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श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग तेलुगु कवयित्री रचित, 'श्री मोल्ल रामायण तथा उसके अल्पज्ञात प्रसंग’ - डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

श्रीरामकथा के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंग

तेलुगु कवयित्री रचित, 'श्री मोल्ल रामायण तथा उसके अल्पज्ञात प्रसंग’

दो. - प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।

दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड ३५-४

श्रीराम ने शबरी के आश्रम में जाने के बाद उन्हें नवधा भक्ति बताई, जिसमें पहली भक्ति संतों का सत्संग है तथा दूसरी भक्ति में श्रीराम ने अपने कथा-प्रसंग और उनमें प्रेम रखने का बताया था। इसी क्रम में इस आलेख में तेलुगु साहित्य की प्रथम कवयित्री मोल्ल और उनकी कृति 'श्री मोल्लरामायण’ के अल्पज्ञात दुर्लभ प्रसंगों का विवरण दिया गया है।

आध्यात्मिकता भारतीय राष्ट्र की प्राण वायु एवं शक्ति है। वैदिक काल से लगाकर आज तक आधुनिक युग में अनेक रूप रूपान्तरों और प्रकारान्तरों में यही शक्ति भारत को स्पन्दित और नियंत्रित करती रही है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन और कृतित्व हमारी आध्यात्मिक संस्कृति की धरोहर है। इस कारण श्रीराम का व्यक्तित्व और कृतित्व को समय-समय पर अनेक महर्षियों, मुनियों और समर्पित भक्तों एवं कवियों ने अपनी दृष्टि से आंकलन किया।

आंध्रप्रदेश और तेलुगु भाषा में श्रीराम काव्य की जितनी प्रचुरता एवं बहुलता है, शायद ही वह दूसरे अन्य क्षेत्र अथवा भाषा में उपलब्ध नहीं है। तेलुगु भाषा में रचित राम-काव्यों में 'श्री मोल्ल रामायण’ एक संक्षेप काव्य के रूप में सर्वाधिक लोकप्रिय, मार्मिक एवं हृदयस्पर्शीय है। आज से लगभग ५०० वर्ष पूर्व सामन्तकालीन युग में पिछड़ी हुई जाति में जन्म लेकर एक नारी मोल्ल ने कैसे इस प्रकार की श्रेष्ठ साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक प्रचुरताओं से परिपूर्ण रचना की परिकल्पना एवं सृष्टि की होगी? आंध्रप्रदेश की सामाजिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक विशिष्टताओं की सुगंध से 'श्री मोल्ल रामायण’ श्रीराम के जीवन और चरित्र की एक अद्भुत कृति है। इस तरह श्री मोल्ल रामायण तेलुगु भाषा का अनमोल-अनुपम ग्रंथ रत्न है।

सामान्यत: तेलुगु साहित्य की राम-काव्य परम्परा में महिलाकृत चार रामायण है- श्री मोल्ल रामायण, मधुर वाणीकृत संस्कृतिकृत रघुनाथ रामायण, शीरमु सुभद्रमाम्बा कृत सुभद्रा रामायण, चेब्रोलु सरस्वती कृत सरस्वती रामायण। इन सबमें प्रचार-प्रसार एवं ख्याति की दृष्टि से श्री मोल्ल रामायण अग्रगणीय है। आन्ध्रप्रदेश के निवासियों के लिए श्रीराम से बढ़कर कोई दूसरा इष्टदेव नहीं हैं और रामायण से बढ़कर अन्य कोई भक्ति कथा नहीं है। साहित्य में दैनिक जीवन में जहाँ भी सुना जाए, यह एकमात्र श्रीराम का पवित्र नाम घर-घर में प्रतिध्वनित होता सुनाई पड़ता है। श्रीराम के वनवास के चौदह वर्ष से अधिक समय (यात्रा) आन्ध्रप्रदेश में दण्डकारण्य और गोदावरी के किनारों पर ही व्यतीत हुआ है। उस पावन स्मृति को जाग्रत करने वाले अनेक स्थान और चिह्न इस प्रदेश में आज भी यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होते हैं। यही कारण है कि मर्यादा पुरुषेात्तम श्रीराम की पुनीत गाथा गाने वाले भक्तों-संतों, महानुभावों से आन्ध्रप्रदेश भरा पड़ा है।

सदियों के पूर्व एक सामान्य कुम्हार परिवार की अल्प शिक्षित महिला द्वारा रचित आन्ध्रप्रदेश में सर्वाधिक लोकप्रिय, सरल-सुबोध फिर भी अनेक अलंकारों से सुशोभित श्री मोल्ल रामायण जैसा भक्ति काव्य भारत के लिए भारतीय नारी के लिए और हम सब भारतवासियों के लिए बड़े ही गौरव की बात है।

श्रीराम-काव्य की रचनाकार आतुकूरि मोल्ल तेलुगु साहित्य की प्रथम कवयित्री मानी गई है। प्राचीन कवियों की परम्परा के अनुसार मोल्ल के जीवन के संबंध जैसे वह किस जाति की थी? उसके माता-पिता कौन थे? वह किस गाँव में रहती थी? वह कितने वर्ष जीवित रही? वह विवाहित अथवा अविवाहित थी?

अन्त: साक्ष्य के आधार पर गुरुलिंग जंगम की अर्चना में तत्पर शिवभक्तिरत मोल्ल आतुकूरि केसन की वर पुत्री मानी जाती है। ऐसा सुना गया है कि श्री कण्ठ मल्लेख के वर-प्रसाद से कविता करना वह सीख गई। यह गोपरम वर्तमान में नेल्लूर के समीप एक गाँव माना जाता है। 'केसन सेट्टी तनय’ मानने के कारण लोग इसे मोल्ल वैश्य होने का अनुमान भी करते हैं किन्तु जनश्रुतियों-किंवदन्तियों में उसका कुम्हारिन होने के पक्ष में हैं। मोल्ल का जीवनकाल लगभग ई. सन् १३२०-१४०० माना गया है। मोल्ल ब्रह्मचारिणी रही होगी। पिता शिव के भक्त थे तो मोल्ल श्रीराम की भक्त थी।

इस प्रकार पिता और पुत्री दोनों के अंतरंग में शिव-राम की अद्वेत भक्ति का भाव पल्लवित-पुष्पित हुआ और वह रामफल के रूप में आंध्र जनता रूपी शुकों को रुचिकर ही नहीं अमृत तुल्य सिद्ध हुआ। प्रधान कथा को भंग न करते हुए मोल्ल ने भी अपनी रुचि के अनुसार, प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप प्रसंगों को घटा-बढ़ाकर इस रामायण की अद्भुत रचना की है। इस रामायण में छ: काण्ड एवं नौ सौ पद्य हैं। श्री मोल्ल रामायण के अद्भुत प्रसंग ये हैं-

तेलुगु श्री मोल्ल रामायण में हनुमान जी का सीतान्वेषण प्रसंग

सीतान्वेषण में सुग्रीव ने अपनी अनगिनत वानर सेना श्रीराम को दिखाई। सुग्रीव ने सीतान्वेषण में समर्थ अधिक शक्तिशाली वानरोत्तमों को नियोजित कर दिशाओं में भेजने के लिए कहा, पूर्व में मेंद को, पश्चिम में सुषेण को, उत्तर में शतबली को नियाजित कर उनकी सहायता में लाख-लाख संख्या में वानर वीरों को देकर, जानकीजी के रहने की जगह का पता लगाकर, एक माह के भीतर लौट आने को भेजा। तत्पश्चात् हनुमान जी को बुलाकर कहा कि, 'तुम दक्षिण में जाओ।’ उस समय श्रीराम ने हनुमान जी के विश्वास आदि गुणों की प्रशंसा कर अपने समीप बुलाकर कहा कि-

नपुड़ श्रीराम भूपालुंडु वानि विश्वासादि गुणम्मुलकु

मेचिनवाडै दग्गरगा बिलिचि नीवु शौर्यवंतुडवु हितुंडवुनु

गावनु नीचेत मत्प्रयोजनं बीडेरुननि पलिकि तनचेति

यंगुलळीयकं बतनि चेतिविच्चि यीमुद्रिक जनकराज नंदनकु

समर्पिचि या जानकी। शिरोरत्नबुं माकानवालुगा दम्मनि

यनूप नंतडिय्यकोनि भोविकन नात निकि दोडुगा

नंगदजांबपदायुलं गूर्चि यनिपे न

श्री मोल्ल रामायण किष्किन्धाकाण्ड २७

'तुम हनुमान् शौर्यवान हो, हितेषी हो। अत: तुमसे मेरा प्रयोजन सिद्ध होगा। इतना कहकर श्रीराम ने अपने हाथ की अँगूठी उन्हें देकर, जनकराज नन्दिनी को समर्पित कर उस जानकी के शिरोरत्न (चूड़ामणि) को अपनी पहचान के रूप में लाने को कहकर उन्हें भेजा। हनुमान जी ने यह बात स्वीकार कर श्रीराम को प्रणाम् किया। उसके बाद अंगद, जाम्बवान् आदि को भेजा।

इस प्रकार इस श्री तेलुगु मोल्ल रामायण का सीतान्वेषण प्रसंग अन्य श्रीरामकथाओं (रामायणों) से भिन्न है, क्योंकि इस रामायण में श्रीराम ने हनुमान जी को सीताजी से भेंट कर उनकी पहिचान कर उनसे चूड़ामणि लेकर अपनी अँगूठी देने का निर्देश दिया। इसके साथ ही साथ श्रीराम ने हनुमान जी की शक्ति को प्रशंसा कर कहा कि मेरा प्रयोजन तुमसे ही सिद्ध होगा।

हनुमान जी ने भी अशोक वाटिका में जाकर श्रीराम का गुणगान करने के पश्चात्, उनका दूत बताकर सीताजी को उनके द्वारा दी गई अँगूठी सीताजी को समर्पित कर दी। हनुमान जी ने बाद में कहा कि अब खाली हाथों जाना दूतों के लिए उचित कार्य नहीं है तथा सीताजी से कहा कि आपके दर्शन प्राप्त किए। इसका विश्वास जताने के लिए आप अपना शिरोरत्न मुझे दे दीजिए। यह सुनकर सीताजी ने कहा कि मैंने तुम्हारे द्वारा मेरे नाथ (स्वामी) का क्षेम (कुशल समाचार) सुन लिया, फिर भी तुम्हारे निज रूप को देखे बिना मैं अपना शिरोरत्न तुम्हें नहीं दूँगी। यह सुनकर हनुमान जी ने भी अपना विशाल रूप दिखाया, इसे देखकर सीताजी प्रसन्न हो गई तथा श्रीराम को पहिचान के रूप में शिरोरत्न दे दिया।

श्रीरामचरित मानस में सीतान्वेषण-हनुमान् प्रसंग

सुग्रीव के आदेशानुसार नील, अंगद, जाम्बवान् और हनुमान जी दक्षिण दिशा में सीताजी का पता लगाने के लिए तैयार होकर जाने लगे। उस समय श्रीराम ने जो कुछ किया तथा कहा वह इस प्रकार है।

पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा।।

परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।

बहु प्रकार सीतहि समझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहूँ।

हनुमत जन्म सुफल करिमाना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना।

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड २३-५-६

इन सबके (नील, अंगद और जाम्बवान्) पीछे पवनसुत श्रीहनुमान जी ने श्रीराम को सिर नवाया। कार्य का विचार करके श्रीराम ने हनुमान जी को अपने पास बुलाया। उन्होंने अपने कर कमलों से उनके सिर को स्पर्श किया तथा अपना सेवक जानकर उन्हें अपने हाथ की अँगूठी उतार कर दी। तत्पश्चात् उन्होंने हनुमान जी से कहा कि तुम बहुत प्रकार से सीताजी को समझाना और मेरा बल तथा विरह (प्रेम) का कहकर तुम शीघ्र लौट आना। यह सुनकर हनुमान जी ने अपना जन्म सफल समझा और कृपानिधान प्रभु को हृदय में धारण करके सीताजी की खोज में चल पड़े। यहाँ इस कथा प्रसंग में श्रीराम ने सीताजी के पास से पहिचान के रूप में चूड़ामणि लाने का हनुमान जी को कुछ भी नहीं कहा था।

श्री मोल्ल रामायण एवं अन्य रामायणों में सेतुबंध कथा प्रसंग

श्री मोल्ल रामायण में रामसेतु निर्माण का प्रसंग अन्य रामायणों से कुछ परिवर्तन के साथ वर्णित है। अत: अन्य रामायणों अथवा श्रीरामकथाओं में से इस प्रसंग को जानना आवश्यक होगा।

वाल्मीकि रामायण में रामसेतु प्रसंग

श्रीराम के विशाल अमोघ बाण से कुक्षिस्थान के दग्ध हो जाने पर सरिताओं के स्वामी समुद्र (सागर) ने श्रीराम से कहा-

अयं सौम्य नलो नाम तनयो विश्वकर्मण:।

पित्रा दत्तवर: श्रीमान् प्रीतिमान् विश्वकर्मण:।।

वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग २२-४५

सौम्य! आपकी सेना में जो नल नामक कान्तिमान् वानर है, साक्षात् विश्वकर्मा का पुत्र है। नल को इसके पिता ने यह वर दिया है, 'तुम मेरे समान समस्त शिल्पकला में निपुण होओगे।’ प्रभो। आप भी तो इस विश्व के सृष्टा विश्वकर्मा हैं, इस नल के हृदय में आपके प्रति बड़ा प्रेम है। यह वानर अपने पिता के समान ही शिल्पकला में समर्थ है, अत: यह मेरे ऊपर पुल का निर्माण करें। सागर ने कहा कि मैं उस सेतु (पुल) को धारण करूँगा। यह सुनकर नल ने उठकर श्रीराम से कहा मैं इस महासागर पर सेतु बाँधने में समर्थ हूँ। अत: सब वानर आज ही सेतु बाँधने का कार्य आरम्भ करें। श्रीराम की आज्ञा होते ही वानरों साल अश्वकर्ण, धव, बाँस, कूटज अर्जुन, ताल, तिलक, तिनिश, बेल, छित्वन खिले हुए कनेर, आम और अशोक आदि वृक्षों से तथा पर्वतों शिखरों को तोड़-तोड़ कर समुद्र को पाटने लगे। श्रीराम सेतुबंध सौ योजन लम्बा तथा दस योजन चौड़ा बनाने का लक्ष्य था। प्रथम दिवस १४ योजन लम्बा, द्वितीय दिवस २० योजन, तृतीय दिवस २१ योजन, चतुर्थ दिवस २२ योजन एवं पंचम् दिवस २३ योजन। इस प्रकार १४+२०+२१+२२+२३=१०० योजन सेतु का निर्माण कर दिया।

श्रीरामचरितमानस में रामसेतु कथा प्रसंग

श्रीराम ने सागर से कहा कि हे तात्! जिस प्रकार वानरों की सेना पार उतर जाए वह उपाय बताओ तब सागर ने श्रीराम से कहा-

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।

तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलघि प्रताप तुम्हारे।।

श्रीरामचरित मानस सुन्दरकाण्ड ६०-१

हे नाथ! नील और नल दो वानर भाई हैं। उन्होंने लड़कपन में ऋषि से आशीर्वाद पाया था। उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पर्वत भी आपके प्रताप से समुद्र पर तौर जाएंगे। इस प्रकार उनके स्पर्श और श्रीराम के प्रताप से सेतुबंध का निर्माण किया गया।

तेलुगु श्री मोल्ल रामायण में समुद्र पर

सेतुबंध तथा पर्वतों को निगलने वाले महामस्त्य

श्रीराम के सामने समुद्र ने मानव के रूप को धारण कर दैन्यभाव प्रकट करते हुए प्रणाम कर कहा अब सेतुबंध में विलम्ब क्यों? इनकुलाधीश्वर (राम)! कपियों को भेजकर शीघ्र सेतु निर्माण कराओ। वारिधि को बाँधकर पार करो। यह सुनकर कन्द-

रामुनि पंपुन ब्लवग

स्तोमं बट्लरिगियरिगि दौड्डगु कोडल्

क्षेममुन देच्चि जलनिधि

रामाज्ञानु वैचिरधिकरभसं बोप्पन।।

श्री मोल्ल रामायण युद्धकाण्ड प्रथमाश्वास-४१

श्रीराम के आदेश को सुनकर प्लवंग-स्तोम (समूह) ने चल-चलकर बड़े-बड़े पहाड़ों को कुशलता से लाकर राजाज्ञा से जलधि में उत्साह से डाल दिया। वानरों के पर्वत-पाषाण तथा वृक्ष-समूहों की लाख-लाख की संख्या में लाकर सागर में डालने पर उनसे भयंकर ध्वनि हो रही थी। उन वानरों में ऐसा उत्साह था कि उनकी चीख-पुकार, उछलकूद, अट्टहास एवं हँसी मजाक से ब्रह्माण्ड मानों फट गया हो। वानरों द्वारा लाए गए सभी पर्वतों, वृक्षों एवं पाषाणों को तिमिंगल (तिमिंगल बड़ी भारी सामुद्रीय मछली) निगलने लग गए। उस समय बार-बार पर्वतों के पाषाणों को तैरते नहीं देखकर श्रीराम ने संदेह के साथ रत्नाकर (समुद्र) से इसका कारण पूछा। सागर (रत्नाकर) ने उनसे तुरंत कहा- हे मेदिनीश! रावण की आज्ञा से सभी पाषाणों को मछलियाँ निगली जा रही है। ये सब रावण की आज्ञा से तिमि और तिमिंगल मुझ (सागर) में ऐसा कर विचरण कर रहे हैं।

हे राम! यदि नल के द्वारा बांधा नहीं जाएगा तो सेतु (बांध) नहीं टिकेगा। इसलिए आप नल नामक वानर को वहाँ भेजिए। इतना कह कर सागर चले गए। सागर के तट पर महावीर वानरों के साथ पर्वतों के लाने पर श्रीराम के आदेश से नल ने उसी दिन दस योजन तक सेतु का निर्माण किया तथा सूर्यास्त हो गया।

वानरेन्द्रों की सेना उस सेतुबंध की प्रात:काल तक रक्षा की तथा सूर्योदय होते ही महाबलशाली हनुमान जी ने सुवेलाद्रि जाकर उस पर्वत के समीप स्थित हेमकूट्, नागपर्वत, सिहाचल नामक तीन पर्वतों के वालपाश से उखाड़कर निम्बफल के सदृश फूलों को गेंदों के समान उछलते हुए आकर नल को (हाथों में) दिया। तीन पर्वत कुल मिलाकर नव्वद (नब्वे) योजनों की लम्बाई से युक्त हुए। तत्पश्चात् शतयोजनों की लम्बाई और दस योजनों का चौड़ा सागर को बाँधकर नल ने सेतुबंध का निर्माण किया।

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डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता

'मानसश्री’, मानस शिरोमणि, विद्यावाचस्पति एवं विद्यासागर

सीनि. एमआईजी-१०३, व्यास नगर,

ऋषिनगर विस्तार, उज्जैन (म.प्र.)

Email : drnarendrakmehta@gmail.com

पिनकोड- ४५६ ०१०

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