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एक है वंदना - चित्रा गुप्ता

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चित्रा गुप्ता

एक है वंदना

वंदना एक खूबसूरत बदकिस्मत लड़की....अपने घर की तीसरी लड़की..उससे पहले भी दो लडकियां....संयोग से वंदना के जन्म से ही पिता को व्यापार में घाटा होना शुरू हो गया। बुजुर्गों का अंधविश्वास शुरू हो गया ओह ! तीसरी लड़की है यह तो होना ही था....यही से शुरू होती है वंदना के दुर्भाग्य की कहानी... आमतौर पर माना जाता है कि जैसा बच्चे को लेबल करते हैं वह अवचेतन में वैसा ही सोचता है और धीरे-धीरे वैसा ही स्वयम् को समझने लगता है। यही वंदना के साथ भी हुआ।

वन्दना चार भाई- बहनों में तीसरे नम्बर की और उसके बाद भाई.... वह तो जैसे प्यार की हकदार ही नहीं थी। यद्यपि उसे भाई –बहनों की तरह सब जरूरत की चीजें मिलती पर प्यार पर उसका हक़ नहीं था ,खासकर माँ के प्यार का। घर में गरीबी पैर पसार चुकी थी..... ऊपर से सबकी पढ़ाई का बोझ....जब-तब उस पर माँ का गुस्सा निकलता। तेरे पैदा होते ही सब उजाड़ हो गया..उसे यह सुनाया जाता। वन्दना बचपन से ही स्वभाव की बहुत अच्छी थी। अक्सर शांति से सब आरोप सहती.... पर वह भी इंसान ही तो थी। जब उसे इन तानों पर गुस्सा आता और वह उसे दिखाने की गलती करती तो उसकी ही पिटाई होती। कई बार वह घर की सीढ़ियों में बैठकर देर रात तक रोती थी। यह देखकर मैं बहुत दुखी होती। उसे सांत्वना भी देती। पर वह तो उसके लिए पर्याप्त नहीं थी। जब तक बच्चे को अपने माता-पिता का प्यार भरा स्पर्श न मिले उसके लिए किसी और स्पर्श विशेष मायने नहीं रखता। मेरे पास बैठते ही वह बिलख-बिलख कर रोती। उसके साथ मैं भी आंसू बहाती...पर कर कुछ नहीं सकती थी। बी.ए. पास करने के बाद उसकी एक व्यापारी के लड़के से शादी तय हो गई। कपड़ों के व्यापारी थे ..जैसा कि मैंने पहले भी लिखा कि वंदना सांवली खूबसूरत ,सांचे में ढली 5 फुट 4 इंच लम्बी तन्वंगी युवती थी। बिना दहेज के इतने बड़े परिवार में शादी...घर में सब बहुत खुश थे...वंदना भी कम खुश नहीं थी। उसने विवाह से पहले एक दिन हंस कर भी कहा था कि अब तो असैनी ( बदकिस्मत ) का ठप्पा भी खत्म हो जाएगा। घर की दुत्कारों से निजात पा जाऊँगी। लड़के वाले मर्सीडीज में बैठकर आये थे। लड़का भी ठीक था...हमारे यहाँ एक कहावत है – घी की लड्डू टेढ़े भी भले...उस हिसाब से लड़का अच्छा था। वंदना के नसीब जाग गये यह देखकर मुझे काफी तसल्ली हुई। उसकी शादी बिना दहेज़ की थी सो सब कुछ साधारण ही दिया गया। वंदना ट्यूशन करती थी सो उसके पास कुछ रुपये थे। पहली बार वह जिद करके ब्यूटी पार्लर गई। दुल्हन के रूप में उसका चेहरा चमक रहा था। उस दिन उसे देखकर मुझे स्मिता पाटिल और शबाना आजमी की याद आई थी।

वंदना का दुर्भाग्य उसका पीछा कहां छोड़ने वाला था। एक महीने में ही पता लग गया कि उसका पति मिर्गी का मरीज था ऊपर से शराबी भी.....जिस बिना दहेज की शादी का गुणगान करते उसके पिता जी नहीं थकते थे...उसका रहस्य समझ में आया...इस छलावे में वंदना की सास, जेठ, ननद सब भागीदार थे। सास को उसकी तकलीफ़ देखकर शायद तरस आता था या अपने पाप का पश्चात्ताप था उसने वंदना को बहुत जेवर दिया ... उसको खुश करने का प्रयास भी करती। किसी भी औरत को यदि धोखे में रखकर शादी की जाए तो क्या वह खुश रह सकती है ? माँ से तिरस्कृत वंदना ने हालात से समझौता किया। पर वह अन्दर से टूट चुकी थी ... सपोर्ट के नाम पर एक बहन साथ देती थी पर वह तो काफी नहीं था। वंदना तो हर पल मर-मरकर जी रही थी। पहली संतान लड़की हुई.. बहुत प्यारी... वंदना अपना दुःख जैसे भूल गई बच्ची के साथ मस्त रहती...पति ने भी बेटी का स्वागत किया....पर टूटी हुई वंदना को प्लूरिसी ने आ दबोचा। पति शराबी ऊपर से मिर्गी का मरीज...घरवालों के रहमो करम पर इलाज हुआ... उसके बाद फिर दो लडकियां और एक लड़का...वंदना के चार बच्चे... पति का साथ बच्चे पैदा करने तक सीमित था...वंदना किस दुःख में जी रही है इससे उसका लेना-देना ही नहीं था। डायबटीज के कारण उसके दांत भी गिर गए थे एक खूबसूरत सुघड़ लड़की का ऐसा हाल होगा इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। वंदना को अपने बच्चे पढ़ाने थे। उसने उन्हें पढ़ाया भी। पति को देखती तो सोचती थी...न जाने कब मेरा इनका साथ छूट जाए। अभी तो व्यापार से पैसे मिल जायेंगे...इनके जीते जी इन लड़कियों की शादी हो जाए...पर उसका ऐसा सौभाग्य कहाँ था ? पति को एक दिन सड़क पर दौरा पड़ा और वे वहीँ प्राणहीन हो गये। वे तो पहले से ही चिंता मुक्त थे पर इसे और भी चिंता में छोड़ गये। जिस दीवार के सहारे उसे घर खर्च मिलता था वह तो टूट चुकी थी। पति ज़िंदा थे तो उनके घर आने की इन्तजार में उसने आंसुओं से खिड़कियों को भिगोया था...कई बार आधी रात को नशे में धुत्त उसके पति को कोई शराबी दोस्त घर छोड़ जाया करता। वंदना अपनी लाचारी पर बिलख-बिलखकर रोया करती थी। काश ! वह शिवानी की नायिका कृष्णकली की तरह कभी हारना या झुकना न सीखती। पर खुद को अभागिनी समझने वाली तो हथियार डाल चुकी थी। व्यापार से अपर्याप्त धन राशि देकर उसे ससुराल वालों ने मंझधार में छोड़ दिया... चार बच्चे...रहने को दो कमरे और कुछ पैसा और जेवर उसके पास रह गया....सास भी चल बसीं..अब उसकी ओर से बोलने वाला कोई नहीं था....पिता अपनी औपचारिकता निभाकर चलते बने। उनके पास कुछ था भी नहीं सिवाय अपनी मजबूरियों के... अक्सर सोचती हूँ वे वन्दना के सर पर हाथ रखते ,प्यार भरा स्पर्श करते तो सम्भवतः उसे एहसास होता कि माँ-बाप तो अपने हैं।

वन्दना ने लडकियां पढ़ा दी थीं पर सबको उनकी शादी की चिंता थी....कमजोर माँ की सन्तान थीं...काम से ज्यादा उन्होंने भी शादी को महत्त्व दिया ...चंदे से तीनों की शादी हो गई। लडकियां खाते-पीते घर में गई उनकी ओर से वंदना बेफिक्र हो गई थी। जेवर बेचकर लड़के को मैकनिकल इंजिनियर बना दिया....संतोषी वंदना संतुष्ट हो गई। उसकी नौकरी लग गई घर के गुजारे लायक तनख्वाह उसे मिलने लगी। अभी दुर्भाग्य ने साथ न छोड़ा था.....अबकी बार ब्रैस्ट केंसर ने उसे आ दबोचा....चुपचाप होम्योपैथिक इलाज कराती रही.....बेटे की इतनी आमदनी नहीं थी कि इलाज हो जाए....फिर से चंदा इकट्ठा किया गया। पहले डायबटीज पर नियंत्रण पाना था। बहनों ने मिलकर जबरदस्ती उसका ऑपरेशन और कीमो कराया। अब वह फिर संतुष्ट होकर जीवन जीने लगी.....अब एक और दुर्भाग्य.....उसकी आँखों से बहुत कम दिखने लगा। लोगों के कपड़े सीकर वह घर खर्च के लिए रुपये इकट्ठा करती थी अब अपने कपड़ों में बटन लगाने लायक भी नहीं रही। वह फोन नम्बर नहीं देख पाती है। बहुत बार भगवान् से पूछती हूँ कि वंदना का क्या कसूर था जो उसे जीवन का सफर इतने दर्दनाक तरीके से तय करना पड़ रहा है....क्या उस संतोषी को हंसने का खुश रहने का कभी भी हक़ नहीं था ? कहते हैं 12 साल बाद तो घूरे के भाग भी जग जाते हैं क्या वंदना घूरे से भी गई बीती है ? सच में मुझे भगवान् से शिकायत है। वंदना हमेशा मेरे दिमाग में छाई रहती है। आज उसके बारे में लिखते समय मेरे आँसू मेरी लेखनी को धुंधला कर रहे हैं।

विद्वान् जन कहते हैं कि जो हम चाहते हैं वही हम बोले और सोचें। उससे जो तरंगे मिलेंगी वे भगवान् जरूर सुनता है । मैं तो हर दिन दिल की गहराइयों से कहती हूँ ...वंदना तू खुश रहे...बहुत खुश रहे...वंदना कोई गैर नहीं मेरी चचेरी बहन है।

चित्रा गुप्ता

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