं जी नहीं पाऊंगी। क्या रे?’

मैंने कुछ भी नहीं कहा। उसने जोश में कहा&‘वह ग़रीब है&होगा! दूसरी जाति का है&तो क्या हुआ? लोगों का क्या जाता है? हमारी दीवार में दरार डालने क्यों आते हैं? बोलो नाना! तुम्हें झुंझलाहट महसूस नहीं होती? तुम लेखक हो, ऐसे दुष्ट लोगों पर कहानी क्यों नहीं लिखते? ऐसे लोगों को समाज के सामने खड़ा करके, तुम क्यों नहीं कहते कि ये जवान दिलों को ठेस पहुँचाने वाले समाज के गुनहगार है? मुझे ही देखो! बाबा ने मुझे चार दिन क़ैद कर रखा था। अम्मा ने मुझे तरह-तरह की बातें सुनाई। घर के बाहर, लोगों ने अपनी नज़रें मुझपर केंद्रित करके मुझे जलाकर ख़ाक कर दिया जैसे मैंने प्यार करके कोई बहुत बड़ा गुनाह किया है।’

सांस लेने के लिए वह कुछ पल रुकी।

‘यही मेरा बाप है, जिसने आज तक मेरी तारीफ़ करते हुए मेरे चेहरे को प्यार भरे हाथों से सहलाया, उसी ने कल मेरे गालों पर तमाचा दे मारा। शाम को मैं घर में घुसी ही थी कि बाबा ने मुझे धमकाते हुए कहा&‘रागिनी कहाँ गई थी?’

मैंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने फिर ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा&‘बताती हो या नहीं?’

मैंने सिर्फ़ गर्दन हिलाई। वे गुस्से से कहने लगे&‘ज़रूर उसके पास ही गई होगी। फिर उससे मिली न? कहो, मिली या नहीं मिली? कहो, कहो!’

‘मैं फिर भी ख़ामोश रही, तभी हाथ घुमाकर मेरे गालों पर तमाचा दे मारा। उन्होंने मुझे मारा यही वेदना बहुत थी, मुझे सालती रही। मैं रात भर रोती रही, सुबकती रही। अपनी बेटी के स्नेह से ज़्यादा बाबा को समाज का डर और रीति-रस्मों की परवाह है। किसी खलनायक की तरह क्यों हमारे सुख को भंग करने के लिये आतुर है। नायिका का पिता होकर, उसी के सुख संसार में आग लगाने वाले ऐसे खलनायक की कहानी कभी तुमने लिखी है?

‘नाना! सच, मेरे लिये इतना कर दो। मुझपर एक कहानी लिखो, फिर भले ही मैं शिकार बन जाऊँ, पर मुझ जैसी और नौजवान लड़कियों को माँ-बाप की ओर से आज़ादी तो मिलेगी। नाना सच में लिखो न!’

और सच में मैंने कहानी लिख डाली। रागिनी के बाप को खलनायक न बनाकर, सारे ज़माने को खलनायक बनाने का फ़ैसला कर लिया था। कल्पना तेज़ रफ़्तार से परवाज़ भरने लगी।

कहानी को मालामाल करने के लिये, रागिनी और उसके प्रेमी के इर्द-गिर्द के माहौल का अभ्यास किया। उसके प्रेमी का ऑफ़िस देखा, घर देखा। जिस मुशायरे में उनकी पहचान हुई, उस मुशायरे का सारा प्रोग्राम बैठकर सुना। वे साथ में घूमने क्यों जाते हैं, उसका सबब, उनके ख़तों के मज़मून, दोनों के बीच में हुई प्यार की गुफ़्तगू यह तमाम ‘मसाला’ रागिनी ने मेरे हवाले किया और आख़िर मेरी नाकाम मुहब्बत की बेहतरीन कहानी तैयार हो गई। सारे गाँव में उस कहानी ने क़यामत बरपा कर दी। कहानी में प्रेमी और प्रेमिका का ज़िक्र, प्रेमी की ऑफ़िस, उसका घर, माता-पिता, मुशायरे के ज़िक्र ने हर पहचान को आसान कर दिया, किसी को अपनी सोच पर दबाव देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। जो बात पहले सिर्फ़ कानों में सरगोशियाँ करती, वही हर चौराहे पर खुले आम सुनने में आने लगी। रागिनी को बंद करके रखने की ज़रूरत अब उसके पिता को नहीं पड़ी। वह खुद ही अपने आप को दिन-रात घर में बंद कर बैठी।

इस समय मैं एक अजीब चिंता से घिरा हुआ था। मेरी कहानी उसने पढ़ी है या नहीं, इसकी मुझे कोई ख़बर नहीं मिल सकी। मैं फिर से बेचैन हो गया। अचानक, एक दिन उसके भाई ने आकर मुझे चिट्ठी दी। रागिनी ने लिखा था&‘नाना, तुम्हारी कहानी पढ़ी, मुझे यक़ीन है कि तुम बड़े लेखक बनोगे। तुम्हारी कहानियाँ फिलमाई भी जाएँगी। गाँव में चारों ओर हमारे बारे में ही लोग बात कर रहे हैं। हमारी बदनामी हो रही है। इस बदनामी से बचने के लिये, बाबा ज़रूर हम दोनों की शादी करवाएँगे। क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता?’

‘मुझे भी ऐसा ही लगता है’ ऐसा उसे लिख भेजा। मेरी लेखनी के बारे में जो भविष्यवाणी उसने की थी, वही मुझे सबसे ज़्यादा भली लगी। मैं बहुत खुश था।

पर उसी रात रागिनी का पिता मेरे घर आया।

‘नाना किस जनम की दुश्मनी निकाल रहे हो, ये तो बताओ। तुम्हारे पिता के साथ मेरी दोस्ती है, इसलिये छोड़ रहा हूँ, नहीं तो तुम्हारी इस कहानी के लिये..। रहने दो! तुम अभी छोटे हो। दिमाग़ ठिकाने पर रखो, अच्छे बर्ताव का सबक अब भी सीख लो। पर, तुम खुद क्या लिखते हो और उसका नतीजा क्या निकलेगा, इस पर चार दिन सोचो और फिर लिखो। बाक़ी अपनी कहानी से एक ग़रीब लड़की का सर्वनाश कर दिया है तुमने, यह बिलकुल सही है।’

इतना कहकर रागिनी के पिता सिर झुकाए बाहर चले गए। फिर रागिनी को लेकर उसके पिता ‘वरहाड’ गए हैं, यह ख़बर सुनी। वहाँ रागिनी की मौसी थी।

धीरे-धीरे दिन गुज़रने लगे। जैसे पानी पर मची हलचल आहिस्ता- आहिस्ता शांत हो जाती है, वैसे ही इस वारदात के साथ भी हुआ। लोगों की याद से जल्द ही रागिनी, उसका प्रेमी, मेरी कहानी&सब ग़ायब हो गए। नई बातें सामने आईं और लोग उन पर चर्चा करने लगे। जिनको जख़्म मिले, उनके साथ क्या वेदना हुई यह पता नहीं पड़ पाया।

यह जानने के लिये सीधा रास्ता नहीं था, इसलिये मैंने टेढ़ा रास्ता ढूँढ़ निकाला। मैं ख़यालों में खो गया। अपने प्रीतम से ज़बरदस्ती एक नौजवान लड़की को उसके पिता दूर बहुत दूर ले जाते हैं। वह तन से तो वाक़ई दूर हुई पर मन से वह अपने प्रीतम के पास ही रही। उसकी आँखों की चमक ख़तम हो गई। बातचीत से जोश ग़ायब था, जीना बेमज़ा हो गया। उसका दिल निर्जीव मिट्टी की तरह हो गया। उसे यूँ लगने लगा कि वह जहाँ बैठे, वहाँ बैठी ही रहे, जहाँ लेटे, वहाँ लेटी ही रहे, कुछ कर दिखाने का शौक़ बाक़ी न रहा। बतियाने की ख़्वाहिश भी ख़तम हो गई। ज़िन्दगी बेमानी हो गई।

फिर उसके बाप ने उससे पूछा&शादी के बारे में पूछा। कुछ तो बात करनी चाहिए, इसलिए उसने ‘हाँ’ कही। उसे लड़का देखने आया। जिस समय वह आया, उस वक़्त वह मोम की गुड़िया बनी बैठी रही। सिर ऊपर करके लड़के को देखा तक नहीं। आख़िर उसकी शादी हो गई। पर उसका निर्जीव मन, ज़िन्दा न हो पाया। धीरे-धीरे वह दुबली होने लगी। खान-पान से उसका मन उचाट हो गया। उसे क्या हो रहा है, किसी को पता ही नहीं चला। आख़िर एक साल के बाद, डॉक्टर ने यह फैसला सुनाया कि उसे क्षयरोग हुआ है। तद्पश्चात् वह बहुत दिन ज़िन्दा न रही। मुर्दा तो वह पहले ही थी, ज़माने की नज़रों में आज मर गई।

दिमाग़ में आई ऊटपटांग कल्पनाएँ लिख लीं। रागिनी के ग़म और गुस्से से मैं एक रस हो गया। लिखते-लिखते आँसू पोछने लगा, पोंछते-पोंछते लिखने लगा।

कहानी लिखकर समाप्त करनी थी, मैंने खुद से कहा&‘रागिनी, तुम यहाँ नहीं हो, तो भी तुम्हारे जज़्बात मैं महसूस कर सकता हूँ। मुझे उनके साथ एक रस होना आता है। रागिनी, तुम्हारा ग़म दुनिया के आगे रखना मेरा फर्ज़ था और वह मैंने निभाया। मेरे अल्फाज़ नीरस हो सकते हैं, पर वे तुम्हें मधुर लगेंगे, इसका मुझे यक़ीन है।’

कहानी लिखी तो सही पर वह प्रकाशित डेढ़ साल के बाद हुई। पर छपने के बाद वह मुझे बहुत पसंद आई। मेरे यार-दोस्तों ने भी मेरी तारीफ़ की। दोस्तों को पसंद आने वाली यही मेरी पहली कहानी थी।

उस वक़्त किसी ने मुझे आकर बताया कि रागिनी आई है। उससे मिलने को मैं बहुत आतुर था। अपनी छपी हुई कहानी उसे दिखाने के लिये मेज़ पर निकाल कर रखी। पर दो दिन शायद रागिनी घर के बाहर ही नहीं निकली। तीसरे दिन सुबह-सुबह, मैं अभी सोया ही था, तो दरवाज़े की कुंडी की खड़खड़ाहट थी। मैंने उठकर दरवाज़ा खोला। बाहर रागिनी खड़ी थी। मैं आश्चर्य के साथ उसको देखता रहा। उसकी गोद में एक प्यारा-सा बच्चा था।

मैंने अपनी आँखों को रगड़कर फिर देखा। सूरज की रोशनी रागिनी के बदन पर पड़ रही थी। उसकी सेहत पहले से काफ़ी बेहतर हुई थी। चेहरे पर लाली थी और आँखों में चमक।

कुछ सूझा ही नहीं कि क्या बात करूँ, इसलिए बेवजह हँसने लगा। उसने कमरे में बिखरी चीज़ों की ओर देखकर कहा&‘छिः! छिः! अभी तक तुम्हारा अनाड़ीपन कम नहीं हुआ है। ठहरो, अब तो तुम्हारी शादी करवा ही देनी चाहिए!’

अपनी कही बात पर वह खुद हँसने लगी। इसलिये मैं भी साथ में हँसता रहा। उस समय मेरे मन में कुछ और विचार थे। उसपर लिखी कहानी जिस मैगज़ीन में प्रकाशित थी, वह मेज़ पर थी। उचित मौक़ा पाकर, वह उसके सामने रखने की सोच रहा था।

रागिनी भीतर आकर मेरे पलंग की ओर गई। अपने बच्चे को वहाँ लिटाकर वह उसके साथ खेलने लगी। उसने बच्चे का गाल खींचा, उसके नन्हें-नन्हें होंठ अपने होठों में समेटे और अपना चेहरा बच्चे की तरफ़ झुकाया तो बच्चे ने भी अपने छोटे हाथ ऊपर करते हुए अपनी बौनी उंगलियों को रागिनी के बालों में उलझाया। बालों में खिंचाव पर रागिनी ने लाड़ से ‘उई अम्मा!’ कहा और झूठमूठ के गुस्से से बच्चे के मुँह पर हल्की-सी थपकी देते कहा&‘नाना! अभी भी तुम कहानी लिखते हो?’

मैंने कहा&‘हाँ!’

सिर को कुछ नीचे झुकाते, बालों से बच्चे की उँगलियाँ छुड़ाते कहा&‘अच्छी-अच्छी पत्रिकाओं में तुम्हारी कहानियाँ आती होंगी अब!’

मैंने ‘हूँ’ में जवाब दिया। उसने अपने बालों से बच्चे की उँगलियाँ छुड़ाकर, उसकी मुट्ठी को अपने हाथ में थामकर उससे खेलती रही।

‘नाना! तुम्हें ऐसी कहानी लिखनी आएगी क्या?’ उसने कहा।

‘कैसी?’ मैंने पूछ लिया।

एकदम अपना चेहरा नीचे करके, बच्चे के पाँच-दस चुम्बन लेते हुए कहा&‘ऐसी...ऐसी...ऐसी...।’

मैं कुछ कहते-कहते रुक गया। अचानक मुझे आभास हुआ कि वह मुझसे बात नहीं कर रही थी।

‘अभी कहानी लिखते हो? ऐसी कहानी तुम्हें लिखनी आएगी क्या?’

ये सवाल बेमतलब के थे। वे मुझे या किसी को भी मुख़ातिब होकर नहीं कहे गए थे। मैं वहाँ न होता तो कमरे में आई चिड़िया को या मेज़-कुरसी से भी मुख़ातिब होकर वह ऐसा ही कुछ कहती और अपने बच्चे को चूमती रहती।

मैंने कुछ भी न कहा। हाँ उसे दिखाने के लिये मेरी लिखी कहानी जिस पत्रिका में थी, वह चुपचाप, उसका ध्यान दूसरी ओर देखकर मेज़ के नीचे छुपा दी!

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: मुझपर कहानी लिखो - प्रांत-प्रांत की कहानियाँ - संकलन व अनुवाद - देवी नागरानी
मुझपर कहानी लिखो - प्रांत-प्रांत की कहानियाँ - संकलन व अनुवाद - देवी नागरानी
http://1.bp.blogspot.com/-0KU8kvXy4aA/Xf7yGaxfWEI/AAAAAAABQiA/c6R1OSHUTB8W1Gpb2GrMT2i1Fgae5KGBgCK4BGAYYCw/s320/prant%2Bprant%2Bki%2Bkahani-706441.png
http://1.bp.blogspot.com/-0KU8kvXy4aA/Xf7yGaxfWEI/AAAAAAABQiA/c6R1OSHUTB8W1Gpb2GrMT2i1Fgae5KGBgCK4BGAYYCw/s72-c/prant%2Bprant%2Bki%2Bkahani-706441.png
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2019/12/blog-post_57.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2019/12/blog-post_57.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content