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उनको मैंने चोरी से इक गीत सुनाना है। - शबनम शर्मा

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पीपल का पेड़

सदियों पुराना, दादाओं का दादा

गाँव के उस छोर पर खड़ा

पीपल का पेड़

दिन बीते, माह बीते, बरस बीते,

दशक बीते, सदियाँ बीत गई,

इंसान पुश्त दर पुश्त गया,

पर, एक टाँग पर खड़ा,

देखता रहा बदलते युगों को,

ये पीपल का पेड़।

दुनिया क्या से क्या हो गई,

राजाओं के महल ढह गये,

पुरानी संस्कृति विलुप्त हो गई,

नई सभ्यता ने जन्म लिया, पर

सबको ताकता रहा पीपल का पेड़।

सदियों तक पूज्य रहा, सभ्य रहा, बना रहा

आभूषण ये पीपल का पेड़।

आज यह पूज्य नहीं, सभ्य नहीं,

चुपचाप काटा जाता है इसे

वह भी लोगों की तरह अंधा, बहरा,

गूंगा बन जाता है।

देखता है सिर्फ उसके आँसू

ये गगन, ये हवा और देते हैं

आवाज़, चुप हो जा, समझौता

कर ले। सह लेता है असंख्य वज्र,

मूक खड़ा ये पीपल का पेड़।


मेरा जीवन

मेरा जीवन सरिता के वेग सा

बहता चला गया,

पत्थरों पर सैंकड़ों प्रहार जैसे

सहता चला गया,

मूक बन गया वह पहाड़

उस वन के तरू भी

मुँह मोड़ गये, जब यह

ज़माना हम पर बेबाक

जुल्म करता चला गया

मेरा जीवन......

पानी की तरह निर्मल मन,

कुछ कहने को आतुर होता,

अंगारों के आगोश् में, यह

तपन, गरमाहट व दर्द

सहता चला गया

मेरा जीवन......

पता मुझे न चला,

कब सर्द हवा हमसे

मुख मोड़ गई

वर्षा की बूंदों में मेरा

हर दर्द आँसू धोता चला गया

मेरा जीवन......

इन्तज़ार रहा उन लम्हों का

जो सुला दें, रुलायें नहीं,

मन ही मन हृदय मेरा

कुछ ऐसी अकुलाहट सहता

चला गया.....

मेरा जीवन.....


भारत माँ

सम्पूर्ण विश्व में इकलौती है

मेरी भारत माँ,

ये पूज्य है, धन्य है,

सर्वप्रिय है मुझे।

सोचती हूँ मेरा हर साँस,

इसके नाम का दास हो,

मेरे खून की बूँद-बूँद

इसके काम आये।

मेरे चक्षुओं में सदा

तुम्हारी तस्वीर हो

कर्ण सदैव तुम्हारा

गुणगान सुने,

व जिह्वा से निकला

एक-एक शब्द तुम्हें

अर्पित हो।

मेरे हाथ सर्वदा तेरी

स्तुति के लिए ही उठें

और पग तुम्हारी विजय

पताका लिये आगे बढ़ें

मेरा दिल हर दम तेरे

नाम का पुजारी हो

व कहे, जय भारती

जय भारती।


वक्त

क्या कभी वक्त के चलते

किसी ने देखा है? नहीं

जैसे आत्मा को शरीर से

निकलते किसी ने नहीं देखा।

फूल तो देखे हैं सबने,

पर इसकी खुशबू को

बिखरते कभी किसी ने

नहीं देखा।

आते हैं सीना तान कर,

पर जाते हैं कहाँ सब

ये किसी ने नहीं देखा।

फेंकता है पासें कोई,

कभी जीवन के, कभी मौत के,

पर कौन? कभी किसी ने नहीं देखा।

उगलता है लावा कहीं,

कहीं बर्फ के ढेर हैं,

करता है ये करतब

कौन? किसी ने नहीं देखा।

कहते हैं वक्त गया वापिस न

आयेगा, गलत है ये,

लम्हें हमारे, ज़िन्दगी की

कसमें ये खडा वक्त, पीढ़ी

दर पीढ़ी निगल जायेगा,

और बताएगा उन बच्चों को

कि ‘‘मैंने इसका इस्तेमाल

सही नहीं किया।’’


वो पल

आज भी याद है मुझे,

तेरा वो चुपचाप जड़ हो जाना,

सुनकर कि सब कभी मिल न सकेंगे हम।

आँखों से वो बिना नीर के रोना,

और कह देना वो सब कुछ, जिसके

कभी शब्द होते ही नहीं।

दुपट्टे की कोर से उंगली दबाना,

और मेरे होंठों का कंपकंपाना,

आज भी याद है मुझे।

चल देना धीरे-धीरे, दिल

में लिये एक चुपी का तूफान

और मुड़ कर इक बार धीरे

से पलक के देखना

आज भी याद है मुझे।

उठ जान मेरा हाथ, खुद ब खुद

ही उसका मेरी तरफ हिल

जाना, और तेरा हथेलियों

से अपना मुखड़ा ढाँपना

आज भी याद है मुझे।


फौजी-फौजी-फौजी

फौजी भी इक इंसान है हमारी तरह

जिसे हमारा समाज महज़ जिम्मेदारियों

का गठ्ठर समझता है

व करता है सदैव इक अलग सी उम्मीद

ताज्जुब तो तब होता है जब वह भी बना

लेता है खुद को समाज के तमाम बाशिंदों

से अलग और चल पड़ता है पीठ मोड़कर

सामाजिक भावनाओं की ओर से,

सिसक कर लम्बा घूंट भर लेती है प्रेयसी,

और मुंह बंद कर सिसक लेते हैं लाडले,

कांपती है माँ की दुबली पतली देह, और

चुपके से पोंछ लेता है दो मोती बापू किसी

दरवाज़े की ओट में।

कितने अलग हैं ये फरिश्ते हम सबसे,

जो अपने जिगर के टुकड़े को रोकते नहीं

और भेज देते हैं हम सबों के लिये

अनजान राहों पर, बारूद के बिस्तर पर

गोलियों के सामने, धन्य हैं वो,

उन्हें मेरा शत-शत प्रणाम।


कुछ हमने सुनाना है

कुछ दिल ने सुनाना है

दबे पाँव चले आना

कुछ बात बताना है,

तनहाइयों का मौसम है,

यादें तेरी साथी हैं,

उनको मैंने चोरी से

इक गीत सुनाना है।

दो बूँदें अशकों की

जो तेरी पलकों पे ठहरी हैं

उस ठहरे हुए पानी में

तूफान उठाना है।

इक दस्तक जो हौले से

हरदम ही रहती है

उनको दरवाजे तक

मिलने को जाना है

चुपके से तुम

दिल में पड़े रहना

आहट पे जगेगा

बेदर्द ज़माना है।

लाखों जंजीरों ने

तुमको जकड़ा है

क्यों मुझे पाने का

तेरे दिल ने ठाना है।


 शबनम शर्मा

माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र.

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