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शोध आलेख - सामाजिक चेतना के विकास में पंथी गीतों की भूमिका ( छत्तीसगढ़ के विषेश संदर्भ में ) - शोधार्थी - मनीष कुमार कुर्रे

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शोध आलेख -

सामाजिक चेतना के विकास में पंथी गीतों की भूमिका -

( छत्तीसगढ़ के विषेश संदर्भ में ) -

शोधार्थी - मनीष कुमार कुर्रे -

हिन्दी विभाग, शास0 दिग्विजय स्वशासी महा0 राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) -

ईमेल manishkumarkurreymkk@gmail.com

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विषय प्रवेशः- छत्तीसगढ़ की लोक कला अत्यंत समृद्ध हैं। वह अपनी मौलिकता और विविधता के लिए भी विख्यात हो चुका है जिसमें पंथी गीत एवं नृत्य का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। छत्तीसगढ़ के संत बाबा गुरू घासीदास के जीवन चरित्र एवं उनके मानव कल्याण के लिए किए गए कार्य जिसमें उपदेश, निर्देश एवं संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने का लोक हितकारी एवं सामाजिक चेतना जागृत करने का सहज सुगम तरीका पंथी गीत एवं नृत्य है। छत्तीसगढ़ राज्य आरम्भ काल से ही धार्मिक और सांस्कृतिक साधना का केन्द्र रहा है। इस प्रदेश में पंथी गीतों ने विशेष ख्याति अर्जित की है। इस अंचल के निवासी गीत-संगीत और नाट्य के लिए प्रसिद्ध हो चुके हैं। इनसे सम्बंधित पंथी नर्तकों की छोटी-बड़ी मण्डलियों और उनके समर्थ कलाकार बड़ी संख्या में मिलते हैं। पंथी गीत के उत्कृष्ट योगदान से छत्तीसगढ़ देश-विदेश में अपनी लोक कला की श्रेष्ठता के कारण विख्यात हो चुका है। छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ के अनुयायियों ने पंथी गीत के माध्यम से समाज में विषमता के विरूद्ध निरन्तर मानवीयता एवं बन्धुत्व की भावना के विकास को बल दिया। इसके पीछे बाबा गुरू घासीदास और पंथी गीतों की प्रेरक भूमिका रही है ,जो छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक एवं सामाजिक चेतना को गतिमान रखी हुई है। बाबा गुरू घासीदास की प्रेरक शिक्षा के फलस्वरूप पंथी गीतों में मानव-प्रेम, शांति और सौहार्द्र को छत्तीसगढ़ के लोकजीवन के केन्द्रीय मूल्य के रूप में पहचान मिली है। इन आदर्शों के सृजन में पंथी गीतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है साथ ही छत्तीसगढ़ के संतों एवं महापुरूषों का महान योगदान रहा है। गुरू घासीदास ऐसे ही महापुरूष थे। इसमें प्रेम, करूणा, शांति, सद्भावना, एकता, मानवता, अहिंसा आदि के संदर्भ में तार्किक, मूल्यपरक एवं शिक्षाप्रद गीत गाये जाते हैं। यह सामाजिक चेतना को समुन्नत करने का प्रयास भी है।

छत्तीसगढ़ संस्कृति की इस शिष्ट धारा में गुरू घासीदास की सतनाम संस्कृति का सन्निवेश है। यहाँ के रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार, तीज-त्यौहार, उत्सव-पर्व आदि में सामूहिकता की भावना गुरू घासीदास की सतनाम संस्कृति की ही देन है। समाज में गुरू का महत्व और गुरू-पूजा की परम्परा भी सतनाम की देन है, इन्हीं बातों का समावेश पंथी गीतों में किया गया है।

सतनाम पंथ की लोकगाथा, और संस्कृति है महान।

जरूरत है आज हमें, उसकी करने की पहचान ।।

शोध आलेख का उद्देश्य :- छत्तीसगढ़ के विशेष संदर्भ में पंथी गीतों में छत्तीसगढ़ के लोगों में अमिट रूप से प्रवाहित सामाजिक चेतना का अद्यतन अनुशीलन समय का बड़ी आवश्यकता है। पंथी गीतों का सर्वाधिक प्रभाव छत्तीसगढ़ में दृष्टिगोचर होता है। संत गुरू घासीदास द्वारा पंथी गीतों के माध्यम से छत्तीसगढ़ ही नहीं अपितु राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने का प्रयास किया गया। बाबा गुरू घासीदास के उपदेशों के द्वारा हम उन सामाजिक बुराइयों और कुरीतियों को दूर कर सकते हैं जो समाज एवं राष्ट्र को आगे बढ़ाने के मार्ग में अवरोध की तरह खड़ी हुई हैं।

प्रस्तुत शोधपत्र के माध्यम से सतनाम की विचारधारा प्रेम, मानवता और गुरू संदेश का प्रचार-प्रसार होगा। इससे समाज एवं देश में समरसता, स्नेह, सद्भाव एवं भातृत्व का वातावरण निर्मित होगा। इसका उद्देश्य स्पष्ट है कि अब तक ज्ञात तथ्यों एवं निष्कर्षों का अनुशासित अध्ययन करते हुए नवीन तथ्यों, विचारणाओं एवं सम्भावनाओं का प्रामाणिक उदाहरण प्रस्तुत करना है।

छत्तीसगढ़ के लोकगीत एवं पंथी गीत

लोक शब्द अत्यन्त प्राचीन है ऋग्वेद में इसका प्रयोग साधारण जनता के अर्थ में अनेक स्थान पर हुआ है जैमिनीय उपनिषद् में कहा गया है कि लोक अनेक किस्म में फैला हुआ है एवं प्रत्येक वस्तु में व्याप्त है। पाणिनि के अष्टाध्यायी में भी लोक तथा सर्वलोक शब्द का उल्लेख मिलता है। लोक शब्द अंग्रेजी के '' फोक '' शब्द का पर्यायवाची है। डब्लू0 जे0 थामसन ने सन् 1846 में सर्वप्रथम फोर-लोर शब्द का प्रयोग सभ्य राष्ट्रों में निवास करने वाली असभ्य एवं आदिम जातियों के परम्परा, रीति-रिवाज एवं अधंविश्वासों के लिए किया है। थामसन की दृष्टि लोक आत्मा, चिन्तन एवं लोकजीवन की गहराईयों तक नहीं पहुँच पाई है। उनकी सोच मानव जीवन की समग्रता की दृष्टि से उथली और संकुचित है।

(1) लोकगीत का अभिप्राय तथा स्वरूप :- वस्तुतः लोकगीत ग्राम गीत है, तथा ग्राम्य जीवन संस्कृति के धरोहर है। ग्राम गीत को प्रकृति का उद्गार समझा गया है। ग्रामीण नर-नारियों के हृदय पटल पर आसीन होकर प्रकृति के वे ही गीत ग्राम गीत है। लोकगीत के प्रचलन के साथ ही लोक साहित्य की रचना हुई। हजारी प्रसाद द्विवेदी लोकगीत को वेदों के समकक्ष स्वीकार करते हुए कहते है -''ये आर्येत्तर के वेद हैं''। पं. बलदेव प्रसाद मिश्र ने लोकगीत को परिभाषित करते हुए लिखा है कि '' अकृत्रिम भावों से, प्रेरणा से, हृदय की समस्त रागत्मकता लेकर लोकगीत उद्भूत होता है। लोकगीत इस प्रकार कविता है जो अलिखित होते हुए भी सही अर्थों में सत्काव्य कही जा सकती है। चिन्तामणि उपाध्याय के अनुसार - सामान्य लोक जीवन की पार्श्व भूमि में अचिंत्य रूप से अनायास ही फूट पड़ने वाले मनोभावों की लयात्मक अभिव्यक्ति लोकगीत कहलाती है। सम्यक् दृष्टि से लोकगीत मानव मन के अतः संवेगों की वह लयात्मक सुसाधना है जो अनादि काल से चले आ रहे हैं और जिसके रचयिता अज्ञात है। लोकगीत उन भावों की अभिव्यक्ति है जहाँ धार्मिक, सामाजिक नियम मूल्य, रीति-रिवाज, व्यवहार का प्रतिबंध नहीं होता। हृदय के आवेग, उल्लास, उमंग, हास, प्रणय, शोक, करूणा, क्रोध की निश्चल अभिव्यक्ति होती है। स्वच्छंद मानसिक विचार की भावना ही लोकगीत के प्रमुख लक्षण है।

(2) छत्तीसगढ़ के लोकगीत : पंथी गीत :- छत्तीसगढ़ के लोकगीत में पंथी गीत अपनी विशिष्टता के कारण प्रसिद्ध हो गए हैं। इसमें छत्तीसगढ़ के लोक चेतना, वेदना, प्रेम एवं श्रद्धा के भावों के सुन्दर समन्वय मिलता है। पंथी गीत विशेषकर बाबा गुरू घासीदास जी के जीवन चरित्रादि पर केन्द्रित है। पंथी गीत में प्रेम, करूणा, शांति, सद्भावना, एकता, मानवता, अहिंसा आदि के संदर्भ में तार्किक मूल्यपरक और शिक्षाप्रद गीत गाये जाते हैं। कभी-कभी पंथी गीतों में सामयिक राष्ट्रीय एवं सामाजिक घटनाओं को जन कल्याण के ध्येय से समायोजित कर लिया जाता है। चौका-आरती, मंगल-भजन, गुरू-पूजा एवं वंदना की इस सम्प्रदाय के लोगों का धार्मिक एवं सामाजिक महत्व के लोकगीत होते हैं।

(3) पंथी का अर्थ :- पंथी शब्द पंथ से बना है। पंथ का अर्थ है- मार्ग, रास्ता। अर्थात् सत्य के मार्ग पर चलने वाला। कई विद्वान पंथी को पंछी से उत्पन्न मानते हैं जिसका अर्थ है- राहगीर, यात्री, बटोही। कबीरदास जी के दोहे में यह देखा जा सकता है जो इस प्रकार है-

बड़ा हुआ सो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।

पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।

पंथी गीत : उद्भव - विकास एवं गुरू घासीदास

(1) पंथी-गीतों का उद्भव :- 18वीं शताब्दी का काल भारत के लिए पराधीनता का काल था। इस समय मानवता सिसक रही थी। समाज वर्गों-उपवर्गों, जातियों-उपजातियों में खण्ड़-खण्ड़ दिखाई दे रहा था। फलस्वरूप व्यक्ति से व्यक्ति को, हृदय से हृदय को अलग कर खोखली समाज अपनी जर्जरता का तमाशा देख रहा था। उच्च वर्ग में विलास भरे जीवन की मादकता थी तो निम्न वर्ग में भूखमरी के कारण त्राहि-त्राहि मची हुई थी।

धर्म विभिन्न मत-मतान्तरों में बँट चुका था। धर्म की विभिन्न शाखाएँ हो चुकी थी। अस्पृश्यता और भेदभाव का रोग समाज में पूरी रह फैल चुका था। उच्च वर्ग के लोग निम्न वर्ग के लोगों पर अत्याचार कर रहे थे, तभी शोषित पीड़ित जनता किसी लोक उद्धारक पुरूष को पुकार रही थी। तब उन्हें गुरू घासीदास बाबा जैसे काल पुरूष मिले। इन असंतुलित परिस्थितियों में बाबा जी ने नेतृत्व का बागडोर सम्भाला और घूम-घूम कर पीड़ित जनता को वाणी दी। व्यवस्था के प्रति सुधार क्रांति का उपदेश दिया। सत्य की खोज, साधना, सत्यनाम का प्रचार गुरू बाबा का कर्मयोग है। भावों की श्रद्धापूर्ण अभिव्यक्ति में लय एवं गान का स्फुटन अनायास ही हो जाता है। यह स्वाभाविक प्रवृति, मनोद्गार पंथी गीतों के आरम्भ का मूल है।

(2) पंथी गीतों की विषय-वस्तु तथा क्षेत्र :- पंथी गीतों का मुख्य विषय गुरू घासीदास के जीवन चरित्र तथा सतनाम महिमा का ही गान है। बाबा के जन्म, शैशव अवस्था, यौवन अवस्था, विवाह, तपस्या, वचन, उपदेश के साथ माता सफुरा और उनके चमत्कारिक कार्यों का ही वर्णन पंथी गीतों में मिलता है। सतनाम की महत्ता और सतनाम कीर्तन की प्रासंगिकता पर भी बल पंथी गीतों में मिलता है। मूर्ति-पूजा, बाह्य आड़म्बर, आचार-विचार, अंधविश्वास, ऊँच-नीच का भेदभाव का भी तर्कसंगत विरोध प्रस्तुत किया जाता है, साथ ही आध्यात्मिक, सामाजिक तथा राष्ट्रीय चेतना मूलक ज्ञान भी मिलता है।

(3) पंथी गीत तथा नृत्य :- पंथी गीतों के उद्गम के साथ ही पंथी नृत्य का आरम्भ हुआ। पंथी गीत छत्तीसगढ़ी लोक गीत है उसी तरह पंथी नृत्य लोक नृत्य है। पंथी गीतों के गायन के समय मन के साथ तन भी भाव-विभोर होकर नृत्य की मुद्राओं में ढ़ल जाता है। शारीरिक ताल एवं लयबद्ध संगीत, पंथी नृत्य की आरम्भ की कहानी है। इसमें पुरूष वर्ग के साथ आज महिला वर्ग भी पंथी नृत्य मण्ड़लियों के माध्यम से भाग लेती है। गीतों का लय और स्वरों का आरोह-अवरोह पर नृत्य की गति निर्भर करती है। मध्य में मुख्य गायक एवं मृदंग वादक क्रमशः गायन और वादन करते हुए मनमोहक नृत्य प्रस्तुत करते हैं। तीव्रता पंथी नृत्य को आकर्षक बनाती है। इच्छानुसार गति बढ़ाई और घटाई जा सकती है। मुख्य पंक्ति के साथ तुक मिलाने के लिए कुछ शब्द लाये जाते हैं और भाव की अपेक्षा गीत की सार्थक पंक्ति को गाकर लय एवं छन्द को पूर्णता देते हैं। दूसरी पंक्ति के साथ प्रयोजन भी स्पष्ट होना आरम्भ हो जाता है।

(4) प्रमुख वाद्ययंत्र :- पंथी नृत्य में प्रयुक्त वाद्ययंत्रों को दो भाग में बाँटा जा सकता है -

(क) पारम्परिक वाद्ययंत्र :- इसके अन्तर्र्गत मृदंग, झांझ, मजीरा, झुमका, पेटी, घुँघरू आदि आते हैं।

(ख) नवीन प्रयोग या आधुनिक वाद्ययंत्र :- इसके अन्तर्र्गत केसियों, बेंजों, माईक, ढ़ोलक, बांसुरी, लाउड स्पीकर आदि।

(5) पंथी वेशभूषा :- पंथी नृत्य प्रारंभिक दौर में पुरूष प्रधान नृत्य रहा लेकिन समय के साथ पंथी के अनेक स्वरूप विकसित व परिवर्तित हुए। इनमें मुख्य रूप से महिला सहभागिता भी है। इस प्रकार समाज में प्रगति के साथ महिला पंथी पार्टी व पुरूष पंथी पार्टी का अवतरण हुआ -

(अ) पुरूष पंथी वेशभूषा :- यह पारंपरिक एवं निर्धारित होती है। पुरूष पंथी दल में नर्तक जनेऊ, सफेद धोती, सफेद कुर्ता, गले में कंठी माला व आर्कषक रेडिमेड चमकीले हार भी धारण करते हैं। मस्तक पर चंदन का तिलक शोभायमान होता है। सफेद धोती के ऊपर कमर पर बहुरंगी कमरबंध भी बांधा जाता है। मस्तक पर सफेद पट्टी बांधा जाता है, हाथों में सफेद रूमाल रखा जाता है और पैरों में घुँघरू बांधा जाता है जिससे खन-खन की आवाज से लोग स्वयं आकर्षित हो जाते हैं।

(ब) महिला पंथी वेशभूषा :- महिलाओं की वेशभूषा सादगीपूर्ण होती है। वे श्वेत साड़ी धारण करती हैं। महिलाएँ भुजाओं में नांगमोरी, कमर में करधन, गले में कंठी माला व सिक्के की माला तथा हाथों में सफेद व हरी चुड़िया, ऐंठी, मस्तक पर तिलक का चंदन लगाती है। विवाहित स्त्रियाँ माँग में स्वेत चंदन लगाती हैं और पैरों में घुँघरू पहनती हैं। महिलाएँ बालों में केसाही व सफेद कागज के बने आकर्षक गजरे का उपयोग करती हैं। प्रायः महिलाएँ पंथी नृत्य में '' फुलकांस '' पीतल के लोटे को सिर पर रखकर संतुलन बनाकर नृत्य प्रस्तुत करती हैं। यह दृश्य अत्यंत मोहक होता है।

(6) गुरू घासीदास :- बाबा गुरू घासीदास का जन्म 18 दिसम्बर सन् 1756 पूस महीने में गिरौदपुरी नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता महंगूदास एवं माता अमरौतिन बाई थी। पत्नी सफुरा माता थी। सत्य, अहिंसा, धर्म, मानवता, सहिष्णुता, प्रेम और करूणा के साथ इनके सप्त सिद्धांत जो आज भी प्रासंगिक है इस प्रकार है :- 1.सत्यनाम पर विश्वास, 2. मूर्ति-पूजा मत करो, 3. जाति भेद के प्रपंच में मत पड़ो, 4. माँस भक्षण मत करो, 5. नशा सेवन मत करो, 6. अपराह्न में खेत मत जोतो, 7. पर स्त्री को माता जानो।

पंथी गीतों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना

सामाजिक या लोकचेतना ही राष्ट्रीय चेतना का बुनियाद होता है। सामाजिक चेतना के विकास में लोक गीतों की अहम् भूमिका रही है। पंथी गीतों का सामाजिक उन्नयन में इसकी विशेष भूमिका रही है। आज पंथी गीत एवं नृत्य देश-विदेश में प्रसिद्ध हो चुके हैं। पंथी गीतों में बाबा गुरू घासीदास के प्रेरक शिक्षाओें और उनके आदर्शों को सहेज कर रखे हुए हैं। पंथी गीतों में तात्कालीन युग के हास-उल्लास के रूपांकन की अपेक्षा उस युग की त्रासदी एवं उपेक्षा जनित पीड़ा का भाव अधिक है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि इसका प्रभाव व मूल्य उस युग तक सिमटकर रह गया। इसमें व्यक्त विचार और संदेश काव्य सत्य ही है। गुरू बाबा घासीदास के उपदेश काल सीमा में आबद्ध होकर मनुष्य एवं समाज का स्वरूप निर्धारित और उसकी उपादेयता स्थापित करने में मूल्यवान प्रमाणित हुआ है।

पंथी गीत एवं कुछ चित्र

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(अ) सत्य पर बल :- पंथी गीतों में निहित सत्य तत्व का वर्तमान संदर्भ में बहुत अधिक महत्व है। ''सत्यनाम'' का जो स्वरूप पंथी गीतों में प्रतिपादित है वह मानव प्रवृति को सत्यवचन, सत्कर्म एवं सत्य जीवन की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा देता है।

उदाहरण -

सतनाम सतपुरूष के नइये कोनो आकार।

मूरत के आकार में कहां समाही निराकार।।

(ब) नैतिकता पर बल :- पंथी गीतों में सत्य, अहिंसा औैर प्रेम सम्बंधी विचार वर्तमान परिस्थितियों में नैतिकता का मापदण्ड बन गया है। हमारी संस्कृति में अन्य बलों से नैतिक बल को अधिक शक्तिशाली माना गया है। गाँधी जी ने इन्हीं तत्वों को अंग्रेजी हुकूमत हटाने के लिए प्रमुख स्थान दिया था। इस आशय का संदेश पंथी गीतों में मिलता है -

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सत्य इबादत प्रभू डिग जावे, वही जीवन जन्नत पहुँचावै।

हिंसा पथ से दूर हटाया, सत्यनाम का झलक दिखावै।।

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(स) जाति प्रथा विरोध :- मानव एकता एवं विश्वबन्धुत्व की भावना पंथी गीतों में व्यक्त होता है। जाति-पाँति के भेदभाव का विरोध बाबा जी ने किया है -

मरगे जात बढ़ाई रे मनवा मरगे जात बढ़ाई

दस मास माता के गरभ मा रहिये, बीस मास कोनो नाहि

एक द्वार से सब कोई आये, तभो ले भेद बताई

रे मनवा मरगे जात बढ़ाई ।।

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(द) मानवीय अत्याचार को प्रतिबंधित करने का प्रयास बाबा गुरू घासीदास ने किया है। सतनाम में प्रत्येक मनुष्य को एक माना है। यथा -

सच पूछो तो मानुष एक जाति होती है।

जति-पाँति से समाज का विनाश होता है।।

आवे समझ तो जाति भेद तोड़ो।

कहती है मानवता मेल भाव जोड़ो।।

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(ध) नारी सम्मान :- पंथी गीतों में नारी को देवी रूप में श्रद्धा, करूणा, प्रेम, दया आदि भावों से मण्डित करके प्रतिष्ठित किया गया है। नारी के विभिन्न रूप माता, बहन, पत्नी के रूप में मिलता है। इस तरह नारी को सबल बनाने, अस्तित्व के आंकलन के लिए, पुरूषों को उसकी अस्मिता के पहचान के लिए, नारी चेतना के लिए उपयुक्त प्रतीत होता है। यथा -

नारी हे देवी, नारी हवै जननी अउ नारी हे महान।

नारी बिना नर हे अधुरा, जानत हे सकल जहान।।

पंथी गीतों की उपादेयता एवं महत्व :-

पंथी लोक गीत होते हुए भी कविता की सामग्री अपने में निहित किए हुए हैं। पंथी गीतों की यही विशेषता सामाजिक भावना और चेतना के लिए नई दिशा देती है कि अनुभूति एवं अभिव्यक्ति सुसंस्कृत एवं उच्च वर्गीय लोगों की बपौती नहीं है। अभिव्यक्ति को सौन्दर्य मण्डित करने की कला से लोक मानस भी पूर्ण परिष्कृत है। इस प्रकार पंथी लोक जीवन का ऐसा रचना है जिसमें भावों की सरिता, जीवन के संकल्प , कर्म की प्रधानता और लोक मंगल का स्वप्न है। इसमें अमृत धारा (जीवनधारा) है तो अलंकारों की मधुर झंकार भी है, दर्शन का सच्चा काव्य है तो गान की मर्मस्पर्शी उच्च भूमि भी है। पंथी गीतों में अतीत के दृश्य पटल में वर्तमान के संघर्षों का रंग-बिरंगा रेखाचित्र है। लोक जीवन की आत्मीय पहचान के लिए छत्तीसगढ़ का समस्त सांस्कृतिक भाव व्यापार इसमें निहित है। सतनाम पंथ द्वारा रचित भजन, गीत और गुरू घासीदास के प्रति निःसृत सद् भावनाएँ ही पंथी गीत का आवरण धारण करती है। छत्तीसगढ़ लोक गीत की एक जातीय विधा लोक भजन तथा लोक गीत की पृथक शैली है जिसमें पंथी गीतों का महत्वपूर्ण स्थान है। बाबा के द्वारा बताये गये सत्य, अहिंसा, धर्म, मानवता, सहिष्णुता, करूणा एवं भाईचारा का भावना आज समाज में परिलक्षित होता है।

उपसंहार :- छत्तीसगढ़ के लोक साहित्य में पंथी गीतों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। लोक साहित्य में गीत, नृत्य, मंगल, भजन एवं कीर्तन, पण्डवानी, नाचा, गम्मत, लीला में जो स्थान कबीरदास का है वही स्थान छत्तीसगढ़ में बाबा गुरू घासीदास का भी है। गुरू बाबा का सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना के विकास में सराहनीय योगदान है। गुरू घासीदास एक महामानव थे जिनमें मानवता, प्रेम, दया, करूणा, समता, सामाजिक समरसता भरी पड़ी थी। बाबा गुरू घासीदास सभी जीवों को समाज समझते थे। इसलिए समतामूलक समाज व्यवस्था की नींव डाली थी। पंथी गीतों में निहित सत्य तत्व, अहिंसा तत्व, एकता सम्बंधी विचार, जाति सम्बंधी विचार, ईश्वर समन्वय, नारी चित्रण, सतनाम सम्बंधी विचार, लोक मंगल की भावना पंथी गीतों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना आज भी प्रासंगिक है।

संदर्भ :-

(1) सतनाम रहस्य, डॉ0 जे0 आर0 सोनी, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग बिलासपुर द्वारा प्रकाशित, पृष्ठ - 256, 257, 258।

(2) छत्तीसगढ़ के पंथी गीत और बाबा गुरू घासीदास, लघु शोध प्रबंध, लेखिका श्रीमती सुप्रभा झा, पृष्ठ - 33, 34, 35 ।

(3) सत्य प्रभात (अंक 2), डॉ0 आई0 आर0 सोनवानी, सत्यदर्शन राष्ट्रीय साहित्य एवं शोध संस्थान, भिलाई-दुर्ग छत्तीसगढ़, पृष्ठ - 36, 37, 38 ।

(4) तपश्चर्या एवं आत्मचिंतन गुरू घासीदास, डॉ0 बलदेव प्रसाद, जयप्रकाश मानस, रामशरण टण्डन, पृष्ठ - 161, 162, 163 ।

(5) पंथी गीत एवं राष्ट्रीय चेतना, डॉ0 जे0 आर0 सोनी, गुरू घासीदास साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, न्यू राजेन्द्र नगर रायपुर (छ0ग0), पृष्ठ - 66, 67, ।

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