रचनाएँ खोजकर पढ़ें

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -


विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधाएँ ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


द्रोपदी जाग उठी - प्रांत-प्रांत की कहानियाँ - संकलन व अनुवाद - देवी नागरानी

साझा करें:

प्रांत -प्रांत की कहानियाँ (हिंदी-सिन्धी-अंग्रेजी व् अन्य भाषाओँ की कहानियों का अनुवाद) देवी नागरानी -- पंजाबी कहानी द्रोपदी जाग उठी रेणु बह...

प्रांत-प्रांत की कहानियाँ

(हिंदी-सिन्धी-अंग्रेजी व् अन्य भाषाओँ की कहानियों का अनुवाद)

देवी नागरानी

--

पंजाबी कहानी

द्रोपदी जाग उठी

रेणु बहल

ख़ामोश रात के साए बढ़ने लगे थे। गाँव की सरहद पर टीन की छत वाले देसी शराब के टीबे में अब भी गड़बड़ी थी। निहाल सिंह शाम ढलते ही चरण सिंह के साथ वहां आ गया था। चरण सिंह उसके बचपन का दोस्त उसकी तकलीफ से बखूबी वाक़िफ था। वह जानता था कि बेबे के चले जाने के बाद अपना ही घर उसे पराया लगने लगता था। वह अपनी ज़िंदगी से बेज़ार हो गया है। शराब पीते-पीते वह उसे ज़िंदगी की तरफ़ वापस लाने की कोशिश करता रहा। सब्र के साथ वह उसकी बातें सुनता रहा। नशा चढ़ने के बाद उसे चुप सी लग जाती थी। वहाँ से उठने से पहले एक बार फिर उसने निहाल को अपने साथ चलने का ज़ोर डाला। डगमगाते क़दमों और लड़खड़ाती ज़ुबान से कभी ऊँची तो कभी धीमी आवाज़ में कुछ कही, कुछ अनकही बातें कभी खुद से तो कभी दूसरों को कहते-सुनाते दोनों गाँवों की तरफ़ रवाना हो गए। फिर एक मोड़ पर दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गए। रात के उस पहर गाँवों की गलियाँ वीरान हो चुकी थीं। दूर से मेंढक के टर-टर की आवाज़ें चुप्पी को तोड़ रही थीं। बेतरतीबी से उठते क़दम नुक्कड़ पे सोये कुत्ते पर जो पड़े तो वह चूं-चूं करता हुआ उठकर पहले पीछे हटा, फिर उसे आगे चलते देखकर पीछे से भौंकने लगा। उसने रुककर पीछे देखा और मोटी सी गाली दी और फिर आगे बढ़ गया। घर का दरवाज़ा बंद था। दो-तीन बार ज़ोर-ज़ोर से खटखटाने के बाद दरवाज़ा पम्मो ने खोला। मुँह से कुछ बड़बड़ाती हुई रसोई की तरफ बढ़ गई। वह आँगन में बिछे तख़्त पर जाकर बैठ गया। उसकी बेबे तो हमेशा काम से फ़ुर्सत पाकर उसी तख़्त पर बैठती थी। उसने प्यार से बिस्तर पर हाथ फेरा और फिर आस्तीन से ही बहती आँखें साफ़ करने लगा। पम्मो दो मिनट के बाद थाली में दाल-रोटी लेकर उसके पास आई। बिना कुछ कहे तख़्ते पर थाली रखी और मुड़ने लगी तो उसने पम्मो की कलाई पकड़ ली और पूछने लगा&

‘‘मक्खनी सो गया क्या?’’

अपने छोटे भाई मक्खन सिंह को वह प्यार से मक्खनी ही कहता था। पम्मो ने एक झटके से अपनी कलाई छुड़ा ली और बिना किसी बात का जवाब दिये रसोई की तरफ़ बढ़ गई।

‘‘तुझे अब मैं ज़्यादा तकलीफ़ नहीं दूँगा। चला जाऊँगा यहाँ से।’’ यह कहते हुए वह खाना खाने लगा। शराब पीकर वह गले तक तृप्त हो चुका था। दो निवाले ही मुँह में डाले बाक़ी खाना वहीं छोड़ वह सीढ़ी चढ़कर छत पर पहुँच गया। खुले आसमां के नीचे हर रोज़ की तरह उसका बिस्तर लगा हुआ था। वह जाते ही बिस्तर पर गिर गया। तारों भरे आसमां की तरफ़ देखा, तो उसे बादलों में बेबे की शक्ल नज़र आने लगी। आँखें खोलकर दोबारा देखना चाहा तो उसकी आँखें खोलने की ताक़त ही न रही। दो मिनट में ही वह बेसुध होकर सो गया।

निहाल सिंह कोई शराबी नहीं था। साल में पाँच-छः बार ही शराब पीता, जब कभी ज्यादा ग़म हो या फिर कोई खास शादी-ब्याह का प्रोग्राम हो तो। हाँ, अगर कभी तीन-चार महीने बाद चरन सिंह के साथ शहर में नथनी वाली के पास जाने का प्रोग्राम बन जाता तो वह चुपचाप शराब गटका लेता था। मगर गाँव में बेबे के सामने पीकर जाने की उसकी हिम्मत न होती। घर में सिर्फ़ वही तो था जो बेबे की घुड़की से डरता था या यूँ कहो कि बेबे को तकलीफ़ नहीं देना चाहता था। उसको देखकर तड़प उठता था। उसके दो छोटे भाई मक्खन सिंह और बैसाखा सिंह डटकर शराब पीते थे और रोढा सिंह तो बेबे के का़बू में बिल्कुल नहीं था। वह तो नशे का आदी हो चुका था। हज़ारों नौजवानों की तरह उसे भी अफ़ीम-गांजे की लत लग चुकी थी, उसे न किसी का खौफ़ था और न लिहाज़।

रात भर वह बेसुध पड़ा रहा। सुबह सूरज सर पर चमकने लगा तो मक्खन ने आकर भाई को जगाया। निहाल तो पौ फटने से पहले ही उठने का आदी था। हर रोज़ सुबह बेबे की गुरबानी की आवाज़ रस घोलती हुई कानों में टपकती तो वह नींद से जाग उठता। उसे सुबह बहुत मीठी लगती थी जिसका अहसास उसे बेबे के गुज़र जाने के बाद हुआ। अब उसे ज़िंदगी फीकी और बेरंग लगने लगी थी। घर सूना-सूना लगने लगा था। वह पहले कहां जानता था कि भरा-पूरा परिवार, घर की रौनक सिर्फ़ बेबे के दम से ही है। आँगन में तख़्त पर बैठी बेबे की नज़रें चारों ओर घूमतीं। आवाज़ इतनी दमदार कि पम्मो की आवाज़ उसके कंठ में ही अटक जाती। उसने तो पम्मी की आवाज़ भी कभी ढंग से नहीं सुनी थी। कभी पम्मो से बात करने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। बेबे की एक आवाज़ पर उसके लिए खाने-पीने का सामान ले आती। सर पर दुपट्टा ओढ़े चुपचाप सब काम करती रहती और मन की बात जुबान तक न आती। निहाल सिंह ने कई बार पम्मो को सुनाते हुए बेबे से बात की थी, वह भी कनखियों से उसे देखते, उसे महसूस होता कि वह उसकी बातें सुनकर मुस्करा रही है। एक रोज़ उसने पम्मो को सुनाते हुए बेबे से उसके बनाए खाने की तारीफ़ की तो वह सब सुन रही थी। तारीफ़ के दो बोल बेबे ने भी बोल दिए तो खामोश मंद-मंद मुस्कराती रही। निहाल ने बेबे से पूछा :

‘‘बेबे कहीं मक्खन के साथ कोई ज़ुल्म तो नहीं हो गया?’’

‘‘वह क्या पुत्तर?’’ बेबे ने हैरानगी से पूछा।

‘‘यह गूंगी तो नहीं?’’

‘‘चल हट चंदरया। सयानी है सब सुनती भी है और बोलती भी है। मक्खन से पूछा लेना कितने कान भरती है उसके।’’

‘‘लगती तो नहीं बेबे।’’ उसने धीरे से कहा।

वह चुपचाप सुनती रही और काम करती रही। बेबे ने बात बदलते हुए कहा।

‘‘मैं सोचती हूँ चानण से बात करूँ।’’

‘‘किस लिए?’’

‘‘उसकी बेटी का हाथ माँग लूँ तेरे लिए।’’

‘‘बेबे उसकी उम्र देखी है? कम से कम पंद्रह साल छोटी है वह मुझसे। चाचा कभी उस रिश्ते के लिए नहीं मानेगा। तू बस उम्मीद छोड़ दे।’’

‘‘हाय-हाय अकाल पड़ गया लड़कियों का?’’

‘‘बेबे क्यों फ़िक्र करती है, हम अकेले तो कंवारे नहीं हैं इस गाँव में। यहाँ नहीं होगी तो कहीं और होगी। अगर किस्मत ने लिखा होगा तो मिल ही जाएगी। हमारे मक्खनी को भी तो मिल ही गई तेरी पम्मो।’’

‘‘मैं हाथ पर हाथ धरे तो नहीं बैठ सकती। यह तो मैं ही जानती हूँ कि कैसे इसका बाप राज़ी हुआ था रिश्ते के लिए। मैं तो तेरा रिश्ता लेकर गई थी मगर उसे गोरा-चिट्टा मक्खन पसंद आ गया।’’

‘‘पर क्या हुआ बेबे मैं भी ज्येष्ठ हूँ और साल में एक महीना जेठ का भी होता है।’’ उसने शरारत से मुस्कराते हुए पम्मो की तरफ़ देखकर कहा जो कपड़े धोने का पानी निकाल रही थी। उसने फिर बात सुनी-अनसुनी कर दी और बेबे ने उसके सर पर प्यार से चपत लगा दी।

‘‘छोटी भाभी है, मज़ाक मत किया कर।’’

वक्त़ गुज़रता गया, बेबे की कोशिशें नाकाम होती रहीं। सच में लड़कियों का अकाल ही पड़ गया था। वह भी तो चार-चार बेटे पैदा करके कितनी खुश थी। उसने भी तो जाने-अनजाने क़ुदरत के फैसले को नकारा था। बग़ावत की थी कुदरत के फैसले से। वह तड़प उठती मगर किसी से कुछ न कहती, अपनी तकलीफ़ अपने अंदर ही पी जाती।

बेबे निहाल को बहुत मानती थी। चारों बेटों में वह उसे सबसे ज़्यादा अज़ीज़ था। शायद इसलिए कि वह उसकी पहली औलाद थी। नहीं, पहली औलाद को तो उसकी सास ने दुनिया में आने से पहले ही उसकी कोख में मरवा डाला था। उन्हें बेटी नहीं चाहिए थी, और उसका पति माँ के फैसले के खिलाफ एक लफ्ज़ भी न बोला, बुत बना उसकी बेबसी देखता रहा। उसकी फरियाद को नजऱअंदाज कर दिया। उसके सामने दो रास्ते थे&या अपनी कोख को बचा ले या फिर अपनी शादी को। और उस वक्त़ कमसिन, लाचार, बेबस केसरो ने अपनी शादी को बचाने के लिए अपनी पहली औलाद क़ुरबान कर दी। बहुत रोई थी, बहुत सिसकी थी पर उस चोट ने उसे तोड़ने के बजाय और मज़बूत बना दिया था। एक लंबे अरसे तक उसने अपने पति प्रीतम सिंह को अपने पास नहीं आने दिया। उसकी मर्दानगी चकनाचूर कर दी थी। हथौड़े की तरह केसरी की बात उसकी आन पर बरसी थी जब एक रात केसरो ने उसका हाथ अपने जिस्म से हिक़ारत से यह कहकर झटक कर पीछे धकेल दिया था&

‘‘अपनी बेबे से इजाज़त लेकर आया है कि नहीं? नहीं लाया है तो पहले पूछ ले अपनी बेबे से, फिर आना। माँ का मुरीद।’’

यह गाली उसने धीमी आवाज़ में दी थी जो पिघलते सीसे की तरह उसके कानों में पड़ी थी।

इतना कहकर वह कमरे से निकल कर आँगन में आ गई थी। और उस रात प्रीतम सिंह अंगारों पर लोटता रहा। उस रात उसे अहसास हो गया था कि वह मर्द होकर भी उससे ज़्यादा कमज़ोर व ओछा है। उस रात उसने अपनी बेबे का पल्लू छोड़ कर बीवी का आँचल थाम लिया। बेबे तिलमिलाती रही और केसरो दिन-ब-दिन निखरती गई, सँवरती गई। एक के बाद एक केसरो ने चार बेटों को जन्म दिया। सबसे बड़ा बेटा पैदा हुआ तो दादा-दादी उसे देखकर निहाल हो गए। और दादी ने उसका नाम ही निहाल सिंह रख दिया।

उसके दो साल बाद गोरा-चिट्टा बेटा पैदा हुआ तो केसरो ने उसका नाम मक्खन सिंह रख दिया। फिर उसके अलगे साल उसे एक और बेटा पैदा हुआ जिसे देखते ही दादी ने कहा था&‘‘प्रीतम यह क्या? सरदार के घर रोढ़ा बच्चा?’’

उस रोज से प्रीतम ने उसे रोढ़ा ही कहकर बुलाना शुरू कर दिया।

तीन साल लगातार इधर खेतों में फसल की कटाई होती तो उधर घर में केसरो की फसल भी तैयार हो जाती। सबसे छोटा बेटा बैसाखा, बैसाखी वाली शाम को ही पैदा हुआ था। उस साल बैसाखी की खुशियाँ दुगुनी हो गईं।

जैसे-जैसे केसरो के पैर जमते गए, सास के हाथों से गृहस्थी की डोर ढीली होती गई। दादी-पोतों की चहल-पहल देखकर खुश थी मगर प्रीतम सिंह बेटों की जवानियां नहीं देख सका।

निहाल जवान हुआ तो केसरो के दिल में बेटे के सर पर सेहरा देखने की ख्वाहिश जवान होने लगी। उसने रिश्ते के लिए इधर-उधर हाथ-पैर मारने शुरू कर दिये। निहाल से बड़ी उम्र के जवान गाँव छोड़कर शहर जा बसे थे, सिर्फ़ इस वजह से कि उनको गाँव में शादी के लिए लड़कियाँ नहीं मिल रही थी। उसकी बेबे ने भी निहाल के लिए कई दरवाज़े खटखटाए, आस-पास के गाँवों तक जा पहुँची मगर उसके संजोग सोए रहे। बेबे ने तो ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि उसके हीरे जैसे बेटे के लिए दुल्हन मिलना इतना मुश्किल हो जाएगा। जब खाली झोली लेकर लौटती तो अक्सर कहती :

‘‘लगता है लड़कियों का अकाल पड़ गया है। जिसके घर देखो लड़के ही लड़के हैं और अगर कहीं लड़की है तो उन लोगों के नखरे ही बहुत हैं, ज्यादा बड़े ज़मींदार चाहिए उन्हें।’’

वक्त गुज़रने लगा तो बेबे की फ़िक्र भी बढ़ने लगी। चार-चार जवान बेटे, वह भी बिना बाप के, न किसी का डर न किसी का लिहाज़। मुशटंडों की तरह सारे गाँव में दनदनाते फिरते। वक़्त गुज़ारने के लिए गाँव के किसी कोने में कभी दारू, कभी ताश, कभी तालाब के पास आती-जाती गाँव की लड़कियों, औरतों को सर से पाँव तक बेबाकी से देखते रहे तो कभी मोबाइल पर देखी फिल्मों पर आलोचनात्मक टिप्पणी करते। बेबे उनको पाँवों में ज़िम्मेदारी की बेड़ियाँ पहनाने को बेचैन थी। अब तो सिर्फ़ निहाल ही नहीं, बैसाखा तक की उम्र शादी के लायक़ हो चुकी थी। उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि उनकी जवानी को संभाल पाती। उसे तो हर वक़्त यह डर लगा रहता कि कहीं कोई ऐसा काम न कर बैठें जिससे सभी को उम्र भर की शर्मिंदगी उठानी पड़े।

वह अक्सर अपनी बूढ़ी सास से कहती :

‘‘देख लिया चार-चार पोतों का सुख? क्या इसे घर कहते हैं? न किसी के आने-जाने का वक्त, न उन्हें उठने-बैठने का सलीका, घर में बहन होती तो इस तरह नंग-धड़ंग बेशर्मों की तरह हमारे घर में न घूमते फिरते। गाँव की कोई भी औरत हमारे घर आना इसीलिए पसंद नहीं करती कि इन कमबख़्तों को ज़िंदगी के तौर-तरीक़े नहीं आते। अब तो मैं सोचती हूँ किसी की भी शादी हो जाए। घर में एक लड़की आ जाने से कम-से-कम घर घर तो बन जाएगा। अब तो यह राक्षसों का अखाड़ा लगता है।’’

बूढ़ी दादी पोते के सर पर सहरा देखे बिना ही पूरी उम्र भोग कर चल बसी। खेतों में काम चारों भाई संभाल लेते थे। घर और घर के पालतू जानवरों की जिम्मेदारी बेबे के सर थी। अकेली जान घर का बोझ ढोते-ढोलते अब थक चुकी थी। वह सोच रही थी कि अब पीढ़ी आगे कैसे बढ़ेगी? उस रोज़ मंजीत बता रही थी कि चौधरी का लड़का गाँव की एक लड़की के साथ भाग गया। कल को अगर उसका कोई बेटा ऐसा निकला तो...? यह ख़याल आते ही वह भयातुर हो उठी। वह हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकती। बहू तलाश करने की शिद्दत एक बार फिर तेज़ कर दी थी। इस बार वह कामयाब हो गई थी। रिश्ता तो वह निहाल के लिए माँगने गई थी पर पम्मो के घरवालों को मक्खन ज्यादा पसंद था। न चाहते हुए भी निहाल को छोड़कर उसे पहले मक्खन के सर सहरा सजाना पड़ा। दुल्हन के घर आ जाने से घर के रूप-रंग में कुछ सुधार तो हुआ था।

नई नवेली दुल्हन को घर में घूमते देख निहाल को कुछ अटपटा सा लगा था। वह घर का बड़ा बेटा था, अगर उसकी शादी पहले हो जाती तो यह चूड़ियों की खनक, यह पाजेब का मद्धम संगीत, वह बेझिझक उस रस में डूब जाता। पर अब वह इन सबसे कतराने लगा था। ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त वह घर से बाहर ही गुज़ारता। पम्मो के आने से पहले वह गर्मियों में आँगने में बिस्तर बिछाकर अपने भाइयों के साथ सो जाता था मगर अब इन्होंने आँगन के बजाय छत पर सोना शुरू कर दिया था। पहले तीन भाई छत पर सोते थे फिर दो रह गए। रोढ़े की रातें अकसर घर से बाहर गुज़रने लगी थीं। उसे नशे की ऐसी लत लग चुकी थी कि बेबे और निहाल कोशिशों के बावजूद उसे उस जंजाल से निकाल नहीं पाए थे। फिर वह दिन भी आया जब लाख कहने के बावजूद उसने खेतों पर आना तो छोड़ ही दिया था, ऊपर से अपने हिस्से का तक़ाजा भी करना शुरू कर दिया। सब जानते थे उसे अपना हिस्सा किसलिए चाहिए। उसके परदादा के पास पचास एकड़ ज़मीन थी जो बंटते-बंटते उसके पिता के हिस्से में दस एकड़ ही रह गई थी। अब उस दस एकड़ के भी चार हिस्से लाज़मी थे। बेबे ने जब उसे प्यार से, डांट से, गुस्से से मनाना चाहा, और वह फिर भी अपनी जिद पर अड़ा रहा तो बेबे ने चार की जगह ज़मीन में पाँचवाँ हिस्सा माँग लिया। वह पाँचवाँ हिस्सा खुद उसके लिए था। दो एकड़ का हिस्सा लेकर वह घर से अलग हो गया।

पम्मो ने बहुत जल्द घर के सभी काम अपने हाथ में ले लिए। बेबे आँगन में बैठी-बैठी उसके कामों में हाथ बंटाने लगी थी। काम भी करती जाती, पाठ भी करती रहती, बहू से बातें भी करती और निहाल और बैसाखा की हर जरूरत का ख़याल भी रखती। एक बार नहीं हज़ार बार उसने यह बात सुनाकर पम्मो को पक्का कर दिया था कि :

‘‘देख नूह रानी यह बात पल्ले बाँध ले। जब तक तेरे जेठ और देवर की शादी नहीं हो जाती, उनके सब काम तू ही देखेगी, इनकी हर ज़रूरत का ख़याल तूने ही रखना है। जब उनकी बीवियाँ आ जाएँगी तो वह जानें या न जानें तू अपने फर्ज़ से पीछे मत हटना।’’

वह सर को एक अंदाज़ में हिलाकर ‘‘हाँ’’ की हामी भरती।

एक रात निहाल और बैसाखा खाना खाकर छत पर सोने के लिए पहुँच गये। दोनों देर तक बातें करते रहे फिर बैसाखा ने कुछ रुककर कहा :

‘‘वीरे मैंने ज़रूरी बात करनी है तुझसे।’’

‘‘इतनी देर से ग़ैर ज़रूरी बातें कर रहा था।’’ करवट उसकी ओर बदलते हुए कहा।

‘‘सोचता था कहूँ या न कहूँ।’’

‘‘ऐसी भी कौन सी बात है, अब कह भी दे। नींद आ रही है मुझे, जल्दी से बता क्या बात है?’’

‘‘बुध को जगतार ट्रक लेकर कलकत्ता जा रहा है। मुझे भी साथ चलने को कह रहा है। मैं सोचता हूँ मैं भी चला जाऊँ।’’

जगतार और कलकत्ते का ज़िक्र सुनकर उसका माथा ठनका। नींद तो बस गायब हो गई और वह उठकर बैठ गया।

‘‘तूने उसके साथ जाकर क्या करना है?’’

‘‘मैं...’’ वह हकलाने लगा।

‘‘देख बैसाखे, मुझे साफ़-साफ़ सब बता दे। मैं जगतार को भी जानता हूँ और तेरे इरादे भी मुझे ठीक नहीं लग रहे। बता क्या बात है?’’

‘‘थक गया हूँ मैं लोगों की बातें सुनते-सुनते। कल के छोकरे ताने देते हैं। अपने ही यार दोस्त जिनके साथ बचपन में खेलकर जवान हुए, हमें देखकर रास्ता बदल लेते हैं। और अगर उनके घर चले जाओ तो बाहर दरवाज़े से ही भगा देते हैं। वीरे हमारी शादी नहीं हुई, उसका मतलब यह तो नहीं कि हमारी कोई इज़्ज़त ही नहीं।’’

‘‘यह इज़्ज़त वाली बात कहाँ से आ गई? बेबे ने कितनी बार कोशिश की हमारे लिए लड़की देखने की। अगर क़िस्मत में नहीं ब्याह लिखा तो कोई क्या कर सकता है? और फिर हम अकेले ही तो इस गाँव में कंवारे मलंग नहीं हैं। और भी तो हैं हमारे साथी।’’

‘‘मुझमें तुम जैसा सब्र नहीं...!’’

‘‘क्या मतलब? तू कहना क्या चाहता है साफ़-साफ़ बता।’’

‘‘मैं जगतार के साथ कलकत्ता जाऊँगा और मैं वहीं से अपने लिए दुल्हन ले आऊँगा। वह कहता था वहाँ आसानी से लड़कियाँ मिल जाती हैं।’’

‘‘ओ...तो यह बात है। तू दुल्हन खरीदकर लाएगा।’’

‘‘ऐसा ही समझ लो।’’

‘‘अगर बेबे उसके लिए भी राज़ी न होगी। किसी बंगालिन को वह अपनी बहू कभी नहीं मानेगी। और यार सोच तो कल तेरे बच्चे होंगे। सरदार के बच्चे, जट के बच्चे बंगाली सूरत वाले।’’ सोचते हुए उसे बनावटी हँसी आ गई।

‘‘जो भी होगा ठीक होगा। होंगे तो मेरे ही बच्चे।’’ वह झुंझलाकर बोला।

‘‘देख बैसाखे यह तेरी ज़िंदगी है, तू अपनी मर्ज़ी का मालिक है। मगर मैं जानता हूँ कि बेबे कभी राज़ी न होंगी। वह तो नाई की कमलेशो का सुनकर भड़क उठी थी। तो क्या हुआ अगर वह नाई की बेवा बेटी थी, थी तो अपने इलाके की। अगर तू बंगालिन ले आया तो उसकी बात कौन समझेगा?’’

‘‘कुछ भी हो, अच्छा है न वो किसी की बात समझे और न कोई उसकी बात समझे। कम-से-कम मेरा घर तो बस जाएगा। लोगों के मुँह तो बंद हो जाएँगे।’’

‘‘सोच ले एक बार फिर। और सुन, बेबे से बात कर लेना। उसे मनाकर ही जगतार के साथ जाना।’’

‘‘ये ही तो मुश्किल काम है। देखता हूँ बेबे से बात करके। वीर तू ही बेबे से मेरी सिफारिश कर देना।’’

‘‘अगर मुझे कभी बात करनी होगी तो मैं अपने लिए करूँगा, तेरे लिए क्यों करूँ?’’

‘‘बड़ा भाई नहीं तू मेरा?’’

‘‘चल अच्छा सो जा, सुबह होते ही देखते हैं क्या होता है?’’

जिस बात का उन्हें डर था वही हुआ। बेबे को पता चला तो उसने सारा घर सर पर उठा लिया। वह किसी भी कीमत पर राज़ी नहीं हुई। निहाल बीच में पड़ा तो बेबे ने रोना शुरू कर दिया। आँसू और वो भी बेबे की आँखों में। निहाल ने हथियार डाल दिए और बैसाखा गुस्से से पैर पटकता निकल गया। उस रात वह घर नहीं आया। निहाल उसे तलाश करता जगतार के अड्डे पर जा पहुँचा, उसे समझा-बुझाकर घर तो ले आया मगर उसने अपनी ज़िद नहीं छोड़ी और बुधवार की सुबह वह बैग लेकर घर से निकल गया। बेबे रोती-चिल्लाती रह गई मगर वह रुका नहीं। तीन महीने उसकी कोई ख़ैर-ख़बर नहीं आई और फिर एक रोज़ अचानक एक बंगाली दुल्हन को साथ लेकर घर लौट आया। आते ही बेबे के क़दमों में गिर गया।

‘‘बेबे तेरी बहू...आशीर्वाद दे दे!’’

वह हक्की-बक्की उस आधी पसली की मरियल सी लड़की, जिसके साँवले चेहरे पर दो बड़ी-बड़ी काली आँखें खौफ़ और बेबसी की दुहाई दे रही थी। जिसे देखते ही बेबे ने अपना सर पकड़ लिया और अनमने मुँह से निकला :

‘‘वे जी जोगेया ऐ क्या ले आया? जिसकी शक्ल न सूरत!’’

‘‘बेबे तेरी बहू है, शादी कराके लाया हूँ।’’

‘‘कितने में खरीदी?’’

‘‘बेबे ख़रीदी नहीं! ग़रीब बाप की बेटी है। उसके बाप की नहीं अपने ससुर की सिर्फ़ मदद ही की है।’’

‘‘ओए, उसे खरीदना ही कहते हैं और बिकी हुई औरत की कोई इज़्ज़त नहीं होती। न घर में न समाज में, न ही लोग उसकी इज़्ज़त करेंगे, और न ही कल तू उसकी इज़्ज़त करेगा।’’

‘‘बेबे बीवी है मेरी। ऐसा मत कह। घर बसाना है उसके साथ। तू बस आशीर्वाद दे दे!’’

‘‘एक बात तू मेरी सुन ले! तूने अपनी मरज़ी की, हमारी एक न सुनी। तू अपनी मरज़ी का मालिक, उसे लेकर अपनी अलग से घर-गृहस्थी बसा ले। अब इस घर में तेरे लिए कोई जगह नहीं।’’

‘‘मगर बेबे मैं उसे लेकर जाऊँगा कहाँ?’’

‘‘यह तो तुझे पहले सोचना चाहिए था। तेरे बड़े ख़ैरख़्वाह हैं, यह सलाह भी दे देंगे।’’

अब तक बात सारे गाँव में फैल चुकी थी और निहाल भी यह खबर सुनकर घर की तरफ़ लपका। अपने घर के बाहर लोगों को उचक-उचक कर अंदर देखते भड़क उठा&

‘‘तमाशा हो रहा है कोई? भागो अपने-अपने घरों में जाओ।’’

उसकी ज़ोरदार आवाज़ सुनकर लोग तितर-बितर हो गए।

‘‘बेबे यह क्या कर रही हो? क्यों तमाशा बना रही हो? ब्याहकर लाया है भगाकर नहीं लाया।’’ बेबे के कंधे पर प्यार से हाथ रखकर उसे समझाने लगा।

‘‘मगर देख तो क्या गुल खिलाया है चन्दरे ने।’’ बेबे की आँखें बरसने लगी थीं।

‘‘चुप कर बेबे, मत रो। जो हो गया सो हो गया। तू बस शांत हो जा।’’ माँ को सीने से लगाकर चुप कराने लगा।

बैसाखा अपनी दुल्हन के साथ वहीं परेशान खड़ा रहा। पम्मो रसोई में काम करते-करते बाहर देख रही थी।

‘‘चल ओए बैसाखिया ले जा अपनी दुल्हन को अंदर। जा मुँह हाथ-धोकर कुछ खा-पी ले।’’

यह सुनते ही बैसाखे ने राहत की साँस ली और बीवी को पीछे आने का इशारा करते हुए जल्दी-जल्दी कमरे में चला गया।

‘‘पम्मो, जाकर देख उन्हें क्या चाहिए?’’ बहुत कम वह उसके नाम से बुलाकर कोई काम कहता था।

पम्मो को उसने कमरे में उनके पीछे जाते देखा और खुद वह बेबे को मनाने की कोशिश करने लगा। बैसाखे का इस तरह बंगाली लड़की ब्याह कर ले आना उसे भी अच्छा न लगा था। उसका दर्द, उसकी चाहतें, उसकी ख्वाहिशें, उसकी ज़रूरतें उसकी तिश्नगी को महसूस कर सकता था। वह भी तो उसी कश्ती का मुसाफ़िर था, फर्क़ सिर्फ़ इतना था कि वह बेबे को दुख देकर कोई काम नहीं करना चाहता था। जी तो उसका भी चाहता था कि कोई उसकी राह देखे, उसके सब काम करे, थक-हार कर जब खेतों से लौटे तो दो बोल प्यार के बोले। उसके भी घर में बच्चों का शोर हो। वह सिर्फ़ ठंडी आह भरकर रह गया।

बहुत जल्दी आठ एकड़ ज़मीन के फिर हिस्से हो गए। दो एकड़ अपने हिस्से की ज़मीन लेकर बैसाखा अपनी बीवी को लेकर अलग घर बसाने के लिए दहलीज़ पार कर गया।

ज़मीन और घर के बंटवारे तो सब ने देखे मगर बेबे के दिल के कितने टुकड़े हुए, कितने अरमान सिसक-सिसक कर टूटे, यह किसी को दिखाई नहीं दिया। उसे जिस्मानी तकलीफ कोई नहीं थी बस मोह का रोग लग गया। बेटों का मोह दीमक की तरह उसे अंदर से खोखला करता रहा। अपने सबसे आज्ञाकारी लाडले बेटे का घर न बसा सकने की नाकामयाबी उसे तड़पाती रही और एक रोज़ यह अरमान लिए वह इस दुनिया से कूच कर गई।

बेबे के गुज़र जाने के बाद मक्खन और पम्मो उसका पूरा ख़याल रखते। मक्खन खेतों में उसके साथ काम करता। मंडी भी एक साथ जाते और कोशिश करता कि वह कहीं दोस्तों के साथ रुक न जाए। सीधे उसके साथ ही घर चले आते। पम्मो भी उसकी हर ज़रूरत का ख़याल रखती, वक़्त पर खाना देना, उसके कपड़े धोना, उसका बिस्तर छत पर लगाना, सब वह बिना कहे ही करती। फिर भी निहाल को वह अपना घर नहीं लगता था। वह उसे पम्मो का घर कहने लगा था। बेबे के जाते ही उसके सर का पल्लू भी ढलक गया था। अपने घर का अहसास शायद बेबे अपने साथ ही ले गई थी। रोढ़ा तो अपनी ज़मीन बेचकर न जाने कहाँ निकल चुका था। बैसाखा अपनी बंगालन के साथ खुश था। बस वह ही तन्हा रह गया था। उसे चरन सिंह की बात बार-बार याद आ रही थी। सुनते ही जिस को उसने इंकार कर दिया था, अब वही बात उसे भली लगने लगी थी। वह सोचने लगा कब तक वह ऐसे ही बेमकसद ज़िंदगी जीता रहेगा? कब तक वह चोरों की तरह नथनी वाली के पास अपनी ज़रूरतें पूरी करने जाता रहेगा? उसे अभी कोई अपना चाहिए। बैसाखा भी तो खुश है। लोग एक दिन बातें करेंगे, दो दिन करेंगे, फिर ख़ामोश हो जाएंगे। बच्चे काले पीेले पैदा हो भी गए तो क्या? होंगे तो उसी के। जब यही बात बैसाखा ने उससे कही थी तो वह कैसे खिलखिलाकर हँसा था। अब वह भी थक गया है।

रात आँगन में तख़्त पर बैठे दोनों भाई खाना खा रहे थे और पम्मो रसोई से एक-एक करके गरम-गरम रोटी उनको परोस रही थी। निहाल ने बातों-बातों में चरन सिंह का ज़िक्र छेड़ दिया।

‘‘मक्खन यार चरन सिंह बड़ा ज़ोर डाल रहा है साथ चलने को।’’

‘‘क्या?’’

‘‘कह रहा है कुछ दिनों के लिए उसके साथ बाहर चलूँ।’’

‘‘बाहर, वहाँ क्या है?’’

‘‘उसके कुछ रिश्तेदार रहते हैं। उनकी बहुत जान-पहचान है। हो सकता है कोई लड़की पसंद आ जाए।’’

‘‘वीरे तू भी...?’’ उसने हैरत से भाई को देखा।

‘‘क्या करूँ यार? मेरी भी तो कुछ ज़रूरतें हैं, कुछ अरमान हैं। अब अकेले ज़िंदगी नहीं कटती। पंजाब की ज़मीन तो हमारे लिए बंजर हो गई।’’ उसकी आवाज़ में मायूसी और बेज़ारी ज़ाहिर थी। पम्मो के हाथ रोटी सेकते रुक गए। उसने कान उनकी बातों की तरफ़ लगा दिये।

उस रात न जाने क्यों पम्मो सो न सकी। बेबे की बातें उसे रह-रह कर सताने लगीं। उसने तो वादा किया था बेबे से कि वह उसकी हर ज़रूरत का ख़याल रखेगी। उसे कोई तकलीफ़ नहीं होने देगी। साथ सोया मक्खन सिंह खर्राटे भरता रहा और वह करवटें बदलती रही।

पता नहीं वह ज़मीन के एक और बंटवारे, घर के बंटवारे, अपनी हुकूमत के बंटवारे या फिर मर्द के बंटवारे, न जाने किस के खौफ़ ने उसके अंदर की सोई ही हुई द्रोपदी को जगा दिया। वह सोचने लगी कि अगर कल की तरह उसने, दोबारा उसकी कलाई पकड़ ली तो वह उसे छुड़वाएगी नहीं और न ही भगवान कृष्ण को अपनी मदद के लिए पुकारेगी। उसे तो अपने फ़र्ज़ पूरे करने हैं, उसे तो बेबे से किया हुआ वादा पूरा करना है।

-----****-----

|दिलचस्प रचनाएँ:_$type=blogging$count=5$src=random$page=1$va=0$au=0$meta=0

|समग्र रचनाओं की सूची:_$type=list$count=8$page=1$va=1$au=0$meta=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: द्रोपदी जाग उठी - प्रांत-प्रांत की कहानियाँ - संकलन व अनुवाद - देवी नागरानी
द्रोपदी जाग उठी - प्रांत-प्रांत की कहानियाँ - संकलन व अनुवाद - देवी नागरानी
http://1.bp.blogspot.com/-0KU8kvXy4aA/Xf7yGaxfWEI/AAAAAAABQiA/c6R1OSHUTB8W1Gpb2GrMT2i1Fgae5KGBgCK4BGAYYCw/s320/prant%2Bprant%2Bki%2Bkahani-706441.png
http://1.bp.blogspot.com/-0KU8kvXy4aA/Xf7yGaxfWEI/AAAAAAABQiA/c6R1OSHUTB8W1Gpb2GrMT2i1Fgae5KGBgCK4BGAYYCw/s72-c/prant%2Bprant%2Bki%2Bkahani-706441.png
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2019/12/blog-post_72.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2019/12/blog-post_72.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ