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व्यंग्य - बदलते मुहावरे, सिकुड़ती लोकोक्तियां - प्रभात गोस्वामी

हमारे जीवन में मुहावरों और लोकोक्तियों का बड़ा महत्त्व रहा है . अपनी बातों को प्रतीकात्मकता के साथ कहना , चुटिकियों के साथ कहने के लिए मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग पुरानी पीढ़ी तो बखूबी जानती है . पर , नई पीढ़ी के लिए अपनी रोज़मर्रा की बातों में इनका प्रयोग अब किसी घने जंगल से लुप्त होते जा पेड़ों जैसा हो गया है . हाल ही में हम नई पीढ़ी के लड़कों के बीच इन्हीं मुहावरों और लोकोक्तियों के चक्कर में फंस कर घनचक्कर हो गए . हुआ यूं कि एक मॉडर्न कॉलेज के सालाना जलसे में एक सत्र इन्हीं पर आयोजित कर छात्रों से चर्चा करने के लिए हमें भी स सम्मान आमंत्रित किया गया था . पर, क्या बताए कि बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले .

पहले आम बोलचाल में मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग के बारे में अर्थ सहित समझाया तो लड़के सर खुजलाने लगे . सोचा आगे जब इनसे पूछेंगे तो शायद हमारा मकसद पूरा हो जाए ! हमने पहली लोकोक्ति-' अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है', का अर्थ पूछा तो एक डेढ़ होशियार छात्र ने कहा - सर , इसका कोई अर्थ अब नहीं रह गया है . आजकल शेर जंगल से निकल कर गलियों-मोहल्लों में बेखौफ हो कर घूम रहे हैं और वन विभाग उनको पकड़ ही नहीं पाता . इसलिए अपनी गली के कुत्ते दुम दबाए चुपचाप 'कुत्ते',  ही बनकर बैठे हैं. कुत्तों से अब गली के शेर का तमगा छिन गया है .

हमने भी हिम्मत नहीं हारी, फिर पूछा बताओ - ' अब पछताए क्या हुआ , जब चिड़िया चुग गई खेत', का अर्थ क्या है ? तब एक छिछोरे ने बड़ी हेकड़ी से कहा - क्या गुरूजी , बेचारी चिड़िया तो आजकल पेड़ों की कमी की वजह से कहीं दूर देश में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहीं हैं . बाकी बचीं ट्वीटर हैंडल्स में चहचहा रहीं हैं . आजकल तो 'पड़ोस' से आकर टिड्डियाँ खेत चुग रहीं हैं . गीदड़ भभकी देने वाले बेचारे 'पड़ोसी, युद्ध वाले हमले की बजाय टिड्डियों से हमला करवाने के आलावा और भी क्या सकते हैं ? सो इसे यूं कहें कि-'अब पछताए क्या हुआ , जब टिड्डियाँ चुग गईं खेत'.

एक बार तो हमारी हिम्मत की दीवार इन बेतुके ज़वाबों से हिलने लगी पर हम भी किसी मोर्चे में डटे सैनिक की तरह अडिग हो कर पूछते रहे . बताओ - 'नाच न जाने आंगन टेढ़ा', के क्या मायने हैं ? अब एक कुचमादी छात्र उठा और कहा - आजकल मल्टी स्टोरी के ज़माने में आँगन बनते ही नहीं , फिर चाहे हम नाच न जाने तो न जाने , आपको क्या तकलीफ है . हमने फिर पूछा -' ईश्वर की माया , कहीं धूप -कहीं छाया', का अर्थ बताओ . भीड़ से फिर एक होनहार उठा - गुरूजी , यहाँ तो हर तरफ धूप ही धूप है , सड़कों , पुलों , भवनों, मेट्रो रेल बनाने की अंधी दौड़ में पेड़ों की बलि रोजाना चढ़ती जा रही है . पेड़ नहीं तो छाया कहाँ से आएगी . आपकी ये लोकोक्ति अब चलने वाली नहीं .

अब हम भी किंकर्तव्य विमूढ़ हो गए . सोचा लोकोक्ति के बजाय इन लौंडों को मुहावरे का अर्थ पूछा जाए . हमने पूछा -'आटा गीला करना', मुहावरे का अर्थ कोई बता सकता है ? भीड़ से एक आवाज़ गूंजी - गुरदेव , आजकल एक फोन पर घर बैठे गरमा -गर्म खाना मिल रहा है  , फिर भला - पानी की कमी के चलते बूंद-बूंद बचाने की मुहिम के बीच हम क्यों आटा गीला करें? अब हमारे सब्र का बांध टूट रहा था . आखिरी कोशिश करते हुए गुस्से में अंतिम मुहावरा पूछा - उल्लू का पट्ठा', इसका अर्थ क्या है ? फिर एक आवाज़ आई - इतनी देर से माथा लड़ा रहे हो , फिर भी ज़वाब चाहिए क्या ? 

हमने भी माथा पीट लिया . दीवार से सर फोड़ने से अच्छा है यहाँ से नौ -दो-ग्यारह होना . इस नई पीढ़ी की भाषा तो अब खिचड़ी बन गई है . फिर जब से खिचड़ी को प्रधान जी ने पौष्टिक आहार बता दिया था तब से ही यहाँ लोगों को खिचड़ी बहुत ही स्वादिष्ट लगने लगी है . इस 'हिंगलिश',  जनरेशन को भाषा की खिचड़ी ही अच्छी लगती है . ऐसे में बदलते मुहावरों और सिकुड़ती लोकोक्तियों की लाज रखना अब किसी के वश में नहीं है . साधो ! साधो !!

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15/27, मालवीय नगर , जयपुर -302027

राजस्थान .

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