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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 प्रविष्टि क्र. 8 - सत्यवती : सीताराम पटेल 'सीतेश'

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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020

प्रविष्टि क्र. 8 -

सत्यवती

सीताराम पटेल 'सीतेश'


पात्र परिचय

सुधन्वा : एक राजा

दाशराज : निषाद राज

सत्यवती : योजनगंधा/ मत्स्यगंधा

पराशर मुनि : एक मुनि

बालक / वेदव्यास : सत्यवती का पुत्र

शान्तनु : हस्तिनापुर का राजा

देवव्रत/ भीष्म : शान्तनु का पुत्र

अंबिका : सत्यवती की पुत्र विचित्रवीर्य की पत्नी

परिश्रमी : अंबिका की सखी


अंक : 1 (योजनगंधा)

दृश्य : 1

स्थान : सुधन्वा का महल

(दाशराज जुड़वा बच्चे को लेकर आता है।)

दाशराज : दण्डवत महाराज।

सुधन्वा : दाशराज आज उल्टी गंगा कैसे बहा रहे हो?

दाशराज : समझा नहीं महाराज?

सुधन्वा : आज मछली की जगह टोकरी में बच्चे लाये हो।

दाशराज : महाराज, आज तो गजब हो गया।

सुधन्वा : क्या गजब हो गया, पहेलियां मत बुझाओ, जल्दी जल्दी बताओ?

दाशराज : महाराज, आज सुबह यमुना नदी में जाल खेलने गया, तो वहाँ मछली की जगह टोकरी फँसा, उसमें ये युग्मज बच्चे मिलते हैं, मुझे एकाएक विश्वास नहीं हुआ, इनकी सौन्दर्य को देखकर मैं ठगा सा रह गया, फिर मैं इन्हें आपके पास ले आया।

सुधन्वा : तुम्हारी वचन सत्य है, दाशराज। ये शिशु बहुत खूबसूरत है।

दाशराज : फिर मैं इन युग शिशु सुमनों को तुम्हें समर्पित करता हूँ, महाराज।

सुधन्वा : पर दाशराज, मुझे वंश चलाने के लिए बालक की आवश्यकता है,बालिका की नहीं ।

दाशराज : पर महाराज, बालक और बालिका में इतना अंतर क्यों?

सुधन्वा : तुम नहीं समझोगे, दाशराज, बालिका के पालन पोषण में एक राजा को कितना कष्ट उठाना पड़ता है।

दाशराज : हमारे यहाँ तो बालक और बालिका में कोई भेद नहीं करते, कश्ती चालन, मत्स्य आखेट की शिक्षा दोनों को समान रूप से दी जाती है।

सुधन्वा : तुम नहीं समझोगो, दाशराज, यह आकाश में उड़ने वाले और जल में जीविका चलाने वाले के बीच का अन्तर है।

दाशराज : समझ गया महाराज, ये खाई हर युग में रहेगी। महाराज आप चाहते हैं बालक, ले लीजिए, मैं बालिका को अपने साथ ले जा रहा हूँ।

(पर्दा गिरता है।)


दृश्य : 2

स्थान : यमुना का किनारा

कुटिया में दाशराज खाना खा रहे हैं। पराशर मुनि आते हैं।

पराशर मुनि : मुझे उस पार पहुँचा दो, दाशराज।

दाशराज : (खाते हुए) मुनि, मैं अभी खा रहा हूँ, हाँ आपको मेरी पुत्री उस पार पहुँचा देगी। पुत्री सत्यवती।

सत्यवती : (आकर कहती है) क्या है पिताजी?

दाशराज : पुत्री, इन मुनि को नाव में बैठाकर यमुना नदी के उस पार पहुँचा दो।

सत्यवती : चलिए महाराज, आज हम आपको उस पार पहुँचा देते हैं।

पराशर मुनि : (आकर्षित भाव से) चलिए।

( दोनों नाव के पास आते हैं)

सत्यवती : चलिए मुनि महाराज ।

(पराशर मुनि उसे निर्निमेष देखते रहते हैं।)

सत्यवती : चलिए मुनि महाराज । नाव में बैठिए।

पराशर मुनि : आँ, हाँ। चलिए।

(पराशर मुनि नाव में बैठते हैं, सत्यवती नाव खेने लगती है। पराशर मुनि आहिस्ता उठकर उसके समीप आते हैं, अपने दाहिने हाथ से उसके दाहिने हाथ को सहलाते है।)

सत्यवती : मुनि महाराज, जो मेरे साथ कर रहे हैं, क्या वह ठीक है, एक मुनि होकर आपका कामांध होना उचित है।

पराशर मुनि : मुनि, मुनि, मुनि, तुम क्या कह रही हो, सुन्दरी, क्या मुनि का मन नहीं होता है?

सत्यवती : होता है, पर वो मन को जीते रहते हैं, मन से परे होते हैं, तभी तो वो मुनि होते हैं।

पराशर मुनि : मैं मन को नहीं जीत पाया हूँ, अभी मेरा मन तुम्हारे सौन्दर्य का पिपासा है, मेरे प्यासा मन का प्यास बुझा दो सुन्दरी ।

सत्यवती : तुम्हें कुंवारी कन्या से ऐसे कहते हुए थोड़ा सा भी संकोच नहीं हो रहा है, मुनिबर।

पराशर मुनि : इसमें संकोच की क्या बात है, सुन्दरी, तुम सुन्दरी हो और मैं सुन्दर हूँ, हमारा तुम्हारा योग प्रकृति चाहती है, इसलिए हमारा तुम्हारा इस नाव में संयोग हुआ है।

सत्यवती : तुम ब्राह्मण हो मुनिवर और मैं अछूत कन्या हूँ।

पराशर मुनि : तुम किस जमाना की बात कर रही हो सुन्दरी, मैं पुरुष हूँ और तुम स्त्री हो। सृष्टि ने दो ही वर्ग बनाया है, एक नर और दूसरा मादा, दोनों के योग से ही सृष्टि का संचालन होता है।

सत्यवती : ईश्वर का संसार में मनुष्य सबसे सुन्दर रचना है, उसमें ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है। मुझ मत्स्यगंधा के कौन सी गुण को देखकर मेरी ओर आकर्षित हो रहे हैं।

पराशर मुनि : मैं नहीं जानता, तुम्हारी कौन सी गुण है, जो मुझे आकर्षित कर रही है। पर तुमसे मिलने को मेरा मन मचल रहा है।

( उसका दाहिने हाथ को जोर पकड़ लेता है। सत्यवती उसे प्यार से छुड़ाती है।)

सत्यवती : मुनिवर! आप कुछ धैर्य धारण करें, मैं अभी उस पार ले चलती हूँ।

( पराशर मुनि उसे निर्निमेष निहार रहे हैं, फिर दोनों उस पार पहुंचते ही उसे अपने बाँहों में समेट लिया।)

सत्यवती : मुनिवर! मेरे बदन से दुर्गन्ध निकल रहा है, और आपको मुझसे घृणा नहीं हो रही है। समान रूप वालों के बीच ही परस्पर संबंध आनंद दायक होता है।

( पराशर मुनि मंत्र फूंककर उसे मत्स्यगंधा से योजनगंधा बना देते हैं।)

पराशर मुनि : अब तो खुश हो सुन्दरी ।

सत्यवती : मुनिवर! मेरे पिताजी उस किनारे से हमें देख रहे हैं।

पराशर मुनि : सुन्दरी, वे खाने में मग्न है, वे हमें नहीं देख रहे हैं।

सत्यवती : मुनिवर! हम पशु नहीं है। जब तक रात नहीं हो जाती, तब तक इंतजार कीजिए।

पराशर मुनि : मैं इंतजार नहीं कर सकता सुन्दरी, मैं योग के बिना बिन जल मीन सा तड़फ रहा हूँ।

सत्यवती : अभी दिन में हमें कोई भी देख सकता है। मुनिवर! अब आपकी जैसी इच्छा हो, वैसी करें, लोकनिंदा अत्यन्त कष्टकारी होती है।

पराशर मुनि : तुम ठीक कह रही हो सुन्दरी । अभी मैं दिनकर को बादल से ढंककर रजनीकर बनाता हूँ।

( पराशर मुनि मंत्र पढ़कर बादल लाते हैं। परस्पर दोनों के सिवा वहाँ दूसरे नहीं दिखाई देते हैं।)

सत्यवती : मुनिवर! मैं अभी कन्या हूँ, आप मेरे साथ संबंध बनाकर चले जायेंगे। तब मैं क्या करूँगी, बताइये मुनिवर! यदि मैं गर्भवती हो गई, तो पिताजी को क्या उत्तर दूँगी।

पराशर मुनि : सुन्दरी! तुम मुझसे संबंध बनाकर भी कन्या ही रहोगी। सुन्दरी! तुम मुझसे जो भी वर मांगना चाहती हो, माँग लो। तुम्हें देने में मुझे अति खुशी होगी।

सत्यवती : मुनिवर! आप मुझे ऐसा वरदान दीजिए, जिससे मेरे माता-पिता इसे जान न सके। आप ऐसा करें, जिससे मैं अक्षता बनी रहूँ। हमारे योग से जो पुत्र पैदा हो, वह आपके समान अपूर्व ओजस्वी हो। मेरी यह सुगंध सदा बनी रहे और मेरा यौवन नित नूतन बना रहे।

पराशर मुनि : तुम्हारा पुत्र तीनों लोकों में विख्यात होगा और वेदों पुराणों के रचयिता होगा।

(सत्यवती और पराशर मुनि का मिलन होता है। सत्यवती तत्काल गर्भवती हो जाती है।)

पराशर मुनि : मैं देवयोग से तुम्हारे ऊपर आकर्षित हुआ हूँ, सुन्दरी! मुझे ऐसा मोह पहले कभी नहीं हुआ था, परियों को देखकर भी नहीं हुआ था, मैं तुम्हारे मछराईन गंध पर आज मोहित हो गया।

सत्यवती : अब मैं पिताजी को कैसे मुँह दिखाऊँगी।

पराशर मुनि : इसका तुम कोई विशेष कारण समझो, विधाता हमें कोई विशेष कारण से मिलाया है।

(पर्दा गिरता है।)


दृश्य :3

स्थान : यमुना द्वीप

(सत्यवती पुत्र को जन्म देती है। जन्म लेते ही बालक बोलने लगा)

बालक : माँ, मुझे जन्म लेने के लिए विधाता ने तुम्हारी ही गर्भ चुना, जिससे मैं धन्य हो गया, माँ, आप जैसे माँ पाकर, पर मुझे अपने पिताजी के समान बहुत से कार्य करने हैं, अब आप अपनी इच्छानुसार कहीं भी चली जाएँ और मैं भी तप करने के लिए जा रहा हूँ।

सत्यवती : तुम अपनी माँ को त्यागकर नहीं जा सकते पुत्र।

बालक : माँ, मेरा जन्म ही तप के लिए हुआ है और मेरे कारण तुम्हारी बदनामी होगी, इसीलिए मैं जा रहा हूँ माँ।

सत्यवती : पर पुत्र, एक माँ का मानस ये सह नहीं पायेगी।

बालक : तुम्हें सहन करना होगा, माँ! तुम मुझे जब भी याद करेगी, तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा। इसमें हम दोनों का कल्याण है, माँ! आज्ञा दें।

सत्यवती : परहित कार्य के लिए तुम्हें नहीं बाँधूगी, पुत्र! जा जहां भी जा, अपने पिताजी के नाम को रोशन करना।

( बालक सत्यवती का पाँव छूकर चला जाता है।)

(पर्दा गिरता है।)

दृश्य :4

स्थान : यमुना नदी के किनारा

(शान्तनु सुगंध से मदहोश होकर आ रहा है।)

शान्तनु : ये सुगंध कहाँ से आ रही है, इस सुगंध में मैं मदहोश हो रहा हूँ, ये सुगंध न मदार की है, न कस्तूरी की है, न मालती की है, न चंपा की है, न केतकी की है, मैं ऐसे अनुपम सुगंध का पहले कभी अनुभव नहीं किया हूँ, सुन्दर पवन प्रवाहित हो रही है, मेरे मानस मनीषा को मुग्ध कर देने वाली पवन कहाँ से आ रही है?

(यमुना नदी के किनारे सत्यवती को देखता है। वह आश्चर्य चकित हो जाता है।)

शान्तनु : ये सुगंध इसी लड़की की शरीर से आ रही है। यह कौन है और इस समय यह कहाँ से आई है? यह कोई देवांगना है या मानवी स्त्री, यह कोई गंधर्व कन्या है या नागकन्या है? मैं इस सुगंधा के विषय में कैसे जानकारी प्राप्त करूँ।

( उसके समीप जाकर कर पूछते हैं।)

शान्तनु : सुगंधा! तुम कौन हो

? किसकी पुत्री हो?

सत्यवती : मैं निषादकन्या हूँ, दाशराज की पुत्री हूँ।

शान्तनु : सुगंधा! तुम इस निर्जन वन में क्यों बैठी हो?

सत्यवती : मैं जल में यह नौका चलाती हूँ।

शान्तनु : सुगंधा! क्या तुम अकेली ही हो?

सत्यवती : हाँ, पिताजी अभी ही घर गये हैं।

शान्तनु : तुम विवाहिता हो या कुमारी?

सत्यवती : तुम्हें देखकर नहीं जान रहे हो?

शान्तनु : सुगंधा! पहेली न बुझाओ, मुझे जल्दी जल्दी बताओ।

सत्यवती : मैं अविवाहिता हूँ। अपने पिता की आज्ञा में रहने वाली कन्या हूँ। राजन्!

शान्तनु : मैं कुरुवंशी वीर हूँ, तुम मुझे अपना पति बना लो। मेरी कोई दूसरी पत्नी नहीं है, सुगंधा! तुम मेरी धर्मपत्नी बन जाओ। मैं सदा के लिए तुम्हारा दास बन जाऊँगा। मेरी पत्नी गंगा मुझे त्याग कर चली गई है। सुगंधा! तुम्हें देखकर मेरा मन वश में नहीं रह गया है।

सत्यवती : राजन! आपने मुझसे जो कहा, वो सही है, किन्तु मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। मेरे पिताजी ही मुझे दे सकते हैं, अतएव उन्हीं से मुझे माँगिए। मैं स्वेच्छाचारिणी नहीं हूँ, मैं सदा बड़ों का आदर करती हूँ, मेरे पिताजी के अनुसार सब काम करती हूँ, यदि मेरे पिताजी मुझे आपको देना स्वीकार कर लें, तब आप मुझसे विवाह कर लें, मैं सदा के लिए आपके अधीन हो जाऊँगी।

शान्तनु : हाँ, हाँ, जाऊँगा, सुगंधा! तुम्हारे पिताजी से तुम्हें माँगने तुम्हारे घर जाऊँगा।

(पर्दा गिरता है।)


दृश्य :5

स्थान : दाशराज का घर

(शान्तनु आते हैं, उसको देखकर दाशराज हाथ जोड़कर कहता है।)

दाशराज : महाराज! आप मेरी कुटिया में पधारे, हमारे तो भाग्य जग गये, मैं आपके दास हूँ, आपके आगमन से मैं कृतकृत्य हो गया। महाराज! आप जिस कार्य के लिए आए हैं, मुझे आज्ञा दीजिए।

शान्तनु : मैं घूमा फिराकर बात करना नहीं जानता, आपकी कन्या पर मेरा दिल आ गया है, मैं उसे अपनी धर्मपत्नी बनाना चाहता हूँ।

दाशराज : कन्या तो पराया धन ही होती है, महाराज! मैं उसे आपको दूँगा, पर मेरा एक शर्त है महाराज!

शान्तनु : कौन सी शर्त है, दाशराज, जिसे राजा पूरा नहीं कर सकता है।

दाशराज : महाराज! हर पिता अपनी कन्या के लिए अच्छा घर और अच्छा वर चाहता है। आपके घर से अच्छा मुझे घर नहीं मिल सकता है और न आपसे अच्छा वर मिल सकता है, मेरे शर्त है कि इस कन्या का पुत्र ही आपके बाद राजगद्दी पर बैठेगा।

(शान्तनु गंगा पुत्र देवव्रत का स्मरण कर चुप हो गए।)

दाशराज : चुप हो गए, महाराज।

(शान्तनु चुपचाप चले जाते हैं।)

(पर्दा गिरता है।)


दृश्य : 6

स्थान : दाशराज का घर

( युवराज देवव्रत आते हैं, दाशराज और सत्यवती घर पर हैं, उसको देखकर दाशराज हाथ जोड़कर कहता है।)

दाशराज : युवराज! आप किस कार्य के लिए पधारे हैं, बताइए?

देवव्रत : आपकी कन्या मेरी माता बने, इसलिए मैं आपकी कन्या को मेरे पिताजी के लिए माँगने आया हूँ। मैं इनका सेवक रहूँगा।

दाशराज : युवराज! आप स्वयं इसे अपनी सहधर्मिणी बनाइए, क्योंकि आपके रहते इसका पुत्र राजा नहीं हो सकेगा।

देवव्रत : आपकी कन्या मेरी माता है, मैं राजा नहीं बनूँगा। इसका पुत्र ही राजा बनेगा।

दाशराज : मैंने आपकी बात सही मान ली, परन्तु आपका पुत्र बलवान हुआ तो वह बलपूर्वक राज्य को निश्चय ही ले लेगा।

देवव्रत : मैं गंगा का आठवाँ पुत्र देवव्रत प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजन्म विवाह नहीं करूँगा।

दाशराज : तुम्हारा वचन भीष्म है, युवराज! आज से तुम भीष्म कहे जाओगे, मेरी पुत्री सत्यवती तुम्हारी माता हुई।

(पर्दा गिरता है।)


अंक : 2 (नियोग)

दृश्य : 1

स्थान : राजमहल

( आज सत्यवती सोच में पड़ी है।)

सत्यवती :(मन ही मन) रूप और गंध अगर स्त्री में है, तो कोई भी पुरुष उसकी ओर आकर्षित हो सकता है। स्त्री का रूप ही उसका सबसे बड़ा धन है। अगर मैं रूपवती नहीं होती, तो क्या मेरी ओर पराशर मुनि आकर्षित होते, उन्हें मेरा मछराईन गंध भी अच्छा लगा, रूप से ही वे मेरी ओर आकर्षित हुए। भ्रमर रूप रस का पान करके नौ दो ग्यारह हो गया और मेरे बदन के बदबू को सुगंध में परिवर्तित कर दिया। मैं सुन्दरी से सुगंधा हो गई, मेरी सुगंध को सूंघकर हस्तिनापुर के महाराजा शान्तनु मेरी ओर आकर्षित हुए। एक निषाद कन्या को अपना हृदय समर्पित कर दिया और उसे महारानी बना दिया। मुनि के लिए मैं सुन्दरी थी, तो महाराजा के लिए सुगंधा बन गई। एक से मैं अविवाहित होकर वेद को पुत्र रूप में पाई, फिर उसे त्याग दी, तो दूसरे से दो पुत्र पाई, चित्रांगदा और विचित्रवीर्य। मेरा सौतेले बेटे गंगा पुत्र भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा खूब निभाई। उसने मेरे पुत्र चित्रांगद को राजा बनाया। उसका मंत्री बनकर उसकी रक्षा करता रहा, पर नियति को कुछ और मंजूर था, मेरा पुत्र गंधर्व के हाथों मारा गया। दूसरा पुत्र विचित्रवीर्य राजसिंहासन पर विराजमान हुआ। उसकी परिणय के लिए भीष्म ने अंबा, अंबिका, अंबालिका का हरण कर लाया। अंबा अपना हृदय शाल्व को दे दी थी, इसलिए उसे स्वतंत्र कर दिया। पर अंबिका और अंबालिका विचित्रवीर्य की रानी बना दी, उसने योग के बिना भोग किया, इसलिए राजयक्ष्मा का रोग लिया। असमय ही वह काल कलवित हो गया, हे भगवान! हमारे वंश की वृद्धि कैसे हो?

(भीष्म आता है।)

भीष्म : माताश्री, आप किस सोच में पड़ गई।

सत्यवती : पुत्र, मैं सोच रही थी, इतनी बड़ी साम्राज्य का कौन उत्तराधिकारी होगा। पुत्र मेरा कहना मान, तू अंबिका से पुत्र पैदा कर, जिससे हमारा वंश चले।

भीष्म : माताश्री! तुम तो जानती है, मैंने आपके पिताजी के सामने वचन लिया है कि मैं आजन्म ब्रह्मचारी रहूंगा। माताश्री! मैं वंश को कैसे आगे बढा सकता हूँ, माताश्री! तुम नियोग द्वारा वंश वृद्धि कर सकती हो।

(पर्दा गिरता है।)


दृश्य : 2

स्थान : राजमहल

( सत्यवती अपने पुत्र वेदव्यास को याद कर रही है।)

सत्यवती : तुमने कहा था पुत्र! जब भी मैं किसी संकट में रहूँ और तुम्हें याद करूँ, तो तुम तुरंत आ जाओगे, पुत्र वेद! आज मुझे तुम्हारी आवश्यकता है।

(वेदव्यास आता है।)

वेदव्यास : प्रणाम माताश्री!

सत्यवती : युग युग जीओ, पुत्र! अभी मैं तुम्हें याद कर रही थी और तुम आ गये।

वेदव्यास : कैसे याद कर रही थी। माताश्री!

सत्यवती : पुत्र! तुम तो अपनी माँ की मन की बात जान लेते हो। पुत्र! आज राजसिंहासन खाली पड़ा हुआ है।

वेदव्यास : मैं कुछ नहीं समझा, माताश्री!

सत्यवती : मेरे दोनों पुत्र असमय काल के गाल में समा गए। वंश वृद्धि के लिए मुझे तुम्हारी मदद चाहिए, पुत्र!

वेदव्यास : मुझे आज्ञा दें, माताश्री! मैं क्या करूँ?

सत्यवती : पुत्र, तुम अंबिका से नियोग कर पुत्र पैदा करो।

वेदव्यास : माता का आज्ञा का पालन करना हर पुत्र का कर्तव्य है, माताश्री! निश्चित समय पश्चात् आप अंबिका को मेरे पास भेजिएगा।

(पर्दा गिरता है।)


दृश्य : 3

स्थान : राजमहल

( सत्यवती स्त्री जीवन को सोच रही है।)

सत्यवती : वंश संचालन! वंश संचालन! बस एक यही चिंता सता रही है। विधवा से नियोग के द्वारा संतान की उत्पति की चाह कर रही हूँ।

(वेदव्यास आते हैं।)

वेदव्यास : प्रणाम माताश्री!

सत्यवती : चिरंजीवी हो, पुत्र!

वेदव्यास : अंबिका से जो पुत्र होगा, वह नेत्रहीन होगा, माताश्री!

सत्यवती : मैं कुछ भी समझ नहीं पायी, पुत्र!

वेदव्यास : माताश्री! मेरे रूप को देखकर अंबिका ने अपनी आँखें उसी प्रकार बंद कर ली, जिस प्रकार रात्रि में कमल अपनी पंखुरी बंद कर लेता है।

सत्यवती : इससे उसके पुत्र के अँधे होने का क्या संबंध है, पुत्र!

वेदव्यास : माताश्री! तुम भलीभाँति जानती हो, पुत्र का शारीरिक और मानसिक गुण अपने माता-पिता से आते हैं। शारीरिक संबंध के समय उनके मन में जो भाव होते हैं, वही भाव लेकर पुत्र की उत्पत्ति होती है। माताश्री! अंबिका ने लज्जा से या फिर घृणा से अपनी नयन बंद कर ली थी, उसका संबंध प्रेम या कर्म से कतई भी नहीं था। पुत्र की उत्पत्ति भी इसी प्रकार से होगा और इसका नाम धृतराष्ट्र होगा।

सत्यवती : पुत्र! एक अँधा व्यक्ति कैसे शासन चला सकता है। शासन चलाने के लिए आँख की आवश्यकता पड़ती है, पुत्र!

वेदव्यास : हाँ, माताश्री! एक आदर्श शासक की आँखें अवश्य होने चाहिए। आँखें के बिना वह अपनी प्रजा के सुख-दुःख को कैसे जान पायेगा।

सत्यवती : फिर क्या होगा, पुत्र?

वेदव्यास : और मैं क्या ही कर सकता हूँ, माताश्री! संतान उत्पत्ति के लिए माता-पिता का तन-मन प्रफुल्लित होना चाहिए। तभी एक स्वस्थ संतान की उत्पत्ति होती है।

सत्यवती : एक उपाय और है, पुत्र!

वेदव्यास : वो कौन सी है, माताश्री?

सत्यवती : तुम छोटी रानी अंबालिका के साथ नियोग करो, जिससे हमारे हस्तिनापुर के लिए योग्य शासक मिले।

वेदव्यास : माताश्री! अंबालिका को थोड़ा पढ़ा-लिखा कर मेरे पास भेजिएगा, जिससे वो भी अंबिका के समान गलती न करे। माता-पिता के गलती का परिणाम पुत्र को भुगतना पड़ता है।

सत्यवती : तुम सही कह रहे हो, पुत्र! अंबालिका को मैं जरूर पढ़ा-लिखा कर भेजूँगी। अंबिका के समान वो भी कोई गलती न करे।

वेदव्यास : संतान प्राप्ति के लिए तन का योग जरूरी है, पर एक स्वस्थ संतान के लिए तन-मन का योग जरूरी है।

(पर्दा गिरता है।)


दृश्य : 4

स्थान : राजमहल

(सत्यवती सोच में डुबी हुई है।)

सत्यवती : देखें, अंबालिका हस्तिनापुर को योग्य शासक दे सकती है कि नहीं?

(वेदव्यास आते हैं।)

वेदव्यास : प्रणाम माताश्री!

सत्यवती : खुश रहो पुत्र!

वेदव्यास : माताश्री! नियति हमारे साथ क्या खेल, खेल रही है, समझ नहीं पा रहा हूँ।

सत्यवती : पुत्र! अंबालिका से भी कहीं कुछ गलती हो गई?

वेदव्यास : हाँ, माताश्री! डर के मारे उसका सारा शरीर पीला पड़ गया था।

सत्यवती : तो अब क्या होगा, पुत्र?

वेदव्यास : माताश्री ! इससे जो भी संतान उत्पन्न होगा, वह रोगग्रस्त होगा, उसका नाम पांडु होगा।

सत्यवती : तो क्या ये भी शासन चलाने वाला शासक नहीं बनेगा।

वेदव्यास : बनेगा, माताश्री! पर यह अल्पायु होगा।

सत्यवती : पुत्र, फिर तो अंबिका को एक बार और राजी करना पड़ेगा। उसे समझाकर भेजना पड़ेगा कि पहले जैसे गलती न करे।

वेदव्यास : माताश्री! मेरी उत्पत्ति ही आपके कार्य संपादन के लिए हुआ है। मैं तो अपना कार्य सही ढंग से संपादन कर रहा हूँ, प्रभु अपने भक्तों को लाने के लिए न जाने कौन सी लीला रच रहे हैं।

(पर्दा गिरता है।)


दृश्य : 5

स्थान : राजमहल

(अंबिका और परिश्रमी बातचीत कर रहे हैं।)

अंबिका : सखी परिश्रमी, सासू माँ, स्त्री होकर भी स्त्री के हृदय के भावना को नहीं समझ पा रही है।

परिश्रमी : मैं कुछ नहीं समझ पाई रानीजी।

अंबिका : कोई भी नारी, बिना प्रेम के परपुरुष को अपना शरीर कैसे सौंप सकती है?

परिश्रमी : नारी और रानी में बहुत अंतर है, रानीजी?

अंबिका : तो क्या रानी, नारी नहीं होती है?

परिश्रमी : होती है, रानीजी! पर पहले वह रानी होती है। उसे अपने भावना को मारकर कर्तव्य का निर्वहन करना पड़ता है।

अंबिका : प्रेम के बिना बार-बार कर्तव्य का निर्वहन कैसे करूँ, सखी! उस वीभत्स पुरुष से मिलन करना मुझे तनिक भी अच्छा नहीं लगता है।

परिश्रमी : पर महारानीजी का काज तो करना ही पड़ेगा, रानीजी!

अंबिका : पड़ेगा, सखी! पर मैं उसे फूटी आँखें भी देखना पसंद नहीं करती, सबसे पहले तो उसे मेरे आँखों ने देखना पसंद नहीं किया। मैंने अपनी आँखें बंद कर ली। हृदय भी उसे थोड़ा सा भी पसंद नहीं कर रहा था। वह मेरे तन पर बलात्कार करता रहा, सखी, जो मेरा संतान हुआ है, उसी बलात्कार का परिणाम है।

परिश्रमी : नारी के दर्द का पहचान एक नारी को होना चाहिए। तो शासक इनसे परे होते हैं।

अंबिका : मेरा कहना तू मानेगी, सखी!

परिश्रमी : एक दासी को तुमने सखी का दर्जा दिया, क्या वो कम है। परिश्रमी अपना कर्तव्य जानती है, रानीजी! रानी का हर आज्ञा का पालन करना दासी का कर्तव्य है।

अंबिका : तो तुझे मैं आज्ञा देती हूँ, तुम उस पुरुष के पास जाओ और मेरी सासू माँ की आज्ञा का पालन करो।

परिश्रमी : पर मैं कैसे जा सकती हूँ, रानीजी! ये आप लोगों का निजी मामला है, एक दासी उसे कैसे संपन्न कर सकती है, रानीजी? राज्य के संचालन के लिए दासी का संतान का नहीं, रानी की संतान की आवश्यकता है, रानीजी!

अंबिका : परिश्रमी सखी! तुममें कौन सी रानी के गुण नहीं हैं, हम दोनों बचपन के सहेली हैं, किस्मत की बात है तुम दासी हो और मैं रानी हूँ।

परिश्रमी : बचपना तो बचपन के साथ खत्म हो गई, रानीजी! मैं अतीत में नहीं जीती, रानीजी! वर्तमान में जीती हूँ, इसलिए मस्त हूँ। मैं भलीभाँति जान रही हूँ, तुम रानी हो और मैं तुम्हारी अदना सा दासी।

अंबिका : तुममें वो सारी गुण है, जो मुझमें है। फर्क बस इतनी सी है कि मैं राजमहल में पैदा हुई और तुम एक झोपड़ी में।

परिश्रमी : झोपड़ी और राजमहल का फर्क मुझे पता है, रानीजी! मुझे मेरी औकात में रहने दीजिए।

अंबिका : तो तुम अपनी रानी की आज्ञा का पालन नहीं करोगी?

परिश्रमी : पालन करूँगी, अच्छी तरह करूँगी, पर तुम भी वही गलती नहीं कर रही हो, जो गलती महारानी जी ने किया।

अंबिका : मैं नहीं समझ पाई।

परिश्रमी : बढ़िया लगे तो गप गप, खराब लगे तो थू थू । अगर उसे आपके हृदय चाहते, तो मुझे उसके पास भेजती।

अंबिका : ( क्रोधित होकर) तुम अपनी हद से आगे बढ़ रही हो, परिश्रमी!

परिश्रमी : आप तो एकदम से नाराज हो गई, रानीजी!

अंबिका : नाराज नहीं होऊँगी तो हँसूंगी, तुम मेरी सबसे अच्छी सहेली हो, इसीलिए तुम्हें वहाँ भेज रही हूँ।

परिश्रमी : समझ गई, रानीजी ! आपने जो कार्य मुझे सौंपा है, उसे मैं तन-मन लगाकर पूरा करूँगी।

अंबिका : मुझे तुमसे ऐसी ही उम्मीद थी, सखी।

परिश्रमी : पर वो लोग नाराज हो गये तो?

अंबिका : वो कौन?

परिश्रमी : महारानी और मुनि

अंबिका : महारानी जी को मैं सँभाल लूँगी, मुनि को तुम संभाल लेना।

परिश्रमी : ठीक है, रानीजी!

(पर्दा गिरता है।)


दृश्य : 6

स्थान : राजमहल

( सत्यवती ध्यान मग्न बैठी है। वेदव्यास आते हैं।)

वेदव्यास : प्रणाम माताश्री!

सत्यवती : जीते रहो, पुत्र !

वेदव्यास : माताश्री! इस समय जो संतान होगा, वह सर्व सम्पन्न गुणधारी होगा।

सत्यवती : पुत्र! मैं तुम्हारा आभारी हूँ, मैं तुम्हारा अहसान जिन्दगी भर नहीं भूलूंगी।

वेदव्यास : माताश्री, पुत्र कोई अहसान नहीं करता, माँ का कहना मानना, हर पुत्र का कर्तव्य होता है। वो तो मेरा कर्तव्य था। माताश्री! अंबिका ने फिर से गलती कर दी।

सत्यवती : इस बार उसने कैसी गलती की और अभी-अभी तुम कह रहे थे, संतान सर्वगुण सम्पन्न होगा।

वेदव्यास : माताश्री! संतान अंबिका के कोख से नहीं होगा।

सत्यवती : ये तुम क्या कह रहे हो, पुत्र? मैं नहीं समझ पाया।

वेदव्यास : मैं सत्य कह रहा हूँ, माताश्री! संतान सर्वगुण सम्पन्न होगा, पर उसकी सखी परिश्रमी के कोख से होगा।

सत्यवती : ऐसे कैसे हुआ?

वेदव्यास : अंबिका ने अपनी जगह अपनी सखी को मेरे पास भेजा था। इस सर्वगुण सम्पन्न संतान का नाम होगा- विदुर

सत्यवती : विदुर

वेदव्यास : हाँ, विदुर, जो धृतराष्ट्र और पांडु का सहायक और प्रभुभक्त होगा।

(पर्दा गिरता है।)

समाप्त

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सीताराम पटेल 'सीतेश'

sitarampatel.reda@gmail. com

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